Hamare Jhooth Bhi Hamare Nahin
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अमिता शर्मा की कविताओं की दुनिया काफ़ी विस्तृत और वैविध्यमयी है और यह विस्तार और वैविध्य मनमाना या अवधारणात्मक न होकर ऐसी अर्जित जीवनानुभूति है जो हमें अपने परिवेश को और उससे प्रतिकृत होनेवाले अपने दिलो–दिमाग़ की प्रतिक्रियाओं को भी उन पर पड़े अभ्यास और अतिपरिचय के जाले छुड़ाती हुई—एक नई समझ और नई विकलता के साथ स्वायत्त करने में मदद करती है। यह कविता यदि एक ओर ‘अख़बारी हादसे पलटते, अपनी सुरक्षा की धूप सेंकते रहने के सुख’ की आत्म–वंचना को उघाड़ती है तो दूसरी ओर वह नितान्त आज के सामाजिक अरण्य में ‘मेमने की खाल ओढ़े भेड़िए’ को भी पहचानती है और उस ‘जोकर’ को भी, जो ‘अपना सन्तुलन बनाए रखने के लिए सबको चाहिए।’ वह मानवी साहचर्य और अलगाव के एक समूचे वर्णपट को उकेर सकती है और ‘बिना घर की छतों’ को भी। वह उन ‘ईर्ष्याओं’ को भी जानती है जो औरों से आगे बढ़ने के लिए उत्तेजित करती हुई हमें अपने आपसे छोटा करती हैं, और उन सपनों को भी, जो ज़िन्दगी को बदलते नहीं, और जटिल कर देते हैं।</p> <p>बन्धन और स्वातंत्र्य, अनिवार्य उत्पीड़न और उतनी ही दुर्दम्य मुक्ति–चेष्टा की छटपटाहट मानो अमिता की कविता के वादी–संवादी सुर हैं। सिमोन वेल की कृति ‘ऑपरेशन एंड लिबर्टी’ के आवरण–पृष्ठ पर खुले आसमान की पृष्ठभूमि में सलाखों का ‘क्लोज–अप’ जिस तरह उभरकर आता है, कुछ–कुछ उस तरह का कथ्य–रूप इन कविताओं के भीतर से उजागर होते देखा जा सकता है—‘कितनी विशाल खिड़की/कितना विशाल आसमान/पर दीखती हैं केवल उनके बीच की छड़ें’—किसी भी दृष्टिकोण की इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी! निश्चय ही अमिता के यहाँ अपसंस्कृति के विद्रूपों के बरक्स प्रकृति हमेशा विद्यमान रही है, किन्तु रूसो-ई रोमैन्टिक विद्रोह और वापसी के तर्ज पर नहीं। यह निहायत ही एतद्देशीय और निहायत आँख–सामने की हक़ीक़तों के भीतर से उजागर होता आत्महीनता का घेराव है जो अपने भोक्ता और साक्षी को इस प्रश्न के सम्मुख धकेलता है—‘इस असंज्ञ संस्कृति में/किस सच को हम अपना कहें/हमारे झूठ भी अपने नहीं।’</p> <p>इन कविताओं में आत्म और अनात्म के ही नहीं, निजी और सार्वजनिक के बीच भी ख़ासी आवाजाही सम्भव हुई है। बौखलाहट, विक्षोभ की जगह सूखी–सान्द्र टिप्पणियों ने ले ली है जो हमारे निकट सम्बन्धों में भी घर करती जा रही रिक्ति की कचोट को भी सह्य बना लेती हैं कुछ इस तरह कि एक तरफ़ अपने दर्द को ‘अपनी तरह अपने से कह लेने’ और दूसरी तरफ़ ‘अपने अभिनय का द्रष्टा बनने’ के बीच चुनाव की गुंजाइश ही नहीं छूटती। ध्यान देने की बात मगर यह है कि दोनों को ‘मोक्ष’ की संज्ञा से अभिहित करना इस मूल्य–विपर्यय के युग को उसकी अपनी शर्तों पर स्वीकार लेना नहीं है। लगता है, जैसे मोक्ष या आत्मा जैसे पारम्परिक प्रत्ययों को ही नहीं, स्वतंत्रता और समता सरीखे शब्दों को भी उनका अर्थ–प्रामाण्य लौटा लेने के लिए इक्कीसवीं सदी के लेखकों को भी ‘एक्जाइल’ और ‘कनिंग’ के सूक्ष्म उपकरणों की उतनी ही ग़रज़ और दरकार है जितनी आधुनिकों को थी। ‘एक नितान्त ख़ाली जगह में’ अपने आपको ढूँढ़ने की समस्या और साँसत इस कविता की एक चरितनायिका की ही नहीं, हम सबकी है, और जिस दु:ख के सहारे यह खोज सम्भव होती है, वह भी एक अनिवार्य, किन्तु सार्थक दु:ख है।
