Gada Tola
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पहले अन्दर मारी जाती है नदी/तब मिटता है नक़्शे से गाडा टोला। गाडा टोला यानी नदी टोला। राही डूमरचीर की ये कविताएँ नदी, पहाड़, जंगल और उनके साथ बसे मनुष्यों के विस्थापन, विलोप और निर्वासन से उपजे अफ़सोस और पीड़ा की कविताएँ हैं। कुछ ‘बनने’ के लिए या सिर्फ़ ‘जी सकने’ के लिए लोग अपनी ज़मीनों से उठकर शहरों की ओर निकल जाते हैं, पहाड़ उन्हें रास्ता देते हुए पीछे रह जाते हैं, नदियाँ भी, सखुआ के जंगल भी। राही अकसर इस विवशता की सबसे भीतरी कोर से अपनी कविता उठाते हैं। इसके लिए उन्होंने अपना एक खुला मुहावरा गढ़ा है, जो ख़बरों से भी कोई मार्मिक कविता निकाल लेता है, चिट्ठियों और संवादों से भी। इस तरह वह जीवन जस-का-तस सम्प्रेषित हो पाता है, जिसकी पीड़ा को कवि हम तक पहुँचाना चाहता है। ‘ऐदेल किस्कू’ और ‘हिम्बो कुजूर’ जैसी कई कविताएँ हैं, जो इसी प्रविधि से पंक्ति-दर-पंक्ति और सघन होती जाती हैं। ‘गीतों के आयोजन को तुम लोग सुरों का महासंग्राम कहते हो’—कहा रिमिल टुडू ने। राही जीवन के इस पहलू को भी देखते हैं जो जंगल से दूर सभ्यता के बीच गढ़ा जा रहा है, जहाँ ज्ञान किताबों में बन्द है, और किताबें अलमारियों में। सभ्यता की विडम्बनाओं को आईना दिखाते हुए, एक कवि के रूप में राही समय के, प्राकृतिक अवयवों के, पेड़ों, पत्तों, दूब, पानी, बच्चों और नदियों के मन से बतियाते हैं और हर हाल में उनके पक्ष में खड़े रहते हैं— अच्छा आप उसी गाँव के हैं न/जहाँ मन्दिर के किनारे नदी है देवघर के उस भले मानुष से कहा मैंने—जी नहीं/उस गाँव का हूँ/जहाँ नदी के किनारे मन्दिर है।
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पहले अन्दर मारी जाती है नदी/तब मिटता है नक़्शे से गाडा टोला।
गाडा टोला यानी नदी टोला।
राही डूमरचीर की ये कविताएँ नदी, पहाड़, जंगल और उनके साथ बसे मनुष्यों के विस्थापन, विलोप और निर्वासन से उपजे अफ़सोस और पीड़ा की कविताएँ हैं। कुछ ‘बनने’ के लिए या सिर्फ़ ‘जी सकने’ के लिए लोग अपनी ज़मीनों से उठकर शहरों की ओर निकल जाते हैं, पहाड़ उन्हें रास्ता देते हुए पीछे रह जाते हैं, नदियाँ भी, सखुआ के जंगल भी। राही अकसर इस विवशता की सबसे भीतरी कोर से अपनी कविता उठाते हैं। इसके लिए उन्होंने अपना एक खुला मुहावरा गढ़ा है, जो ख़बरों से भी कोई मार्मिक कविता निकाल लेता है, चिट्ठियों और संवादों से भी। इस तरह वह जीवन जस-का-तस सम्प्रेषित हो पाता है, जिसकी पीड़ा को कवि हम तक पहुँचाना चाहता है। ‘ऐदेल किस्कू’ और ‘हिम्बो कुजूर’ जैसी कई कविताएँ हैं, जो इसी प्रविधि से पंक्ति-दर-पंक्ति और सघन होती जाती हैं।
‘गीतों के आयोजन को तुम लोग सुरों का महासंग्राम कहते हो’—कहा रिमिल टुडू ने। राही जीवन के इस पहलू को भी देखते हैं जो जंगल से दूर सभ्यता के बीच गढ़ा जा रहा है, जहाँ ज्ञान किताबों में बन्द है, और किताबें अलमारियों में। सभ्यता की विडम्बनाओं को आईना दिखाते हुए, एक कवि के रूप में राही समय के, प्राकृतिक अवयवों के, पेड़ों, पत्तों, दूब, पानी, बच्चों और नदियों के मन से बतियाते हैं और हर हाल में उनके पक्ष में खड़े रहते हैं—
अच्छा आप उसी गाँव के हैं न/जहाँ मन्दिर के किनारे नदी है
देवघर के उस भले मानुष से कहा मैंने—जी नहीं/उस गाँव का हूँ/जहाँ नदी के किनारे मन्दिर है।
Book Details
-
ISBN9789360869663
