Mrityu : Kavitayein
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जीवन और मृत्यु सहोदर स्थितियाँ हैं। लेकिन खड़ी बोली हिन्दी में ऐसी कोई कविता पुस्तक नहीं जो केवल मृत्यु सम्बन्धी अनुभव और स्थितियों से निर्मित हो। इस अर्थ में अरुण देव के इस संग्रह का प्रकाशन एक विरल घटना है। सौ पदों में प्रशस्त यह पुस्तक मृत्यु के प्राय: सभी आयामों,पक्षों और मृत्युजनित भावों को पुंजीभूत करती है। इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है जीवन के साथ घनिष्ठता। मृत्यु की कविताएँ अन्ततः जीवन की कविताएँ होती हैं, जो जीवन था, जो है और जो होगा। कभी-कभी कविता इतनी कम जगह घेरती है मानो कोई अन्तिम साँस हो। कभी कबीर से लेकर कामू तक के प्रसंग एक बिम्ब को महाकाव्यात्मक विस्तार दे देते हैं। लेकिन कहीं भी न तो ईश्वर का स्मरण है, न किसी अन्य लोक या उत्तर-जीवन की अभिलाषा। जो है यहीं है। मृत्यु भी इसी जीवन, इसी संसार की परिघटना है, शाश्वत और सर्वग्रासी। लेकिन जीवन सबसे बड़ा है। अरुण कमल प्रख्यात कवि
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जीवन और मृत्यु सहोदर स्थितियाँ हैं। लेकिन खड़ी बोली हिन्दी में ऐसी कोई कविता पुस्तक नहीं जो केवल मृत्यु सम्बन्धी अनुभव और स्थितियों से निर्मित हो। इस अर्थ में अरुण देव के इस संग्रह का प्रकाशन एक विरल घटना है। सौ पदों में प्रशस्त यह पुस्तक मृत्यु के प्राय: सभी आयामों,पक्षों और मृत्युजनित भावों को पुंजीभूत करती है।
इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है जीवन के साथ घनिष्ठता। मृत्यु की कविताएँ अन्ततः जीवन की कविताएँ होती हैं, जो जीवन था, जो है और जो होगा। कभी-कभी कविता इतनी कम जगह घेरती है मानो कोई अन्तिम साँस हो। कभी कबीर से लेकर कामू तक के प्रसंग एक बिम्ब को महाकाव्यात्मक विस्तार दे देते हैं। लेकिन कहीं भी न तो ईश्वर का स्मरण है, न किसी अन्य लोक या उत्तर-जीवन की अभिलाषा। जो है यहीं है। मृत्यु भी इसी जीवन, इसी संसार की परिघटना है, शाश्वत और सर्वग्रासी। लेकिन जीवन सबसे बड़ा है।
अरुण कमल प्रख्यात कवि
Book Details
-
ISBN9789360869410
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इक़बाल की फ़ारसी मसनवी ‘अस् रारे ख़ुदी’ (ख़ुदी या अहम् के रहस्य) एक दार्शनिक कविता है, जिसे ख़ुदी या अहम् (Ego) अथवा आत्मन् (Self) के अर्थ, उसकी यथार्थता, अभिपुष्टि एवं स्थिरता का एक प्रकार का उपनिषद् कहा जा सकता है। यह कविता जगत् विषयक संकल्पना से प्रेरित होती है तथा अस्तित्व के महानाटक में मानवीय अहम् (Human Ego) या मानवीय आत्मशक्ति तथा उससे उद्भूत चारित्रिक एवं नैतिक गुणों की भूमिका का निरूपण करती है। कवि की भावप्रवणता तथा उस भावप्रवणता की सशक्त और प्रभावकारी अभिव्यक्ति की शैली इस दार्शनिक एवं तत्त्वमीमांसीय कविता को उच्चतर कविता के अवस्थान का अधिकारी बना देती है। स्पष्टतया यह एक विचार-प्रधान कविता है और कवि के विचार हृदयानुभूत हैं तथा उनकी