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अमिता शर्मा की कविताओं की दुनिया काफ़ी विस्तृत और वैविध्यमयी है और यह विस्तार और वैविध्य मनमाना या अवधारणात्मक न होकर ऐसी अर्जित जीवनानुभूति है जो हमें अपने परिवेश को और उससे प्रतिकृत होनेवाले अपने दिलो–दिमाग़ की प्रतिक्रियाओं को भी उन पर पड़े अभ्यास और अतिपरिचय के जाले छुड़ाती हुई—एक नई समझ और नई विकलता के साथ स्वायत्त करने में मदद करती है। यह कविता यदि एक ओर ‘अख़बारी हादसे पलटते, अपनी सुरक्षा की धूप सेंकते रहने के सुख’ की आत्म–वंचना को उघाड़ती है तो दूसरी ओर वह नितान्त आज के सामाजिक अरण्य में ‘मेमने की खाल ओढ़े भेड़िए’ को भी पहचानती है और उस ‘जोकर’ को भी, जो ‘अपना सन्तुलन बनाए रखने के लिए सबको चाहिए।’ वह मानवी साहचर्य और अलगाव के एक समूचे वर्णपट को उकेर सकती है और ‘बिना घर की छतों’ को भी। वह उन ‘ईर्ष्याओं’ को भी जानती है जो औरों से आगे बढ़ने के लिए उत्तेजित करती हुई हमें अपने आपसे छोटा करती हैं, और उन सपनों को भी, जो ज़िन्दगी को बदलते नहीं, और जटिल कर देते हैं।</p>
<p>बन्धन और स्वातंत्र्य, अनिवार्य उत्पीड़न और उतनी ही दुर्दम्य मुक्ति–चेष्टा की छटपटाहट मानो अमिता की कविता के वादी–संवादी सुर हैं। सिमोन वेल की कृति ‘ऑपरेशन एंड लिबर्टी’ के आवरण–पृष्ठ पर खुले आसमान की पृष्ठभूमि में सलाखों का ‘क्लोज–अप’ जिस तरह उभरकर आता है, कुछ–कुछ उस तरह का कथ्य–रूप इन कविताओं के भीतर से उजागर होते देखा जा सकता है—‘कितनी विशाल खिड़की/कितना विशाल आसमान/पर दीखती हैं केवल उनके बीच की छड़ें’—किसी भी दृष्टिकोण की इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी! निश्चय ही अमिता के यहाँ अपसंस्कृति के विद्रूपों के बरक्स प्रकृति हमेशा विद्यमान रही है, किन्तु रूसो-ई रोमैन्टिक विद्रोह और वापसी के तर्ज पर नहीं। यह निहायत ही एतद्देशीय और निहायत आँख–सामने की हक़ीक़तों के भीतर से उजागर होता आत्महीनता का घेराव है जो अपने भोक्ता और साक्षी को इस प्रश्न के सम्मुख धकेलता है—‘इस असंज्ञ संस्कृति में/किस सच को हम अपना कहें/हमारे झूठ भी अपने नहीं।’</p>
<p>इन कविताओं में आत्म और अनात्म के ही नहीं, निजी और सार्वजनिक के बीच भी ख़ासी आवाजाही सम्भव हुई है। बौखलाहट, विक्षोभ की जगह सूखी–सान्द्र टिप्पणियों ने ले ली है जो हमारे निकट सम्बन्धों में भी घर करती जा रही रिक्ति की कचोट को भी सह्य बना लेती हैं कुछ इस तरह कि एक तरफ़ अपने दर्द को ‘अपनी तरह अपने से कह लेने’ और दूसरी तरफ़ ‘अपने अभिनय का द्रष्टा बनने’ के बीच चुनाव की गुंजाइश ही नहीं छूटती। ध्यान देने की बात मगर यह है कि दोनों को ‘मोक्ष’ की संज्ञा से अभिहित करना इस मूल्य–विपर्यय के युग को उसकी अपनी शर्तों पर स्वीकार लेना नहीं है। लगता है, जैसे मोक्ष या आत्मा जैसे पारम्परिक प्रत्ययों को ही नहीं, स्वतंत्रता और समता सरीखे शब्दों को भी उनका अर्थ–प्रामाण्य लौटा लेने के लिए इक्कीसवीं सदी के लेखकों को भी ‘एक्जाइल’ और ‘कनिंग’ के सूक्ष्म उपकरणों की उतनी ही ग़रज़ और दरकार है जितनी आधुनिकों को थी। ‘एक नितान्त ख़ाली जगह में’ अपने आपको ढूँढ़ने की समस्या और साँसत इस कविता की एक चरितनायिका की ही नहीं, हम सबकी है, और जिस दु:ख के सहारे यह खोज सम्भव होती है, वह भी एक अनिवार्य, किन्तु सार्थक दु:ख है।
