Bhramargeet Saar
(0)
Author:
Acharya Ramchandra ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
135
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सूर के कृष्ण-प्रेम तथा भक्ति के सागर ‘सूरसागर’ का सबसे मूल्यवान मोती है ‘भ्रमरगीत’ जिसमें सूरदास के हृदय से निकली अपूर्व रसधारा बही है। ‘भ्रमरगीत सार’ के संकलन-सम्पादन का कार्य आचार्य शुक्ल ने 1920 में शुरू किया था, लेकिन ठीक से पूरा होने में इसे कुछ समय लगा। लगभग चार सौ पदों के इस संचयन में उस समय कुछ पुनरुक्ति दोष भी रह गया था जिसे पुस्तक की लोकप्रियता और लगातार बढ़ती माँग के चलते, ठीक करने का समय आचार्य नहीं जुटा पाए थे।</p> <p>प्रस्तुत संस्करण वरिष्ठ आलोचक और आचार्य शुक्ल के समीप रहे विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित है। सो इसमें नए पाठकों की सुविधा के लिए कुछ और टिप्पणियाँ भी जोड़ दी गई हैं, जिन्हें हम ‘चूर्णिका’ शीर्षक से पुस्तक के अन्त में पाएँगे।</p> <p>आचार्य शुक्ल के शब्दों में सूरदास का प्रेम-पथ ‘लोक से न्यारा’ है। गोपियों के प्रेम-भाव की गम्भीरता उद्धव के ज्ञान-गर्व को मिटाती हुई दिखाई पड़ती है। वह भक्ति की एकान्त साधना का आदर्श प्रतिष्ठित करती जान पड़ती है, लोकधर्म के किसी अंग का नहीं। सूरदास सच्चे प्रेम-मार्ग के त्याग और पवित्रता को ज्ञान-मार्ग के त्याग और पवित्रता के समकक्ष खड़ा करने में सफल रहे हैं। साथ ही, उन्होंने उस त्याग को रागात्मिका वृत्ति द्वारा प्रेरित दिखाकर भक्ति या प्रेम-मार्ग की सुगमता भी प्रतिपादित की है।</p> <p>पदों के प्रामाणिक पाठ के साथ आचार्य शुक्ल की सुदीर्घ व्याख्या इस पुस्तक को सूर के प्रेम-पक्ष की मूल्यवान विवेचना का रूप देती है, जो मध्यकालीन काव्य, विशेषकर भक्तिधारा के अध्येताओं के साथ ही भाव-प्रेमी पाठकों के लिए भी आनन्द का स्रोत सिद्ध होती है।
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सूर के कृष्ण-प्रेम तथा भक्ति के सागर ‘सूरसागर’ का सबसे मूल्यवान मोती है ‘भ्रमरगीत’ जिसमें सूरदास के हृदय से निकली अपूर्व रसधारा बही है। ‘भ्रमरगीत सार’ के संकलन-सम्पादन का कार्य आचार्य शुक्ल ने 1920 में शुरू किया था, लेकिन ठीक से पूरा होने में इसे कुछ समय लगा। लगभग चार सौ पदों के इस संचयन में उस समय कुछ पुनरुक्ति दोष भी रह गया था जिसे पुस्तक की लोकप्रियता और लगातार बढ़ती माँग के चलते, ठीक करने का समय आचार्य नहीं जुटा पाए थे।</p>
<p>प्रस्तुत संस्करण वरिष्ठ आलोचक और आचार्य शुक्ल के समीप रहे विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित है। सो इसमें नए पाठकों की सुविधा के लिए कुछ और टिप्पणियाँ भी जोड़ दी गई हैं, जिन्हें हम ‘चूर्णिका’ शीर्षक से पुस्तक के अन्त में पाएँगे।</p>
<p>आचार्य शुक्ल के शब्दों में सूरदास का प्रेम-पथ ‘लोक से न्यारा’ है। गोपियों के प्रेम-भाव की गम्भीरता उद्धव के ज्ञान-गर्व को मिटाती हुई दिखाई पड़ती है। वह भक्ति की एकान्त साधना का आदर्श प्रतिष्ठित करती जान पड़ती है, लोकधर्म के किसी अंग का नहीं। सूरदास सच्चे प्रेम-मार्ग के त्याग और पवित्रता को ज्ञान-मार्ग के त्याग और पवित्रता के समकक्ष खड़ा करने में सफल रहे हैं। साथ ही, उन्होंने उस त्याग को रागात्मिका वृत्ति द्वारा प्रेरित दिखाकर भक्ति या प्रेम-मार्ग की सुगमता भी प्रतिपादित की है।</p>
