Hindnama : Ek Mahadesh Ki Gatha
Author:
Krishna KalpitPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 239.2
₹
299
Available
हिन्दनामा’ एक महादेश की गाथा उसी तरह है जिस तरह प्रेमचन्द का ‘गोदान’ भारतीय किसान जीवन की गाथा है। ‘हिन्दनामा’ इतिहास है न काल्पनिक उपन्यास। यह एक धूलभरा दर्पण है जिसमें हमारे देश की बहुत सी धूमिल और चमकदार छवियाँ दिखाई देती हैं। ‘हिन्दनामा’ दरअसल हिन्दुस्तान के बारे में एक दीर्घ कविता है जिसमें कोई कालक्रम नहीं है। सब कुछ स्मृतियों की तरह गड्डमड्ड है, जहाँ प्राचीन और अर्वाचीन इस तरह मिलते हैं जैसे किसी नदी के घाट पर शेर और बकरी एक साथ अपनी प्यास बुझा रहे हों। इसकी कोई बिबलियोग्राफ़ी नहीं है—यह कबीर के करघे पर बुनी हुई एक रंगीन चादर है, जो शताब्दियों से शताब्दियों तक तनी हुई है। उग्र राष्ट्रवाद के इस वैश्विक दौर में अपने राष्ट्र को जानने की कोशिश निश्चय ही जोखिम का काम है, और यह कहने की शायद कोई ज़रूरत नहीं कि ‘हिन्दनामा’ हिन्दूनामा नहीं है। हिन्दुस्तान का इन्द्रधनुष जो सात रंगों से मिलकर बना है, उसकी ऐसी गाथा है जो कभी और कहीं भी ख़त्म नहीं होती—चलती ही जाती है। हिन्दी काव्य-जगत के लिए बरसों बाद हासिल एक उपलब्धि है ‘हिन्दनामा’।
ISBN: 9789389577082
Pages: 304
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: ‘धूमिल की श्रेष्ठ कविताएँ’ अत्यन्त प्रखर और हिन्दी काव्य-जगत में नई हलचल पैदा करनेवाले सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की कविताओं का प्रथम सम्पादन है। एक लम्बी भूमिका के साथ सम्पादकों ने उनकी श्रेष्ठ कविताओं का चयन किया है, साथ ही भाषा के माध्यम से गाँव को शहर की होड़ में लानेवाले कवि की कविताओं पर संक्षिप्त टिप्पणी भी प्रस्तुत की है। लक्ष्य, धूमिल की अनगढ़ भाषा और नए मुहावरे को पाठकों तक सहजता से पहुँचाना है। सम्पादकों की दृष्टि में धूमिल का सर्जनात्मक व्यक्तित्व उनकी कविता में सक्रियता से मुखर है। ‘धूमिल को उनके कथ्य और भाषा के स्वीकृत स्वरूप के लिए जानना चाहिए, न कि प्रयोगात्मक शैलीकार के रूप में।’
Raks Jaari Hai
- Author Name:
Zilani Bano
- Book Type:

- Description: अब्बास ताबिश की ग़ज़लों में एक साधा हुआ रूमान है, जिसकी हदें इंसानी रूह और इंसानों की दूर-दूर तक फैली हुई दुनिया के तमामतर मसलों पर निगाह डालती हैं। वे पाकिस्तान से हैं और उर्दू शायरी की उस रवायत में हैं जिससे पाकिस्तान के साथ-साथ हिन्दुस्तान के लोग भी बख़ूबी परिचित हैं, और जिसके दीवाने दोनों मुल्कों में बराबर पाए जाते हैं। अहसास के उनके यहाँ कई रंग हैं, यानी ये नहीं कहा जा सकता कि वे सिर्फ़ इश्क़ के शायर हैं, या सिर्फ़, फ़लसफ़े की गुत्थियों को ही अपने अशआर में खोलते हैं, या सिर्फ़ दुनियावी समझ और ज़िन्दगी को ही अपना विषय बनाते हैं। उनके यहाँ यह सब भी है—मसलन यह शेर, ‘हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस, जो तआल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं।’ इस शे’र में निहाँ विराग और लगाव हैरान कर देनेवाला है, उसको कहने का अन्दाज़ तो लाजवाब है ही। अपनी बात को कहने के लिए वे अपने अहसास को एक तस्वीर की शक्ल में हम तक पहुँचाते हैं जो पढ़ने-सुनने वाले के ज़ेहन में नक़्श हो जाता है। ‘मैं कैसे अपने तवाज़ुन को बरकरार रक्खूँ, क़दम जमाऊँ तो साँसें उखड़ने लगती हैं’। इस शे’र में क्या एक भरा-पूरा आदमी अपने वजूद की चुनौतियों को सँभालने की जद्दोजहद में हलकान हमारे सामने साकार नहीं हो जाता? अब्बास ताबिश की विशेषताओं में यह चित्रात्मकता सबसे ज़्यादा ध्यान आकर्षित करती है। मिसाल के लिए एक और शे’र, ‘ये जो मैं भागता हूँ वक़्त से आगे-आगे, मेरी वहशत के मुताबिक़ ये रवानी कम है’। अब्बास ताबिश की चुनिन्दा ग़ज़लों का यह संग्रह उनकी अब तक प्रकाशित सभी किताबों की नुमायंदगी करता है। उम्मीद है हिन्दी के शायरी-प्रेमी पाठक इस किताब से उर्दू ग़ज़ल के एक और ताक़तवर पहलू से परिचित होंगे।
Tareekh Hamein Saath Liye Jaatee Hai
- Author Name:
Hariom
- Book Type:

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Description:
कविता अन्ततः एक भाषिक संरचना है। शब्दों को बरतने की कला है। लय और संरचना उसके अनिवार्य तत्व हैं। समकालीन भारतीय राजनीति की शिकार सिर्फ़ मनुष्यता ही नहीं हमारी भाषा भी हुई है। वो भाषा जो अमीर ख़ुसरो, ग़ालिब, मीर, रहीम से लेकर मुक्तिबोध की सृजनात्मकता से गुज़रकर हमें प्राप्त हुई।
हरिओम की कविताएँ भाषा का एक खोया हुआ आत्मीय संसार गोया हमे वापिस सौंपती हैं। उनके लेखन में एक स्वाभाविक लय है जो अपनी सहजता से हमें चकित करती है। इसे एक लम्बे अभ्यास के बिना प्राप्त करना असम्भव है। कहीं-कहीं नए शब्दों को शामिल करते हुए अनायास ही वे भाषा की न सिर्फ़ पुनर्रचना करते प्रतीत होते हैं; बल्कि उसे नया संस्कार भी देते हैं।
और हम सदियाँ बिताकर आ गए थे जैसे लम्हों में—वाक्य ऐसे लगते हैं जैसे किसी शेर का पूरा मिसरा हों। भूख से नहीं मरता कोई—जैसा यांत्रिक, संवेदनहीन अहम्मन्य वाक्य जैसे किसी ग़ैरज़िम्मेदार तानाशाह का प्रतीक बन जाता है। अपने समय और समाज की गहरी चिन्ता और एहसास के बावजूद इस संग्रह की मुख्य थीम प्रेम है। वे कहते हैं—वक़्त ने जगह को ऐसे घेर रखा है/जैसे मेरी बाँहों ने तुम्हें।
वक़्त और जगह याद करिए—Time & Space—आइंस्टाइन ने जब समय को स्थान का अनिवार्य चौथा आयाम बताया था तो वैज्ञानिकों को ये समझने में कुछ समय लगा था। किन्तु प्रेम की अनुभूति के बरक्स समय और स्थान के युग्म को हरिओम इस सहजता से लाकर रख देते हैं कि हमें ये बोध ही नहीं होता कि उनकी बाँहों में समय है। और उनकी प्रेमिका जिसे वे ‘तुम’ कहकर सम्बोधित कर रहें हैं—वो जगह है, वो पृथ्वी है, वो अन्तरिक्ष है। जिसका समय से मुक्त होना असम्भव है बल्कि अस्तित्व भी असम्भव है।
हरिओम युवा हैं। अपने शब्दों को यक़ीन के साथ स्वर देते हैं और लय पर उनका अधिकार है। तारीख़ हमें साथ लिये जाती है संग्रह में इसके अलावा भी बहुत कुछ है और जो नहीं है वो अगली रचनाओं में और ताक़त के साथ आएगा।
इस यक़ीन के साथ शुभकामनाओं सहित...
—नरेश सक्सेना
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