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Sadho ! Jag Baurana

In category

Poetry

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Hindi

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About the book

मुकेश कुमार टेलीविज़न की दुनिया का एक जाना-माना नाम है। साहित्य से जुड़े तमाम लोग उन्हें दूरदर्शन पर डॉ. नामवर सिंह के साथ पुस्तक चर्चा के अत्यन्त चर्चित कार्यक्रम ‘सुबह-सवेरे’ के माध्यम से, ‘हंस’ में पिछले आठ सालों से प्रकाशित उनके स्तम्भ ‘कसौटी’ के कारण तथा कई टेलीविज़न चैनलों को शुरू करके उन्हें सफल बनानेवाले एंकर के रूप में भी जानते-समझते रहे हैं। लेकिन उनके बहुविध व्यक्तित्व के बहुत से पहलू लोगों से अभी तक क़रीब-क़रीब छिपे हुए रहे हैं जिनमें उनका व्यंग्यकार, कथाकार तथा कवि रूप भी शामिल है। टेलीविज़न की दुनिया में रहकर अपने परिवार तक के लिए समय निकाल पाना मुश्किल हो जाता है और हड़बड़ी की इस दुनिया में अपनी संवेदनाएँ बचाना प्राय: असम्भव ही होता है। अत: आश्चर्य होता है कि इस दुनिया में लगातार रहकर ख़ासकर कविता के लिए समय उन्होंने कैसे और कहाँ से निकाल लिया होगा? और यों ही अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए कविता के नाम पर कुछ भी लिख देना तो सम्भव या आसान है मगर कविता के आधुनिक मुहावरे को समझते हुए अपने पेशेवर काम से एक बिलकुल ही अलग दुनिया रच देना अगर असम्भव नहीं तो बेहद मुश्किल और जटिल है। मुकेश की विशेषता सिर्फ़ यह नहीं है कि वे कविताएँ लिखते हैं, यह भी है जैसा कि ऊपर कहा गया, वे इसमें संवेदनाओं की एक अलग दुनिया रचते हैं। यह दुनिया दैनिक और हर घंटे या हर दस मिनट बाद टीवी के पर्दे पर आनेवाली ज़्यादातर सतही और कामचलाऊ ख़बरों और उनके विश्लेषण की दुनिया से बिलकुल ही अलग है। इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठकों को याद ही नहीं आएगा कि यह वही मुकेश हैं जिन्हें रात के समय समाचारों का कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करते हमने-आपने देखा है, हालाँकि वहाँ भी उनका तीखापन कहीं खोता नहीं जैसे कि ‘हंस’ के उनके स्तम्भ में भी यह बेधड़क ढंग से व्यक्त होता है। इन कविताओं में से कम कविताओं में ही आज की राजनीति से सीधे-सीधे रूप से कवि वाबस्ता है। ये कविताएँ उनके कोमल और लड़ाकू दोनों पक्षों को एक साथ उजागर करती हैं। वे चाँद की बात इनमें करते हैं, साथ ही समुद्र की, नदियों की, स्मृतियों की, साँकल की (जो जीवन से प्राय: खो चुकी है), प्यार की, अपने और बच्चों के बचपन की, आत्मनिर्वासन की और ऐसी ही कई-कई बातें करते हैं। वे कई ताज़े टटके बिम्ब रचते हैं। दूज का चाँद उन्हें बिना मूठ का हँसिया नज़र आता है जो तारों की फ़सल काटने के काम आता है। इन कविताओं में नदी अपनी आत्मकथा लिखती पाई जाती है। इनमें कवि स्मृतियों के घर में रहता हुआ पाया जाता है। और मुकेश यह सारा काम टेलीविज़न की अत्यन्त शब्दस्फीत दुनिया से अलग पर्याप्त भाषा संयम से करते हैं। उनकी कविताएँ छोटी हैं, स्पष्ट हैं और लगभग उतने ही शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जितने का प्रयोग करना अनिवार्य है और यह अनुशासन हासिल करना आसान नहीं है। कई नामी कवि बेहद शब्दस्फीत हैं। उनमें कहीं-कहीं एक गहरा आक्रोश भी है तो कहीं एक गहरा आत्मविश्वास भी, इसलिए कितना भी घना क्यों न हो अँधेरा जितना जान पड़ता है उतना घना नहीं होता अँधेरा। और ऐसे आत्मविश्वास का अर्थ तब ज़्यादा है जब कवि को पता है कि—जिन्हें पूजा हो गए पत्थर, पूजते-पूजते लोग भी हो गए पत्थर, देवता भी पत्थर, पुजारी भी पत्थर, सब पत्थर पत्थर ही पत्थर। जब सब तरफ़ पत्थर ही पत्थर हों, हमारे आदर्श देवता और पुजारी तक जब पत्थर हो चुके हों, तब रचने की चुनौती ज़्यादा गम्भीर है क्योंकि रचना के स्रोत भी पथरा चुके हैं। ऐसे कठिन समय में सरल-आत्मीय कविताएँ रचनेवाले मुकेश कुमार के इस संग्रह की तरफ़ आशा है सबका ध्यान जाएगा, हालाँकि स्थितियाँ साहित्य से जुड़े लोगों के भी पथरा जाने की हैं।