<p>पदों के प्रामाणिक पाठ के साथ आचार्य शुक्ल की सुदीर्घ व्याख्या इस पुस्तक को सूर के प्रेम-पक्ष की मूल्यवान विवेचना का रूप देती है, जो मध्यकालीन काव्य, विशेषकर भक्तिधारा के अध्येताओं के साथ ही भाव-प्रेमी पाठकों के लिए भी आनन्द का स्रोत सिद्ध होती है।
Book Details
-
ISBN9788180312717
-
Pages183
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लोकजीवन की विभिन्न छवियों, भाव और भाषा-भंगिमाओं, प्रकृति और साथ ही नागर जीवन के विभिन्न सकारात्मक-नकारात्मक चित्रों का सार्थक निर्वाह करनेवाली ये कविताएँ एक बार फिर से अष्टभुजा शुक्ल के अलगपन को रेखांकित करती हैं।
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- Description: धूमिल की कविता वह कहती है जो गद्यकारों के स्पष्ट निष्कर्ष नहीं कह पाते। जिस चीज को वे वक्तव्य कहते हैं, वह सच जान चुके भाषणबाजों का कोई दो टूक फैसला नहीं है, वह चीजों के उस चेहरे को पकड़ने का उद्यम है जो देखने की सिद्ध और आत्मसम्पूर्ण परिपाटियों से छूट-छूट जाता है। उनकी कविता कवि से ज्यादा एक सतत चिन्तित व्यक्ति की कविता है। इसीलिए हमें भी वह वहाँ जाकर छूती है जहाँ काव्य के शिल्पकारों की सुमुख रचनाएँ नहीं पहुँच पातीं। उनका रचना-संघर्ष उन शब्द-योजनाओं और अर्थ-बिम्बों तक जाता है जिन्हें बौद्धिक और भावात्मक काहिली को संस्कृति-सभ्यता माननेवाला समाज अपशब्द, गाली आदि कहा करता है। इसीलिए शायद अपने कवि-जीवन में वे इतने व्यवस्थित कवि नहीं थे। उनकी चिन्ता का विस्तार बहुत ऊबड़-खाबड़ और बीहड़ था जो अपने बहुत भीतर से, जहाँ भाषा और शब्द अंकुरित होते हैं, वहाँ से लेकर बहुत बाहर, दूर तक एक सही शब्द देने की बेचैनी में जैसे परिदृश्य को रौंदता रहता है। शायद यही वजह है कि ऊपरी तौर पर सीमित दिखनेवाले इनके रचना-संसार को समेटने में हमारी समझ, हमारी चेतना बार-बार कुछ कम-सी पड़ जाती है। बार-बार लगता है कि असल में जो धूमिल हैं, वे फिर पूरी तरह पकड़ में नहीं आ सके। उनकी रचनाओं की यह समग्र प्रस्तुति एक प्रस्ताव है कि शुरू से आखिर तक के धूमिल को हम एक साथ रखकर फिर से समझने का प्रयास करें। अभी भी हो सकता है कि बहुत कुछ इधर-उधर बिखरा रह गया हो जो भविष्य में सामने आए लेकिन जो इन तीन खंडों में है, वह हमें धूमिल के सभी कोनों की तरफ ले जाने के लिए काफी है। इस पहले खंड में उनकी कविताओं को रखा गया है जिनमें उनके तीन प्रकाशित संग्रहों के अलावा वे सब कविताएँ भी ले ली गई हैं जो किताब की शक्ल में पाठकों तक नहीं पहुँच सकीं। और जो संख्या में उन कविताओं से कम नहीं हैं जो ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’ और ‘सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र’ में आ चुकी हैं। खंड - 2 धूमिल समग्र के इस दूसरे खंड में उनके