Jee Haan Likh Raha Hoon
Author:
NishantPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Unavailable
व्यक्ति के मन, जीवन की छटपटाहट और असन्तोष कैसे कविता में आकर अभिव्यक्ति के फार्म्स और साहित्य की संस्थाबद्धताओं के विरुद्ध संघर्ष में बदल जाता है, यह देखना हो तो निशान्त की ये कविताएँ पढ़नी चाहिए। यह हाशिए से चलकर केन्द्र तक आए एक रचना-विकल मन का आक्रोश है जो इस संग्रह की, विशेषकर तीन लम्बी कविताओं में अपना आकार पाने, अपनी पहचान को एक रूप देने की अथक और अबाध कोशिश कर रहा है।</p>
<p>नाभिक से फूटकर वृत्त की परिधि रेखा की तरफ़ ताबड़तोड़ बढ़ता यह विस्फोट हर उस दीवार, मठ और शक्ति-केन्द्र को ध्वस्त करना चाहता है जो एक उगते हुए अंकुर के विकास को लगभग अपना कर्त्तव्य मानकर बाधित करना चाहते हैं। एक तरह से यह बीसवीं सदी के आख़िरी दशक में उभरी प्रतिरोध की वह युवा-मुद्रा है जिसे अपना हर रास्ता या तो अवरुद्ध मिला या फिर बेहद चुनौतीपूर्ण। समाज में बाज़ार अपनी चकाचौंध के साथ पसरा हुआ था और भाषा में संवेदना, परदुख और सरोकार आदि शब्दों के बड़े व्यापारी अपनी उतनी ही चमकीली दुकानें फैलाए बैठे थे।</p>
<p>इस संग्रह में शामिल तीनों लम्बी कविताएँ—‘कबूलनामा’, ‘मैं में हम, हम में मैं’ और ‘फ़िलहाल साँप कविता’—इन सब आक्रान्ता बाज़ारों-दुकानों के पिछवाड़े टँगे ख़ाली कनस्तरों को पीटने और पीटते ही चले जाने का उपक्रम है। उम्मीद है, यह कर्ण-कटु ध्वनि आपको रास आएगी।</p>
<p>साथ में हैं ‘कोलकाता’ और विभिन्न चित्रकारों की चित्रकृतियों पर केन्द्रित दो कविता-शृंखलाएँ जिनमें निशान्त का कवि अपनी काव्य-भूमि को नई दिशाओं में बढ़ाते हुए अपने पाठक को अनुभूति की अपेक्षाकृत दूसरी दुनिया में ले जाता है।</p>
<p>
ISBN: 9788126722600
Pages: 168
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि सुप्रतिष्ठित कवि राकेश मिश्र का चतुर्थ काव्य-संग्रह शब्दों का देश प्रकाशित हो रहा है। इस संकलन में दो सौ के आस-पास कविताएं संकलित हैं, जो मिश्र जी के विकसित भाव-बोध और विश्व-बोध का सतर्क परिचय देती हैं।
यहां कवि जिस तटस्थता से शब्दों एवं संवेदनाओं के संश्लेषण द्वारा जिंदगी और कविता को परस्पर अनुस्यूत करता है, उससे जीवन और जगत का वैविध्यपूर्ण-अनावृत यथार्थ पूरी मर्मस्पर्शिता तथा गहनता के साथ प्रस्तुत हुआ है। मिश्र जी अपने सुख-दुख, उदात्त प्रेम, जीवन-बोध, विश्व-बोध, उर्वर सहानुभूति, समय-समाज के बदलते संदर्भों, प्रकृति-पर्यावरण के प्रति चिंता और मानवीय सरोकारों को जिस मौलिकता और सहजता से चित्रित करते हैं, उससे इस संकलन की कविताएं एक विशिष्ट संवेदनात्मक गहराई और बौद्धिक उत्कर्ष प्राप्त करती हैं।
