Mujh Ko Meri Yaad Aa Rahi Hai (Hindi)
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रेख़्ता पब्लिकेशन से प्रकाशित पुस्तक ‘मुझ को मेरी याद आ रही है : फरहत एहसास’ इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि इसमें 1973 से 2023 तक का उनका काव्य-संग्रह शामिल है। इसमें ग़ज़लें और कविताएँ सम्मिलित हैं, जिनमें जीवन की विषमताएँ, मानव मनोविज्ञान, भावनाएँ, व्यक्तिगत पीड़ा, सामाजिक विचलन, सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ परंपराओं के प्रति विद्रोह की स्पष्ट झलक मिलती है। फरहत एहसास का जन्म 25 दिसंबर 1950 को बहराइच (उत्तर प्रदेश) में हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे उर्दू साप्ताहिक अख़बार ‘हजूम’ से जुड़े। उन्हें उर्दू, हिंदी, ब्रज, अवधी और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेज़ी और पाश्चात्य साहित्य में भी दक्षता हासिल है। फरहत एहसास की शायरी जीवन की शायरी है। इसमें मानव मनोविज्ञान, भावनाओं और संवेदनाओं का हर पहलू जीवित महसूस होता है। पुरानी और जर्जर परंपराओं से विद्रोह उनकी शायरी की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। उनके काव्य-संग्रह ‘मैं रोना चाहता हूँ’, ‘शायरी नहीं है यह’ और ‘क़श्क़ा खींचा देर में बैठा’ इसी कड़ी के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
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रेख़्ता पब्लिकेशन से प्रकाशित पुस्तक ‘मुझ को मेरी याद आ रही है : फरहत एहसास’ इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि इसमें 1973 से 2023 तक का उनका काव्य-संग्रह शामिल है। इसमें ग़ज़लें और कविताएँ सम्मिलित हैं, जिनमें जीवन की विषमताएँ, मानव मनोविज्ञान, भावनाएँ, व्यक्तिगत पीड़ा, सामाजिक विचलन, सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ परंपराओं के प्रति विद्रोह की स्पष्ट झलक मिलती है। फरहत एहसास का जन्म 25 दिसंबर 1950 को बहराइच (उत्तर प्रदेश) में हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे उर्दू साप्ताहिक अख़बार ‘हजूम’ से जुड़े। उन्हें उर्दू, हिंदी, ब्रज, अवधी और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेज़ी और पाश्चात्य साहित्य में भी दक्षता हासिल है। फरहत एहसास की शायरी जीवन की शायरी है। इसमें मानव मनोविज्ञान, भावनाओं और संवेदनाओं का हर पहलू जीवित महसूस होता है। पुरानी और जर्जर परंपराओं से विद्रोह उनकी शायरी की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। उनके काव्य-संग्रह ‘मैं रोना चाहता हूँ’, ‘शायरी नहीं है यह’ और ‘क़श्क़ा खींचा देर में बैठा’ इसी कड़ी के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
Book Details
-
ISBN9788199502147
-
Pages1067
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Avg Reading Time36 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अमिता शर्मा की कविताओं की दुनिया काफ़ी विस्तृत और वैविध्यमयी है और यह विस्तार और वैविध्य मनमाना या अवधारणात्मक न होकर ऐसी अर्जित जीवनानुभूति है जो हमें अपने परिवेश को और उससे प्रतिकृत होनेवाले अपने दिलो–दिमाग़ की प्रतिक्रियाओं को भी उन पर पड़े अभ्यास और अतिपरिचय के जाले छुड़ाती हुई—एक नई समझ और नई विकलता के साथ स्वायत्त करने में मदद करती है। यह कविता यदि एक ओर ‘अख़बारी हादसे पलटते, अपनी सुरक्षा की धूप सेंकते रहने के सुख’ की आत्म–वंचना को उघाड़ती है तो दूसरी ओर वह नितान्त आज के सामाजिक अरण्य में ‘मेमने की खाल ओढ़े भेड़िए’ को भी पहचानती है और उस ‘जोकर’ को भी, जो ‘अपना सन्तुलन बनाए रखने के लिए सबको चाहिए।’ वह मानवी साहचर्य और अलगाव के एक समूचे वर्णपट को उकेर सकती है और ‘बिना घर की छतों’ को भी। वह उन ‘ईर्ष्याओं’ को भी जानती है जो औरों से आगे बढ़ने के लिए उत्तेजित करती हुई हमें अपने आपसे छोटा करती हैं, और उन सपनों को भी, जो ज़िन्दगी को बदलते नहीं, और जटिल कर देते हैं।