गीतों, कहानियों, लघुकथाओं, नाटक, निबन्ध, समीक्षात्मक टिप्पणियों, अनुवाद आदि को लिया गया है। ‘दस्तक’ शीर्षक से उनके कागजों में मिले काव्यात्मक वाक्यों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है जिनसे विचार, रचना और अपने परिवेश, समाज, समय के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के तरीके को समझा जा सकता है। उन्होंने कहीं लिखा था कि ‘जब मैं साइकिल पर सवार होता हूँ, मेरा दिमाग साइकिल की तीलियों की तरह चलता है’। सड़कों-फुटपाथों, चाय-पान की दुकानों पर, खेतों खलिहानों में कहीं भी वे मूलतः एक व्यग्र कवि थे। हर जगह उन्हें किसी बड़े सच की तरफ इशारा करती हुई पंक्तियाँ मिल जाती थीं जिन्हें वे उस समय उपलब्ध किसी भी कागज के टुकड़े पर लिख लिया करते थे। यह बताता है कि उनका अपना होना कितनी गहराई से एक नैतिक उत्तरदायित्व से जकड़े रचनाकार का होना है। एक टटकी कविता बाजार में उतारकर फारिग हो जानेवाले कवि वे नहीं थे। यह जीवन और समय के बहुआयामी सच से उनका नाता था जो लगातार उन्हें अपनी कुंडली में कसे रहता था। हर सच्चे रचनाकार के साथ यह होता है। इसीलिए वे अपनी छप चुकी, प्रशंसित हो चुकी कविताओं में रद्दोबदल कर लेते थे। उनकी पांडुलिपियों में कहीं-कहीं कागज के किसी टुकड़े पर एक-एक दो-दो पंक्तियाँ लिखी हैं तो कहीं तीन-चार पंक्तियाँ ऐसी हैं जो अपने आप में पूरी कविता प्रतीत होती हैं लेकिन जिन पर वे आगे काम करना चाहते होंगे पर नहीं कर पाए। लेखन का उनका जीवन गीत से शुरू हुआ था और गीत लिखने का क्रम 1960-61 तक चला। प्रकाशित रूप में कुछ ही गीत मिले हैं लेकिन लिखे गए गीतों की संख्या इतनी है कि उनका भी एक संग्रह निकल सकता था। इस खंड में उनके गीतों को भी रखा गया है। शुरू से लेकर आखिर तक के उनके निबन्धों और समीक्षात्मक टिप्पणियों को भी काल-क्रम से इसमें रखने की कोशिश की गई है। उनमें से कुछ तो बाकायदा प्रकाशित रहे हैं, कुछ नहीं। बांग्ला के लोकप्रिय कवि सुकान्त भट्टाचार्य के कविता-संग्रह ‘छाड़पत्र’ का ‘पारपत्र’ नाम से उनका सह-अनुवाद भी इसमें शामिल है। खंड – 3 धूमिल समग्र के इस तीसरे खंड में संकलित सामग्री को पढ़ना धूमिल को समझने के लिए सबसे जरूरी है। इसमें उनकी डायरी और पत्रों को रखा गया है। डायरी से उनकी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संलग्नता प्रकट होती है। कहीं-कहीं दीखता है कि एक ही तरह की दिनचर्या कई दिनों तक चल रही है, लेकिन उसी के भीतर से उनकी सघन सक्रियता का भी बोध होता है। फरवरी 1969 का एक पन्ना है : ‘मैं महसूस करने लगा हूँ कि कविता आदमी को कुछ नहीं देगी, सिवा उस तनाव के जो बातचीत के दौरान दो चेहरों के बीच तन जाता है। इन दिनों एक खतरा और बढ़ गया है कि ज्यादातर लोग कविता को चमत्कार के आगे समझने लगे हैं। इस स्थिति में सहज होना जितना कठिन है, सामान्य होने का खतरा उतना ही, बल्कि उससे कहीं ज्यादा है।’ उसके थोड़ा आगे कविता की तरह की कुछ पंक्तियाँ हैं : ‘आलोचक/वह तुम्हारी कविता का/एक शब्द सूँघता है/और/नाक की सीध में/तिजोरियों की ओर दौड़ा चला जाता है।’ वे अपनी डायरी में इसी तरह कहीं अपनी प्रतिक्रियाएँ और कहीं विचार टाँकते रहते थे। जाहिर है कि यह डायरी उन्होंने साहित्यिक विधा के तौर पर नहीं, अपनी भावनात्मक और वैचारिक बेचैनियों को व्यक्त करने के लिए लिखी थी। इससे पता चलता है कि कहीं-कहीं उनकी विचार-प्रक्रिया निबन्ध की तरह चलने लगती थी और कहीं सिर्फ एक-दो वाक्यों में अपनी पूरी बात कह देते थे। अपनी कविताओं और छपी हुई चीजों की तरह पत्र भी उन्होंने बहुत सँभालकर नहीं रखे। पांडुलिपियों में कुल 61 पत्र प्राप्त हुए जिन्हें यहाँ दिया गया है। डायरी की तरह इनमें भी सम-सामयिक विषयों पर स्फुट विचार हैं।
Pani Jaisa Des
- Author Name:
Vinay Kumar
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Description:
पानी जैसी तरल और पारदर्शी ये कविताएँ पानी के ही बारे में हैं, पानी के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में; और इस तरह पृथ्वी पर पानी के सहारे जीने वाले मनुष्य, और उसकी उत्तरजीविता के बारे में भी।
यह अकसर नहीं होता कि कोई एक तत्त्व कवि की चेतना में इस तरह पैवस्त हो जाए कि एक पूरी की पूरी पुस्तक उससे लिखवा ले, विनय कुमार के साथ यह दूसरी बार हुआ है। ‘यक्षिणी’ के बाद इस बार वे पानी पर ठहरे हैं, जो जीवन का आधार है, और सभ्यता की सबसे ज्यादा मार भी उसी पर है।
ये कविताएँ पानी के दुख की कविताएँ हैं जिसमें मनुष्यों के दुखों के प्रतिबिम्ब भी दिखाई देते हैं। इनमें तालाब हैं, नदियाँ हैं, उनके किनारों पर उगी-बसी जीवन-आकांक्षाएँ और हताशाएँ हैं। मंत्रों जैसी अखंडता में अनुस्यूत ये कविताएँ गहरे वैचारिक आलोड़न से उपजी हैं जिनका एक सिरा पर्यावरणीय सरोकारों की वर्तमानता से जुड़ा है और दूसरा सिरा जल की तात्त्विक अनंतता से।
Neerja
- Author Name:
Mahadevi Verma
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- Description: महादेवी वर्मा की हिन्दी काव्य-यात्रा में परिपक्वता की दृष्टि से 'नीरजा' का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ‘नीरजा’ में बिलकुल परिपक्व भाषा में एक समर्थ कवि बड़े अधिकार के साथ और बड़े सहज भाव से अपनी बात कहता है। महादेवी जी के अनुसार, “ ‘नीरजा’ में जाकर गीति का तत्त्व आ गया, मुझमें और मैंने मानो दिशा भी पा ली है।”
Thanega Pranam
- Author Name:
Manju Preetham
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- Description: The best poetry collection
Himalaya Ke Anchal Mein Prakriti Ka Sparsh
- Author Name:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'
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- Description: पुस्तक के हर प्रसंग में एक अप्रत्यक्ष और अदृश्य शाश्वत शक्ति परिलक्षित होती है। यह पुस्तक एक उन्नत साधक से लेकर आध्यात्मिक पथ के प्रथम जिज्ञासुओं के लिए रोमांचक मार्गदर्शिका है। हिमालयवासी दिव्य संतों के रहस्यों से परिचय कराती आत्मकथा, जिसमें पुनर्जन्म, साधना, आध्यात्मिक उन्नयन आदि की अनसुनी घटनाएँ पाठकों को अचंभित कर देंगी। मैं