Vah Ladki Jo Motorcycle Chalati Hai
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पुरातन की स्मृति और अभाव अक्सर ही कविताओं के प्रेरक कारक होते हैं, या तो हम किसी बीते क्षण को कविता में सम्बोधित करते हैं या फिर किसी भविष्य की कामना हमें कविता में सोचने को प्रेरित करती है। लेकिन इस संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ वर्तमान को सम्बोधित हैं और आधुनिक सभ्यता के कुछ नए उपादानों को समझने की कोशिश करती हैं; मसलन—‘मोबाइल फ़ोन’, ‘बाज़ार’, ‘सेज के नाम से जाने जानेवाले विशेष आर्थिक क्षेत्र’ और ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’। >इस नई दुनिया को कवि बिना किसी पूर्वग्रह के एकदम ताज़ा निगाह से देखता और समझता है और पाठक को भी अपनी यात्रा में शामिल करता चलता है—‘क्या/आप नहीं चौंके थे/उस दिन/जब आपने/पहली बार किसी/एक लड़की को/मोटरसाइकिल चलाते/हुए देखा था?’ यह दृश्य कवि को एक नए युग का आरम्भ लगता है, लेकिन इसके भविष्य को लेकर उसे कुछ शंका भी है—‘क्या शादी के बाद भी/चला पाएगी वह मोटरसाइकिल/...क्या/वह आगे बैठी होगी/और पति/होगा/पीछे सवार?’ संग्रह का दूसरा खंड ‘उम्र का चालीसवाँ’ बढ़ती आयु के अहसास की कविताओं का है जिसके विषय में ख़ुद कवि का कहना है कि ‘उम्र के इस संक्रमण काल में रचित ये कविताएँ नितान्त निजी जीवन से लेकर सामाजिक स्तर तक बदलते रिश्तों के प्रति प्रतिक्रिया हैं। इन कविताओं में कई विशुद्ध हास्यबोध की रचनाएँ भी हैं, जिन्हें संग्रह में सम्मिलित करने के पीछे मेरी सोच यह है कि हास्य को केवल मंचीय जुमलेबाज़ी के लिए छोड़ देना हास्यबोध के साथ अन्याय है।’ संक्षिप्त मुहावरे में रची ये कविताएँ हिन्दी कविता-प्रेमियों को निश्चय ही पसन्द आएँगी।
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पुरातन की स्मृति और अभाव अक्सर ही कविताओं के प्रेरक कारक होते हैं, या तो हम किसी बीते क्षण को कविता में सम्बोधित करते हैं या फिर किसी भविष्य की कामना हमें कविता में सोचने को प्रेरित करती है। लेकिन इस संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ वर्तमान को सम्बोधित हैं और आधुनिक सभ्यता के कुछ नए उपादानों को समझने की कोशिश करती हैं; मसलन—‘मोबाइल फ़ोन’, ‘बाज़ार’, ‘सेज के नाम से जाने जानेवाले विशेष आर्थिक क्षेत्र’ और ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’।
>इस नई दुनिया को कवि बिना किसी पूर्वग्रह के एकदम ताज़ा निगाह से देखता और समझता है और पाठक को भी अपनी यात्रा में शामिल करता चलता है—‘क्या/आप नहीं चौंके थे/उस दिन/जब आपने/पहली बार किसी/एक लड़की को/मोटरसाइकिल चलाते/हुए देखा था?’ यह दृश्य कवि को एक नए युग का आरम्भ लगता है, लेकिन इसके भविष्य को लेकर उसे कुछ शंका भी है—‘क्या शादी के बाद भी/चला पाएगी वह मोटरसाइकिल/...क्या/वह आगे बैठी होगी/और पति/होगा/पीछे सवार?’
