Rashtrakavi Kuwempu Ki Kavitayen
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‘ओ मेरे चेतन, बन तू अनिकेतन', कहकर सारे जहाँ में कहीं भी निकेतनिवासी बनने की इच्छा न रखनेवाले कुवेंपु ने अपने विश्वमानव सन्देश के द्वारा मनुष्य को जाति, वर्ण और अन्यान्य उपाधि-विशेषणों से बाहर आकर मात्र मनुष्य की हैसियत से ‘जीने और जीने दो’ के सिद्धान्त पर डटे रहने को कहा है। उनके पंचमंत्रों और सप्तसूत्रों में विश्व मानव की परिकल्पना है।</p> <p>कुवेंपु के जीवन में आध्यात्मिकता का पुट उनके बचपन के दिनों से विकसित होता गया। उनके ‘दर्शन’ के मूल में प्रकृति का महत्त्वपूर्ण योगदान है, प्रकृति उनके काव्य का अविभाज्य अंग है। उनके काव्य में अभिव्यक्त आध्यात्मिकता ने उनके अध्ययन-चिन्तन-मन्थन एवं अनुभव से उद्भूत होकर धीरे-धीरे साकार रूप प्राप्त किया है। यह आध्यात्मिकता उनके लिए बाहरी वेश न होकर अन्तरंग विकास के अविभाज्य अंग के रूप में है। मतलब यह कि कुवेंपु में जो आध्यात्मिकता पाई जाती है, उसके लिए उस परिवेश का भी योगदान है, जिसके अन्तर्गत वे पाले-पोसे गए थे।
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‘ओ मेरे चेतन, बन तू अनिकेतन', कहकर सारे जहाँ में कहीं भी निकेतनिवासी बनने की इच्छा न रखनेवाले कुवेंपु ने अपने विश्वमानव सन्देश के द्वारा मनुष्य को जाति, वर्ण और अन्यान्य उपाधि-विशेषणों से बाहर आकर मात्र मनुष्य की हैसियत से ‘जीने और जीने दो’ के सिद्धान्त पर डटे रहने को कहा है। उनके पंचमंत्रों और सप्तसूत्रों में विश्व मानव की परिकल्पना है।</p>
<p>कुवेंपु के जीवन में आध्यात्मिकता का पुट उनके बचपन के दिनों से विकसित होता गया। उनके ‘दर्शन’ के मूल में प्रकृति का महत्त्वपूर्ण योगदान है, प्रकृति उनके काव्य का अविभाज्य अंग है। उनके काव्य में अभिव्यक्त आध्यात्मिकता ने उनके अध्ययन-चिन्तन-मन्थन एवं अनुभव से उद्भूत होकर धीरे-धीरे साकार रूप प्राप्त किया है। यह आध्यात्मिकता उनके लिए बाहरी वेश न होकर अन्तरंग विकास के अविभाज्य अंग के रूप में है। मतलब यह कि कुवेंपु में जो आध्यात्मिकता पाई जाती है, उसके लिए उस परिवेश का भी योगदान है, जिसके अन्तर्गत वे पाले-पोसे गए थे।
Book Details
-
ISBN9788180310782
-
Pages201
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
शुरू से लेकर अब तक की कविताएँ सिलसिलेवार पढ़ी जाएँ तो कुँवर नारायण की भाषा में बदलते मिज़ाज को लक्ष्य किया जा सकता है। आरम्भिक कविताओं पर नई कविता के दौर की काव्य-भाषा की स्वाभाविक छाप स्पष्ट है। इस छाप के बावजूद छटपटाहट है—कविता के वाक्य-विन्यास को आरोपित सजावट से मुक्त कर सहज वाक्य-विन्यास के निकट लाने की। आगे चलकर यह वाक्य-विन्यास कुँवर नारायण की कविता के लिए स्वभाव-सिद्ध हो गया है। लेकिन उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने सहज वाक्य-विन्यास को बोध के सरलीकरण का पर्याय अधिकांशत: नहीं बनने दिया। सहज रहते हुए सरलीकरण से बचे रहना, साधना के कठिन अभ्यास की माँग करता है। 'सहज-सहज सब कोई कहै—सहज न चीन्हे कोय!' बाल-भाषा में 'प्रौढ़ व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति' देने की चुनौती को कुँवर नारायण ने बहुत गहरे में लिया और जिया है। परम्परा की स्मृति और 'सैकड़ों नए-नए' पहलुओं को धारण करनेवाली काव्य-भाषा सम्भव करने के लिए जो साधना उन्होंने की होगी, उसका अनुमान ही किया जा सकता है। कुँवर नारायण इस महत्त्वपूर्ण सचाई के प्रति सजग हैं कि ‘कलाकार-वैज्ञानिक के लिए कुछ भी असाध्य नहीं।’ वे इस गहरी सचाई से भी वाक़िफ़ हैं कि चिन्तन चाहे दार्शनिक प्रश्नों पर किया जाए चाहे वैज्ञानिक तथ्यों पर, काव्यात्मक भाषा ही प्रत्यक्ष दिखने वाले विरोधों के परे जाकर मूलभूत सत्यों को धारण करने का हौसला कर पाती है।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Vishwa Sangeet Ka Itihas
- Author Name:
Amal Dash Sharma
- Book Type:

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Description:
संगीत के इतिहास से हम क्या समझते हैं? केवल घटनाओं का समावेश करना ही इतिहास नहीं कहलाता, बल्कि उन घटनाओं के परस्पर सम्बन्धों का समन्वय करना भी अत्यन्त आवश्यक है; अर्थात् कब, कहाँ और कैसे उन घटनाओं का विकास हुआ, उन सबका यथार्थ वर्णन और कालक्रम की दृष्टि से उपलब्ध सभी तत्त्वों और तथ्यों का प्रामाणिक रूप में समावेश—यह सभी कुछ इतिहासकार का कर्तव्य है। वस्तुतः संगीत का विकास मनुष्य जाति के विकास के साथ जुड़ा हुआ है। इसमें हज़ारों वर्षों का समय लगा है। इसी कालावधि में संगीत का भी विकास हुआ है। इसलिए संगीत कला के इतिहास की व्याख्या के लिए उस समूचे काल को कई भागों में बाँटकर देखना होगा।
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए लेखक ने विश्व-संगीत के इतिहास को भी—कालक्रम से प्राचीन, मध्य एवं आधुनिक—मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित कर विवेचित किया है तथा विभिन्न संस्कृतियों और शासनकाल के आधार पर उसे उपभागों में बाँटकर देखा है। इस क्रम में लेखक ने भारतीय संगीत को एक जाति की असाधारण मनीषा के इतिहास के रूप में रेखांकित करते हुए विश्व-संगीत के इतिहास में उसके अमूल्य अवदान का मूल्यांकन किया है।
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