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‘पिता की आँख में परायी औरत’, ‘उधारीलाल’, ‘स्कूटर’ और ‘मुझ नातवाँ के बारे में : पाँच प्रेम कविताएँ’ इस संग्रह में शामिल ये कुछ ही कविताएँ पवन करण के कवि की गहराई और ऊँचाई, दोनों का प्रमाण दे देती हैं। ये कविताएँ एक व्यक्ति के रूप में उनकी विस्तृत चेतना और कवि के रूप में उस चेतना को शब्दों में बाँधने, साधने और जन-मन की धारा में प्रवाहित कर देने की क्षमता की साक्षी हैं।</p> <p>यह विस्मयकारी है कि अक्सर मुख्यधारा की चर्चा में बने रहनेवाले पवन करण कविता के प्रचलित मुहावरों से बिलकुल भी प्रभावित न होते हुए, जीवन के जिस भी इलाक़े में जाते हैं, एक क़तई अपनी तरह की कविता लेकर आते हैं। विषय के चुनाव में भी वे किसी रूढ़ि को आगे नहीं बढ़ाते, न ही किसी धारा का अनुकरण करते; जीवन का सब कुछ उनके लिए कविता है, और हर क्षण वे कवि हैं, हर सम्भव विषय उनके लिए कविता का विषय है। बाज़ार हो, राजनीति हो या सरकारी पाखाना-घर, चाँद हो, वकील हो या अस्पताल के बाहर लगा एक अदना-सा टेलीफ़ोन, वे हर कहीं एक लय तलाश कर लेते हैं जिसमें ये चीज़ें पुनः, और इस बार एक कविता के रूप में, हमारे सामने से गुज़रती हैं। संग्रह की लगभग प्रत्येक कविता इसका सबूत है।</p> <p>ये कविताएँ उन्हीं लोगों के शब्दों और मुहावरों में बात करती हैं जिनकी ये कविताएँ हैं यानी हम और आप। यहीं हमारे सामने से शुरू होकर और हमारे देखते-ही-देखते हमारी दृष्टि-सीमा से ऊँचे, कहीं अबूझ और अपार होती व्यवस्था के प्रति हमारी प्रतिक्रिया भी इन कविताओं में है, और विषाद भी। हमारे जीने का उछाह भी इनमें है और अवसाद भी। इनमें हमारा बड़ा होना भी है और छोटा होना भी, हमारी हिंसा भी और हमारी करुणा भी।
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‘पिता की आँख में परायी औरत’, ‘उधारीलाल’, ‘स्कूटर’ और ‘मुझ नातवाँ के बारे में : पाँच प्रेम कविताएँ’ इस संग्रह में शामिल ये कुछ ही कविताएँ पवन करण के कवि की गहराई और ऊँचाई, दोनों का प्रमाण दे देती हैं। ये कविताएँ एक व्यक्ति के रूप में उनकी विस्तृत चेतना और कवि के रूप में उस चेतना को शब्दों में बाँधने, साधने और जन-मन की धारा में प्रवाहित कर देने की क्षमता की साक्षी हैं।</p>
<p>यह विस्मयकारी है कि अक्सर मुख्यधारा की चर्चा में बने रहनेवाले पवन करण कविता के प्रचलित मुहावरों से बिलकुल भी प्रभावित न होते हुए, जीवन के जिस भी इलाक़े में जाते हैं, एक क़तई अपनी तरह की कविता लेकर आते हैं। विषय के चुनाव में भी वे किसी रूढ़ि को आगे नहीं बढ़ाते, न ही किसी धारा का अनुकरण करते; जीवन का सब कुछ उनके लिए कविता है, और हर क्षण वे कवि हैं, हर सम्भव विषय उनके लिए कविता का विषय है। बाज़ार हो, राजनीति हो या सरकारी पाखाना-घर, चाँद हो, वकील हो या अस्पताल के बाहर लगा एक अदना-सा टेलीफ़ोन, वे हर कहीं एक लय तलाश कर लेते हैं जिसमें ये चीज़ें पुनः, और इस बार एक कविता के रूप में, हमारे सामने से गुज़रती हैं। संग्रह की लगभग प्रत्येक कविता इसका सबूत है।</p>
<p>ये कविताएँ उन्हीं लोगों के शब्दों और मुहावरों में बात करती हैं जिनकी ये कविताएँ हैं यानी हम और आप। यहीं हमारे सामने से शुरू होकर और हमारे देखते-ही-देखते हमारी दृष्टि-सीमा से ऊँचे, कहीं अबूझ और अपार होती व्यवस्था के प्रति हमारी प्रतिक्रिया भी इन कविताओं में है, और विषाद भी। हमारे जीने का उछाह भी इनमें है और अवसाद भी। इनमें हमारा बड़ा होना भी है और छोटा होना भी, हमारी हिंसा भी और हमारी करुणा भी।