अभिव्यक्ति प्रांजल एवं वाग्मितापूर्ण भाषा तथा उदात्त एवं मनोरम शैली में हुई है। प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ होने के एक वर्ष बाद 1915 में इसका प्रकाशन विश्व-साहित्य की एक अभूतपूर्व घटना थी, क्योंकि इसके पूर्व इस विषय को एक अनूठे अन्दाज़ में उदात्त काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करने का उदाहरण विश्व-साहित्य में नहीं मिलता। प्रकाशित होते ही यह कविता फ़ारसी में क्लासिक बन गई तथा 1920 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध प्राच्यविद् प्रो. निकल्सन के अंग्रेज़ी अनुवाद के फलस्वरूप यह यूरोप व अमेरिका के पाठकों की पहुँच में आ गई। इसे विश्व-साहित्य की एक महान उपलब्धि क़रार देते हुए प्रसिद्ध अमेरिकी कवि, समालोचक तथा आधुनिक कला के दार्शनिक हर्बट रीड (Herbert Read) ने टिप्पणी की कि यह कविता ‘‘धारणाओं के नानात्व में से आस्था के एकत्व तथा विचारधाराओं के गुह्य तर्क में से एक वैश्विक स्फूर्ति का सृजन करती हुई अपनी सुन्दरता में आधुनिक दर्शन की आधारभूत अवस्थाओं को प्रतिबिम्बित करती है।’’ आख्यानों का प्रयोग वृत्तान्त में पाठकों की दिलचस्पी बनाए रखता है तथा कविता को सजीवता प्रदान करता है। ‘अस् रारे ख़ुदी’ की रचना के साथ फ़ारसी शाइरी में इक़बाल ने एक नए दबिस्तान (School) और तर्ज़ की नींव डाली, जिसे आजकल ईरानी विद्वान ‘सब्के इक़बाल’ अर्थात् ‘इक़बालीय शैली’ (Iqbalian Style) कहते हैं।
इक़बाल के काव्य और चिन्तन के अनुशीलन के लिए ‘अस् रारे ख़ुदी’ मूलाधारात्मक है।
Pratinidhi Kavitayen : Bharatbhushan Agrawal
- Author Name:
Bharatbhushan Agrawal
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भारतभूषण अग्रवाल की कविता बिना किसी नाटकीयता, बिना कोई चीख़-पुकार मचाए ईमानदारी से अपनी सच्चाई को देखती-परखती कविता है। उसमें रूमानी आवेग से लेकर मुक्त हास्य, विद्रूप से लेकर अनुराग और कोमलता की कई छवियाँ, सभी शामिल हैं। कामकाजी मध्यवर्ग की विडम्बनाएँ, संवेदनशील व्यक्ति के ऊहापोह, शहराती ज़िन्दगी के रोज़मर्रा के सुख-दु:ख आदि को भारत जी ईमानदारी और पारदर्शिता से अपनी कविता में जगह देते हैं। उनमें अपनी विशिष्टता का रत्ती-भर भी आग्रह नहीं है। बल्कि अगर आग्रह है तो अपनी सीधी-सादी, सरल जान पड़ती लेकिन दरअसल जटिल साधारणता का। यह आग्रह उनकी आवाज़ को और सघन तथा उत्कट बनाता है।
उनकी कविता अपने को महत्त्वाकांक्षा के किसी विराट लोक में विलीन नहीं करती। वह अपनी उत्सुकताओं और बेचैनियों को जतन से नबेरती है। वह कविता में विकल्प इतना नहीं खोजती जितना सच्चाई की ही कई अन्यथा अलक्षित रह जानेवाली परतों को। कविता में कवि का यह अहसास बराबर मौजूद है कि सच्चाई और ज़िन्दगी कविता से कहीं बड़ी और व्यापक हैं और वे कविता में अँट नहीं पा रही हैं।
Kavita Mein Sab Kuchh Sambhav
- Author Name:
Shailendra Shail
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- Description: collection of poems
