Mall mein Kabutar
Author:
Dr. Vinay KumarPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 164
₹
200
Available
poetry
ISBN: 9789385013720
Pages: 80
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Anvita Abbi
- Book Type:

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Description:
कवि भारतभूषण अग्रवाल उन थोड़े से वरिष्ठ कवियों में से थे जिनसे युवतम कवि भी बिना किसी हिचक या संकोच के मिल सकते थे। वे उनसे समानता और प्रसन्न गरमाहट का व्यवहार करने में कभी चूकते नहीं थे। भारत जी के आकस्मिक देहावसान के बाद जब कुछ मित्रों ने, उनकी पत्नी बिन्दु अग्रवाल की पहल और ज़िम्मेदारी पर, किसी वर्ष में प्रकाशित किसी युवा कवि की श्रेष्ठ कविता के लिए उनके नाम पर एक पुरस्कार स्थापित करने का निर्णय लिया तो उनकी युवतर कवियों से निकटता, उनके प्रति उत्साह और उनमें से कइयों के साथ उनकी सहज आत्मीयता को भी बराबर ध्यान में रखा गया था।
अब तक पुरस्कृत कवियों की पुरस्कृत कविताओं के अलावा उनके वक्तव्य और कुछ ताज़ा कविताएँ इस संचयन में शामिल हैं। उन्हें बहुत मनोयोग से भारत जी की बेटी और विख्यात भाषावैज्ञानिक अन्विता अब्बी ने एकत्र किया है। मंशा कुछ यह रही है कि तीस बरस बाद इसका कुछ आकलन हो कि युवा कवि, जिनमें कई अब लगभग वरिष्ठ हो चुके हैं, अपनी कविता और विचार में, भाषा और शिल्प में, मानवीय सच्चाई की अपनी खोज और आत्मसंघर्ष में, व्यापक कविता दृश्य में किस जगह और किस मुक़ाम पर पहुँचे हैं।
इस संचयन से स्पष्ट होता है कि हिन्दी कविता में विस्मयकारी बहुलता है। यह अनुभव करना उत्साहवर्द्धक और विचारोत्तेजक है कि युवा कवियों में किसी एक दृष्टि, एक शैली, एक विचारप्रवृत्ति का वर्चस्व नहीं है। हर स्तर पर बहुलता है जैसे कि हिन्दी भाषा, साहित्य और समाज में भी बहुलता है। यह बहुलता किसी तरह की पक्षहीनता, तटस्थता या उदासीनता का साक्ष्य नहीं है। उलटे प्रायः इन सभी कवियों में अपने आस-पास की ज़िन्दगी, उसकी विडम्बनाओं और अन्तर्विरोधों, उसमें गुँथे-फँसे अच्छे-बुरे अनुभवों के प्रति खुलापन है। दरअसल यह जटिल ज़िन्दगी ही इस सारी कविता का ‘उर्वर प्रदेश’ है।
Awara Tishnagi
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- Description: Awating description for this book
Bharat-Bharati
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- Description: v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main"><p>‘भारत-भारती’ मैथिलीशरण गुप्त की सर्वाधिक प्रचलित कृति है। यह सर्वप्रथम संवत् 1969 में प्रकाशित हुई थी और अब तक इसके पचासों संस्करण निकल चुके हैं। एक समय था जब ‘भारत-भारती’ के पद्य प्रत्येक हिन्दी-भाषी के कंठ पर थे। गुप्त जी का प्रिय हरिगीतिका छन्द इस कृति में प्रयुक्त हुआ है। भारतीय राष्ट्रीय चेतना की जागृति में इस पुस्तक का हाथ रहा है। यह काव्य तीन खण्डों में विभक्त है : <br />(1) ‘अतीत’ खंड, (2) ‘वर्तमान’ खंड, (3) ‘भविष्यत्’ खंड। ‘अतीत’ खंड में भारतवर्ष के प्राचीन गौरव का बड़े मनोयोग से बखान किया गया है। भारतीयों की वीरता, आदर्श, विद्या-बुद्धि, कला-कौशल, सभ्यता-संस्कृति, साहित्य-दर्शन, स्त्री-पुरुषों आदि का गुणगान किया गया है। ‘वर्तमान’ खंड में भारत की वर्तमान अधोगति का चित्रण है। इस खंड में कवि ने साहित्य, संगीत, धर्म, दर्शन आदि के क्षेत्र में होनेवाली अवनति, रईसों और उनके सपूतों के कारनामें, तीर्थ और मन्दिरों की दुर्गति तथा स्त्रियों की दुर्दशा आदि का अंकन किया है। ‘भविष्यत्’ खंड में भारतीयों को उद्बोधित किया गया है तथा देश के मंगल की कामना की गई है।</p>
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