Ghazal Jab Baat Karti Hai
Author:
Dr. Versha SinghPublisher:
Shivna PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 160
₹
200
Available
This book has no description
ISBN: 9789387310896
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Dukh Ki Bandishen
- Author Name:
Sarvendra Vikram
- Book Type:

-
Description:
सर्वेन्द्र विक्रम का यह कविता-संग्रह ‘दु:ख की बन्दिशें' स्मृति और विस्मृति के बीच काँपते कुहासे की थाह लगाता है। समय और समाज की विडम्बनाएँ इस संग्रह की कविताओं का प्रस्थान हैं। सर्वेन्द्र व्यापक मनुष्यता के वृत्त में इन विडम्बनाओं का परीक्षण करते हैं। समूचे सामाजिक परिदृश्य में अदृश्य जैसा जीवन जी रहे असंख्य व्यक्तियों की 'मानवीय उपस्थिति' दर्ज करने की उत्कंठा इन रचनाओं में है।
कवि एक अघोषित विस्थापन अथवा निर्वासन की प्रक्रिया पर दृष्टि रख सका है। इसीलिए स्त्रियों का अस्मिता-विमर्श इन कविताओं में एक नई तर्कपूर्ण मार्मिकता प्राप्त करता है। इनमें ‘हल्की-सी नमी और असली कहानी जैसी दीप्ति’ का अनुभव किया जा सकता है। स्त्रियों के अपदस्थ आत्मविश्वास और आत्मसंघर्ष पर ऐसी कविताएँ विरल हैं। दुखहरन, वजीर और बरकत अली जैसे लोग लोकतंत्र में कहाँ हैं, ऐसे अनेक प्रश्न उठाती सर्वेन्द्र की कविताएँ निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। पूँजी, बाज़ार, सत्ता, भूमंडलीकरण और साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में अन्तर्ध्वनियों की तरह निहित हैं। ‘धुनिएँ’ कविता कहती है, ‘धुनिएँ दिल्ली जाते हैं या नहीं/पता नहीं/जहाँ बहुत कुछ है धुनने के लिए/रूई के अलावा भी।’
सर्वेन्द्र विक्रम उन तत्त्वों की पहचान भी करते हैं जिनकी समग्र संरचना में नए समाज का मानचित्र मौजूद है। उन्हें भली-भाँति ज्ञात है कि स्थानीयता की शक्ति और वैश्विकता का विवेक ही इस मानचित्र को सजीव कर सकता है। उल्लेखनीय है कि वे राजनीति पर इस तरह मौन हैं कि अभिव्यंजनाएँ सब प्रकट कर देती हैं। सभ्यता और संस्कृति के विकास का इतिहास आलोचनात्मक आशयों के साथ यहाँ व्यक्त हुआ है। एक सघन सतर्क संवेदनात्मक सन्तुलन इन कविताओं की अर्थ-सम्भावनाओं का परिविस्तार करता है। किसी बौद्धिक या शीर्षक की भाँति प्रयोग किए जानेवाले तात्कालिक पद प्रयोगों की अनुपस्थिति रचनाकार के उत्तरदायी कवि-कर्म का प्रमाण है। वस्तुत: सर्वेन्द्र सहभोक्ता की तरह इन कविताओं की रचना कर रहे हैं।
रस्मअदायगी में व्यस्त बहुतेरी समकालीन कविताओं की भीड़ में सर्वेन्द्र विक्रम का स्वर विश्वास का पुनर्वास है। मितकथन और सम्यक् कथन की सिद्धि संग्रह की उपलब्धि है।
Spandan
- Author Name:
Ashutosh Agnihotri
- Book Type:

-
Description:
सबसे अच्छी कविता वह है जो कविता की शर्तों से बाहर है। विज्ञ समाज ने जिसे नकार दिया है। सबसे अच्छी कविता उस जीवन की खोज में निकलती है, जिसे देखा नहीं गया और वह समकालीन कविता की तमाम जकड़बंदी और घेरेबंदी से बाहर हो जाती है। आशुतोष अग्निहोत्री समकालीन हिन्दी कविता के ऐसे ही विलक्षण कवि हैं। इनकी कविता हर वक्त साथ रहनेवाली प्रतिच्छवि की तरह है। कभी यह विचारों के सहारे खड़ी होती है तो कभी भावों के और कभी यह विभिन्न दृश्यों या चित्र-छवियों में रमती हुई नज़र आती है। ठीक एक आदमी की तरह ही उसका जीवित और गतिशील अस्तित्व है। जीवन की तरह ही उसका विस्तार है, और जीवन से भी कहीं बढ़कर उसकी दूरगामी छाया या प्रभाव है।
आशुतोष अग्निहोत्री का एक स्वतंत्र कवि-व्यक्तित्व है। इनकी दृष्टि कविता-पगी है। इनकी कविताएँ हमारी दृष्टि को व्यापक बनाती हैं। इनका देखना कुछ राग लिए होता है। कल्पना का उन्मेष भी अनुपम है।
आशुतोष अग्निहोत्री की कविताएँ धरती के हर कुछ से एक रिश्ता क़ायम करती हैं। इनके अनुभव से हमारे अन्तरमन का तार सहजता से जुड़ जाता है। इनमें जातीय परम्परा का बोध भी है। अनेक रंग और सौन्दर्य-बोध से नि:सृत इनकी कविताएँ जीने का अपना एक छंद विकसित करती हैं। इस नए किन्तु परिपक्व कवि का मैं अभिनन्दन करता हूँ।
—भारत यायावर
Lautati Dopaharein
- Author Name:
Sonnet Mondal
- Book Type:

