Ashre
(0)
Author:
Naeem Sarmad, Anuradha Sharma, Idrees BabarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
250
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‘अरबी ज़बान’ में ‘अशरा’ लफ़्ज़ के मानी होते हैं—'दस', इसी से ये बात समझ आनी चाहिए कि इदरीस बाबर ने उर्दू में एक ऐसी सिन्फ़ या फ़ॉर्म ईजाद की है, जिसमें सिर्फ़ दस मिसरे होते हैं। दिलचस्प बात ये है कि ‘अशरा’ किसी भी तरह लिखा जा सकता है। ग़ज़ल, नज़्म, आज़ाद नज़्म या फिर नसरी नज़्म के तौर पर भी। इसी लिए इस किताब में आपको ‘अशरे’ के ये सभी रूप दिखाई देंगे। ‘अशरे’ को किसी ख़ास मौज़ू का मोहताज भी नहीं बनाया गया है, एक अशरा जहाँ सियासी हो सकता है तो वहीं दूसरा ‘समाजी’ और 'इस्लाही' या फिर इश्क़-ओ-आशिक़ी से भी उसका तअल्लुक़ हो सकता है। ऐसा नहीं है कि क्लासिकल शायरी में दस मिसरों की ऐसी कोई सिन्फ़ मौजूद नहीं थी, दकन से लेकर शुमाली हिन्दुस्तान तक दस मिसरों की ऐसी नज़्मों को ‘मुअश्शर’ कहा जाता था। मगर इदरीस बाबर की इस नई सिन्फ़ ने ख़ुद को बहर और उस्लूब की क़ैद से आज़ाद करके इसमें कई नए इमकान पैदा कर दिए हैं, इस बात का सुबूत आपको ये किताब पढ़ कर मिल जाएगा। इदरीस बाबर नए शायरों में एक बेचैन और तज’रबा-पसन्द शायर हैं। वह किसी एक कल बैठने को तख़लीक़कार के लिए अच्छा नहीं मानते। इसी वजह से उनके यहाँ अलफ़ाज़ से लेकर अहसास तक हर क़दम पर नैरंगी दिखाई देती है। उर्दू अदब में इदरीस बाबर की ईजाद की हुई इस सिन्फ़ का इस्तक़बाल हुआ है और बहुत से लोग अशरे लिख रहे हैं। आप भी अगर उर्दू अदब में तेज़ी से पनपती इस नई सिन्फ़-ए-सुख़न से वाक़िफ़ होना चाहते हैं तो ये किताब ज़रूर पढ़िए।
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‘अरबी ज़बान’ में ‘अशरा’ लफ़्ज़ के मानी होते हैं—'दस', इसी से ये बात समझ आनी चाहिए कि इदरीस बाबर ने उर्दू में एक ऐसी सिन्फ़ या फ़ॉर्म ईजाद की है, जिसमें सिर्फ़ दस मिसरे होते हैं। दिलचस्प बात ये है कि ‘अशरा’ किसी भी तरह लिखा जा सकता है। ग़ज़ल, नज़्म, आज़ाद नज़्म या फिर नसरी नज़्म के तौर पर भी। इसी लिए इस किताब में आपको ‘अशरे’ के ये सभी रूप दिखाई देंगे। ‘अशरे’ को किसी ख़ास मौज़ू का मोहताज भी नहीं बनाया गया है, एक अशरा जहाँ सियासी हो सकता है तो वहीं दूसरा ‘समाजी’ और 'इस्लाही' या फिर इश्क़-ओ-आशिक़ी से भी उसका तअल्लुक़ हो सकता है। ऐसा नहीं है कि क्लासिकल शायरी में दस मिसरों की ऐसी कोई सिन्फ़ मौजूद नहीं थी, दकन से लेकर शुमाली हिन्दुस्तान तक दस मिसरों की ऐसी नज़्मों को ‘मुअश्शर’ कहा जाता था। मगर इदरीस बाबर की इस नई सिन्फ़ ने ख़ुद को बहर और उस्लूब की क़ैद से आज़ाद करके इसमें कई नए इमकान पैदा कर दिए हैं, इस बात का सुबूत आपको ये किताब पढ़ कर मिल जाएगा। इदरीस बाबर नए शायरों में एक बेचैन और तज’रबा-पसन्द शायर हैं। वह किसी एक कल बैठने को तख़लीक़कार के लिए अच्छा नहीं मानते। इसी वजह से उनके यहाँ अलफ़ाज़ से लेकर अहसास तक हर क़दम पर नैरंगी दिखाई देती है। उर्दू अदब में इदरीस बाबर की ईजाद की हुई इस सिन्फ़ का इस्तक़बाल हुआ है और बहुत से लोग अशरे लिख रहे हैं। आप भी अगर उर्दू अदब में तेज़ी से पनपती इस नई सिन्फ़-ए-सुख़न से वाक़िफ़ होना चाहते हैं तो ये किताब ज़रूर पढ़िए।
Book Details
-
ISBN9789347265594
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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बिगड़ते पर्यावरण की समस्या आज मनुष्य के लिए भूख के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। भूख जिस तरह एक देह के अस्तित्व के लिए आसन्न ख़तरा होती है, उसी तरह पर्यावरण-विनाश सृष्टि के अस्तित्व के लिए होता है। एक-एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हम लोगों की आँखों से वह ख़तरा भले ही इतने स्पष्ट और ठोस रूप में न दिखाई देता हो, और भले ही हम बीच-बीच में प्रकृति द्वारा दी जानेवाली चेतावनियों को नज़रअन्दाज़ करने की ढीठता भी जुटा लेते हों, लेकिन जल, ज़मीन, हवा और हरियाली का सतत