तुम्हारे परिवार में लौट रहा हूँ। हमने पिछले जन्म में भी साथ गाया है। जैसे वाक्य इस पुस्तक में दृष्टिगोचर होते हैं। यह पुस्तक शरीर से निकलकर सूक्ष्म यात्रा कर पिछले जन्म के संबंधियों को सँभालने जैसे रहस्योद्घाटनों से भरी विस्मयकारी कृति है, जिसको आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे। इसमें आपको भौतिकवादी पश्चिम जगत् में प्रेम से ओत-प्रोत लोक-कल्याणार्थ हिमालयवासी भारतीय संतों की गौरवशाली करुणा गाथा का विस्तृत विवरण मिलेगा। साथ ही यह आपको सत्य और धर्म पर आधारित दुःख, पीड़ा और मृत्यु से निवृत्ति दिलाती दिव्य उद्देश्य से भरपूर ईश्वर के चिरसेवकों के चमत्कारों का परिचय भी देगी। अवतारों और अलौकिक महापुरुषों की क्रीड़ाभूमि भारत की अक्षुण्ण संत परंपरा की अत्यंत रोमहर्षक नवीनतम गाथा। कवि ने प्रकृति की तुलना माँ से की है और यह प्रतिपादित किया है ................. भारतीय मनीषा अनादि काल से ही प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिज्ञासु एवं आस्थावान रही है। सर्वप्रथम ‘अथर्ववेद’ में ही ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथ्वियाः’ कहकर धरती की वंदना की गई है। साथ ही, आकाश को पिता की संज्ञा दी गई है। हमने पर्वत, नदी, वृक्ष-वनस्पतियों में भी देवी-देवता की संकल्पना की है। इस तरह हमारे आदि पूर्वज समूची प्रकृति में ही देवत्व का संधान करते थे। वैदिक साहित्य में प्रकृति की सारी शक्तियों को एक सुनिश्चित विधान में दिखलाया गया है। उसमें नियमन है। उसके विराट् एवं प्रशस्त रूप में चराचर जगत् तथा गोचर और अगोचर ब्रह्मांड के समस्त उपादान समाहित हैं। इस नियमन को वैदिक भाषा में ऋत कहा गया है। ऋत नियमों से बड़ा कोई नहीं है। अग्नि प्रकृति की विराट् शक्ति हैं। वे भी एतस्य क्षत्ता हैं। नदियाँ भी ऋतावरी हैं और नियमानुसार चलती हैं। भूमंडलीय ताप भी नियमबद्ध और संतुलित है। हमारे ऋषियों का यह मानना है कि जब प्रकृति की सारी शक्तियाँ नियमबद्ध हैं तो मनुष्य का आचरण भी नियमबद्ध होना चाहिए। यही कारण है कि हमारे कवियों और साहित्यकारों ने सदैव प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति अपनी संलग्नता का परिचय दिया है। भारतीय विश्वदृष्टि प्रकृति और मनुष्य में, व्यष्टि-समष्टि में भेद नहीं करती है। हम मानते हैं कि बाहर जो सूर्य का प्रकाश है, वही भीतर ज्ञान का प्रकाश है। बाहर जो अंधकार है, वही भीतरी भय है। इसी तरह तृण और वीरुध में जो ऊपर उठने और लहलहाने की प्रक्रिया है, वह हमारी आंतरिक उमंग है। हमने मनुष्य-देवता, प्रकृति-पुरुष में स्वामी के बजाय सहकार भाव देखा है। इसलिए वे परस्पर एक-दूसरे को प्रेरित-प्रकाशित और संपन्न करते हैं। फलतः वे युग्म परस्पर अपेक्षी हो जाते हैं। उनकी सहकारिता, सहस्थिति और अंतरावलंबन सामूहिक उत्थान में सुपरिणत हो जाते हैं। अतः पारस्परिक सामंजस्य और सहयोगपूर्ण अस्तित्व के द्वारा परम सामंजस्य तथा पूर्णता तक पहुँचना ही भारतीय चिंता-धारा का केंद्रीय वैशिष्ट्य है।
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