-
Description:
सॉनेट मंडल अंग्रेजी कविता और साहित्य के सुपरिचित नाम हैं। हिन्दी में यह उनका पहला कविता-संग्रह है। लौटती दोपहरें की कविताएँ पढ़कर लगेगा कि ये एक ध्यानस्थ मस्तिष्क से प्रसूत रचनाएँ हैं। एक मन जो पूर्ण एकाग्रता की एक सीधी रेखा पर स्वयं को, अपने बहुत निकट से प्रसरित होकर ब्रह्मांड के छोर तक जाते समय को, अपने अतीत को और उस बीते, लेकिन कहीं अब भी ठहरे हुए काल में फॉसिल्स की तरह जमी स्मृतियों को बहुत ललक से देखता है।
वे कहते हैं—‘समय मेरी अदृश्य छाया है/उजाले में अदृश्य/नंगी आँखों से छिपी/सहज-बोध के लिए खुली।’ इस समय को पकड़ने और इन कविताओं के अन्तस तक पहुँचने के लिए हमें एक समतल अहसास के रास्ते पर चलना होता है। उनके कवि ने अपनी हर पद-चाप को ध्यान से सुना है, और बहुत करीने से कविता में निथारा है।
Pran-Bhang Tatha Anya Kavitayen
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: ं वर्तमान संग्रह को अपनी प्रारम्भिक रचनाओं का संग्रह बनाना चाहता था और इसका मुख्य रूप वही है भी। किन्तु पुरानी बहियों को उलटते-पलटते समय कुछ कविताएँ और मिल गईं, जिन्हें प्रारम्भिक रचनाएँ तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु जो उसी न्याय से प्रकाश में आने के योग्य हैं, जिस न्याय से कवि की प्रारम्भिक रचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं।' दिनकर जी के इस कथन से स्पष्ट है कि यह उनकी प्रारम्भिक कविताओं का संग्रह है। बावजूद इसके यह उनका एक ऐसा संग्रह भी है जिसके महत्त्व को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में उल्लेख किया है। प्रस्तुत संग्रह में एक लघु खंड काव्य 'प्रण-भंग' नाम से है जो महाभारत युद्ध में घटित श्रीकृष्ण के शस्त्र-ग्रहण की घटना पर आधारित है जिसे दिनकर जी ने खुद 'जयद्रथ-वध' के अनुकरण पर लिखा गया माना है। इस खंड काव्य में परम्परा और आधुनिकता का अन्तर्विरोध अपनी तार्किकता के साथ है। यही नहीं, इसमें भक्ति भी अपनी आस्था के साथ रूपायित हुई है। ‘प्रण-भंग’ के अलावा संग्रह की स्फुट कविताओं–‘शहीद अशफाक के प्रति’, ‘वायसराय की घोषणा पर’, ‘महात्मा गांधी’, ‘शहीदों के नाम पर’, ‘मूक बलिदान’, ‘तपस्या’, ‘शहीद’ आदि–में हम स्वर्णिम अतीत के प्रति संवेदनशीलता और अपने यथार्थ के प्रति अन्तर्विरोध को गहरे लक्षित कर सकते हैं। वहीं पुस्तक के अन्त में संगृहित अट्ठाईस क्षणिकाओं में सामाजिक पीड़ा और सांस्कृतिक चिन्तन है, तो सत्ता की शोषक-प्रवृत्ति के प्रति धारदार नज़रिया भी है जिसे इन पंक्तियों में देखा जा सकता है–‘राजा/तुम्हारे अस्तबल के/घोड़े मोटे हैं।/प्रजा भूखी और नंगी है।/घोड़ों को कोई अभाव नहीं।/लेकिन लोगों को हर तरफ़ की तंगी है।’ ‘प्रण-भंग और अन्य कविताएँ’ संग्रह के बारे में दिनकर जी के ही शब्दों को लेकर कहें तो यह उनके 'सम्पूर्ण काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालता है
Dhoop Se Roothi Chandni
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
- Rating:
- Book Type:

- Description: This book has no description
Samar Gatha
- Author Name:
Narendra Jain
- Book Type:

- Description: लब खुले, बाँहें फैलीं,खामोशी को तोड़ते शब्द और अहर्निश नदी की तरह बहते विचार एवं उनके समुच्चय का नाम है‘समर गाथा’। यह सिर्फ एक विचार पर कदमताल करते स्वरों का कलरव नहीं, बल्कि अलग-अलगसमय में उपजे विचारों का संकलन है। यह ताली-बजाऊ संस्कृति के विरुद्ध सघन और विवेकउद्वेलन का आवश्यक जनमार्ग है। यह सिर्फ विभिन्न दिनों में लिखे गए पत्रकारीय आग्रहभर नहीं है, इसमें सच और अनुभव को व्यक्त करने का जरूरी सामर्थ्य भी है। इसमें गहराईऔर संश्लिष्टता है, बोधगम्यता है। यह वह केंद्रीभूतधारणा है, जिसने ‘समर गाथा’ को पुस्तकाकार लेने में मेरी मदद की। मुरली, घर-आँगन, वन-उपवन,मन-तन की नहीं, जीवन की अहर्निश गूँज का नाम है ‘समर गाथा’। आप भिज्ञ हैं कि प्राणका रूपांतर भाषा है, इसमें प्रवाह है, स्पर्श है। प्रवाह है, इसलिए गति है, स्पर्शहै, इसीलिए संवाद भी है। मैंने जब-जब इन आलेखों को पढ़ा, इसमें तैरता रहा। मुझे लगाकि इसमें सामयिक दृष्टिबोध है, कहन है, कहन में जरूरी घनत्व है, फिर भी बहाव है; जैसेसभी नदियाँ सरस्वती हैं और सभी पहाड़ पुण्य। यह पुस्तक आपको अपनेदृष्टिकोण का विकास करने में मदद करेगी। कृपा करेंगे कि इसके पात्रों को हिंदू-मुसलमानके चश्मे से नहीं, क्रांतिकारी के रूप में देखेंगे तो समय और समाज को समझने में मददमिलेगी। —डॉ. पियूष जैनराष्ट्रीय सचिव, पैफ
Khoontiyon Per Tange Log
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
- Book Type:

-
Description:
‘खूँटियों पर टँगे लोग’ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का सातवाँ काव्य-संग्रह है, जिसमें शामिल अधिकतर कविताएँ 1976-1981 के बीच लिखी गई थीं। इन कविताओं में नियति और स्थिति को स्वीकार कर लेने की व्यापक पीड़ा है। यह पीड़ा कवि के आत्म से शुरू होकर समाज तक जाती है और फिर समाज से कवि के आत्म तक आती है और इस तरह कवि और समाज को पृथक् न कर, एक करती हुई उसके काव्य-व्यक्तित्व को विराट कर जाती है।
सम्प्रेषण की सहजता सर्वेश्वर की कविताओं का मुख्य गुण रहा है और इसकी कलात्मक साध इस संग्रह में और निखरी है। एक समर्थ कवि के स्पर्श से चीज़ें वह नहीं रह जातीं जो हैं—कोट, दस्ताने, स्वेटर सब-के-सब युग की चुनौतियों से टकराकर क्रान्ति, विद्रोह और विरोध से जुड़ जाते हैं। प्रतीकों और बिम्बों का ऐसा सहज इस्तेमाल दुर्लभ है। सर्वेश्वर का काव्य-संसार बहुत व्यापक है। इतना व्यापक संवेदन-क्षेत्र वह रचते हैं कि उनके एक कवि में अनेक कवि देखे जा सकते हैं और सभी सर्वेश्वर हैं। उनकी काव्य-भाषा लोक से आकर इस तरह सम्भ्रान्त भाषा में मिल जाती है कि एक का खुरदरापन और दूसरे का चिकनापन अलग-अलग पहचान पाना कठिन हो जाता है।
वस्तुतः ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ की कविताएँ सर्वेश्वर की काव्य-भाषा को और आगे बढ़ाती हैं तथा समकालीन हिन्दी काव्य को भी, जिसका चरित्र मूल्यों के अभाव और व्यवस्था के दबाव में तेज़ी से बदल रहा है। यह बदलाव, बिना किसी अतिरिक्त आग्रह के, सर्वेश्वर के इस संग्रह में आसानी से देखा जा सकता है।
Bela
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

-
Description:
‘बेला' और ‘नए पत्ते' के साथ निराला-काव्य का मध्यवर्ती चरण समाप्त होता है। 'बेला' उनका एक विशिष्ट संग्रह है, क्योंकि इसमें सर्वाधिक ताज़गी है। अफ़सोस कि निराला-काव्य के प्रेमियों ने भी इसे लक्ष्य नहीं किया, इसे उनकी एक गौण कृति मान लिया है। ‘नए पत्ते' में छायावादी सौन्दर्य-लोक का सायास किया गया ध्वंस तो है ही, यथार्थवाद की अत्यन्त स्पष्ट चेतना भी है। ‘बेला' की रचनाओं की अभिव्यक्तिगत विशेषता यह है कि वे समस्त पदावली में नहीं रची गईं, इसलिए ‘ठूँठ' होने से बच गई हैं।
इस संग्रह में बराबर-बराबर गीत और ग़ज़लें हैं। दोनों में भरपूर विषय-वैविध्य है, यथा—रहस्य, प्रेम, प्रकृति, दार्शनिकता, राष्ट्रीयता आदि। इसकी कुछ ही रचनाओं पर दृष्टिपात करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। ‘रूप की धारा के उस पार/कभी धँसने भी दोगे मुझे?', ‘बातें चलीं सारी रात तुम्हारी; आँखें नहीं खुलीं तुम्हारी।', ‘लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो/भरा दौंगरा उन्हीं पर गिरा।' बाहर मैं कर दिया गया हूँ। भीतर, पर, भर दिया गया हूँ।' आदि। राष्ट्रीयता ज़्यादातर उनकी ग़ज़लों में देखने को मिलती है।
निराला की ग़ज़लें एक प्रयोग के तहत लिखी गई हैं। उर्दू शायरी की एक चीज़ उन्हें बहुत आकर्षित करती थी। वह भी उसमें पूरे वाक्यों का प्रयोग। उन्होंने हिन्दी में भी ग़ज़लें लिखकर उसे हिन्दी कविता में लाने का प्रयास किया। लेकिन निराला-प्रेमियों ने उसे एक नक़ल-भर मान उन्हें असफल ग़ज़लकार घोषित कर दिया। सच्चाई यह कि आज हिन्दी में जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, उनके पुरस्कर्ता भी निराला ही हैं। ये ग़ज़लें मुसलसल ग़ज़लें हैं। मैं स्थानाभाव में उनकी एक ग़ज़ल का एक शे’र ही उद्धृत कर रहा हूँ :
तितलियाँ नाचती उड़ाती रंगों से मुग्ध कर-करके,
प्रसूनों पर लचककर बैठती हैं, मन लुभाया है।
Sahar Ke Khwab
- Author Name:
Monika Singh
- Book Type:

-
Description:
प्रेम की गहरी व्यंजना, नज़दीकियों और दूरियों की हस्सास अक्कासी, देश और समाज की तल्ख़ हक़ीक़तों से ज़ख़्मी मिसरों और शे’रों की गहरी बुनावट—इन सबसे मिलकर बनती हैं मोनिका सिंह की ग़ज़लें और इस नए ग़ज़ल-संग्रह के ख़्वाब।
कहते हैं सहर यानी सुबह के वक़्त देखे गए ख़्वाब सच हो जाते हैं। इस संग्रह की ग़ज़लों में ऐसे अनेक ख़्वाब सँजोए गए हैं, जिन्हें सच होना ही चाहिए। ख़ुशियों के, प्यार के, मिलन के, समाजी एकता और क़ौमी मुहब्बत के ख़्वाब के साथ मोनिका सिंह अपने वक़्त को भी बहुत गहराई से देखती है; और अपने मन को भी। यही वजह है कि उनके अहसास का सन्तुलन कहीं भी गड़बड़ाता नहीं है।
‘यकायक नींद में आँसू निकल आए; वो ख़्वाबों में मुझे तड़पा गया शायद।’ एक ग़ज़ल का यह शे’र जहाँ इश्क़ की गहरी संवेदना को रौशन करता है, वहीं हमें ऐसे शे’र भी पढ़ने को मिलते हैं: ‘दूरियाँ दो मज़हबों में की जिन्होंने, कह रहे वो/फ़ासले होते नहीं कम, बात इतनी सी नहीं है/ फेंककर स्याही बने हैं देशभक्ति के पुजारी/बँट गए मुद्दों में यूँ हम, बात इतनी सी नहीं है।’
देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली ग़ज़लों ने धीरे-धीरे उर्दू अल्फ़ाज़ से अपनी नज़दीकी बढ़ाई है, आमफ़हम होने के नाम पर सपाट होने की आशंका को उसने काफ़ी कम किया है, और उर्दू ग़ज़ल की बहुस्तरीय अर्थगर्भिता के नज़दीक गई है। यह बात इस संग्रह में भी देखने को मिलती है।
Pad Kupad
- Author Name:
Ashtbhuja Shukla
- Book Type:

-
Description:
‘पद-कुपद’ हिन्दी कविता की जनोन्मुख परम्परा में एक प्रतिमान है। अष्टभुजा शुक्ल ऐसे कवि हैं जिन्हें मनुष्यता के मौलिक मर्म का गहन ज्ञान है। उनकी कविताओं में वह गाँव और क़स्बा है जिसका संघर्ष निरन्तर बढ़ता जा रहा है। राजनीति और अर्थशास्त्र की भूमंडलीय परिभाषाओं के सम्मुख जो जीवन प्रायः भूलुंठित दिख रहा है, उसका प्रतिरोध अष्टभुजा शुक्ल की रचनाओं में गतिशील है।
पद-शैली में अष्टभुजा की ये अधिकांश रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पहले ही पाठकों-आलोचकों की प्रशंसा प्राप्त कर चुकी हैं। यह छन्द की वापसी जैसा कोई उपक्रम नहीं है, बल्कि शताब्दियों से आ रही कबीरी पुकार का पुनर्नवन है। स्वीकृत पद-शैली के आयतन में कवि ने समकालीन समाज के अन्तर्विरोधों व अन्तःसंघर्षों को व्यक्त किया है।
‘लोहे के कुछ चने सुबह थे, सायं जिन्हें भिगोया/पानेवाले राज पा गए, अष्टभुजा सब खोया।’ —आम जन के दु:ख-दर्द को प्रकट करते हुए अष्टभुजा शुक्ल इसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति, प्रवृत्ति, व्यवस्था तक जाते हैं। जिस प्रखर राजनीतिक विवेक की आज हिन्दी कविता में सर्वाधिक आवश्यकता है, वह ‘पद-कुपद’ का प्राण-तत्त्व है।
शब्द की त्रिशक्ति के पारखी अष्टभुजा शुक्ल के इन पदों में व्याप्त व्यंग्य अनायास कवि नागार्जुन की याद दिलाता है। इन रचनाओं में जाने ऐसे कितने शब्द हैं जो विस्मृतप्राय पुरखों की तरह सामने आ खड़े होते हैं। कहना न होगा कि यह काव्यभाषा केवल अष्टभुजा के रचना-संसार में ही सम्भव है। यदि एक उदाहरण देना हो तो गन्ना पर रचा पद पढ़ा जा सकता है। बीस पंक्तियों में समूचा जीवन और उसका दर्शन समाया है—‘कटकर, छिलकर, निचुड़-निचुड़कर होकर गेंड़ी-गेंड़ी/अष्टभुजा की गाँठ बची तो फिर पनपेगी पेंड़ी’।
‘पद-कुपद’ वस्तुतः हिन्दी की जातीय कविता का अर्थवान विस्तार है। पथरीले यथार्थ के बीच अदम्य जिजीविषा की दूब अर्थात् अनहारी हरियाली की पहचान इन पदों को महत्त्वपूर्ण बनाती है।
Ghar Ki Aurten Aur Chand
- Author Name:
Renu Hussain
- Book Type:

- Description: रेणु हुसैन की कविताओं की जो दुनिया है, उसकी केन्द्रीय धुरी है प्रेम। उनकी कविताओं के विषय अपनी पूरी विविधताओं के बावजूद घूम-फिर कर इसी धुरी पर लौट आते हैं लेकिन प्रेम की यह धुरी किसी भी मायने में एकांगी या एकरूपीय नहीं है, बल्कि अपनी पूरी सघनता और विस्तार के साथ बहुआयामी और बहुरूपीय है। आज के समय में जब प्रेम की चारों तरफ़ से घेरा जा रहा है। ‘लव जेहाद’ जैसे फ्रेज़ेज का सायास निर्माण किया जा रहा है, यहाँ प्रेम से पोषित रेणु हुसैन की ये कविताएँ व्यवस्था तथा ऐसे शब्दों के समक्ष मुस्कुराती हुई दिखाई देती हैं। रेणु हुसैन की कविताओं की एक दूसरी धुरी है घर और स्त्री। बात चाहे जो हो रेणु जी की कविताओं में घूमघामकर घर और स्त्री आ ही जाते हैं। लेकिन उनकी कविताओं में स्त्री जितना घर के भीतर है, उतनी वह घर के बाहर नहीं है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि घर के भीतर की स्त्री घर के बाहर नहीं देखती। देखती है लेकिन कम देखती है, मगर जब देखती है तो उसका फ़लक बहुत विस्तृत होता है। इस संग्रह में बहुत-सी कविताएँ इस बात का सशक्त उदाहरण हैं। घर और स्त्री से जुड़ी रेणु जी की कविताएँ इस बात का पता देती हैं कि घर के भीतर स्त्री जितनी है उतना ही स्त्री के भीतर घर। लेकिन रेणु जी की कविताओं में घर और स्त्री का यह सम्बन्ध उन अर्थों में बिल्कुल नहीं है जिन अर्थों में वह जाना जाता है। इन कविताओं में घर बिल्कुल अलग तरीक़े से आता है। अगर घर कहीं किसी रूप में स्त्री को बाँध रहा है तो उतना ही वह उसे आज़ाद भी कर रहा है। स्त्री जितना घर के बाहर जाती है, उतना ही लौटकर घर में वापिस आती है लेकिन अपनी पूरी ठसक, आज़ादी और सम्मान के साथ। ऐसा लगता है कि जैसे स्त्री और घर दोनों एक दूसरे के भीतर लगातार यात्रा कर रहे हैं। लेकिन इस यात्रा में स्त्री लगातार घर से आगे निकलती दिखाई देती है। रेणु हुसैन की कविताओं को देखकर लगता है कि जैसे पेड़ में पत्ते फूटते हैं और फूल आते हैं, ठीक उसी तरह ये कविताएँ काग़ज़ पर चली आई हैं। इन कविताओं में छलक पड़ता और सजीव हो उठता-सा रोमानीपन लगातार हमें अपनी तरफ़ खींचता है। इन कविताओं की भाषा में एक अलग क़िस्म का नयापन और अनोखापन है जो मुसलसल एक वाक्य से दूसरे में गूँजता और दृश्यमान होता हुआ दिखाई देता है। उनकी कविताएँ पढ़ते हुए लगातार ऐसा लगता रहता है मानो शब्द और वाक्य कवयित्री ने चुने नहीं हैं, बल्कि वे चुन लिए गए हैं भावों के द्वारा अपनी अभिव्यक्ति के लिए। रेणु हुसैन की कविताएँ और उनकी भाषा हमें इस बात का पता देती हैं कि ये रेणु हुसैन की कविताएँ हैं और रेणु हुसैन की भाषा। —रजनी अनुरागी
Siddharth Aur Gilahari Chayan
- Author Name:
K. Satchidanandan
- Book Type:

-
Description:
गहरी करुणा, वैचारिक परिपक्वता और संसार को मनुष्यों समेत हर जीव के लिए एक उदार खुली जगह बनाने की मंशा से युक्त के. सच्चिदानन्दन की ये कविताएँ हमें एक बड़े रचनाकार का भावप्रवण सान्निध्य उपलब्ध कराती हैं।
के. सच्चिदानन्दन मलयालम भाषियों के लिए जितने अपने हैं, उतने ही हिन्दी भाषी पाठकों के भी हैं। अनामिका अनु द्वारा संकलित-अनूदित यह संग्रह उनकी कविता-यात्रा का अगला चरण है। वे ऐसे कवि हैं जो न अपने फ़ॉर्म को पुराना पड़ने देते हैं, न ही अपनी दृष्टि को। भीतर और बाहर की अपनी यात्राओं और कला-साहित्य के विभिन्न अनुशासनों से अपने लगाव के चलते वे अपनी कविता को लगातर नई करते रहते हैं। उन्हीं के शब्दों में : ‘मेरी कविता एक संवाद है जो मैं अपने से, दूसरों से, प्रकृति से और सृष्टि से अनवरत करता रहता हूँ। आधी सदी से भी ज़्यादा समय से मैं कविता लिख रहा हूँ, कविता का अनुवाद भी करता रहा हूँ, कविता के बारे में लिखता भी रहा हूँ, फिर भी हर नई कविता के सम्मुख मैं एक ‘बिगिनर’ की तरह ही प्रस्तुत होता हूँ। हर नई कविता में अपने अनुभव को व्यक्त करने के लिए मुझे नए सिरे से सही शब्दों और उपयुक्त शिल्प की तलाश करनी होती है।’
इस संकलन की कविताएँ अपनी कथ्यगत विविधता और संवेदना की व्यापक परिधि के साथ पुन: हमें उनकी कविता के विराट लोक में ले जाती है जहाँ दु:ख के कमरे हैं, और देशों की सीमाएँ उलांघती मानवीयता के विशाल पंख भी।
Mere Desh Mein Kahte Hain Dhanyavad
- Author Name:
Sharad Chandra
- Book Type:

-
Description:
रने एमिल शार्, जिन्हें अल्बैर् कामू अपने समय का महानतम कवि मानते थे, का जन्म दक्षिणी फ्रांस के प्रोवॉन्स प्रदेश के एक नामी और ख़ूबसूरत क़स्बे, ईल-सुर-सोर्ग में, 7 जून, 1907 को हुआ था। उन्होंने अपने जीवन का ज़्यादातर समय पेरिस और प्रोवान्स में बिताया।
शार् ने अपने बिम्ब और प्रतिमाएँ दक्षिण फ्रांस में बीते अपने बचपन से और वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों से ली हैं। वो कोई देहाती कवि नहीं थे, लेकिन देहात के दृश्यों का प्रभाव उनकी कविताओं में भरपूर मिलता है। प्रकृति के प्रति शार् की आस्था उतनी ही दृढ़ थी जितनी अपनी कविताओं के शिल्प के प्रति। उन्होंने सोर्ग नदी के प्रदूषण, वान्तू—जिस पर प्रैटार्क ने 1336 में विजय प्राप्त की थी—और मौं मिराइल पहाड़ों की चोटियों पर न्यूक्लियर रिएक्टरों के लगाने पर शहरी आपत्ति जताई थी।
शार् की सृजनात्मक दृष्टि पर, उनके कविता लिखने के उद्देश्य और शिल्प पर जिन लोगों का प्रभाव रहा, उनमें ग्रीक दार्शनिक हेरा क्लाइटस, फ़्रैंच कलाकार जॉर्ज दि लातूर और कवि आर्थर रैम्बो को प्रमुख माना जाता है। रैम्बो का साया उनके बिम्बों पर स्पष्ट दिखता है, ख़ास तौर से उनकी सूक्ष्म, घनीभूत गद्य कविताओं में। शार् पर एक और प्रभाव रहा अति यथार्थवाद का।
शार् एक ही विधा में लिखना पसन्द नहीं करते। उन्होंने मुख्य रूप से तीन विधाओं (forms) में कविताएँ लिखी हैं : मुक्त छन्द, गद्य कविता, और सूक्ति। वो अपनी पद्य कविताओं (Verse Poems) और गद्य कविताओं में उन्हीं विषयों को परिवर्द्धित करते हैं जिन्हें उन्होंने अपनी सूक्तियों में उठाया।
अपनी आख़िरी किताब के प्रकाशन तक शार् इस धारणा के समर्थक रहे कि कला, साहित्य और संगीत पारस्परिक रूप से प्रतिरोध की आवश्यक अभिव्यक्ति में जुड़े हुए हैं।
Sanvali Ibaaratein
- Author Name:
Anupam Singh
- Book Type:

- Description: ‘साँवली इबारतें’ की कविताएँ एक ऐसे समय में लिखी गई हैं, जिसमें न्याय, सौन्दर्य और मनुष्य जीवन को सँवारने वाली कोमलता का विलोप हो रहा है। ऐसे में कविता लिखना मृत्यु पाने का निमंत्रण भी बन सकता है। समानता की लालसा रखने वाले लोगों पर रोज़ गोलियाँ चल रही हैं, फिर भी कवि अपने लिए इससे बेहतर काम नहीं खोजना चाहती। कविता ही उसका घर है; यहीं वह अपने मित्रों, शत्रुओं और मृत्यु को भी आने का निमंत्रण देती है। वह अपने शहर, मोहल्ले या देश से भी निष्कासित नहीं होना चाहती। वह इसी शहर में रहेगी जहाँ वह रहती है, जहाँ बसने में किसी ईश्वर ने उसकी मदद नहीं की बल्कि पड़ोसी, अजनबी लोग, यहाँ तक कि यहाँ के पेड़-पौधे ही ज़्यादा हितकारी रहे। इस जुझारू जीवन-अनुभव के कारण वह उन लोगों को सलाह देती है जो कविता को किसी तमग़े की तरह पहनना चाहते हैं, उसके जोखिम को नहीं उठाते। इस अन्धकार भरे समय में प्रेम करना भी जोखिम-भरा काम है, उतना ही जितना कविता लिखना लेकिन कवि की पूरी संलग्नता है इस पदार्थीय जीवन से। वह देखती और समझती है कि यह सारी प्रकृति, कायनात सारी, अपने जगरूप में बेहद सुन्दर है और मनुष्य के लिए कल्याणकारी भी। वह आश्वस्त है कि उसकी आँखों के जल में यह रोशनी-भरा संसार अपना जगरूप देख सकता है जैसे कि मनुष्य अपने सुन्दर विचारों की रूपरेखा अपने सामाजिक संघर्षों के ताप से बनते हुए देख सकता है। इस संग्रह की कविताएँ अपनी भाषा और कथ्य में इतनी सँवरी हुई हैं कि उन्हें परिपक्व कहना भी उनके कवित्व को संकुचित करने जैसा होगा। कवि अपनी राजनैतिक चेतना का विस्तार हवाओं को अपनी देह सौंपने का निर्णय लेकर करती है जो समकालीन अधिनायक तंत्र को नई चुनौती देने जैसा है। ये कविताएँ हमें नई राह पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। हमारे समय की इस स्त्री कवि में इतना आत्मविश्वास और मेधा है कि यदि वह सबको साथ लिये चले तो सब चल भी पड़ेंगे उजले भविष्य की ओर। —सविता सिंह
Nayee Ankhen
- Author Name:
Ravindra Kumar
- Book Type:

- Description: श्री रविन्द्र कुमार के द्वारा प्रणीत 'नई आँखें कविता संग्रह की कविताएँ काव्य के संसार में अपना एक पृथक स्थान निर्मित करती हैं और विभिन्न कोणों से तथा अपनी काव्यमयी अनुभूतियों से मस्तिष्क की अनेक खिड़कियाँ खोल देती हैं। सद्विचारों के लिए भी स्वच्छ और ताजा हवा का आना आवश्यक है। ये कविताएँ भी स्वच्छ और ताजा हवा की तरह साहित्य को एक नया रूप देने में सक्षम हैं। बिम्बों-प्रतीकों का हारा हुआ विधान इन कविताओं में एक नया कलेवर लेकर आया है तथा ये कविताएँ एक नए क्षितिज का द्वार खोलती हैं। इन कविताओं में कवि एक नई भाव-भंगिमा से संसार को देखने की दृष्टि सृजित करता है। प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ संसार की गतिमयता को अत्यंत सूक्ष्मता से अभिव्यंजित करती हैं। एक आलोकमयी दृष्टि का प्रक्षेपण करते हुए कवि यथार्थ के दृश्यों का उद्घाटन करता है। एक सामाजिक यथार्थ जो बहुधा दर्शन से समझा जा सकता है, उसे कवि ने कविता के माध्यम से समझाने की चेष्टा की है। बहुत कुछ चिरंतन सत्य की परिभाषा में लिखे हुए शब्द समय से पार देखने को विवश करते हैं। अदृश्य को देखने की जिजीविषा का एक अनूठा प्रयास इन कविताओं में है। स्वच्छ प्रकृति की स्वच्छ मानसिकता की इस काव्यमयी सृष्टि के लिए कवि श्री रविन्द्र्र कुमार जी की इन कविताओं का स्वागत होना ही चाहिए। —डा. अनूप सिंह
Kahi Ankahi (Poems)
- Author Name:
Nandita Shukla Bhaskar
- Book Type:

- Description: "यह नियति ही है जिसे भोगना है सोचती हूँ हँसकर झेलूँ पर जब भी ये सोचती हूँ रो पड़ती हूँ भरे गले से तुम्हारा नाम लेना चाहती हूँ तुम्हें कृतज्ञता के दो शब्द कहना चाहती हूँ। कितना तो हमें कहना-सुनना है कह-सुन भी लेंगे इर्द-गिर्द के लोगों की दृष्टि में हम मौन हैं सिर्फ बरसों बाद मिले अपरिचितों की भाँति। देखते-देखते नीले आकाश में बादल रुई के फाहे-से छा गए हैं एकाएक सफेद परोंवाले पक्षी अपने पंख फड़फड़ा के उड़ने लगे हैं मैं दुबककर तुम में और समा जाती हूँ अपने बसेरे में, चिडि़या-सी! बस यों ही जीना सीख लिया है अपने काँधों पर अपने ही अस्थिकलशों को ढोना शुरू कर दिया है। —इसी संग्रह से बचपन में ही माँ के साए से संचित हो गई एक बालिका के मनोभावों का संकलन है यह पुस्तक। पिता की स्नेहिल छाँव और ममत्व से जिसका पालन हुआ, उस बालिका की आशा-उत्कंठाओं का संकलन है यह पुस्तक। ईश्वर सबकुछ ले ले, पर माता-पिता के साए से वंचित न करे क्योंकि वही दुनिया का सबसे सुरक्षित कवच होते हैं—यह प्रार्थना करनेवाली बालिका की ‘कही-अनकही’ भावनाओं का संकलन है यह पुस्तक। "
Pani ka Pta Puchh Rahi Thi Machhali
- Author Name:
Kamleshwar Sahu
- Book Type:

- Description: Poems
Raheem Dohawali
- Author Name:
Vagdev
- Book Type:

- Description: "रहीम अर्थात् अब्दुर्रहीम खानखाना को अधिकतर लोग कवि के रूप में जानते है; लेकिन कविता ने उनका दूसरा पक्ष आवृत कर लिया हो, ऐसा नहीं है। रहीम का व्यक्तित्व बहुआयामी था। एक ओर वे वीर योद्धा, सेनापति, चतुर राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ थे तो दूसरी ओर कवि-हृदय, कविता-मर्मज्ञ, उदार चित्त, उत्कट दानी, मानवीयता आदि गुणों से ओत-प्रोत थे। रहीम का जीवन तीव्र घटनाक्रमों से भरा रहा। चार वर्ष की उम्र में पिता असमय बिछड़ गए। तीन पुत्र युवावस्था में ही एक-एक कर गुजर गए। एक धर्मपुत्र फहीम युद्ध में मारा गया। इसके बाद उपाधि और जागीरदारी छिन गई। इस प्रकार 7 2 वर्ष का उनका जीवन बारंबार कसौटी पर कसा गया; और इस रस्साकाशी ने उन्हें इस कदर तोड़कर रख दिया कि अंत समय में पुनः मिली उपाधि और सत्ता का भी वे उपभोगी नहीं कर सके। इस पुस्तक में उसी युग-पुरुष के जीवन-वृत्त और काव्य-संसार पर प्रकाश डाला गया है। यह पाठकोपयोगी सामग्री अब्दुर्रहीम खानखाना उर्फ रहीम के रचनाकर्म और व्यक्तित्व से परिचित कराएगी। "
Ghar Ka Rasta
- Author Name:
Mangalesh Dabral
- Book Type:

-
Description:
मंगलेश डबराल की कविता में रोज़मर्रा ज़िन्दगी के संघर्ष की अनेक अनुगूँजें और घर-गाँव और पुरखों की अनेक ऐसी स्मृतियाँ हैं जो विचलित करती हैं। हमारे समय की तिक्तता और मानवीय संवेदनों के प्रति घनघोर उदासीनता के माहौल से ही उपजा है उनकी कविता का दु:ख। यह दु:ख मूल्यवान है क्योंकि इसमें बहुत कुछ बचाने की चेष्टा है। कविता की एक भूमिका निश्चय ही आदमी के उन ऐन्द्रीय और भावात्मक संवेदनों को सहेजने की भी है जिन्हें आज की अधकचरी और कभी-कभी तो मनुष्य-विरोधी राजनीति और एक बढ़ती हुई व्यावसायिक दृष्टि लगातार नष्ट कर रही है।
प्रकृति के साथ मनुष्य के सम्बन्धों पर भी एक हिसाबी-किताबी दृष्टि का ही क़ब्ज़ा होता जा रहा है। मंगलेश की कविता पेड़ को ‘करोड़ों चिड़ियों की नींद’ से जोड़ती हुई जैसे इस तरह के क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ ही खड़ी है। महानगर में रहते हुए मंगलेश का ध्यान जूझती हुई गृहस्थिन की दिनचर्या, बेकार युवकों और चीज़ों के लिए तरसते बच्चों से लेकर दूर गाँव में इन्तज़ार करते पिता, नदी, खेतों और ‘बर्फ़ झाड़ते पेड़’ तक पर टिका है। उनकी नज़र उस अघाए हुए वर्ग के बीच जाकर बेचैन हो जाती है जो सब कुछ को बाज़ार-भाव के हवाले करने पर तुला है।
मंगलेश की कविता के शब्द करुण संगीत से भरे हुए हैं। इनमें एक पारदर्शी ईमानदारी और आत्मिक चमक है। लेकिन उनकी कविता अगर हमारे समय का एक शोकगीत है तो आदमी की जिजीविषा की टंकार भी हम उसमें सुनते हैं और उसमें स्वयं अपनी निजी स्थिति का एक साक्षात्कार भी है। बहुत सामान्य-सी लगनेवाली चीज़ों का मर्म भी मंगलेश की कविता इस तरह खोलती है कि उसमें से एक पूरी दुनिया झाँकने लगती है। ‘माचिस की तीली बराबर रोशनी’ इसी तरह की एक पंक्ति है।
दरअसल ‘घर का रास्ता’ की एक से दूसरी कविता तक हमें अनुभवों, बिम्बों और जीवन-स्थितियों का एक ऐसा संसार मिलेगा कि हम रह-रहकर पहचानेंगे कि यह तो हमारा कितना अपना है।
—प्रयाग शुक्ल
Apurna Aur Anya Kavitayein
- Author Name:
K. Satchidanandan
- Book Type:

- Description: अपूर्ण और अन्य कविताएँ के. सच्चिदानन्दन की कविताओं के हिन्दी अनुवाद का एक महत्त्वपूर्ण संकलन है। इसके पहले उनकी कविताओं के दो हिन्दी संकलन ‘के. सच्चिदानन्दन की कविताएँ’ और ‘वह जिसे सब याद था’ प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत संकलन में मुख्यत: वे कविताएँ संगृहीत हैं जो यात्रानुभवों और प्रेम से सम्बद्ध हैं। एक लम्बी कविता ‘अपूर्ण’ इन दो विषयों को अनुस्यूत करती हैं : यह कविता स्टॉकहोम, दिल्ली और पेरिस में लिखी गई थी। 'उत्तरकांड' चीन पर लिखी कविताओं की शृंखला है—और यह ध्यान पर एकाग्र है। अध्यात्म, प्रेम, प्रकृति, राजनीति और कविताएँ सभी कविता के पाठ में शामिल हैं। ‘उत्कल’ और ‘हम्पी में शामें’—केवल स्थान विशेष का विवरण मात्र नहीं, बल्कि स्मृति और कल्पना से संघनित हैं। कवि की प्रेम कविताओं में जहाँ असाधारण तीव्रता है वहाँ समय की निरन्तर उपस्थिति को लक्ष्य किया जा सकता है। —संग्रह की अधिकांश कविताएँ हमारे समय के आक्रोश, बिखराव और विद्रोह को व्यक्त करती हैं। ये कविताएँ अपनी कल्पना-शक्ति, प्रखर अनुभूति, ध्यानपरकता और व्यंग्य-भाव के लिए जानी जाएँगी।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book