क्षरित होता जीवन उन निगाहों से अनचीन्हा नहीं रह जाता जो प्रस्तुत उल्लास की झीनी चदरिया के पार दूर क्षितिज के धुँधलके में लिखी जा रही नाश-विनाश की पटकथाओं की पंक्तियाँ पढ़ लेती हैं, यानी कवियों और रचनाशील हृदयों की निगाहें। यह पुस्तक प्रकृति और कवि के इसी अपने, और समाज की रिश्तेदारियों के धोखादेह प्रपंच से परे, उनके निहायत पवित्र और निजी रिश्ते का दस्तावेज़ है। पाठकगण इस किताब को सरकारों और संस्थाओं के रस्मी पर्यावरण-प्रेम और शुष्क रुदन के काव्यानुवाद के रूप में न लें। यह समष्टि-मन के रचनाकुल और ईमानदार स्नायुओं की पीड़ाजनित प्रतिक्रियाओं का संकलन है जिसमें हिन्दी के नए-पुराने, वरिष्ठ, श्रेष्ठ और सजग रचनाकारों ने प्रकृति के साथ अपनी सम्बन्ध-यात्रा के सबसे चिन्तित क्षणों को वाणी दी है। संग्रह में एक सौ एक समकालीन कविताएँ और पैंतालीस कवि शामिल हैं। कौन छोटा है, कौन बड़ा है, यह सवाल अप्रासंगिक है। क्योंकि कविता का विषय महत्त्वपूर्ण है, समस्याओं की भयंकरता प्रासंगिक है। एक ही त्रासदपूर्ण मुद्दा सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। सब में आशंकाएँ हैं तो साथ ही आशाएँ भी हैं। प्रकृति की आसन्न मृत्यु पर चीख़ने के बजाय प्रतिरोध खड़ा करना ये रचनाकार अपना दायित्व समझते हैं।
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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Book
Naye Yug Mein Shatru
- Author Name:
Mangalesh Dabral +1
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एक बेगाने और असन्तुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं—अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल के अन्तराल से आए इस संग्रह का शीर्षक चार ही लफ़्ज़ों में सब कुछ बता देता है : उनकी कला-दृष्टि, उनका राजनीतिक पता-ठिकाना, उनके अन्तःकरण का आयतन।
यह इस समय हिन्दी की सर्वाधिक समकालीन और विश्वसनीय कविता है। भारतीय समाज में पिछले दो-ढाई दशक के फासिस्ट उभार, साम्प्रदायिक राजनीति और पूँजी के नृशंस आक्रमण से जर्जर हो चुके लोकतंत्र के अहवाल यहाँ मौजूद हैं और इसके बरक्स एक सौन्दर्य-चेतस कलाकार की उधेड़बुन का पारदर्शी आकलन भी। ये इक्कीसवीं सदी से आँख मिलाती हुई वे कविताएँ हैं जिन्होंने बीसवीं सदी को देखा है। ये नए में मुखरित नए को भी परखती हैं और उसमें बदस्तूर जारी पुरातन को भी जानती हैं। हिन्दी कविता में वर्तमान सदी की शुरुआत ही ‘गुजरात के मृतक का बयान’ से होती है।
ऊपर से शान्त, संयमित और कोमल दिखनेवाली, लगभग आधी सदी से पकती हुई मंगलेश की कविता हमेशा सख्तजान रही है—किसी भी चीज़ के लिए तैयार। इतिहास ने जो ज़ख़्म दिए हैं उन्हें दर्ज करने, मानवीय यातना को सोखने और प्रतिरोध में ही उम्मीद का कारनामा लिखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध। यह हाहाकार की ज़बान में नहीं लिखी गई है; वाष्पिभूत और जल्दी ही बदरंग हो जानेवाली भावुकता से बचती है। इसकी मार्मिकता स्फटिक जैसी कठोरता लिए हुए है। इस मामले में मंगलेश ‘क्लासिसिस्ट’ मिज़ाज के कवि हैं—सबसे ज़्यादा तैयार, मँजी हुई और तहदार ज़बान लिखनेवाले।
मंगलेश असाधारण सन्तुलन के कवि हैं—उनकी कविता ने न यथार्थ-बोध को खोया है, न अपने निजी संगीत को। वे अपने समय में कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों को अच्छे से सँभाले हुए हैं और इस कार्यभार से दबे नहीं हैं। मंगलेश के लहज़े की नर्म-रवी और आहिस्तगी शुरू से उनके अकीदे की पुख़्तगी और आत्मविश्वास की निशानी रही है। हमेशा की तरह जानी-पहचानी मंगलेशियत इसमें नुमायाँ है।
और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो सकती है कि इन कविताओं में वह साजे-हस्ती बे-सदा नहीं हुआ है जो ‘पहाड़ पर लालटेन’ से लेकर उनके पिछले संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ में सुनाई देता रहा था। ‘नए युग में शत्रु’ में उसकी सदा पूरी आबो-ताब से मौजूद है।
—असद ज़ैदी।
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