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‘अरबी ज़बान’ में ‘अशरा’ लफ़्ज़ के मानी होते हैं—'दस', इसी से ये बात समझ आनी चाहिए कि इदरीस बाबर ने उर्दू में एक ऐसी सिन्फ़ या फ़ॉर्म ईजाद की है, जिसमें सिर्फ़ दस मिसरे होते हैं। दिलचस्प बात ये है कि ‘अशरा’ किसी भी तरह लिखा जा सकता है। ग़ज़ल, नज़्म, आज़ाद नज़्म या फिर नसरी नज़्म के तौर पर भी। इसी लिए इस किताब में आपको ‘अशरे’ के ये सभी रूप दिखाई देंगे। ‘अशरे’ को किसी ख़ास मौज़ू का मोहताज भी नहीं बनाया गया है, एक अशरा जहाँ सियासी हो सकता है तो वहीं दूसरा ‘समाजी’ और 'इस्लाही' या फिर इश्क़-ओ-आशिक़ी से भी उसका तअल्लुक़ हो सकता है। ऐसा नहीं है कि क्लासिकल शायरी में दस मिसरों की ऐसी कोई सिन्फ़ मौजूद नहीं थी, दकन से लेकर शुमाली हिन्दुस्तान तक दस मिसरों की ऐसी नज़्मों को ‘मुअश्शर’ कहा जाता था। मगर इदरीस बाबर की इस नई सिन्फ़ ने ख़ुद को बहर और उस्लूब की क़ैद से आज़ाद करके इसमें कई नए इमकान पैदा कर दिए हैं, इस बात का सुबूत आपको ये किताब पढ़ कर मिल जाएगा। इदरीस बाबर नए शायरों में एक बेचैन और तज’रबा-पसन्द शायर हैं। वह किसी एक कल बैठने को तख़लीक़कार के लिए अच्छा नहीं मानते। इसी वजह से उनके यहाँ अलफ़ाज़ से लेकर अहसास तक हर क़दम पर नैरंगी दिखाई देती है। उर्दू अदब में इदरीस बाबर की ईजाद की हुई इस सिन्फ़ का इस्तक़बाल हुआ है और बहुत से लोग अशरे लिख रहे हैं। आप भी अगर उर्दू अदब में तेज़ी से पनपती इस नई सिन्फ़-ए-सुख़न से वाक़िफ़ होना चाहते हैं तो ये किताब ज़रूर पढ़िए।
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‘अरबी ज़बान’ में ‘अशरा’ लफ़्ज़ के मानी होते हैं—'दस', इसी से ये बात समझ आनी चाहिए कि इदरीस बाबर ने उर्दू में एक ऐसी सिन्फ़ या फ़ॉर्म ईजाद की है, जिसमें सिर्फ़ दस मिसरे होते हैं। दिलचस्प बात ये है कि ‘अशरा’ किसी भी तरह लिखा जा सकता है। ग़ज़ल, नज़्म, आज़ाद नज़्म या फिर नसरी नज़्म के तौर पर भी। इसी लिए इस किताब में आपको ‘अशरे’ के ये सभी रूप दिखाई देंगे। ‘अशरे’ को किसी ख़ास मौज़ू का मोहताज भी नहीं बनाया गया है, एक अशरा जहाँ सियासी हो सकता है तो वहीं दूसरा ‘समाजी’ और 'इस्लाही' या फिर इश्क़-ओ-आशिक़ी से भी उसका तअल्लुक़ हो सकता है। ऐसा नहीं है कि क्लासिकल शायरी में दस मिसरों की ऐसी कोई सिन्फ़ मौजूद नहीं थी, दकन से लेकर शुमाली हिन्दुस्तान तक दस मिसरों की ऐसी नज़्मों को ‘मुअश्शर’ कहा जाता था। मगर इदरीस बाबर की इस नई सिन्फ़ ने ख़ुद को बहर और उस्लूब की क़ैद से आज़ाद करके इसमें कई नए इमकान पैदा कर दिए हैं, इस बात का सुबूत आपको ये किताब पढ़ कर मिल जाएगा। इदरीस बाबर नए शायरों में एक बेचैन और तज’रबा-पसन्द शायर हैं। वह किसी एक कल बैठने को तख़लीक़कार के लिए अच्छा नहीं मानते। इसी वजह से उनके यहाँ अलफ़ाज़ से लेकर अहसास तक हर क़दम पर नैरंगी दिखाई देती है। उर्दू अदब में इदरीस बाबर की ईजाद की हुई इस सिन्फ़ का इस्तक़बाल हुआ है और बहुत से लोग अशरे लिख रहे हैं। आप भी अगर उर्दू अदब में तेज़ी से पनपती इस नई सिन्फ़-ए-सुख़न से वाक़िफ़ होना चाहते हैं तो ये किताब ज़रूर पढ़िए।