संग्रह का दूसरा खंड ‘उम्र का चालीसवाँ’ बढ़ती आयु के अहसास की कविताओं का है जिसके विषय में ख़ुद कवि का कहना है कि ‘उम्र के इस संक्रमण काल में रचित ये कविताएँ नितान्त निजी जीवन से लेकर सामाजिक स्तर तक बदलते रिश्तों के प्रति प्रतिक्रिया हैं। इन कविताओं में कई विशुद्ध हास्यबोध की रचनाएँ भी हैं, जिन्हें संग्रह में सम्मिलित करने के पीछे मेरी सोच यह है कि हास्य को केवल मंचीय जुमलेबाज़ी के लिए छोड़ देना हास्यबोध के साथ अन्याय है।’
संक्षिप्त मुहावरे में रची ये कविताएँ हिन्दी कविता-प्रेमियों को निश्चय ही पसन्द आएँगी।
Book Details
-
ISBN9788183618281
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: धूमिल की कविता वह कहती है जो गद्यकारों के स्पष्ट निष्कर्ष नहीं कह पाते। जिस चीज को वे वक्तव्य कहते हैं, वह सच जान चुके भाषणबाजों का कोई दो टूक फैसला नहीं है, वह चीजों के उस चेहरे को पकड़ने का उद्यम है जो देखने की सिद्ध और आत्मसम्पूर्ण परिपाटियों से छूट-छूट जाता है। उनकी कविता कवि से ज्यादा एक सतत चिन्तित व्यक्ति की कविता है। इसीलिए हमें भी वह वहाँ जाकर छूती है जहाँ काव्य के शिल्पकारों की सुमुख रचनाएँ नहीं पहुँच पातीं। उनका रचना-संघर्ष उन शब्द-योजनाओं और अर्थ-बिम्बों तक जाता है जिन्हें बौद्धिक और भावात्मक काहिली को संस्कृति-सभ्यता माननेवाला समाज अपशब्द, गाली आदि कहा करता है। इसीलिए शायद अपने कवि-जीवन में वे इतने व्यवस्थित कवि नहीं थे। उनकी चिन्ता का विस्तार बहुत ऊबड़-खाबड़ और बीहड़ था जो अपने बहुत भीतर से, जहाँ भाषा और शब्द अंकुरित होते हैं, वहाँ से लेकर बहुत बाहर, दूर तक एक सही शब्द देने की बेचैनी में जैसे परिदृश्य को रौंदता रहता है। शायद यही वजह है कि ऊपरी तौर पर सीमित दिखनेवाले इनके रचना-संसार को समेटने में हमारी समझ, हमारी चेतना बार-बार कुछ कम-सी पड़ जाती है। बार-बार लगता है कि असल में जो धूमिल हैं, वे फिर पूरी तरह पकड़ में नहीं आ सके। उनकी रचनाओं की यह समग्र प्रस्तुति एक प्रस्ताव है कि शुरू से आखिर तक के धूमिल को हम एक साथ रखकर फिर से समझने का प्रयास करें। अभी भी हो सकता है कि बहुत कुछ इधर-उधर बिखरा रह गया हो जो भविष्य में सामने आए लेकिन जो इन तीन खंडों में है, वह हमें धूमिल के सभी कोनों की तरफ ले जाने के लिए काफी है। इस पहले खंड में उनकी कविताओं को रखा गया है जिनमें उनके तीन प्रकाशित संग्रहों के अलावा वे सब कविताएँ भी ले ली गई हैं जो किताब की शक्ल में पाठकों तक नहीं पहुँच सकीं। और जो संख्या में उन कविताओं से कम नहीं हैं जो ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’ और ‘सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र’ में आ चुकी हैं। खंड - 2 धूमिल समग्र के इस दूसरे खंड में उनके गीतों, कहानियों, लघुकथाओं, नाटक, निबन्ध, समीक्षात्मक टिप्पणियों, अनुवाद आदि को लिया गया है। ‘दस्तक’ शीर्षक से उनके कागजों में मिले काव्यात्मक वाक्यों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है जिनसे विचार, रचना और अपने परिवेश, समाज, समय के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के तरीके को समझा जा सकता है। उन्होंने कहीं लिखा था कि ‘जब मैं साइकिल पर सवार होता हूँ, मेरा दिमाग साइकिल की तीलियों की तरह चलता है’। सड़कों-फुटपाथों, चाय-पान की दुकानों पर, खेतों खलिहानों में कहीं भी वे मूलतः एक व्यग्र कवि थे। हर जगह उन्हें किसी बड़े सच की तरफ इशारा करती