इस संकलन का केन्द्रीय भाव-बोध और मूल प्रतिपाद्य यह है कि प्रकृति-पर्यावरण की तरह ही भौतिक-जीवन, वैयक्तिक अनुभव-स्मृतियाँ और वस्तु जगत मनुष्य की नियति को कैसे संचालित करता है तथा कैसे उसे घेरे रहता है, इसे आविष्कृत करने का दुष्कर और चुनौतीपूर्ण कार्य इस संग्रह की कविताओं द्वारा सम्पन्न हुआ है। इसमें प्रेम, सौंदर्य, आसपास के जीवनानुभव, गांव-शहर से लेकर वैश्विक घटनाओं तक का गत्यात्मक चित्रण हुआ है। शब्दों का देश अमानवीय स्थितियों के बीच मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने के प्रयास की अभिव्यक्ति है, जिसमें कवि की दुर्निवार आस्था, संघर्ष चेतना की सही पहचान और अनुभव जगत का वैविध्यपूर्ण समारोह उपस्थित हुआ है। इसमें कवि की लघु, सामान्य और लंबी कविताओं का मनोरम विन्यास, भावों की उत्कटता, चित्रण की सूक्ष्मता एवं जीवनानुभूति की गहनता के साथ एक विशिष्ट औदात्य और वैभव से सम्पन्न हैं जो एक बड़ी संभावना की ओर बढ़ रहे कवि का निदर्शन कराती हैं। इस दृष्टि से संग्रह की सारी कविताएँ बेहद पठनीय, चिंतनीय और पाठक को संवेदन एवं बौद्धिक धरातल पर समृद्ध करने वाली हैं।
—डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय
Jaise Chand Par Se Dikhti Dharti
- Author Name:
Harjendra Chaudhary
- Book Type:

- Description: हरजेन्द्र चौधरी के पहले कविता-संग्रह ‘इतिहास बोलता है’ की कविताओं में जो गड़गड़ाता आवेश था, वह इस संग्रह की कविताओं में काफ़ी हद तक मंथर हो गया लगता है। समाज और संसार को अपनी अवधारणाओं, अपने सपनों के मुताबिक ढाल लेने की वह बेचैनी इन कविताओं में भी दिखाई पड़ती है लेकिन अधिक संयत, अधिक सधे हुए रूप में। चतुर्दिक घटित हो रहे सामाजिक परिवर्तन की गहरी पहचान और उसके सघन अनुभव इन कविताओं को अपेक्षाकृत अधिक 'स्थायी' प्रभविष्णुता प्रदान करते दिखाई पड़ते हैं। कवि यहाँ सामाजिक परिवर्तन की दिशा-गति के बिम्ब रचता है, जिनमें एक नैतिक आग्रह और 'रेजिस्टेंस' भाव अन्तर्निहित है। धरती पर से चाँद देखने की बजाय चाँद पर से धरती देखने-दिखाने वाली इन कविताओं में भाषा और बिम्बों की गजब की ताज़गी है। ये कविताएँ एक गहरी मानवीय संवेदना की कविताएँ हैं। यह आकस्मिक नहीं है कि हरजेन्द्र चौधरी की कविताओं में किसान, कवि, औरत और बच्चे की उपस्थिति बार-बार दर्ज होती है। यहाँ इन्हें मानवीय संवेदना के बचे रहने के लक्षण और उसे बचाए रखने की चिन्ता के प्रमाणों के रूप में भी पढ़ा-देखा जा सकता है। साथ ही इन कविताओं में हम अपने 'समय का चेहरा' देख सकते हैं, जो निरन्तर बदल रहा है—जितना बाहर जीवन में, उतना ही इन कविताओं के भीतर भी। प्रतिकूल परिस्थितियाँ और मानवीय संघर्ष—दोनों की टकराहट भरी पारस्परिकता बार-बार इन कविताओं में स्थान पाती है। सामूहिक ज़िन्दगी को अनेकविध प्रभावित करने वाले 'सुदूर' कारणों को भी इन कविताओं में बिना किसी बड़बोलेपन के इतनी सहजता से स्थान दे दिया गया है कि पाठक चमत्कृत हुए बिना इनकी पकड़ में आ जाता है।
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