Kamal Ki Auratein
Author:
Shailja PathakPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
कमाल की औरतें हैं वो जो कितना कुछ सहकर बनी रहीं; कमाल की औरतें हैं वो जिन्होंने अपने मन की किसी हौंस के लिए सारे ज़माने को ठेंगे पर रख उड़ा दिया; कमाल की औरतें हैं वो जो अपनी हर ख़ूबी को छिपाकर पति को बड़ा बनने का मौक़ा देती रहीं; कमाल की औरतें हैं वो जो बच्चों के मज़ाक़ का विषय बनती, रहीं फिर भी उन्हें असीसती रहीं; और कमाल की औरतें हैं वो जो हमारी छोटी या बड़ी बहनें हैं, बुआ हैं, दादी फुआ हैं, जिनकी ज़िन्दगी का कितना समय इस इन्तज़ार में बीत गया कि नैहर से बुलावा आएगा कि उनके भाई-पिता-माँ-भाभियाँ, भतीजे-भतीजियाँ उन्हें गले से लगा सुनेंगे उनके दुख, पूछेंगे कि कैसी बीत रही है, कि कोई दुख तो नहीं है तुम्हें...</p>
<p>कमाल की औरतें संग्रह में सब तरह की औरतें मौजूद हैं—पीड़ित, अकेली, विद्रोही, दाम्पत्य को छिन्न-भिन्न करने को आतुर भी, और दाम्पत्य में खप जाने को तत्पर भी—जिन्हें शैलजा पाठक की भाव-प्रवण भाषा में अभिव्यक्ति मिली है—बिलकुल ऐसे जैसे दोपहर बाद के सुस्ताते समय की बतकहियों में।</p>
<p>इनमें से कई औरतें हैं जिन्हें प्रचलित स्त्री-विमर्श अच्छे से जानता है, लेकिन कुछ हैं जिनके दुख पर आधुनिक दृष्टि उस तरह नहीं पड़ी। यह अच्छी बात है कि उन्हें लेकर इस संग्रह में पर्याप्त कविताएँ हैं। समय से पहले बूढ़ी होती बहनें-बुआएँ—नैहर और ससुराल के बीच की धूल उड़ाती पगडंडियों पर जिनके असंख्य दुख अदेखे ग़ायब हो जाते हैं—इन कविताओं में उन्हें पढ़ना दुख के किसी टापू पर अचानक पहुँच जाने जैसा है...स्तब्धकारी!
ISBN: 9789360863074
Pages: 168
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Author Name:
Habeeb 'Jalib'
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Description:
उर्दू की मशहूर शायरा मोहतरमा फ़हमीदा रियाज ने कहा : तारीख़ ने ख़िलक़त को तो क़ातिल ही दिए, ख़िलक़त ने दिया है उसे ‘जालिब’ सा जवाब। और इस शे’र के साथ एक ऐसे शायर की तस्वीर हमारे सामने आती है जिसने अपनी सारी ज़िन्दगी समाज के दबे-कुचले लोगों के नाम कर दी थी। यहाँ हमें ऐसा शायर नज़र आता है जो बार-बार सलाख़ों के पीछे डाला गया, जिसकी एक क्या, तीन-तीन किताबें ज़ब्त की गईं, पासपोर्ट ज़ब्त किया गया, जिस पर झूठा आरोप लगाकर एक साज़िश के तहत मुक़दमे में फँसाया गया, जिसका एक बच्चा दवा-दारू के बिना मरा, और फिर भी जब वह जेल जाता है तो अपनी बीमार बच्ची के नाम सन्देश देकर जाता है कि आनेवाला दौर नई
नस्ल का ही होगा : मेरी बच्ची, मैं आऊँ न आऊँ, आनेवाला ज़माना है तेरा। इतना ही नहीं, जब-जब उसे सत्ता की ओर से प्रलोभन दिए गए, उसने उन्हें ठुकराने में एक पल की देर नहीं की।
हबीब जालिब की शायरी के बारे में कुछ कहना गोया सूरज को चिराग़ दिखाने के बराबर होगा। हम तो इतना ही जानते हैं कि ‘मज़ाज’ ने 1952 में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि ‘जालिब अपने अहद का एक बड़ा शायर होगा’, ‘फ़िराक़’ ने साफ़ तौर पर कहा कि ‘सूरदास का नग़्मा और मीराबाई का खोज अगर यकजा हो जाएँ तो हबीब जालिब बनना है,’ और सिब्ते-हसन, इन्तज़ार हुसैन समेत बहुत सारे अदीबों और जनसाधारण को जालिब ‘नज़ीर’ अकबराबादी के बाद उर्दू के अकेले जनकवि नज़र आते हैं। फिर हज़रत ‘जिगर’ मुरादाबादी ने जो दाद दी, वह खुद ही दाद के क़ाबिल है। फ़रमाया, “हमारा ज़मान-ए-मैनोशी होता तो हम जालिब की ग़ज़ल पर सरे-महफ़िल ख़रा कराते।”
ऐसे ही शायर का यह एक भरा-पूरा प्रतिनिधि संकलन है, जिसे पाठक सँजोकर रखना चाहेंगे।
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