Book Details
-
ISBN9788126717682
-
Pages127
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Author Name:
Ravindra Bharti
- Book Type:

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Description:
विशाल, विराट और महान दिखनेवाली चीज़ें जीवन का स्रोत नहीं होतीं, उन्हें विशेष अवसरों पर, कुछ आयोजित-प्रायोजित मन:स्थितियों में देखने और वापस आकर भूलने के लिए देखा जाता है। वे हमारे उन दिनों और रातों की साथी नहीं बनतीं जिनसे हम बनते हैं, हमारा जीवन बनता है, हमारा दैनन्दिन, हमारे अतीत और वर्तमान बनते हैं।
रवीन्द्र भारती की ये कविताएँ ऐसी ही छोटी चीज़ों की अभ्यर्थना करती हैं। 'गृहस्थ की गृहस्थी' एक कविता है जिसमें घर में आई एक नई कटोरी का स्वागत किया जा रहा है 'यह हमारी पात्र है/इसके पात्र हैं हम/ पात्र-परिचय होगा, धीरे-धीरे बढ़ेगा हेल-मेल।'
'आपा-धापी' एक कविता है जिसमें लोकन ट्रेनों और बसों की लगातार गतिमान भीड़ में एक नामालूम से रिश्ते की पहचान की गई है। रोज़-रोज़ दिखनेवाले चेहरों के बीच बननेवाला एक अबोला रिश्ता—'निर्दोष आँखों की मौन कथा/चली जाती है किसी की, किसी के साथ अकारण/अकारण ही होती है चिन्ता/जब कोई दिखता नहीं दो-चार दिन।' यह 'अकारण' जगत-गति के बड़े कहे जानेवाले सुपरिभाषित कारणों का अचीन्हा-सा स्थानापन्न है, और जीवन की डोर को थामे रखने में इसकी भी बहुत बड़ी भूमिका है।
इन कविताओं में ऐसी अनेक चीज़ें, दृश्य, पंक्तियाँ, और चित्र हैं जो हमें हमारे अनजाने ही हमारी साधारणता में आश्वस्ति भर देते हैं, जो कहते हैं कि बड़ी-बड़ी ताक़तों की दूर से दिखाई देनेवाली आकर्षक और महान आकृतियों से पहले हमारे पास भी ऐसा बहुत कुछ है जो उनके सब कुछ का विकल्प हो सकता है। मसलन 'कुलिया-चुनिया' की नन्ही बच्ची की कल्पित दुनिया जिसमें कवि अनायास सच-झूठ के स्याह-सफ़ेद में विभाजित अपनी वास्तविक दुनिया से मुक्त होकर सहर्ष चला जाता है।
देशज शब्दों, देशज सौन्दर्यबोध और देशज आत्माभिमान से रची इन कविताओं से गुज़रते हुए आप धीरे-धीरे अपनी दुनिया के सूक्ष्म से परिचित होते हैं जो वास्तव में बहुत बड़ा है।
Dararon Mein Ugi Doob
- Author Name:
Chitra Desai
- Book Type:

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Description:
छोटी और कुछ बहुत ही छोटी इन कविताओं का उत्स जीवन के हाशियों पर दूब की तरह उगते, पलते और झड़ जाते दु:खों के भीतर है—इसका अहसास आपको एक-एक कविता से गुज़रते हुए धीरे-धीरे होता है। धीरे-धीरे आप जानने लगते हैं कि किस कविता की किस पंक्ति में दरअसल कितनी बड़ी एक टीस को छिपाकर गूँथ दिया गया है।
'घर की उम्र के लिए/एक पूरा आदमी/टुकड़े-टुकड़े बँटकर/थामता है/हर कोना/...घर की उम्र के लिए/बिखर कर मर जाता है/एक पूरा आदमी।’ घर यहाँ दरअसल एक व्यवस्था का, एक स्थिर सुरक्षा का और सरल शब्दों में कहें तो उस दुनियादारी का प्रतीक है, जिसकी तरफ़ एक व्यक्ति जीवन-भर खिंचकर आता है तो उतने ही वेग से उससे दूर भी जाता है। भीतर और बाहर की इसी खींचतान के अलग-अलग बिन्दुओं से उपजी बेचैन मगर बहुत गहरे में हमें अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति का शान्त आधार उपलब्ध करानेवाली ये कविताएँ इसी अर्थ में विशिष्ट हैं कि ये हमें अपनी सादगी से अपने बहुत नज़दीक बुलाकर हमारा दु:ख सोखती हैं। भाव-बोध के आधार पर संग्रह की कविताओं को चार खंडों में समायोजित किया गया है। पहला है 'पगडंडी’ जिसमें ग्रामीण जीवन और परिवेश में बसे, बनते-बिगड़ते-बदलते रिश्तों और रूपाकारों को सहेजने-समेटने की संवेदन-यात्रा समाहित है। दूसरे खंड 'अलाव’ में अपने अस्तित्व के इर्द-गिर्द बुनी आँच और उसकी लपटों को पकडऩे, चित्रित करने की बारीक लेकिन सुदृढ़ बुनाई है। 