Book Details
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ISBN9788171197002
-
Pages143
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मरण के ऊपर जीवन की सम्भावनाओं को धन की तरह संचित करती ये पंक्तियाँ एक बड़े कवि की ओर से अपने आगे आनेवाले समय को शुभ आमंत्रण की तरह प्रकट होती हैं। एक अन्य कविता में वे कहते हैं :
“कितनी ख़ुशी से/इन्तिज़ार करती है लॉन की घास/दो नन्हे पैरों को चूमने का/फूलों के गमले गिर जाने का/तरह-तरह के रंग पहचाने जाने के लिए/रंग-बिरंगी दवा की गोलियाँ/पन्नी की क़ैद से मुक्त हो बाहर आने को।”
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- Description: भक्तिकाल में मीराँ की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी। मीराँ के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ भी गढ़ ली गईं। किंवदन्तियाँ भले ही ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न हों, किन्तु उनसे इतना अवश्य ज़ाहिर होता है कि मीराँ अपनी विद्रोही चेतना के कारण लोकप्रिय अवश्य हो गई थीं। जो रचनाकार जितना अधिक लोकप्रिय होता है, उतना अधिक उसके कृतित्व का देशकाल के अनुसार रूपान्तरण होता है। मीराँ के पद गेय थे, अत: एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में साधु, सन्तों तथा गायकों के द्वारा मौखिक ढंग से प्रचारित-प्रसारित होते रहे। मीराँ सर्जनात्मक चेतना को भी उद्वेलित करती हैं। मीराँ के पदों में पाठ-भेद होने के लिए प्रादेशिक भेद तथा मौखिक गेय परम्परा को ज़िम्मेदार ठहराया गया है। उनके औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगाए बिना एक सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मीराँ ने कुछ पदों को दुबारा कुछ विस्तार से तथा कुछ परिवर्तन के साथ गाया होगा। आत्मोल्लास या उन्माद के क्षणों में गाए जानेवाले गीतों में गायक को इसकी सुध-बुध कहाँ रहती है कि वह अपने पूर्व कथन को दुहरा रहा है। उन्होंने अपने जीवन में घटित हुए कटु एवं तीक्ष्ण अनुभवों को वाणी दी है, राणा के द्वारा जो व्यवहार किया गया था, मीराँ भावावेश के क्षणों में उनका कई पदों में स्मरण करती हैं और भगवद् कृपा की महिमा का अनुभव करती हैं। शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय पुस्तक।
Pratinidhi Kavitayen : Nagarjun
- Author Name:
Nagarjun
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- Description: हिन्दी के आधुनिक कबीर नागार्जुन की कविता के बारे में डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है : ‘‘जहाँ मौत नहीं है, बुढ़ापा नहीं है, जनता के असन्तोष और राज्यसभाई जीवन का सन्तुलन नहीं है वह कविता है नागार्जुन की। ढाई पसली के घुमन्तू जीव, दमे के मरीज़, गृहस्थी का भार—फिर भी क्या ताक़त है नागार्जुन की कविताओं में! और कवियों में जहाँ छायावादी कल्पनाशीलता प्रबल हुई है, नागार्जुन की छायावादी काव्य-शैली कभी की ख़त्म हो चुकी है। अन्य कवियों में रहस्यवाद और यथार्थवाद को लेकर द्वन्द्व हुआ है, नागार्जुन का व्यंग्य और पैना हुआ है, क्रान्तिकारी आस्था और दृढ़ हुई है, उनके यथार्थ-चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता आई है।...