Gunjan
Author:
Sumitranandan PantPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
प्रस्तुत पुस्तक पाठकों के सामने है। इसमें सभी तरह की कविताओं का समावेश है; कुछ नवीन प्रयत्न भी। सुविधा के लिए प्रत्येक पद्य के नीचे रचना-काल दे दिया है। यदि 'गुंजन' मेरे पाठकों का मनोरंजन कर सका, तो मुझे प्रसन्नता होगी, न कर सका तो आश्चर्य न होगा, यह मेरे प्राणों की उन्मन गुंजन मात्र है। ‘मेंहदी’ में दूसरे वर्ण पर स्वरपात मधुर लगता है। तब यह शब्द चार ही मात्राओं का रह जाता है, जैसा कि साधारणत: उच्चरित भी होता है। प्रिय प्रियाऽह्लाद से 'प्रिय प्रि'-'आह्लाद' अच्छा लगता है। इस प्रकार की स्वतंत्रता मैंने कहीं-कहीं ली है। ‘अनिर्वचनीय’ के स्थान पर ‘अनिर्वच’, ‘हरसिंगार’ के स्थान पर ‘सिंगार’ आदि। ‘पल्लव’ की कविताओं में मुझे ‘सा’ के बाहुल्य ने लुभाया था। ‘गुंजन’ में ‘र’ की पुनरुक्ति का मोह मैं नहीं छोड़ सका। ‘सा’ से, जो मेरी वाणी का संवादी स्वर एकदम ‘रे’ हो गया है, यह उन्नति का क्रम संगीत-प्रेमी पाठकों को खटकेगा नहीं, ऐसा मुझे विश्वास है।</p>
<p>—सुमित्रानंदन पंत
ISBN: 9788180318122
Pages: 84
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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नेहा नरूका की कविताओं में भारतीय राजनीति के नवीन संस्करणजन्य भय और आशंकाएँ विन्यस्त हैं। वे रेखांकित करती हैं कि इस सदी में, ख़ासतौर पर पिछले दशक में राजनीति ने किस-किस तरह समाज को, जनचेतना को संक्रमित और प्रदूषित करने के उपक्रम किए हैं। उसके अक्स आम जीवन की दिनचर्या, विचार-प्रक्रिया, प्रेमिलता और सहजीविता पर नाख़ूनों की गहरी खरोंचों की तरह आए हैं। इनकी त्रासदियाँ सहज मानवीय जीवन की आकांक्षा को नाना प्रकार चोटिल कर सकती हैं, उसके विचलित करनेवाले, मार्मिक ब्योरे यहाँ दर्ज हैं। वे इन कविताओं में संचित आवेग, प्रतिवाद और पीड़ाजन्य क्रोध में समेकित हैं। हम देख सकते हैं कि काली राजनीति से गाढ़े होते इस सामाजिक अन्धकार में नेहा संवेदित स्पर्श और दृष्टि-सम्पन्नता से अपनी कविता अग्रसर करती हैं।
तमाम तरह के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दुराचारों से लथपथ इस समय में घर के बाहर और भीतर जितने अत्याचार और ख़तरे हैं, वे नेहा की कविताओं के प्रस्थान-बिन्दु हैं। ये कविताएँ एक रचनाकार की तकलीफ़ और तलछट के साक्षात जीवनानुभवों से निसृत हैं। इनसे गुज़रते हुए निम्न-मध्यवर्गीय, निम्नवर्गीय और वंचित जीवन के बारीक फ़र्क़ को बेहतर समझा जा सकता है, हिन्दी कविता में इधर जिसका संज्ञान दुर्लभ हो गया है। स्त्रियों पर आरोपित अन्धविश्वासों, धार्मिक पाखंड से सनी कुरीतियों पर सीधे प्रश्नों की तीक्ष्णता इन्हें अधिक प्रभावी बनाती है। प्रेम पर लिखते हुए वे समाज में व्याप्त विषमताओं और अन्तर्विरोधों पर लगातार निगाह रखती हैं।