'आरोह-अवरोह’ में घर, रिश्तों और कचहरी में फैले आहत तन्तुओं को गहरी-तीखी रंगत में उकेरा गया है। और, चौथे खंड 'मध्यान्तर के बाद’ में पुन: जीवन की जड़ों को खोलकर- खोदकर देखने की कोशिश की गई है जो हमारी सवंदेना-यात्रा को वापस जीवन में आरम्भ से जोड़ देती है।
'पत्थरों को संवेदना देती है/उनकी दरारों में दबी मिट्टी/जहाँ उग आती है दूब/चट्टानों के अस्तित्व को ललकारती।’ ये कविताएँ दरअसल जीवन की कठोर, पथरीली चट्टानों के बीच बची मिट्टी में उगी कविताएँ हैं; जिनमें हम अपने दग्ध वजूद को कुछ देर भीनी-भीनी ठंडक से भर सकते हैं।
Kabir Granthawali : Parimarjit Paath
- Author Name:
Kabir
- Book Type:

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Description:
कबीर-पंथियों में जो स्थान ‘बीजक’ का है, अकादमिक हलक़ों में वही स्थान श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित ‘कबीर-ग्रंथावली’ का है। तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद आज भी कबीर के प्रामाणिक पाठ के लिए अध्येता ‘ग्रंथावली’ का ही सहारा लेते हैं।
ऐसे में अगर यह पता चले कि ‘ग्रंथावली’ में संकलित कबीर भले ही अन्य संग्रहों के मुक़ाबले ज़्यादा पूरे हों, लेकिन जो पाठ यहाँ प्रकाशित है, उसमें अनेक ऐसी भूलें हैं, जो अर्थ का अनर्थ ही नहीं कर रहीं, बल्कि कवि के मंतव्य को ही उलट दे रही हैं, तो क्या हो...
आश्चर्य नहीं कि लगभग एक सदी से अनेक संस्करणों में व्यवहृत ‘ग्रंथावली’ के इस पक्ष पर प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की निगाह रुकी और उन्होंने अपने विशद अध्ययन और कबीर के प्रति अपने असाधारण प्रेम के चलते इसके परिमार्जन का बीड़ा उठाया।
यह संस्करण उसी परिमार्जित एवं शुद्धतम पाठ की प्रस्तुति है जिसका आरम्भ उनकी एक सुदीर्घ भूमिका से होता है। इस भूमिका में प्रो. अग्रवाल ने पाठ-परिमार्जन की इस पूरी श्रम-साध्य प्रक्रिया पर तो प्रकाश डाला ही है, कबीर पर अपने अब तक के अध्ययन से प्राप्त अद्यतन धारणाओं को भी सूत्र रूप में दे दिया है।
पाठकों को ज्ञात ही है कि ‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ (2009) में उन्होंने कबीर के बहाने उस मध्यकाल में भारत की आधुनिकता की पहचान की थी, जो औपनिवेशिक आधुनिकता से पहले ही भारत के लोकवृत्त में प्रकट हो चुकी थी।
‘कबीर-ग्रंथावली’ की इस प्रस्तुति में वे न सिर्फ़ कबीर की वाणी को शुद्धतम रूप में हमें दे रहे हैं, बल्कि कबीर-अध्ययन के इतिहास की गुत्थियों को सुलझाते हुए उन्हें ठीक से पढ़ने-जानने की समझ भी हमें प्रदान कर रहे हैं।
Isee Kaya Mein Moksha
- Author Name:
Dinesh Kushawah
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Description:
दिनेश कुशवाह संवेदनात्मक ज्ञान के आलोचकीय विवेक सम्पन्न कवि हैं। उनकी कविताएँ सहजबुद्धि के विवेक से उपजी रचनाएँ हैं; इसीलिए मुक्त छन्द में होने के बावजूद उनमें संगति, गत्यात्मकता, आन्तरिक लय, संवेदना एवं प्रेम के स्वर प्रमुख हैं। व्यक्तियों, सम्बन्धों, स्थानों पर केन्द्रित दिनेश कुशवाह की कविताएँ स्मृति, आत्मीयता और मूल्यांकन की ईमानदार मनुष्योपयोगी कलाकृतियाँ हैं।