उनकी कविताएँ लोक-संस्कृति के इतना नज़दीक हैं कि उसी का एक विकसित रूप मालूम होती हैं। किन्तु वे लोकगीतों से भिन्न हैं, सबसे पहले अपनी भाषा—खड़ी बोली के कारण, उसके बाद अपनी प्रखर राजनीतिक चेतना के कारण, और अन्त में बोलचाल की भाषा की गति और लय को आधार मानकर नए-नए प्रयोगों के कारण। हिन्दीभाषी...किसान और मज़दूर जिस तरह की भाषा...समझते और बोलते हैं, उसका निखरा हुआ काव्यमय रूप नागार्जुन के यहाँ है।’’
Pratinidhi Shairy : Akbar Allahabadi
- Author Name:
Akbar Allahabadi
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Description:
1851 की जंगे–आज़ादी में हिन्दुस्तानियों की हार के बाद उर्दू अदब में शुरू होनेवाले रेनासाँ में ‘अकबर’ इलाहाबादी का नाम सफ़े–अव्वल के शायरों में गिना जाता है। धर्म पर आधारित इस रेनासाँ की सारी विशेषताएँ ‘अकबर’ के यहाँ पूरी स्पष्टता के साथ देखी जा सकती हैं।
‘अकबर’ के कलाम की एक विशेषता और भी है। उन्होंने अपनी शायरी की शुरुआत संजीदा रवायती शायरी के साथ की थी। वही गुलो–बुलबुल, वही साग़ रो–मीना, वही शीरीं–फ़रहाद, वही शमा और परवाना रवायती शायरी के सारे प्रतीक ‘अकबर’ की शुरुआती शायरी में नज़र आते हैं। लेकिन अकबर इसी रवायत पर क़ायम रहे होते तो तय है कि वे मामूली दर्जे के सैकड़ों शायरों में बस एक होते।
लेकिन ख़ुशनसीबी कि ऐसा नहीं हुआ। जल्द ही अकबर ने अपनी एक अलग राह बना ली और वे हास्य–व्यंग्य के पहले प्रमुख शायर के रूप में जल्वागर हुए। यूँ तो जाफ़र, मीर, सौदा, ग़ालिब और दूसरे शायरों के यहाँ हास्य और व्यंग्य की सुन्दर छटाएँ देखने को मिलती हैं, लेकिन इनमें से किसी को भी बाक़ायदा हास्य–व्यंग्य का शायर नहीं कहा जा सकता। ये ‘अकबर’ थे जिन्होंने उर्दू शायरी में अपनी बात कहने के लिए हास्य–व्यंग्य का सहारा लिया और एक ऐसी नई रवायत की बुनियाद डाली जो आज तक फल–फूल रही है।
विचारधारा के स्तर पर देखें तो पश्चिमी ज्ञान–विज्ञान और पश्चिमी सभ्यता का जितना भारी विरोध ‘अकबर’ के यहाँ दिखाई देता है, उतना किसी और शायर के यहाँ नहीं दिखाई देता। इसी तरह ‘अकबर’ धार्मिक और सामाजिक सुधार के भी विरोधी थे। बदलते हुए हालात में ‘अकबर’ की शिकस्त लाज़मी थी और कहीं हास्य के साथ और कहीं दु:ख के साथ उन्होंने अपनी इस शिकस्त का इज़हार भी किया है। लेकिन इस नकारात्मक पहलू के अन्दर जो सकारात्मक तत्त्व मौजूद हैं, सावधानी के साथ उनकी निशानदेही किए बिना ‘अकबर’ के साथ इंसाफ़ करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
Bagdad Se Ek Khat
- Author Name:
Mahendra Mishra
- Book Type:

- Description: अपने समय से संवाद करती ये कविताएँ कवि महेन्द्र मिश्र के लम्बे प्रशासकीय मौन के बाद सामने आ रही हैं। आज से कोई चौबीस वर्ष पहले उनका पहला काव्य-संकलन आया था—‘अनायास वर्षा’। तब से बहुत कुछ घटित हो चुका है दुनिया में और काव्य का परिदृश्य भी वही नहीं है, जो उस समय था। इन कविताओं से गुज़रते हुए मैंने अनुभव किया कि इस संग्रह के रचयिता ने इस बीच के लगभग सारे सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों को अपनी चेतना में जज़्ब करने के बाद वह वस्तु-फ़लक तैयार किया है, जिससे इस कृति को आकार मिलता है। यह बौद्धिक रूप से एक अत्यन्त सजग रचनाकार की रचना है—जिसे अपने से की गई एक लम्बी बहस भी कहा जा सकता है। वस्तुतः इस किताब का नाम ‘बग़दाद से एक ख़त’ वह संकेतक है, जो इन कविताओं के ‘टोन’ का निर्धारण करता है। मुझे अच्छा लगा कि वैचारिक आवेग वाली लम्बी कविताओं के साथ-साथ यहाँ कुछ अपेक्षाकृत छोटी कविताएँ भी हैं—जैसे ‘वह लड़का’ और ‘नदी’ जो अलग ढंग की कविताएँ हैं और पाठक से सीधे संवाद करती हैं। यह भरा-पूरा संग्रह प्रमाण है कि अपनी प्रशासकीय उलझनों में चाहे इस कवि ने कविता का साथ—अस्थायी रूप से—छोड़ दिया हो, पर कविता ने अपने इस ‘पुराने प्रेमी’ का साथ कभी नहीं छोड़ा। — केदारनाथ सिंह
Har Koshish Hai Ek Baghawat
- Author Name:
Rajendra Kumar
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- Description: collection of poems
Zindagi Ghazal Ho Gai
- Author Name:
Puja Saxena
- Book Type:

- Description: Poems
Dhoop Se Roothi Chandni
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
- Rating:
- Book Type:

- Description: This book has no description
Taaron Kee Dhool
- Author Name:
Krishna Mohan Jha
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- Description: तारों की धूल कृष्णमोहन झा का नया कविता-संग्रह है जो उनके पहले संग्रह के लगभग दो दशकों के बाद पाठकों के सामने आ रहा है। उनकी कविता इस दुनिया को स्मृति की दृष्टि से देखती है। इस तथ्य को, कि स्मृति एक भरा-पूरा संसार है, वह इतने गाढ़े रंगों में अंकित करती है कि उसे छुआ जा सके, उसमें रहा जा सके जैसे हम प्रकृति के साथ, उसके बीच उसके तमाम सजीव स्पर्शों के साथ रहते आए हैं। प्रकृति और मनुष्य का यह साहचर्य उत्तरोत्तर क्षीण हुआ है, यह वह दुख है जो उनकी कविताओं में सतत मौजूद रहता है। उनकी कविता हमें बीते हुए को अपने भीतर सँजोए हुए इस पृथ्वी पर रहना सिखाती है, यह पृथ्वी जहाँ पानी है, हवा है, वनस्पति है, चिड़ियाँ हैं, जुगनू हैं, आकाश और उसमें गुच्छों-के-गुच्छे लटकते तारे हैं, और कविताएँ हैं। उनकी कविता हमें महसूस कराती है कि इन सबके साथ, उनकी सजीवता को स्वीकार करते हुए मनुष्य ने कैसे रहना शुरू किया होगा, और कैसे हम रह सकते हैं ताकि आगे भी रह सकें। वे एक आठवें दिन की कल्पना करते हैं, एक ऐसा दिन जिस पर न ख़ून का एक छींटा हो, न आँसू का कोई निशान। जिस चीज़ को ये कविताएँ क़तई महिमामंडित नहीं करतीं, वह है आगे-ही-आगे चलते चले जाना, और वह भी उसी महापथ से जहाँ विस्मरण हमारी तमाम अकृतज्ञताओं और अमनुष्यताओं को कवच की तरह ढके रहता है। ये हमें याद दिलाती हैं, और आज के समय में यह एक बड़ा कार्यभार है, जिसे ये कविताएँ अपनी आन्तरिक ज़िद और बाह्य शिल्प, दोनों से जैसे शपथपूर्वक करती हैं।
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