Book Details
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ISBN9789347265594
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Pages144
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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देश-काल के शर से बिंधकर
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इस तरह हिन्दी जाति के सबसे बड़े जातीय कवि की जीवन-कथा के द्वारा निराला ने अपनी समसामयिक परिस्थितियों में रास्ता निकालने का संकेत दिया है।”
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Description:
पाकिस्तान में उर्दू की शायरात शायरी के मैदान में शायरों से कहीं आगे निकल गई हैं, जिसकी मिसाल दुनिया भर में किसी देशकाल में नहीं मिलेगी। उन शायरात में जो पोस्ट-मॉडर्न कहलाती हैं, उनमें सारा शगुफ़्ता, अज़रा अब्बास, किश्वर नाहीद, नसरीन अंजुम भट्टी, अनूपा, तनवीर अंजुम और शाइस्ता हबीब के नाम ज़्यादा नुमायाँ हैं। लेकिन सारा शगुफ़्ता इनमें सब से ऊपर हैं। ‘सुपर पोएटेस’ या ‘क्वीन ऑफ़ पोएटिक्स’ के तौर पर वह चमत्कार से कम नहीं। ...पढ़ने वाले मेरी राय से इत्तिफ़ाक़ करेंगे कि इतनी आला शायरी पश्चिम में भी नहीं हो रही। यह शायरी हालाँकि आज की पोस्ट-मॉडर्न रिवायत की तरह सुगठित नहीं लेकिन असर-अंगेज़ी में अपना जवाब नहीं रखती, और आला सतह की शायरी को भी कहीं पीछे छोड़ जाती है।
—मुबारक अहमद, आँखें (उर्दू) के फ़्लैप से
सारा जिस तरह की ज़िन्दगी गुज़ारती थी, ज़हनी सतह पर ख़ुद भी उसे पसंद नहीं करती थी। इसीलिए हमेशा अपराध-भाव से भरी रहती थी। उसकी शायरी में इसी अपराध-भाव की झलक नज़र आती है। ऐसी ज़िन्दगी को वह ख़ुद से चिमटाये हुए चलती थी... एक नज़्म में वह कहती है : मुझे रोटी दो, और फिर गाली दो।
—अतिया दाऊद, ‘सारा मेरी दोस्त’ से
...सारा शगुफ़्ता के नाम और उसकी शायरी को दूसरे समकालीन शायरों और उनकी रचनाओं के साथ ब्रैकेट नहीं किया जा सकता। यह तो ज़रूर है कि उसने ज़्यादातर नज़्में नस्री नज़्म के रूप में लिखीं लेकिन उसकी नस्री शायरी पिछले तीन दशकों (1960 के बाद) से अब तक की नस्री शायरी से बिलकुल अलग नज़र आती है। उसकी शब्दावली की बनावट बेमिसाल है। हम उसकी शायरी की विषय-वस्तु पर बात करें तो उसकी आँखें सब से अहम समयकाल—चरम-जीवन से चरम-मृत्यु तक फैली है। कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप में सारा शगुफ़्ता के सिवा कोई ऐसी औरत नज़र नहीं आती जिसने शायरी और अदब के माध्यम से इस इन्तहा पर पहुँच कर सच—बल्कि नंगा सच—बोला हो।
—अहमद हमीश, मशहूर शायर और ‘आँखें’ (उर्दू) के प्रकाशक
Jag Me Noor Badha Kar Dekh
- Author Name:
Rameshraaj
- Rating:
- Book Type:

- Description: 1974 से 1990 के बीच लिखी गयीं चतुष्पदियाँ
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