हुई पंक्तियाँ मिल जाती थीं जिन्हें वे उस समय उपलब्ध किसी भी कागज के टुकड़े पर लिख लिया करते थे। यह बताता है कि उनका अपना होना कितनी गहराई से एक नैतिक उत्तरदायित्व से जकड़े रचनाकार का होना है। एक टटकी कविता बाजार में उतारकर फारिग हो जानेवाले कवि वे नहीं थे। यह जीवन और समय के बहुआयामी सच से उनका नाता था जो लगातार उन्हें अपनी कुंडली में कसे रहता था। हर सच्चे रचनाकार के साथ यह होता है। इसीलिए वे अपनी छप चुकी, प्रशंसित हो चुकी कविताओं में रद्दोबदल कर लेते थे। उनकी पांडुलिपियों में कहीं-कहीं कागज के किसी टुकड़े पर एक-एक दो-दो पंक्तियाँ लिखी हैं तो कहीं तीन-चार पंक्तियाँ ऐसी हैं जो अपने आप में पूरी कविता प्रतीत होती हैं लेकिन जिन पर वे आगे काम करना चाहते होंगे पर नहीं कर पाए। लेखन का उनका जीवन गीत से शुरू हुआ था और गीत लिखने का क्रम 1960-61 तक चला। प्रकाशित रूप में कुछ ही गीत मिले हैं लेकिन लिखे गए गीतों की संख्या इतनी है कि उनका भी एक संग्रह निकल सकता था। इस खंड में उनके गीतों को भी रखा गया है। शुरू से लेकर आखिर तक के उनके निबन्धों और समीक्षात्मक टिप्पणियों को भी काल-क्रम से इसमें रखने की कोशिश की गई है। उनमें से कुछ तो बाकायदा प्रकाशित रहे हैं, कुछ नहीं। बांग्ला के लोकप्रिय कवि सुकान्त भट्टाचार्य के कविता-संग्रह ‘छाड़पत्र’ का ‘पारपत्र’ नाम से उनका सह-अनुवाद भी इसमें शामिल है। खंड – 3 धूमिल समग्र के इस तीसरे खंड में संकलित सामग्री को पढ़ना धूमिल को समझने के लिए सबसे जरूरी है। इसमें उनकी डायरी और पत्रों को रखा गया है। डायरी से उनकी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संलग्नता प्रकट होती है। कहीं-कहीं दीखता है कि एक ही तरह की दिनचर्या कई दिनों तक चल रही है, लेकिन उसी के भीतर से उनकी सघन सक्रियता का भी बोध होता है। फरवरी 1969 का एक पन्ना है : ‘मैं महसूस करने लगा हूँ कि कविता आदमी को कुछ नहीं देगी, सिवा उस तनाव के जो बातचीत के दौरान दो चेहरों के बीच तन जाता है। इन दिनों एक खतरा और बढ़ गया है कि ज्यादातर लोग कविता को चमत्कार के आगे समझने लगे हैं। इस स्थिति में सहज होना जितना कठिन है, सामान्य होने का खतरा उतना ही, बल्कि उससे कहीं ज्यादा है।’ उसके थोड़ा आगे कविता की तरह की कुछ पंक्तियाँ हैं : ‘आलोचक/वह तुम्हारी कविता का/एक शब्द सूँघता है/और/नाक की सीध में/तिजोरियों की ओर दौड़ा चला जाता है।’ वे अपनी डायरी में इसी तरह कहीं अपनी प्रतिक्रियाएँ और कहीं विचार टाँकते रहते थे। जाहिर है कि यह डायरी उन्होंने साहित्यिक विधा के तौर पर नहीं, अपनी भावनात्मक और वैचारिक बेचैनियों को व्यक्त करने के लिए लिखी थी। इससे पता चलता है कि कहीं-कहीं उनकी विचार-प्रक्रिया निबन्ध की तरह चलने लगती थी और कहीं सिर्फ एक-दो वाक्यों में अपनी पूरी बात कह देते थे। अपनी कविताओं और छपी हुई चीजों की तरह पत्र भी उन्होंने बहुत सँभालकर नहीं रखे। पांडुलिपियों में कुल 61 पत्र प्राप्त हुए जिन्हें यहाँ दिया गया है। डायरी की तरह इनमें भी सम-सामयिक विषयों पर स्फुट विचार हैं।
Shreyasi
- Author Name:
Vinay Kumar
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Description:
विनय कुमार की ‘श्रेयसी’ सरस्वती के अनाविल उज्ज्वल स्वरूप का साक्षात्कार है। इसे पढ़ते हुए ऋग्वेद के वाक्सूक्त के मन्त्र चित्त में विवर्तित होने लगते हैं। ये कविताएँ चेतना के गह्वरों तक उतरती हैं और अतीत और इतिहास ही नहीं, वर्तमान को स्वरित करते हुए भविष्य की आहटों से भी परिचित कराती हैं। विनय कुमार बदलते परिवेश में अपने अक्षुण्ण सांस्कृतिक बोध के साथ कविता को वहाँ ले जाते हैं जहाँ ज्ञान शब्दों में सिमटकर नहीं रह जाता, अनुभव में संवेद्य बन जाता है।