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मुकेश कुमार टेलीविज़न की दुनिया का एक जाना-माना नाम है। साहित्य से जुड़े तमाम लोग उन्हें दूरदर्शन पर डॉ. नामवर सिंह के साथ पुस्तक चर्चा के अत्यन्त चर्चित कार्यक्रम ‘सुबह-सवेरे’ के माध्यम से, ‘हंस’ में पिछले आठ सालों से प्रकाशित उनके स्तम्भ ‘कसौटी’ के कारण तथा कई टेलीविज़न चैनलों को शुरू करके उन्हें सफल बनानेवाले एंकर के रूप में भी जानते-समझते रहे हैं। लेकिन उनके बहुविध व्यक्तित्व के बहुत से पहलू लोगों से अभी तक क़रीब-क़रीब छिपे हुए रहे हैं जिनमें उनका व्यंग्यकार, कथाकार तथा कवि रूप भी शामिल है।

टेलीविज़न की दुनिया में रहकर अपने परिवार तक के लिए समय निकाल पाना मुश्किल हो जाता है और हड़बड़ी की इस दुनिया में अपनी संवेदनाएँ बचाना प्राय: असम्भव ही होता है। अत: आश्चर्य होता है कि इस दुनिया में लगातार रहकर ख़ासकर कविता के लिए समय उन्होंने कैसे और कहाँ से निकाल लिया होगा? और यों ही अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए कविता के नाम पर कुछ भी लिख देना तो सम्भव या आसान है मगर कविता के आधुनिक मुहावरे को समझते हुए अपने पेशेवर काम से एक बिलकुल ही अलग दुनिया रच देना अगर असम्भव नहीं तो बेहद मुश्किल और जटिल है।

मुकेश की विशेषता सिर्फ़ यह नहीं है कि वे कविताएँ लिखते हैं, यह भी है जैसा कि ऊपर कहा गया, वे इसमें संवेदनाओं की एक अलग दुनिया रचते हैं। यह दुनिया दैनिक और हर घंटे या हर दस मिनट बाद टीवी के पर्दे पर आनेवाली ज़्यादातर सतही और कामचलाऊ ख़बरों और उनके विश्लेषण की दुनिया से बिलकुल ही अलग है। इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठकों को याद ही नहीं आएगा कि यह वही मुकेश हैं जिन्हें रात के समय समाचारों का कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करते हमने-आपने देखा है, हालाँकि वहाँ भी उनका तीखापन कहीं खोता नहीं जैसे कि ‘हंस’ के उनके स्तम्भ में भी यह बेधड़क ढंग से व्यक्त होता है। इन कविताओं में से कम कविताओं में ही आज की राजनीति से सीधे-सीधे रूप से कवि वाबस्ता है। ये कविताएँ उनके कोमल और लड़ाकू दोनों पक्षों को एक साथ उजागर करती हैं। वे चाँद की बात इनमें करते हैं, साथ ही समुद्र की, नदियों की, स्मृतियों की, साँकल की (जो जीवन से प्राय: खो चुकी है), प्यार की, अपने और बच्चों के बचपन की, आत्मनिर्वासन की और ऐसी ही कई-कई बातें करते हैं। वे कई ताज़े टटके बिम्ब रचते हैं। दूज का चाँद उन्हें बिना मूठ का हँसिया नज़र आता है जो तारों की फ़सल काटने के काम आता है। इन कविताओं में नदी अपनी आत्मकथा लिखती पाई जाती है। इनमें कवि स्मृतियों के घर में रहता हुआ पाया जाता है। और मुकेश यह सारा काम टेलीविज़न की अत्यन्त शब्दस्फीत दुनिया से अलग पर्याप्त भाषा संयम से करते हैं।

उनकी कविताएँ छोटी हैं, स्पष्ट हैं और लगभग उतने ही शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जितने का प्रयोग करना अनिवार्य है और यह अनुशासन हासिल करना आसान नहीं है। कई नामी कवि बेहद शब्दस्फीत हैं। उनमें कहीं-कहीं एक गहरा आक्रोश भी है तो कहीं एक गहरा आत्मविश्वास भी, इसलिए कितना भी घना क्यों न हो अँधेरा जितना जान पड़ता है उतना घना नहीं होता अँधेरा। और ऐसे आत्मविश्वास का अर्थ तब ज़्यादा है जब कवि को पता है कि—जिन्हें पूजा हो गए पत्थर, पूजते-पूजते लोग भी हो गए पत्थर, देवता भी पत्थर, पुजारी भी पत्थर, सब पत्थर पत्थर ही पत्थर। जब सब तरफ़ पत्थर ही पत्थर हों, हमारे आदर्श देवता और पुजारी तक जब पत्थर हो चुके हों, तब रचने की चुनौती ज़्यादा गम्भीर है क्योंकि रचना के स्रोत भी पथरा चुके हैं। ऐसे कठिन समय में सरल-आत्मीय कविताएँ रचनेवाले मुकेश कुमार के इस संग्रह की तरफ़ आशा है सबका ध्यान जाएगा, हालाँकि स्थितियाँ साहित्य से जुड़े लोगों के भी पथरा जाने की हैं।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2013
Weight
300 grams
ISBN-13
9788126724581
Pages
144
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22.5 cm
Language
Hindi

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