दिनेश कुशवाह की प्रेम कविताओं में प्रेम समाजशास्त्रीय या मनोवैज्ञानिक अध्ययन के विषय के रूप में जीवनीशक्ति की तरह आता है—आर्द्र और ऊष्ण! विषयों की विविधता, प्रगतिशील मूल्यों की पक्षधरता एवं परकाया प्रवेश से कवि ने अपनी कविताओं का संसार उदार एवं व्यापक बनाया है। दिनेश कुशवाह की लड़की विषयक, अभिनेत्रियों पर और ‘एकलव्य की तरफ़ से’ जैसी कविताएँ उतनी ही प्रामाणिक हैं जितनी हमारी नज़रों के सामने की यह दुनिया। ‘लड़की और सोना’, ‘नदी’ तथा ‘खजुराहो में मूर्तियों के पयोधर’ सौन्दर्य के दोनों पक्षों की गंगा-जमुनी कृतियाँ हैं। संक्षेप में दिनेश कुशवाह की सौन्दर्य-दृष्टि दार्शनिक महत्त्वाकांक्षा रखती है।
कविताओं में मौजूद प्रवाहमयता, रागात्मकता, ओजस्विता के प्रसंग में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दिनेश कुशवाह का कवि-कर्म विद्यापति के अपरूप रूप, तुलसी के कवित्व विवेक, कबीर की आँखिन देखी, मीर-ग़ालिब की दुनिया और विश्व साहित्य के गम्भीर अध्ययन से उत्पन्न सूझ और लोकसंपृक्ति से परिचालित होता है। पाठकों को हर्ष होगा कि दिनेश कुशवाह की कविताओं में समझ में न आने लायक कुछ नहीं है। अपठनीय, दुर्बोध, भीषण बौद्धिक कविताओं के इस संकटपूर्ण समय में उनकी कविताएँ पढ़ने और याद रखने योग्य हैं। वे प्रेम, सौन्दर्य और परिवर्तनकामी चेतना के कवि हैं। सही मायने में ‘मेजर वेवलेंथ’ के कवि।
—प्रह्लाद अग्रवाल
Ek Ped Chhatnar
- Author Name:
Dinesh Kumar Shukla
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Description:
दिनेश कुमार शुक्ल की कविता में जीवन और जन के राग का उत्सव है जो आश्चर्य नहीं कि अक्सर छन्द में आता है, नहीं तो छन्द की परिधि पर कहीं दूर-पास मँडराता हुआ। उनकी कविता समय की समूची दुखान्तिकी से परिचित है, उस पूरे अवसाद से भी जिसे समय ने अपनी उपलब्धि के रूप में अर्जित किया है, लेकिन वह उम्मीद की अपनी ज़मीन नहीं छोड़ती। कारण शायद यह है कि जन-जीवन, लोक-अनुभव और भाषा के भीतर निबद्ध जनसामान्य के मन की ताक़त की एक बड़ी पूँजी उनके पास है।
वृहत् विश्व-मानव-समाज की नियति के किसी एक हाथ में सिमट जाने की स्थिति पर व्यंग्यपूर्वक वे अगर कहते हैं कि 'आपकी अनुमति से ही आएँगे/सुख के बौर/आपकी सहमति से ही उठेगी/आँधी दु:ख की', तो स्पष्ट हो जाता है कि अपने समय के सब ख़तरों से वे बख़ूबी वाक़िफ़ हैं, लेकिन वे यह भी देख पा रहे हैं कि 'सब कुछ बिखरा हुआ पड़ा है/ध्वस्त पड़ी है सारी निर्मिति/किन्तु बचा है एक कंगूरा/साबुत सीधा सधा हुआ जो/ ताक रहा है आसमान को'। यही वह एक कंगूरा है जो सम्भवत: एक नए आरम्भ का प्रस्थान बिन्दु होगा जहाँ 'मुकुति-का-खिलइ-सहस-दल-कँवल/हँसइ-जीवन-नित-नूतन-धवल/बहइ-सर-सर-सर-झंझा-प्रबल/कि धँसकँइ-बड़ेन-बड़ेन-के-महल'। इन पंक्तियों में न सिर्फ़ एक भिन्न भविष्य के स्वप्न-नृत्य का नाद सुनाई देता है, बल्कि एक नए निर्माण का इरादा भी दिखाई देता है।
दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ अपनी भाषा-सामर्थ्य के लिए भी विशेष जानी गई हैं। उन्होंने अपना एक अलग रंग रचा है, और छन्द परम्परा को नई कविता में भिन्न कौशल से बरता है जो लोक-स्मृति, जन-गण की पीड़ाओं और मनुष्य की जिजीविषा की विभिन्न मुद्राओं से सम्पन्न इस संग्रह की कविताओं में भी देखा जा सकता है।
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