Jee Haan Likh Raha Hoon
(0)
₹
150
120 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
व्यक्ति के मन, जीवन की छटपटाहट और असन्तोष कैसे कविता में आकर अभिव्यक्ति के फार्म्स और साहित्य की संस्थाबद्धताओं के विरुद्ध संघर्ष में बदल जाता है, यह देखना हो तो निशान्त की ये कविताएँ पढ़नी चाहिए। यह हाशिए से चलकर केन्द्र तक आए एक रचना-विकल मन का आक्रोश है जो इस संग्रह की, विशेषकर तीन लम्बी कविताओं में अपना आकार पाने, अपनी पहचान को एक रूप देने की अथक और अबाध कोशिश कर रहा है।</p> <p>नाभिक से फूटकर वृत्त की परिधि रेखा की तरफ़ ताबड़तोड़ बढ़ता यह विस्फोट हर उस दीवार, मठ और शक्ति-केन्द्र को ध्वस्त करना चाहता है जो एक उगते हुए अंकुर के विकास को लगभग अपना कर्त्तव्य मानकर बाधित करना चाहते हैं। एक तरह से यह बीसवीं सदी के आख़िरी दशक में उभरी प्रतिरोध की वह युवा-मुद्रा है जिसे अपना हर रास्ता या तो अवरुद्ध मिला या फिर बेहद चुनौतीपूर्ण। समाज में बाज़ार अपनी चकाचौंध के साथ पसरा हुआ था और भाषा में संवेदना, परदुख और सरोकार आदि शब्दों के बड़े व्यापारी अपनी उतनी ही चमकीली दुकानें फैलाए बैठे थे।</p> <p>इस संग्रह में शामिल तीनों लम्बी कविताएँ—‘कबूलनामा’, ‘मैं में हम, हम में मैं’ और ‘फ़िलहाल साँप कविता’—इन सब आक्रान्ता बाज़ारों-दुकानों के पिछवाड़े टँगे ख़ाली कनस्तरों को पीटने और पीटते ही चले जाने का उपक्रम है। उम्मीद है, यह कर्ण-कटु ध्वनि आपको रास आएगी।</p> <p>साथ में हैं ‘कोलकाता’ और विभिन्न चित्रकारों की चित्रकृतियों पर केन्द्रित दो कविता-शृंखलाएँ जिनमें निशान्त का कवि अपनी काव्य-भूमि को नई दिशाओं में बढ़ाते हुए अपने पाठक को अनुभूति की अपेक्षाकृत दूसरी दुनिया में ले जाता है।</p> <p>
Read moreAbout the Book
व्यक्ति के मन, जीवन की छटपटाहट और असन्तोष कैसे कविता में आकर अभिव्यक्ति के फार्म्स और साहित्य की संस्थाबद्धताओं के विरुद्ध संघर्ष में बदल जाता है, यह देखना हो तो निशान्त की ये कविताएँ पढ़नी चाहिए। यह हाशिए से चलकर केन्द्र तक आए एक रचना-विकल मन का आक्रोश है जो इस संग्रह की, विशेषकर तीन लम्बी कविताओं में अपना आकार पाने, अपनी पहचान को एक रूप देने की अथक और अबाध कोशिश कर रहा है।</p>
<p>नाभिक से फूटकर वृत्त की परिधि रेखा की तरफ़ ताबड़तोड़ बढ़ता यह विस्फोट हर उस दीवार, मठ और शक्ति-केन्द्र को ध्वस्त करना चाहता है जो एक उगते हुए अंकुर के विकास को लगभग अपना कर्त्तव्य मानकर बाधित करना चाहते हैं। एक तरह से यह बीसवीं सदी के आख़िरी दशक में उभरी प्रतिरोध की वह युवा-मुद्रा है जिसे अपना हर रास्ता या तो अवरुद्ध मिला या फिर बेहद चुनौतीपूर्ण। समाज में बाज़ार अपनी चकाचौंध के साथ पसरा हुआ था और भाषा में संवेदना, परदुख और सरोकार आदि शब्दों के बड़े व्यापारी अपनी उतनी ही चमकीली दुकानें फैलाए बैठे थे।</p>
<p>इस संग्रह में शामिल तीनों लम्बी कविताएँ—‘कबूलनामा’, ‘मैं में हम, हम में मैं’ और ‘फ़िलहाल साँप कविता’—इन सब आक्रान्ता बाज़ारों-दुकानों के पिछवाड़े टँगे ख़ाली कनस्तरों को पीटने और पीटते ही चले जाने का उपक्रम है। उम्मीद है, यह कर्ण-कटु ध्वनि आपको रास आएगी।</p>
<p>साथ में हैं ‘कोलकाता’ और विभिन्न चित्रकारों की चित्रकृतियों पर केन्द्रित दो कविता-शृंखलाएँ जिनमें निशान्त का कवि अपनी काव्य-भूमि को नई दिशाओं में बढ़ाते हुए अपने पाठक को अनुभूति की अपेक्षाकृत दूसरी दुनिया में ले जाता है।</p>
<p>
Book Details
-
ISBN9788126722600
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Madhumas Utar Aya
- Author Name:
Kashiram Soni
- Book Type:

- Description: poetry-and-plays
Pratinidhi Shairy : Akbar Allahabadi
- Author Name:
Akbar Allahabadi
- Book Type:

-
Description:
1851 की जंगे–आज़ादी में हिन्दुस्तानियों की हार के बाद उर्दू अदब में शुरू होनेवाले रेनासाँ में ‘अकबर’ इलाहाबादी का नाम सफ़े–अव्वल के शायरों में गिना जाता है। धर्म पर आधारित इस रेनासाँ की सारी विशेषताएँ ‘अकबर’ के यहाँ पूरी स्पष्टता के साथ देखी जा सकती हैं।
‘अकबर’ के कलाम की एक विशेषता और भी है। उन्होंने अपनी शायरी की शुरुआत संजीदा रवायती शायरी के साथ की थी। वही गुलो–बुलबुल, वही साग़ रो–मीना, वही शीरीं–फ़रहाद, वही शमा और परवाना रवायती शायरी के सारे प्रतीक ‘अकबर’ की शुरुआती शायरी में नज़र आते हैं। लेकिन अकबर इसी रवायत पर क़ायम रहे होते तो तय है कि वे मामूली दर्जे के सैकड़ों शायरों में बस एक होते।
लेकिन ख़ुशनसीबी कि ऐसा नहीं हुआ। जल्द ही अकबर ने अपनी एक अलग राह बना ली और वे हास्य–व्यंग्य के पहले प्रमुख शायर के रूप में जल्वागर हुए। यूँ तो जाफ़र, मीर, सौदा, ग़ालिब और दूसरे शायरों के यहाँ हास्य और व्यंग्य की सुन्दर छटाएँ देखने को मिलती हैं, लेकिन इनमें से किसी को भी बाक़ायदा हास्य–व्यंग्य का शायर नहीं कहा जा सकता। ये ‘अकबर’ थे जिन्होंने उर्दू शायरी में अपनी बात कहने के लिए हास्य–व्यंग्य का सहारा लिया और एक ऐसी नई रवायत की बुनियाद डाली जो आज तक फल–फूल रही है।
विचारधारा के स्तर पर देखें तो पश्चिमी ज्ञान–विज्ञान और पश्चिमी सभ्यता का जितना भारी विरोध ‘अकबर’ के यहाँ दिखाई देता है, उतना किसी और शायर के यहाँ नहीं दिखाई देता। इसी तरह ‘अकबर’ धार्मिक और सामाजिक सुधार के भी विरोधी थे। बदलते हुए हालात में ‘अकबर’ की शिकस्त लाज़मी थी और कहीं हास्य के साथ और कहीं दु:ख के साथ उन्होंने अपनी इस शिकस्त का इज़हार भी किया है। लेकिन इस नकारात्मक पहलू के अन्दर जो सकारात्मक तत्त्व मौजूद हैं, सावधानी के साथ उनकी निशानदेही किए बिना ‘अकबर’ के साथ इंसाफ़ करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
Kalam Aaj Unki Jai Bol
- Author Name:
Vinamra Sen Singh
- Book Type:

-
Description:
भारत का युवा जो साहित्य का विद्यार्थी है उसे भी या जो नहीं है वह भी ऐसे महान रचनाकारों के जीवन और सृजन से परिचित कराना पुस्तक का उद्देश्य है जिन्होंने भारत की स्वाधीनता में अपना तन-मन-धन सब कुछ समर्पित तो किया ही परन्तु अपनी लेखनी से ऐसा व्यापक जन जागरण किया कि सारा देश उस स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ा और अन्ततः अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही पड़ा। इस दृष्टि से इस पुस्तक में आधुनिक हिन्दी साहित्य के ऐसे 14 रचनाकारों के जीवन और सृजन पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया गया है जिन्होंने अपनी लेखनी के द्वारा स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया, जिनकी रचनाएँ भारतीय समाज को उसके स्वाभिमान, गौरव और स्वतन्त्रता के महत्त्व का बोध कराती हैं। ऐसे रचनाकारों के बारे में देश के प्रत्येक व्यक्ति को जानना आवश्यक है जिनके प्रति हम सभी भारतवासियों का कृतज्ञता भाव रखना कर्तव्य है। ऐसा नहीं कि यह विशेषता केवल इन 14 कवियों में ही थी। परन्तु पुस्तक की एक सीमा है। इसीलिए मेरी दृष्टि से जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण थे उन्हें इस पुस्तक में सम्मिलित किया गया।
पुस्तक में इन कवियों के जीवन और सृजन के साथ ही उनकी तीन-तीन ऐसी प्रमुख रचनाएँ भी संकलित की गई हैं जो राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
Hindostan Hamara : Vols. 1-2
- Author Name:
Jaan Nisar Akhtar
- Book Type:

-
Description:
सुविख्यात शायर जाँ निसार अख़्तर द्वारा दो खंडों में सम्पादित पुस्तक ‘हिन्दोस्ताँ हमारा’ में उर्दू कविता का वह रूप सामने आया है जिसकी ओर इसके पहले लोगों का ध्यान कम ही गया था। प्रायः ऐसा माना जाता है कि उर्दू की शायरी व्यक्ति के प्रेम, करुणा और संघर्ष तक ही सीमित है और समय, समाज, राष्ट्र, प्रकृति तथा इतिहास से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। परन्तु यह पूरी तरह एक भ्रान्त धारणा है, इसकी पुष्टि इस पुस्तक के दोनों खंडों में संकलित सैकड़ों कविताओं से होती है। इनमें देश-प्रेम के साथ-साथ भारत की प्रकृति, परम्परा और इतिहास को उजागर करनेवाली कविताएँ भी हैं। हिमालय, गंगा, यमुना, संगम आदि पर कोई दर्जन भर कविताएँ हैं, तो राजहंस, चरवाहे की बंसी और धान के खेत भी अछूत नहीं हैं। होली और वसंतोत्सव जैसे त्योहारों पर भी उर्दू शायरों ने बड़ी संख्या में कविताएँ लिखी हैं। इनमें ‘मीर’ और ‘नज़ीर’ की रचनाएँ तो काफ़ी लोकप्रिय रही हैं।
ताजमहल ही नहीं अजंता, एलोरा और नालन्दा के खँडहर पर भी शायरों की नज़र है। देश के विभिन्न शहरों और आज़ादी के रहनुमाओं के साथ-साथ राम, कृष्ण, शिव जैसे देवताओं पर भी कविताएँ लिखी गई हैं। साथ ही ‘कुमार सम्भव’, ‘अभिज्ञान शाकुन्तल’, ‘मेघदूत’ जैसे महान संस्कृत काव्यों का अनुवाद भी उर्दू में हुआ है जिसकी झलक इस संकलन में मिलती है।
कुल मिलाकर उर्दू कविता का यह एक ऐसा चेहरा है जो इस संकलन के पहले तक लगभग छुपा हुआ था। भारत की सामासिक संस्कृति में उर्दू कविता के योगदान को रेखांकित करनेवाले इस संकलन का ऐतिहासिक महत्त्व है। पहली बार 1965 में इसका प्रकाशन हुआ था। उर्दू कविता की दूसरी परम्परा, जो वास्तव में मुख्य परम्परा है, को रेखांकित करनेवाला यह संकलन पिछले कई वर्षों से अनुपलब्ध रहा है। अब राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा इसे नई साज-सज्जा के साथ अविकल रूप में प्रकाशित किया जा रहा है।
Rashmimala
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Samkaleen Marathi Anudit Kavita
- Author Name:
Sunil Baburao Kulkarni
- Book Type:

-
Description:
मराठी कविता की 600 वर्ष की दीर्घ इतिहास परम्परा है। हर काव्य प्रवाह में उत्थान, ठहराव और अवसान के बाद पुनरुत्थान यह कालक्रम निरन्तर चलता रहता है। मध्यकाल में भक्ति परम्परा के माध्यम से निर्मित हुआ श्रेष्ठ संत काव्य मराठी कविता का महत्त्वपूर्ण उत्थान पर्व रहा है। 1920 से 1945 का काल एक अर्थ में थोपे गए रोमांटिसिज्म के कारण अवनति के काल के रूप में जाना जाता है। इस सांकेतिक शरणागतता तथा उसके कारण निर्मित तत्कालीन परिस्थिति को पहला आघात बा.सी. मर्ढेकर ने दिया।
स्वातंत्र्योत्तर काल के पहले दशक की कविताओं को नई कविता कहा जाता है। इस काल में बा.सी. मर्ढेकर और वि.दा. करन्दीकर की कविताओं में परिवेश के इर्द-गिर्द घूमती हुई कविताओं की परिपाटी पर चलने वाली कविताओं के सृजन का प्रयास दिखाई देता है। वैश्वीकरण के कारण होने वाले बदलावों का अप्रत्यक्ष प्रभाव 1990 के बाद की कविताओं पर रहा है। इस काल के कवियों पर आसपास के परिवेश, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा भाषिक पर्यावरण का प्रभाव होता है।
प्रस्तुत उपक्रम में इस काल में आकार लेने वाले नये सामाजिक, आर्थिक, राजकीय, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परिवेश के माध्यम से मराठी कविता में आए नव प्रवाहों पर संक्षिप्त रूप में प्रकाश डालते हुए हिन्दी भाषिक विद्यार्थियों को मराठी कविता का परिचय कराने का प्रयास इस विषय पत्रिका का प्रमुख उद्देश्य रहा है।
इस दृष्टि से कविता का सृजन करने वाले पिछले तीन दशकों में मराठी कवियों की संख्या विशेष लक्षणीय है। ये कवि महाराष्ट्र के कोने-कोने में व्याप्त हैं। ग्रामों से शहरों तक में निवास करने वाले ये कवि अपने परिवेश की सुगंध को कायम रख कविताएँ लिख रहे हैं।
संकलन की कविताओं और कवियों का चयन करते समय यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखी गई है कि चयनित कवि मूलत: मराठवाड़ा प्रांत से ही सम्बन्धित हों। इन सभी कवियों के मराठवाड़ा की मिट्टी में पले-बढ़े होने के कारण इनकी कविताओं में मिट्टी की सोंधी सुगन्ध के साथ-साथ मराठवाड़ा की भूमि पर घटित सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक गतिविधियों का यथार्थ चित्र अंकित हुआ है। उसे जानने और समझने में छात्रों को निश्चित रूप से सहायता मिलेगी, ऐसा हमें पूरा विश्वास है।
Pani Ki Prarthana : Paryavaran Vishayak Kavitayen
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