Chhatha Beta
- Author Name:
Upendra Nath Ashk
- Book Type:

- Description: उपेन्द्रनाथ अश्क के नाटकों में ‘छठा बेटा’ का विशेष स्थान है। नाटक मुख्य रूप से देखने की वस्तु है। नाटककार के सामने जितनी चुनौती दृश्य को साकार करने की होती है उतनी ही चुनौती पाठ को प्रभावी बनाने की भी होती है, ताकि उसका नाटक अभिनेय और पठनीय, दोनों हो। पठनीयता को नाटक की श्रेष्ठता का अनिवार्य गुण भले न माना जाए लेकिन उसके अभाव में वह एक साहित्यिक कृति के रूप में पूर्णता प्राप्त करने से वंचित रह जाता है। ‘छठा बेटा’ इन दोनों कसौटियों पर पूरी तरह खरा उतरता है। इसमें नाटकीय रचना की तीनों आवश्यक इकाइयों—समय, स्थान और अभिनय का सुसंगत संयोजन है। इसका नाटकीय कौशल यानी स्टेज क्राफ्ट देखें तो आरम्भ, गति, संघर्ष, क्लाइमेक्स आदि नाटकीय कार्य-व्यापार की सभी अवस्थाओं का इसमें अनूठा सन्तुलन है। और इस नाटक का पाठ, मंचन-अभिनय के लिए निर्देश-संवाद मात्र तक सीमित नहीं न रहकर एक मुकम्मल पाठ है जिसको सिर्फ पढ़ कर भी कोई पाठक इसके मर्म तक पहुँच सकता है। हास्य-व्यंग्य की एक धारा शुरू से अन्त तक इस नाटक में प्रवाहित होती रहती है जो इसकी पठनीयता को और प्रभावी बना देती है। लेकिन हास्य-व्यंग्य के इस प्रवाह से नाटक की गम्भीरता कहीं बाधित नहीं होती। मनुष्य की सुख-शान्ति की स्वाभाविक आकांक्षा उस समय दारुण हो उठती है जब वह इसके लिए दूसरों से अपेक्षा करता है। हमारे सामाजिक जीवन की इस सचाई को अश्क इस नाटक में बखूबी उजागर करते हैं लेकिन निराशा की ओर धकेलते हुए नहीं, बल्कि जीवन की इस विडम्बना पर हँसने का हौसला देते हुए।
Kuchh Bhi Vaisa Nahin
- Author Name:
Uma Shankar Choudhary
- Book Type:

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हिन्दी कविता में अपनी अलग पहचान बना चुके उमा शंकर चौधरी का यह कविता-संग्रह हाल के वर्षों में सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर हुए उन तमाम बदलावों का साक्ष्य है जिन्होंने आम आदमी की मुश्किल जिन्दगी को और मुश्किल बना दिया है। संग्रह की कविताएँ समाज की गति और दिशा का बेबाक आकलन ही नहीं करती हैं, उनके निहितार्थों को भी उद्घाटित करती हैं।
कम ही कवि ऐसे हैं जिनके यहाँ राजनीतिक कविताएँ इतनी शिद्दत से अनवरत आती रही हैं जितनी उमा शंकर के यहाँ। उनका राजनीतिक पक्ष स्पष्ट है, इसलिए उनकी कविताएँ भी अपना पक्ष तय करती हुई आम आदमी के हक में जाकर खड़ी हो जाती हैं। समसामयिक राजनीति जिस नए सत्य को गढ़ने और समाज को उसे अपनाने के लिए बाध्य करने को प्रयासरत है, उसकी वास्तविकता को ये कविताएँ सूक्ष्मता से रेखांकित करती हैं। कविता को अपने समय से किस तरह सम्पृक्त होना चाहिए और किस तरह उसे अपने समय का एक अन्तर्पाठ तैयार करना चाहिए ये कविताएँ इसका उदाहरण हैं।