यहाँ स्त्रीवाद की जिरहें, पितृसत्तात्मकता, स्त्री-निर्मिति आदि के पहलू रोज़मर्रा की मुश्किलों और समझ से प्रेरित हैं। जहाँ वे इंगित कर सकती हैं कि व्यापक सुख व्यापक संवेदनहीनता में बदल रहे हैं। स्त्री की व्यथा स्त्री-कथा में बदल गई है। प्रकारान्तर से स्त्री-दशा की बृहत् तस्वीर बनती चली जाती है। इस हेतु वे तथाकथित वांछित काव्यात्मकता या लयकारी के बरअक्स उस ज्ञानात्मक संवेदित गद्य में कविता मुमकिन करती हैं जो समकालीन कविता का हासिल है। ये कविताएँ आँसुओं की नहीं सवालों की झड़ी लगाती हैं, एक सजग स्त्री, नागरिक की तरफ़ से आरोप-पत्र दाख़िल करती हैं। बाध्यकारी नैतिकताओं और पवित्रताओं को प्रश्नांकन के दायरे में लेती हैं। पहले ही कविता-संग्रह में यह सब देखना सुखद है, स्वागतेय है।
—कुमार अम्बुज
Dukh Koi Chidiya To Nahi
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Amit Manoj
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Javednama
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Mohd. Ikbal
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Description:
‘जावेदनामा’ मुहम्मद इक़बाल का ऐसा महाकाव्य है जिसमें पहली बार विश्व के सभी प्रमुख धर्मों के महान व्यक्तित्वों को सम्मानजनक स्थान देकर उन्हें मानवता की विरासत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस्लाम के अन्तिम पैग़म्बर मुहम्मद के मे’राज के बहाने यह काव्यकृति हिन्दुत्व, बौद्ध, ज़रतुश्त और इस्लाम समेत ईसाई धर्म की समेकित अभिव्यक्ति है।
मूल फ़ारसी में सन् 1932 में प्रकाशित इस काव्यकृति ने क्लासिक का दर्जा पा लिया था। इसे ‘शाहनामा’, ‘गुलिस्ताँ’, ‘दीवान’, ‘डिवाइन कॉमेडी’ और ‘फ़ाउस्ट’ की क़तार में शुमार किया जाने लगा। एशिया का ‘डिवाइन कॉमेडी’ कहे गए इस महाकाव्य के सभी मुख्य पात्र, यथा—मौलाना रूमी, विश्वामित्र, ज़रतुश्त, गौतमबुद्ध, टॉल्स्टाय, ग़ालिब, ताहिरा, हल्लाज, अब्दाली, नादिरशाह, टीपू सुल्तान, जमालउद्दीन अफ़ग़ानी, सईद हलीम पाशा और संस्कृत कवि भर्तृहरि सभी एशिया के हैं। गोएटे की तरह इक़बाल में भी अन्य परम्पराओं एवं संस्कृतियों के प्रति सहिष्णुता और आदर की भावना है। ‘जावेदनामा’ के माध्यम से इक़बाल का मक़सद सम्बन्धित क़ौमों को पाश्चात्य साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए उत्प्रेरित भी करना था।
हिन्दी में पहली बार तथा विश्व की लगभग तमाम प्रमुख भाषाओं में अनूदित इस महाकाव्य में इक़बाल तत्त्व मीमांसात्मक विमर्शों से मुठभेड़ करने के साथ बीसवीं सदी की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और धार्मिक पेचीदगियों के परिप्रेक्ष्य में अपनी महान कलात्मक क्षमताओं का इस्तेमाल मूलतः एक भविष्योन्मुख विश्वदृष्टि की स्थापना के लिए करते हैं। अपने ढंग की अपूर्व और अनूठी कृति जिसकी मिसाल विश्व साहित्य में नहीं मिलती।
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