- Description: ारनाथ सिंह के कविता-कर्म में प्रकृति और पर्यावरण की उपस्थिति बरगद की जड़ों की तरह इतनी गहरी और विस्तीर्ण है कि उनकी कुछेक कविताओं को पर्यावरण-केन्द्रित कहना अन्याय होगा। उनकी कई ऐसी कविताएँ जो आपाततः प्रकृति और पर्यावरण की परिधि से बाहर दिखती हैं, लोक और प्रकृति के ताने-बाने को अन्तःसलिला की तरह समेटकर रखती हैं। उनकी पर्यावरण सम्बन्धी कविताओं का चयन दुष्कर तो है ही, कइयों को ग़ैरज़रूरी भी लग सकता है। यह भी हो सकता है कि इस तरह के चयन में ऐसी कई कविताएँ छूट जाएँ जिनमें प्रकृति और पर्यावरण की चिन्ता थोड़े भिन्न स्वरूप में मौजूद है। इस चयन का उद्देश्य केदारनाथ सिंह की ऐसी कविताओं को एक स्थान पर दर्ज करना है, जिनमें प्रकृति और पर्यावरण या तो चरित्र-नायक की तरह या स्थापत्य के स्तर पर अधिक प्रदीप्त हैं। आज पूरा विश्व जिस तरह से पर्यावरण संकट से गुज़र रहा है, यह चिन्ता का विषय है। यह चिन्ता जब कवि की चिन्ता बन जाती है तो जीवन के संकट का प्रश्न बन जाती है क्योंकि कवि पूरी पृथ्वी का नागरिक होता है। पृथ्वी की सभी आहटें उसकी बंसी के सुर बन जाती हैं। ऐसे विषय जब लेखन में आते हैं तो अक्सर बेसुरे हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में कविताएँ सुरसाधक-शब्दसाधक की तरह आपका सन्तुलन बनाए रखती हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से केदारनाथ सिंह की कविताओं के चयन का यह सम्भवत: पहला प्रयास है। इससे कवि के दृष्टि-विस्तार को समझने और ऐसे विषयों को भाषा में बरतते हुए ज़रूरी संवेदनशील बिन्दुओं को उजागर करने में कुछ सहायता अवश्य मिलेगी, ऐसी उम्मीद है। साथ ही, कवि के कुछ अनचीन्हे बिन्दुओं को भी रेखांकित किया जा सक
Yeh Jo Kaya Ki Maya Hai
- Author Name:
Priyadarshan
- Book Type:

-
Description:
एक रचनाकार की पहचान इससे भी होती है कि वह अपने समकालीनों के बीच होते हुए उनसे कितना अलग है और अपने समय को दर्ज करने और उसके विकल्पों को देखने की उसकी प्रविधियाँ किस हद तक उसकी ‘अपनी’ हैं। इस अर्थ में प्रियदर्शन का नया संग्रह ‘यह जो काया की माया है’ कविता के आम प्रचलनों से बहुत हटकर है जिसमें यथार्थ के अनुभव और उसकी अभिव्यक्ति के उपकरण भी कुछ अलग ढंग के हैं।
इस संग्रह में ‘हमें जानवरों से क्षमा माँगनी चाहिए’, ‘काया का वर्णन’, ‘सोचने के कई तरीक़े होते हैं’, ‘धर्म की कविता’, ‘अधर्म की कविता’, ‘करुणा की कविता’, ‘ताक़तवर की कविता’, ‘कमज़ोर की कविता’ जैसी कई कविताएँ संकलित हैं जिनकी संरचना में भी ऐसी ही भिन्नता दिखाई देती है : उनमें कहीं अनुचिन्तनात्मक प्रवृत्ति मिलती है तो कहीं सूक्तियों जैसा चुटीलापन और कहीं अवधारणाओं और परिभाषाओं जैसी संक्षिप्ति।
प्रियदर्शन अपने वक़्त की शिनाख़्त कुछ ऐसी वस्तुओं, चिह्नों, बिम्बों और अवधारणाओं से करते हैं जो आमफ़हम होने के बावजूद आमतौर पर अनदेखे रहते हैं और उन्हें कविता का विषय लगभग नहीं माना जाता।
इस संग्रह की कुछ कविताएँ प्रत्यक्ष राजनीतिक व्यंग्य हैं और उनके विषय तात्कालिक और तक़ाज़ों से भरे हुए हैं, लेकिन अगर कविता की सत्ता-विमर्श से अलग एक ‘उच्चतर’ राजनीति होती है तो इस संचयन की ज़्यादातर कविताएँ राजनीतिक कही जाएँगी : ‘देशभक्ति एक ख़तरनाक शब्द है/किसी तलवार की तरह/जिससे तुम्हारी गर्दन बस यह पूछने के लिए/उड़ाई जा सकती है कि आज की तारीख़ में दाल की क़ीमत क्या है?’
—मंगलेश डबराल
The Darkness is Vanishing
- Author Name:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'
- Rating:
- Book Type:

- Description: The poems of Ramesh Pokhriyal "Nishank" represent innate, passionate ramifications and poetic mystification for readers. While they may include hymns and religious instructions, what stands out is the sentimental piety in the poems offered within this collection. As a poet, Nishank surveys possibilities, comparing them to actualities, facts, theories, alternatives, and ideals, weighing them together. Thus, his work is both insightful and foresightful, providing a sense of life’s worth. Remarkably, these poems are not complex; they are simple and pliable. The doctrines and practices they endorse are not new or recent but align with established norms. The poems that emerge from darkness invigorate the spirit, making our hearts dance and enveloping us in a mystical softness, enchanting enough to soothe distressed feelings while instilling a sense of truth, clarity, and refinement. Nishank conjures images of everyday, affable life, depicting socially intellectual and passionate men who dance, croon, and fall yet rise again—shortly devastated but soon resilient. His poems are both popular and distinctly contemplative. Hidden behind his voice lies every man; if you wish to understand his character, let the doors of the heart open and allow them to speak. *** The ardor for humankind may pulse in every throb of my heart; let there be a beautiful person within me. My only desire in this life is to die for my country, with my life as an emblem for humanity. *** Like worms clothing the wheat, jealousy, like termites, hollow out the preposterous. *** To erase darkness, those who burn like torches do so even in adverse torrents; they never extinguish. *** Happiness resides in the present, not in the future; it rests in the depths of the mind. —From this collection.
Mornaach
- Author Name:
Nida Fazli
- Book Type:

- Description: मोरनाच देवनागरी में आनेवाला निदा फ़ाज़ली का ऐसा संकलन है जिसमें उनकी अब तक की अधिकांश कविताएँ निरखी और परखी जा सकती हैं। इसमें पिछले पच्चीस बरसों की उनकी सोच-समझ और सरोकार का फैलाव है और अब तक आए तीनों मजमूओं में से ख़ुद लेखकीय चुनाव—इसीलिए एक अर्थ में यह निदा की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह भी कहा जा सकता है। इसमें ग़ज़लें भी हैं, नज़्में भी और कुछ गीत भी। शुरू का दौर भी है, बीच का भी और इधर का भी, लेकिन जो बात अव्वल से अब तक मुसलसिल बनी हुई है, वह है कवि का हर एक के लिए एक बेलौस लगाव—कुछ लोगों को यह सिनिसिज़्म की हदों को छूने वाला भी लग सकता है लेकिन शायद यह हर आधुनिक रचनाकार की मजबूरी है कि वह माँ, बाप, भाई, बहन, परिवार, स्त्री, प्रेम, समाज और देश—किसी को भी जस का तस स्वीकार नहीं करता। वह उन्हें सन्देह के कठघरे में धकेलकर सवाल करता है—ऐसे कि पहले वह सवाल पलटकर एक-एक कर ख़ुद उसका गिरेबान पकड़ ले और फिर अन्तत: समाज का होकर रह जाए। यही वह सच है जिसे अपने समय का हर सही रचनाकार अपने अनुभव की रोशनी में ही देखना और परखना चाहता है जैसाकि ख़ुद निदा फ़ाज़ली का ही एक दोहा है: वो सूफ़ी का कौल हो, या पंडित का ज्ञान जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान। —शानी
Is Yatra Mein
- Author Name:
Leeladhar Jagudi
- Book Type:

-
Description:
‘‘लीलाधर जगूड़ी ने अपने दूसरे संग्रह द्वारा हिन्दी कविता में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। यह एक बड़ी बात है। इन कविताओं में जीवन को उसकी समग्रता में पकड़ने की कोशिश है जो इधर के ख्यातिप्राप्त कवि भी नहीं कर पा रहे हैं। या तो वे अपनी भीतरी दुनिया में रमे रहते हैं या बाहरी दुनिया में भटकते रहते हैं। जगूड़ी ने दोनों छोरों को पकड़ा है, साधने की कोशिश की है, किसी एक का निषेध नहीं किया है। दोनों दुनियाओं को जोड़ने का प्रयास उनकी इस संग्रह की कविताओं में अक्सर दीखता है। इससे कवि इनसान की तरह आत्मीय बनता है, पैग़म्बर या क्रान्तिकारी की तरह आस्था और आतंक नहीं जगाता। इस तरह उनका रास्ता धूमिल से अधिक सही है। जगूड़ी की इस यात्रा में अन्तः और बाह्य यात्राओं का विलय है। सच्चे कवि के लिए ये दोनों यात्राएँ अलग नहीं होतीं, केवल उन पर आग्रह घटता-बढ़ता रहता है। अपने अनुभूतिलोक के कारण, प्रतिबद्धता के नाम पर ‘रूपवादी’ और ‘राजनीतिवादी’ उसे एक का होकर रखना चाहते हैं और प्रचारित करते हैं कि दूसरा संसार झूठा है। वास्तविक प्रतिबद्धता अनुभूति की ही प्रतिबद्धता है जिसे कवि निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में प्राप्त करता है और उससे बचता नहीं, रचता है।
जगूड़ी की दूसरी विशेषता इन दोनों दुनियाओं को जोड़ने का शिल्प है और तीसरा उनका बड़बोला न होना है। शिल्प के क्षेत्र में उनके बिम्ब फिसलते हुए प्रकृति से इनसान की ओर, इनसान से प्रकृति की ओर आते-जाते हैं। इस यात्रा में कहीं एक जगह रम नहीं जाते।
पेड़ के प्रतीक से जितना अधिक काम उन्होंने लिया है उतना बहुत कम नए कवियों ने लिया है। भाषा उनकी बोलचाल की, सहज है पर उसका प्रयोग वह एक असहज तेवर के साथ करते हैं, जिसकी ज़रूरत उनके जैसे कवियों को नहीं होनी चाहिए। भाषा का आप किसी आग्रह के साथ प्रयोग कर रहे हैं यह पाठक को बता देना कवि की अपनी ताक़त कम कर लेना है। कहीं-कहीं कविता के पूरे विन्यास में न खपने और चौंकाने वाले शब्दों का प्रयोग उन्होंने किया है जो अब उन्हें छोड़ देना चाहिए। कविता के सम्पूर्ण आकर्षण को किसी एक भड़कीले, असहनशील शब्द की ओर नहीं फेरना चाहिए।
लीलाधर जगूड़ी का यह संग्रह ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए।’’
—सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
(दिनमान, 13 मई, 1975)
Thank You for Leaving
- Author Name:
Rithvik Singh Rathore
- Rating:
- Book Type:

- Description: Dear reader, I wrote this book for the ones who feel everything too deeply. The rare souls who still listen to their hearts and believe in love. The ones who don’t hurt others just because they’re in pain. The ones who wear their hearts on their sleeves and carry kindness within. The ones who overthink, over-invest in people and over-love, always. This book is an ocean full of feelings, so if at any point, you feel like you’re drowning, take a moment to remind yourself that it’s a privilege to feel emotions as intensely as you do. Some people are so disconnected from their hearts that they don’t allow themselves to feel anything at all. That being said, I wish you a happy reading. This book will make you cry. Love, Rithvik
Pratinidhi Shairy : Mirza Shauq Lakhnawi
- Author Name:
Mirza Shauq Lakhnawi
- Book Type:

- Description: मौलाना अब्दुल माजिद दरियावादी ने नवाब मिर्ज़ा ‘शौक़’ लखनवी को ‘उर्दू का एक बदनाम शायर’ तो कहा ही, साथ ही यह फ़ैसला भी सुना दिया कि ‘आज उर्दू की तारीख़ में कहीं उसके लिए जगह नहीं।’ यह और बात है कि सच्चाई आख़िर सिर चढ़कर बोलती है, और अपने इसी लेख में मौलाना ने आख़िर यह बात मानी कि ‘शौक़’ की डायरी की ख़ूबियों ने उनके नाम को गुमनाम नहीं होने दिया; उन्हें बदनाम करके सही, ज़िन्दा रखा। अलावा इसके, आख़िर में वे ख़ुद को यह भी कहने के लिए मजबूर पाते हैं कि ‘मशरिक़ के बेहया सुख़नगी, उर्दू के बदनाम शायर, रुख़सत! तू दर्द भरा दिल रखता था; तेरी याद भी दर्दवालों के दिलों में ज़िन्दा रहेगी। तूने मौत को याद रखा; तेरी याद पर, इंशाअल्लाह, मौत न आने पाएगी।’ इस सिलसिले में स्वर्गीय प्रो. ‘मजनूँ’ गोरखपुरी की बात भी याद रखने योग्य है। लिखते हैं कि उनके एक अंग्रेज़ प्रोफ़ेसर ‘शौक़’ की ‘ज़ह्रे इश्क़’ से बेहद प्रभावित हुए और बोले, ‘तुम लोग हो बड़े कमबख़्त। यह मस्नवी और इस क़समपुर्सी की हालत में! आज यूरोप में यह लिखी गई होती तो शायर की क़ब्र सोने से लेप दी गई होती और अब तक इस मस्नवी के न जाने कितने नुस्ख़े, रंग-बिरंगे एडिशन निकल चुके होते।’ प्रो. ‘मजनूँ’ गोरखपुरी ने तो बल्कि इस मस्नवी का शुमार जनवादी साहित्य में किया है—“ख़वास के लिए यह ऐब है; मगर इसकी क़द्र अवाम से पूछिए।” मुहावरेदार ज़बान और दिलकश तर्ज़े-बयान, देसज और अरबी-फ़ारसी शब्दों पर एक समान अधिकार और उन्हें आपस में दूध-शक्कर कर देने की क्षमता, पात्रों का जीवन्त चरित्र-चित्रण और उनकी भावनाओं का मर्मस्पर्शी वर्णन, इश्क़े-मजाज़ी से इश्क़े-हक़ीक़ी तक की दास्तान—ये तमाम ऐसी ख़ूबियाँ हैं जो ‘शौक़’ को शायरों की पहली क़तार में ला खड़ी करती हैं। और एक मस्नवी जब रंगमंच पर पेश की जाए, फिर पूरा हॉल मातमघर बन जाए, चारों तरफ़ से सिसकियों और हिचकियों की आवाज़ें आनी लगें, कुछ लोग ग़श खाकर लुढ़क पड़ें, घर जाकर एक लड़की आत्महत्या कर ले, कुछ और लोग आत्महत्या की कोशिश करें, और फिर सरकार इस मस्नवी पर पाबन्दी लगा दे, तो आप इसे क्या कहेंगे? ‘शौक़’ को अश्लील कहनेवालों से यह बात ज़रूर पूछी जानी चाहिए कि अश्लीलता थोड़ी देर का मज़ा भले दे ले, क्या वह भावनाओं में इस तरह का तूफ़ान उठाने की क्षमता रखती है।
Kuchh Kavitayen Va Kuchh Aur Kavitayen
- Author Name:
Shamsher Bahadur Singh
- Book Type:

-
Description:
शमशेर जी का पहला कविता-संग्रह ‘कुछ कविताएँ’ 1959 में आया था और दूसरा ‘कुछ और कविताएँ’ 1961 में—यानी उस समय जब वे पचास वर्ष के थे। और ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने कविताएँ तभी लिखना प्रारम्भ किया था—इन दोनों संग्रहों की कविताएँ पिछले बीसेक वर्षों में लिखी गई थीं।
अधिकांश कवि पचास तक पहुँचते-पहुँचते अपने उतार पर होते हैं, लेकिन शमशेर के बारे में यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि निराला के बाद और ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ के पहले किसी भी एक कवि के दो ऐसे छोटे-छोटे अत्यन्त संकोची एवं विनम्र, संग्रहों ने हिन्दी कविता और उसकी आलोचना पर इतना गहरा और दूरगामी असर नहीं डाला।
शमशेर के अनेक कट्टर प्रशंसक अब भी यह मानते पाए जा सकते हैं कि उनकी अधिकांश कालजयी कविताएँ इन्हीं में हैं।...इसमें सन्देह नहीं कि ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में शमशेरियत के सारे मौलिक रंग मौजूद हैं—स्वस्थ-वयस्क रूमान, सारे सौन्दर्य में ऐसी सूक्ष्म-ऐन्द्रिक दृष्टि जो सिर्फ़ उन्हीं की है, शिल्प के प्रतिबद्ध और नाजुक प्रयोग जिनमें प्रगल्भता और प्रदर्शन का नितान्त अभाव है, ‘उर्दू’ और ‘हिन्दी’ का कारगर मेल, छन्दों, ग़ज़लों और नज़्मों से बेपरहेज़गी, कई सांस्कृतिक परम्पराओं का अपनी रक्त-मज्जा में अहसास, ‘परम्परा’ और ‘आधुनिकता’ का सहज मेल और इस सबके साथ और सबके ऊपर सर्वहारा—भारतीय सर्वहारा—के साथ तादात्म्य।
शमशेर ने छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, भारतीय-अरबी-फ़ारसी, परम्परा, आधुनिकतावाद, सौन्दर्यानुभूति, संगीत, चित्रकला, विश्व-समाज तथा राजनीति और प्रतिबद्धता के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं को अपनी अद्वितीय प्रतिभा में ढालकर जो अपना—केवल शमशेर का—काव्य, काव्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र गढ़ा है वह ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में अपने पूरे टटकेपन और उत्कर्ष के साथ उपस्थित है—मूल्यांकन के सारे ‘शुद्ध’, ‘शाश्वत’, कूढ़मग्ज़ और संकीर्ण सिद्धान्तों को विकलांग बनाता हुआ और एक बिलकुल अलग, पूर्णतर और बलिष्ठ सौन्दर्यशास्त्र तथा समीक्षा की माँग करता हुआ।
—विष्णु खरे
Koltar ke Pair
- Author Name:
Pallavi Sharma
- Book Type:

- Description: कविता सिर्फ बिंबों में नहीं रहती और न ही उस अर्थ में जो अंत में बस एक बात बोलता नज़र आता है। असली कविता तो वही है जो शब्दों के सार्थक समूह की यात्रा में अपने शीतल जल, तरल रंग या गर्म कोलतार की तरह बहती है। यह बहना दरअसल, उन शब्दों के बीच उसका सदा के लिए इस तरह रहना है कि पढ़ती हुई आँखों का स्पर्श उसे जगा दे। पल्लवी शर्मा संग्रह की पहली ही कविता में इस अंतर्धारा की उपस्थिति और इसकी अमोघ प्रभविष्णुता को न्योतती चेतावनी की तरह परोसती हैं, और जब आप आगे बढ़ते हैं तो वह संसार पीछे छूट जाता है जहाँ सामयिक यथार्थ और उसके अखबारी बोल बसते हैं। 'कोलतार के पैर' की कविताएँ आपको क्लोज़ अप के अनोखे चित्रकार जार्जिया ओ कीफ के द्वारा चित्रित कंकाल से सरककर निकलती जीवित जीभ जैसी अनुभूति से आपके आधे-अधूरे मन को मिलवाती हैं। इस संग्रह की कविताओं में यथार्थ तो है मगर उसे खर्चीले विवरणों की जगह उस स्पर्श के रूप में चित्रित किया गया है जो संवेदना को लगभग वह सब बता देता है जो विवरण बताते। लेकिन ऐसा भी नहीं कि पल्लवी में दृश्य नहीं। यहाँ दृश्य भी हैं मगर चित्रों की तरह कभी रूपांतरित तो कभी संघनित और कभी अमूर्त। कवि की चेतना का हाल यह कि 'जैसे एक चित्र खींचा हो किसी ने/और मैं उसका हिस्सा हूँ!' इस संग्रह की कविताएँ आपको रंगों और रेखाओं की दुनिया में ले जाती हैं। तरह-तरह की बातें करते तरह-तरह के रंग! चटख से लेकर मोनोक्रोम और कोलतार और कालिख तक। यह अकारण नहीं कि संग्रह में बिंदियों से चित्र बनाने की अनोखी शैली के लिए प्रसिद्ध यायोई कुसामा की मानसिक रुग्णता को उसी की बिंदियों से चित्रित किया गया है। —विनय कुमार
Uttar Kabeer Aur Anya Kavitayen
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
Description:
‘उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ’ केदारनाथ सिंह का पाँचवाँ काव्य-संकलन है, जिसमें पिछले छह-साढ़े छह वर्षों के बीच लिखी गई कविताएँ संगृहीत हैं। यह दौर बाहर और भीतर, दोनों ही धरातलों पर क्षिप्र परिवर्तनों का दौर रहा है। इस संग्रह की कविताओं में उसकी कुछ अनुगूँजें सुनी जा सकती हैं। पर एक ख़ास बात यह है कि यहाँ बहुत-सी कविताएँ एक ऐसे स्मृतिलोक से छनकर बाहर आई हैं, जहाँ समय के कई सम-विषम धरातल एक साथ सक्रिय हैं। इस संग्रह तक आते-आते कवि की भाषा में एक नई पारदर्शिता आई है। इस भाषालोक में कुछ भी वर्जित या अग्राह्य नहीं है—पर यहाँ ऐसे शब्दों पर भरोसा बढ़ा है, जो मानव-व्यवहार में लम्बे समय तक बरते गए हैं।
इस संग्रह की कविताओं में अपने स्थान के साथ कवि का रिश्ता थोड़ा बदला है, जिसका एक संकेत ‘गाँव आने पर’ जैसी कविता में देखा जा सकता है। रचना में यह नया धरातल एक तरह के आन्तरिक विस्थापन की सूचना देता है। विस्थापन की यह पीड़ा अनेक दूसरी कविताओं में भी देखी जा सकती है—यहाँ तक कि ‘कुदाल’ में भी। कोई चाहे तो कह सकता है कि यह कवि के काव्य-विकास में एक नए प्रस्थान की आहट है—हालाँकि ये कविताएँ अपने स्वभाव के अनुसार इस तरह का कोई दावा नहीं करतीं। इस संकलन की बहुत-सी कविताओं में एक अन्तर्निहित प्रश्नात्मकता है। वे अक्सर कुछ पूछती हैं—बाहर से कम और अपने-आपसे ज़्यादा। ‘उत्तर कबीर’ शीर्षक अपेक्षाकृत लम्बी कविता इस प्रश्नात्मक बेचैनी का एक बेलौस उदाहरण है। फिर इस पूछने की धार के आगे मुक्ति भी विडम्बनापूर्ण लगने लगती है और स्वयं कवि-कर्म भी—जो सड़ रहा है और ज़ाहिर कि बहुत कुछ है जो सड़ रहा है क्या मैं उसे बचा सकता हूँ कविता लिखकर?
Pratinidhi Kavitayen : Harivanshrai Bachhan
- Author Name:
Harivansh Ray Bachchan
- Book Type:

- Description: जीवन और योवन, सत्य और स्वप्न तथा सौन्दर्य और प्रेम के अप्रतिम कवि हरिवशराय बच्चन के विशाल काव्य-कोष से चुनी हुई ये कविताएँ बहुत दूर तक आपके साथ जाने वाली है । अपने जीवन का कोई-न-कोई रंग, कोई-न-कोई पहलू इनके शब्दबंधों में आप अवश्य तलाश लेंगे और कविता सहज ही आपकी निजी संवेदना का हिस्सा बन जाएगी । बच्चन-काव्य की यह एक ऐसी विशेषता है, जिससे छायावादोत्तर हिंदी कविता को लोकग्राह्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । दाय के रूप में प्राप्त छायावादी प्रयोगात्मक काव्य-शैली से अप्रभावित रहकर उन्होंने जीवन-सत्यों की अनुभुतिगम्य रचना की । काव्य-क्षेत्र में उनके पदार्पण और रचनात्मक विद्रोह को लक्ष्य करते हुए एक प्रक्यत समालोचक ने लिखा था कि “बच्चन सारा ढांचा बदलकर आए नई भाषा, नई अभिव्यंजना और नए किस्म की अनुभूति, उनका सब कुछ नया-ही-नया है ।” निश्चय ही बच्चन-काव्य का यह नयापन इस शताब्दी के पांच दशकों में फैला हुआ है और इस काल में होने वाली तमाम सामाजिक उथल-पुथल को भी उन्होंने कविताओ में रेखांकित किया है, पर इस सबको अनुभूति की आँख और संवेदना की छुं से ही परखा जा सकता है । तो आइए, इन कविताओं के माध्यम से हम अपने जीवन-यथार्थ और मनोमय भावलोक की यात्रा पर चलें ।
Baat Phoolon Ki
- Author Name:
Sarwjeet Sarw
- Book Type:

- Description: This book has no description
Ayachi
- Author Name:
Kashinath Mishra
- Book Type:

- Description: मनुष्य से याचना करना महापाप है। मनुष्य को केवल ईश्वर से याचना करने का अधिकार है’’ करीब 600 साल पहले मिथिला के इस दर्शन को अपने जीवन में उतारनेवाले महामहोपाध्याय श्री भवनाथ मिश्र प्रसिद्ध ‘अयाची’ के जीवन पर आधारित इस नाटक में मिथिला की ज्ञान परंपरा, सामाजिक इतिहास और भौतिक संतुष्टि के संस्कार को बेहतरीन तरीके से लिपिबद्ध किया गया है। इस नाटक का पहला संस्करण 1961 में प्रकाशित हुआ । दूसरा संस्करण आपके समक्ष है
Urvashi : Dinkar Granthmala
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
उर्वशी और पुरूरवा की प्रेम-कथा का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इस प्राचीनतम आख्यान को अपने युग के नए अर्थ से जोड़ने का सृजनात्मक प्रयास दिनकर की विलक्षण दृष्टि का परिचय है। वे मानते हैं कि उर्वशी सनातन नारी तो पुरूरवा सनातन नर का प्रतीक है। उर्वशी चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक् तथा श्रोत्र की कामनाओं तो पुरूरवा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द से मिलनेवाले सुखों से उद्वेलित मनुष्य का प्रतीक है।
पुरूरवा और उर्वशी का प्रेम मात्र शरीर के धरातल पर आकार नहीं लेता, वह शरीर से जन्म लेकर मन और प्राण के गहन, गुह्य लोकों में प्रवेश करता है। रस के भौतिक आधार से उठकर रहस्य और आत्मा के अन्तरिक्ष में विचरण करता है। पुरूरवा के भीतर देवत्व की तृषा है। इसलिए मर्त्य लोक के नाना सुखों में वह व्याकुल और विषण्ण है। उर्वशी देवलोक से उतरी हुई नारी है। वह सहज, निश्चिन्त भाव से पृथ्वी का सुख भोगना चाहती है। पुरूरवा की वेदना समग्र मानव-जाति की चिरन्तन वेदना से ध्वनित है।
उर्वशी से पुरूरवा के बिछड़ने के बाद विरह को दिनकर एक दार्शनिकता के साथ व्यक्त करते हैं—संन्यास प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सकता, न प्रेम संन्यास को क्योंकि प्रेम प्रकृति और परमेश्वर संन्यास है और मनुष्य को सिखलाया गया है कि एक ही व्यक्ति परमेश्वर और प्रकृति दोनों को प्राप्त नहीं कर सकता। ...और वेदना की भूमि चूँकि पुरूरवा के संन्यास पर समाप्त नहीं हुई, इसलिए औशीनरी की व्यथा ने कविता को वहाँ समाप्त होने नहीं दिया।
निहितार्थ यही कि इन्द्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श कर प्रेम की आध्यात्मिक महिमा को एक व्यापक धरातल पर रचती 'उर्वशी' दिनकर की अपने पाठ और प्रभाव में कभी न ख़त्म होनेवाली कृति है, एक दुर्लभ गीति-नाट्य कृति।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book