इन कविताओं में अपने समय के प्रति कवि का क्षोभ और क्रोध तो है लेकिन उनसे कहीं ज्यादा दुख है। यहाँ स्त्री का दुख है तो घरों में बन्द होने को मजबूर बच्चों का दुख भी। यहाँ हमारे भीतर की मरती जा रही संवेदनशीलता का दुख है तो सड़कों पर उतर चुकी भीड़ के उन्मादी हो जाने का दुख भी। यहाँ सत्ता की बढ़ती निरंकुशता के कारण दुख है तो उसके खिलाफ उठ रहे प्रतिरोध की आवाज को दबाए जाने का दुख भी। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने समय की भयावहता को दर्ज करते कवि में दुख एक स्थायीभाव की तरह स्थापित हो गया है। कहना न होगा कि इस दुखबोध में ही मनुष्यता का भविष्य निहित है।
दरअसल ये कविताएँ अपने समय-समाज का एक ऐसा दस्तावेज हैं जो मनुष्यता की पक्षधरता में हमेशा प्रासंगिक बनी रहेंगी।
Bhay Bhi Shakti Deta Hai
- Author Name:
Leeladhar Jagudi
- Book Type:

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लीलाधर जगूड़ी की कविता यथार्थ को आंशिकता में नहीं बल्कि उसकी पूरी जटिलता और बारीकियों में खोजती आई है। इसी खोज ने उन्हें एक समर्थ कवि की पहचान दी है। लगभग इकहरी और एकआयामी हो रही कविता के मौजूदा दौर में जगूड़ी की ये कविताएँ अनुभव के अनेक आयामों के साथ कुछ चकित करती हैं, कुछ रोमांच से भर देती हैं और अन्ततः इस तरह विचलित करती हैं कि पाठक के भीतर भी एक प्रक्रिया शुरू हो सके।
इन कविताओं में न तो यथार्थ का उत्सव है और न विलाप : इनमें यथार्थ की ऐसी आलोचना है जिसमें वे नए और अनजाने पहलू भी प्रकट होते चलते हैं, जो इससे पहले काव्य-अनुभव नहीं बन पाए थे। यहाँ देखने, जानने और जाँचने के इतने तरीक़े हैं, भाषा और शिल्प की इतनी विविधता है और इसके बावजूद अनुभवों की खोज के अनेक नए या अज्ञात रास्तों की सम्भावनाओं के संकेत भी हैं। यह शायद इसलिए सम्भव हुआ है कि जगूड़ी के लिए जीवन, कविता और भाषा में से कोई भी चीज़ आसान नहीं हैं; कहीं सरल रेखाएँ नहीं हैं; इसके बरक्स उलझे हुए रास्ते और तीखे मोड़ हैं जिन पर चलते हुए आगे नए रास्ते और नए मोड़ ही दिखते हैं। इस मानी में यह संग्रह जगूड़ी की काव्य-यात्रा में एक बड़े मोड़ की तरह है जो आगे की यात्रा को आसान नहीं बना देता, बल्कि नए रचनात्मक जोखिमों की ओर ले जाता है।
भय भी शक्ति देता है की कविताओं के सरोकार बहुत विस्तृत हैं जिन्हें मोटे तौर पर छह हिस्सों में बाँटा गया है। जगूड़ी की आलोचनात्मक दृष्टि लोकगीतों और मिथकों के मनुष्य से लेकर आज के आर्थिक मनुष्य तक के संकटों से जूझती है; वह एक पहाड़ी बैल के सपने और दादी की आदिम दुनिया में भी जाती है और आधुनिक टेक्नोलॉजी या युद्धतंत्र की भी जाँच-परख करती है।
इस तरह लीलाधर जगूड़ी अपने समय के भौतिक और नैतिक संकटों को कविता में दर्ज़ करते हैं और सवाल उठाते चलते हैं। लेकिन वे महज़ यथार्थ का लेखा-जोखा या अनुकृति नहीं करते, बल्कि उसकी पुनर्रचना करते हैं। अपने समय से जूझते हुए वे कविता में एक और या समान्तर समय की रचना करते हैं, जो ख़ास तौर से इस संग्रह की और आधुनिक हिन्दी कविता की भी एक उपलब्धि है।
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