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ‘आग हर चीज़ में बताई गई थी’ चन्द्रकान्त देवताले की कविताओं का एक ऐसा संग्रह है जिसमें प्रयुक्त शब्द, कठिन दुनिया को भाषा में खोलते और रचते हुए निरन्तर एक प्रश्न अपने आप से भी करते हैं कि एक हिंसक और मनुष्य विरोधी समाज में कविता कौन सा मिथ रच सकती है। ‘आग हर चीज़ में बताई गई थी’ में संकलित कविताएँ दुनिया का भयावह किन्तु चमकदार काव्यभाष्य प्रस्तुत करती हैं। ये कविताएँ अपने समय की व्याख्या भी करती हैं और पहले लिखी गई कविताओं की परम्परा में शामिल भी होती हैं। यह चन्द्रकान्त देवताले की फ़नकारी और भाषा कौशल का कमाल ही है कि इस संग्रह की कविताओं में बीसवीं सदी के अन्तिम वर्षों में आन्दोलित होती दुनिया में मनुष्य की स्थिति, उसकी पीड़ा और व्यथा का अक्स समग्रता में बिम्बित हुआ है। संग्रह की कविताएँ शब्दों की पवित्रता के बारे में विचार करती हैं और हमारे समय के अनेक मिथकों को तोड़ती भी हैं। इन कविताओं में विकट और दारुण सच्चाइयों की अवमानना के बजाय उनसे एक चुनौतीपूर्ण सम्बन्ध बनता है, जहाँ वर्तमान समय के अँधेरे अन्तरंग कोनों को प्रकाशित होते हुए देखा जा सकता है। चन्द्रकान्त देवताले इन कविताओं में किसी अन्तिम सत्य की कामना से दृश्य-यथार्थ के जटिल और अपरिहार्य ब्योरों को झूठ मानकर त्यागते नहीं, बल्कि उनका एक विलक्षण और अनिवार्य काव्य-नाटकीय रूपान्तर करते हैं जिससे ‘आग हर चीज़ में बताई गई थी’ की कविताएँ झूठे बिम्बों में ख़र्च नहीं होतीं, बल्कि अपने समय की सच्चाइयों को एक सम्पूर्णता में प्रतिबिम्बित करती हैं।
Koi Doosra Naheen
- Author Name:
Kunwar Narain
- Book Type:

- Description: ‘कोई दूसरा नहीं’ की कविताएँ मन को केवल आह्लादित ही नहीं करतीं, बल्कि विवेक का सम्बल भी प्रदान करती हैं। व्यक्ति से समष्टि की ओर ले जानेवाली ये कविताएँ पाठकों की सामाजिक संचेतना में नई त्वरा और नए संवेग भरती हैं। भाषा जब अनुभव का दामन थामकर चलती है तब उसकी प्रभावोत्पादकता और सम्प्रेषण की क्षमता किस तरह परिपक्व और हृदयग्राही बन जाती है, उसकी मिसाल है—‘कोई दूसरा नहीं’ की कविताएँ। ये कविताएँ कभी सहजता से मन को सहलाती हैं तो कभी कोमलता से कल्पना की पाँखों को उत्प्रेरित करती हैं—निराडम्बर-उदात्त मानवीय संस्कारों को जगाती हैं और इसके साथ ही जीवन और जगत के कड़े यथार्थ का आरोहण भी करती हैं। कविताएँ तलाशती हैं वैसी परिस्थितियाँ और वैसा परिवेश भी जिसमें बेहतर इंसान की कल्पना साकार होती है। इन कविताओं की विशेषता है—प्रगाढ़ जीवनानुभव और सादगी।
Hansi Aur Des
- Author Name:
Rupam Mishra
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- Description: रूपम मिश्र की कविताओं की ‘आत्मा का आयतन’ बड़ा है। इन कविताओं में समाज और राजनीति के फासीवादी दौर में संवेदनशील लोगों के भीषण अन्तर्द्वंद्व अंकित हुए हैं। यहाँ ‘न्याय के लिए तड़पता मन’ है तो अपनापन खोजते थकता-हारता मन भी है और उसी क्षण भाग जाने का भी एक मन है। यहाँ गाँव-क़स्बे में सदियों से गंगा-जमुनी तहज़ीब का देशज मर्सिया है, मुसलमान जोगियों के डर ने उनके बिरहों और निर्गुण सारंगी को ख़ामोश किया है, वही ख़ामोशी इन कविताओं में गूँज उठी है। ‘हँसी और देस’ में जैसे कोई बड़ी ठेठ ज़िद्दी निगाहों से सूचना-संचार के मायाजाल और नफ़रत की बाज़ारू सियासत को बेध रहा है। यहाँ कितनी ही कहानियाँ हैं—बहुत सी तो ऐसी जो बिसरा दिए जाने की कगार पर हैं, लेकिन आदमीपने के अकाल में लड़ते हुए मनुष्यों के जीते रहने की तमन्ना भी है। लोक-रहन, माटी-पानी और हरियाली को मिटते देखना त्रासद है, इस त्रासदी में प्रेम मानो एक आपद्धर्म है, उनके पूरी तरह मिट जाने से पहले ही मिलन की चाह है क्योंकि उनसे विरहित दुनिया में प्रेम का कोई परिवेश न होगा। भले ही ‘नैतिकता की रंगदारी वसूलते लफुए’ हर कहीं दिखते हों लेकिन असम्भव समझ लिए गए प्रतिरोध की छवियाँ जो अभी भी वास्तव हैं, (बस हमने नज़रें फेर ली हैं), उन्हें इस संग्रह की कविताएँ आँख में उँगली डालकर दिखाती हैं। इन कविताओं में हिन्दी का बहुभाषिक वैभव चमकता है। यहाँ अवध के गँवई मुहावरों और शब्दों का भाषिक छिड़काव नहीं, बल्कि अनुभव और सोच की मातृभाषा का आत्मविश्वास है। रूपम की काव्यभाषा जनता की जनवादी राजनीति के संक्रामक हो उठने के क्षण में उससे गलबहियाँ को आतुर है। —प्रणय कृष्ण
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