—राधावल्लभ त्रिपाठी
विनय कुमार की ‘यक्षिणी’ को लोगों ने नए ढंग का खंड-काव्य कहा था। सात सर्गों में बँटा इस पुस्तक का कलेवर उससे आगे जाता है। एक लम्बी, गहरी और बहुआयामी विचार-यात्रा से सम्भव हुई इस कृति में सूखी वैचारिकी नहीं है। गीतात्मक तरलता, आख्यान-कुशलता, नए और अनोखे बिम्बों के साथ-साथ इसमें एक बंकिमता भी है जो कविताओं को मार्मिक और बेधक बनाती है।
‘श्रेयसी’ में परम्परागत अवधारणाओं का स्वीकार भी है और प्रतिरोध भी, विस्तार भी है और तिक्रमण भी। कवि दिव्य से आँखें तो मिलाता है मगर नाहक अभिभूत नहीं होता। वह ज्ञान की परम्परा को समझने का प्रयास करता है और इस क्रम में आवश्यक प्रतिवाद और भविष्यगामी संवाद भी सम्भव करता है जिसे इस यात्रा की उपलब्धि कह सकते हैं। सरस्वती की अवधारणा यूँ तो भारतीय है मगर इसे रचनेवाले तत्त्व कमोबेश हर संस्कृति में हैं। कवि ने भू-राजनीतिक और भाषिक सीमाओं का सहज भाव से अतिक्रमण करते हुए मानव-सभ्यता की सारस्वत-सर्जनात्मक यात्राओं की शक्तियों और चुनौतियों को स्वर दिया है।
यह कृति भारतीय होकर भी वैश्विक है, और धर्मों और संस्कृतियों के विभाजन से परे जाती है। ‘श्रेयसी’ में सरस्वती बड़ी सहजता के साथ गलेटिया, हाइपैटिया, बहादुरशाह ज़फ़र और वाजिद अली शाह से बात करती दिखती है। यह वंदना की किताब नहीं। श्रेयसी कोई देवी नहीं, एक तरलता है जो प्रकृति, कथा और सर्जनात्मक प्रज्ञा तीनों में बहती है। इन तरलताओं के बिना न तो मनुष्य का जीवन सम्भव है और न ही मनुष्यता का।
महाकाव्यात्मक सम्भावनाओं को अपने वितान में समेटती ‘श्रेयसी’ को वर्तमान हिन्दी काव्य-जगत में एक सार्थक हस्तक्षेप की तरह देखा जाएगा।
Mai Behoshi Ka Ek Patthar Tha
- Author Name:
Veeru Sonkar
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- Description: अपने दूसरे कविता संग्रह में वीरू सोनकर थोड़ी अप्रत्याशित परिपक्वता के साथ सामने आ रहे हैं। उनकी कविता में अदम्य आवेग, अपने समय और सभ्यता के रूपों-विद्रूपों और सौन्दर्य और अन्याय की बेरहम शिनाख्त, भाषा और कविता में तेज़ी से फैल रहे रूमानों से अपने को अलग करने की सजगता, बाहर और भीतर के तादात्म्य की अवसन्न पहचान अब पूरी प्रखरता और नवाचार में जाहिर हैं। उनमें दुस्साहस है पर उनकी कविता को मार्मिक विलाप की तरह पढ़ा जा सकता है। अपनी कविता में वे अपनी और आज की सचाई का सामना करने से नहीं हिचकिचाते और कभी अपने क्षोभ में कविता को गाली तक बनाने की हद तक चले जाते हैं। जो भी हो, वे एक भरेपूरे कवि हैं जो उनके एक क्षुब्ध, संवेदनशील, साहसी, सजग आदमी होने का ही एक संस्करण है। वीरू के यहाँ सहना और भाषा दोनों जब-तब कलंक बन जाते हैं। ऐसा भी लग सकता है कि हमारे समय में लगातार हो रहे विध्वंस के बरक्स वे भग्नावशेष में भटकते कवि हैं । यह कविता हमें पुकारती है, हमारे और अपने किये धरे पर विलाप करती है, हमें अनेक विद्रूप और विडम्बनाओं की चिन्हार कराती है, हमें भाषा में नये इलाकों में ले जाती है और हमें आश्वस्त करती है कि इस अभागे समय में भी कविता कुछ कर सकती है। अशोक वाजपेयी प्रसिद्ध साहित्यकार
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