बन्धन और स्वातंत्र्य, अनिवार्य उत्पीड़न और उतनी ही दुर्दम्य मुक्ति–चेष्टा की छटपटाहट मानो अमिता की कविता के वादी–संवादी सुर हैं। सिमोन वेल की कृति ‘ऑपरेशन एंड लिबर्टी’ के आवरण–पृष्ठ पर खुले आसमान की पृष्ठभूमि में सलाखों का ‘क्लोज–अप’ जिस तरह उभरकर आता है, कुछ–कुछ उस तरह का कथ्य–रूप इन कविताओं के भीतर से उजागर होते देखा जा सकता है—‘कितनी विशाल खिड़की/कितना विशाल आसमान/पर दीखती हैं केवल उनके बीच की छड़ें’—किसी भी दृष्टिकोण की इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी! निश्चय ही अमिता के यहाँ अपसंस्कृति के विद्रूपों के बरक्स प्रकृति हमेशा विद्यमान रही है, किन्तु रूसो-ई रोमैन्टिक विद्रोह और वापसी के तर्ज पर नहीं। यह निहायत ही एतद्देशीय और निहायत आँख–सामने की हक़ीक़तों के भीतर से उजागर होता आत्महीनता का घेराव है जो अपने भोक्ता और साक्षी को इस प्रश्न के सम्मुख धकेलता है—‘इस असंज्ञ संस्कृति में/किस सच को हम अपना कहें/हमारे झूठ भी अपने नहीं।’
इन कविताओं में आत्म और अनात्म के ही नहीं, निजी और सार्वजनिक के बीच भी ख़ासी आवाजाही सम्भव हुई है। बौखलाहट, विक्षोभ की जगह सूखी–सान्द्र टिप्पणियों ने ले ली है जो हमारे निकट सम्बन्धों में भी घर करती जा रही रिक्ति की कचोट को भी सह्य बना लेती हैं कुछ इस तरह कि एक तरफ़ अपने दर्द को ‘अपनी तरह अपने से कह लेने’ और दूसरी तरफ़ ‘अपने अभिनय का द्रष्टा बनने’ के बीच चुनाव की गुंजाइश ही नहीं छूटती। ध्यान देने की बात मगर यह है कि दोनों को ‘मोक्ष’ की संज्ञा से अभिहित करना इस मूल्य–विपर्यय के युग को उसकी अपनी शर्तों पर स्वीकार लेना नहीं है। लगता है, जैसे मोक्ष या आत्मा जैसे पारम्परिक प्रत्ययों को ही नहीं, स्वतंत्रता और समता सरीखे शब्दों को भी उनका अर्थ–प्रामाण्य लौटा लेने के लिए इक्कीसवीं सदी के लेखकों को भी ‘एक्जाइल’ और ‘कनिंग’ के सूक्ष्म उपकरणों की उतनी ही ग़रज़ और दरकार है जितनी आधुनिकों को थी। ‘एक नितान्त ख़ाली जगह में’ अपने आपको ढूँढ़ने की समस्या और साँसत इस कविता की एक चरितनायिका की ही नहीं, हम सबकी है, और जिस दु:ख के सहारे यह खोज सम्भव होती है, वह भी एक अनिवार्य, किन्तु सार्थक दु:ख है।
Kaifiyat
- Author Name:
Kaifi Azmi
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अपने समकालीन श्रेष्ठ कवियों में कैफ़ी आज़मी का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। कैफ़ी ने प्रगतिशील उर्दू कविता का माथा बहुत ऊँचा किया है और उसको बहुत शक्तिसम्पन्न बनाया है।
फ़ैज़ की नज़्मों में ग़ज़ल की-सी लाक्षणिकता, शिल्प-लाघव और प्रतीकों के व्यंग्यार्थ मिलते हैं; इसीलिए कुछ और भी, विषम वर्ग संघर्ष झेलनेवालों की कसक, पीड़ा और उम्मीद की चमक...जैसे चिंगारियाँ उड़ती हों...अपनी त्रासदिक मोहिनी से हमें विकल कर देती हैं। या मख़दूम...मख़दूम मुहीउद्दीन का अपना खरा समर्पित व्यक्तित्व अनायास ही हर इन्क़िलाबी का प्रतिनिधि व्यक्तित्व-सा बन जाता है, और तब शायरी की ज़मीन से वह कुछ ऊपर उठ जाता है...शायरी की ज़मीन को भी शायद कुछ ऊपर उठाते हुए।
कैफ़ी का अन्दाज़-ए-बयाँ कुछ और है। इन सबों से न्यारा। वह भावनाओं की पवित्रता, मुहावरे की शुद्धता और भाषा के स्वाभाविक सौन्दर्य और सौष्ठव और इनकी परम्परा की ख़ूबसूरती को बरक़रार रखते हुए, एक आम दर्दमन्द इनसान से एक आम दर्दमन्द इनसान की तरह मिलता है...अपनी कविताओं में...एक जाने-पहचाने रफ़ीक़ और दोस्त की तरह...बिलकुल हमारे दिल की बातों को गुनगुनाते हुए, कुछ हमारे ही दिल के लहज़े में। और सबसे बड़ी बात : उसके पास, इन सारी कैफ़ियत में, एक साफ़ दृष्टि और साफ़-स्पष्ट दिशा है...कि वह हमें कभी नहीं भटका सकता! हम आश्वस्त हैं।
—शमशेर बहादुर सिंह
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