Kavishree
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श्री' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ओजस्वी कविताओं का संग्रह है। कविताओं में प्रखर राष्ट्रवाद, प्रकृति के प्रति उत्कट प्रेम एवं मानव-कल्याण-कामना की मंगल-भावना के दर्शन होते हैं। 'कविश्री' में संगृहीत हैं दिनकर जी की 'हिमालय के प्रति', 'प्रभाती', 'व्याल विजय' एवं 'नया मनुष्य' जैसी प्रसिद्ध प्रदीर्घ कविताएँ, जो हिन्दी काव्य-साहित्य की अमूल्य निधि हैं। दिनकर का काव्य-व्यक्तित्व जिस दौर में निर्मित हुआ, वह राजसत्ता और शोषण के विरुद्ध हर मोर्चे पर संघर्ष का दौर था। इसलिए 'कविश्री' में संकलित रचनाओं को पढ़ना भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में साहित्य के योगदान से भी परिचित होना है। अपने ऐतिहासिक महत्त्व के कारण पाठकों के लिए एक संग्रहणीय और अविस्मरणीय संग्रह।
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श्री' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ओजस्वी कविताओं का संग्रह है। कविताओं में प्रखर राष्ट्रवाद, प्रकृति के प्रति उत्कट प्रेम एवं मानव-कल्याण-कामना की मंगल-भावना के दर्शन होते हैं।
'कविश्री' में संगृहीत हैं दिनकर जी की 'हिमालय के प्रति', 'प्रभाती', 'व्याल विजय' एवं 'नया मनुष्य' जैसी प्रसिद्ध प्रदीर्घ कविताएँ, जो हिन्दी काव्य-साहित्य की अमूल्य निधि हैं।
दिनकर का काव्य-व्यक्तित्व जिस दौर में निर्मित हुआ, वह राजसत्ता और शोषण के विरुद्ध हर मोर्चे पर संघर्ष का दौर था। इसलिए 'कविश्री' में संकलित रचनाओं को पढ़ना भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में साहित्य के योगदान से भी परिचित होना है।
अपने ऐतिहासिक महत्त्व के कारण पाठकों के लिए एक संग्रहणीय और अविस्मरणीय संग्रह।
Book Details
-
ISBN9789389243819
-
Pages72
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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– ‘सीपी और शंख' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा अंग्रेज़ी से अनूदित विश्व की श्रेष्ठ कविताओं का संग्रह है। बावजूद इसके ये दिनकर जी के व्यक्तित्व के रूपों को उद्घाटित करती उनकी अपनी मौलिक रचनाएँ भी प्रतीत होती हैं, क्योंकि उन्होंने भावों से प्रेरणा लेते हुए अपनी तरफ़ से ऐसे-ऐसे चित्रों की सृष्टि कर डाली है जो मूल में कहीं नहीं। इसलिए इन कविताओं में दिनकर जी के अपने चिन्तन और भाषा का परस्पर अन्योन्य सम्बन्ध भी परिलक्षित होते हैं।
संग्रह में पुर्तगीज़ी, स्पेनिश, अंग्रेज़ी, जर्मन, फ़्रेंच, अमरीकी, चीनी, पोलिश और भारतीय भाषाओं में मलयालम की अछूती भावभूमि और नवीन भंगिमाओं वाली कविताएँ शामिल हैं। रूमानी, आत्मपीड़न के अतिरिक्त भक्तिभाव से पूर्ण इन कविताओं की मुख्य विशेषता रस-प्रवणता, लावण्ययुक्त बिम्ब और श्रम की प्रतिष्ठा है।
इस संग्रह की कौन सी कविता किस कवि की कविता का प्रतिबिम्ब है, यह सूचित करने को पुस्तक के अन्त में एक सूची भी दी गई है ताकि सहज ही सृजन के विभिन्न आयामों से जुड़ा जा सके। निस्सन्देह, कविता में नवीन रुचि रखनेवाले पाठकों को दिनकर जी की यह कृति पसन्द ही नहीं आएगी, बल्कि अविस्मरणीय भी साबित होगी।
Dilli
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar +1
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style="font-weight: 400;">‘दिनकर’ की कविताओं में जो गीतात्मक लयात्मकता है वह ‘दिल्ली’ संग्रह की कविताओं में भी मुखर है। इसमें चार कविताएँ संकलित हैं जो दिल्ली के यथार्थ और निहितार्थ को इतने अनूठे ढंग से प्रकट करती हैं कि यह शहर एक प्रतीक बनकर सामने आता है।
संग्रह की पहली कविता ‘नई दिल्ली के प्रति’ 1929 की है। इसकी पृष्ठभूमि में नई दिल्ली का प्रवेशोत्सव है जो 1929 में मनाया गया था। उसी वर्ष भगत सिंह पकड़े गए और लाहौर-कांग्रेस में पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास हुआ। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उस उथल-पुथल भरे दौर में उत्सव और दमन के विरोधाभासों को यह कविता बखूबी मूर्त करती है।
संग्रह की दूसरी कविता ‘दिल्ली और मास्को’ है जिसका रचनाकाल 1945 का है। इसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाजवादी क्रान्ति का जयघोष निहित है जो राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रमों की प्रभावी भूमिकाओं को दिल्ली के सन्दर्भों में देखे जाने की माँग करती है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व रचित उपरोक्त दोनों कविताओं के विपरीत शेष दो कविताएँ—‘हक़ की पुकार’ और ‘भारत का यह रेशमी नगर’—स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद क्रमश: 1952 और 1954 की हैं। इन दोनों कविताओं में दिल्ली का तत्कालीन यथार्थ तो प्रकट हुआ ही है, वह विलासी रूप भी उजागर हुआ है जिससे राजनीतिक कर्मठता को प्रेरणा नहीं मिलती, उलटे बाधा पड़ती है। दिनकर कहते हैं कि देश के नवनिर्माण का कार्य जो इतनी धीमी गति से चल रहा है, उसका भी मुख्य कारण यही है कि कार्याधिकारी देश की आकुलता से अपरिचित हैं। जबकि दिल्ली हमारी सारी शिराओं का केन्द्र है। इसी ऊहापोह की राजनीतिक स्थिति से जो क्षोभ उठता है, वही इन कविताओं का मूल भाव है।
राष्ट्रीय राजधानी पर लिखी इन कविताओं को एक साथ पढ़ने पर पाठक कवि के उपरोक्त दृष्टिकोण को कुछ अधिक न्याय के साथ ग्रहण कर सकेंगे।
Naye Subhashit
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar +1
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सुभाषित संस्कृत काव्य-साहित्य की एक प्रचलित शैली है जिसमें रचित पदों में दृष्टि, सत्य, सौन्दर्य आदि का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। कम शब्दों में बात कहने की कला इस शैली की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। राष्ट्रकवि दिनकर की इस पुस्तक में इसी शैली में रचे गए हिन्दी-पद शामिल हैं।
सुभाषित हमेशा वाक्-कौशल लिये होते हैं। इनमें अन्तर्निहित सन्देश ऐसी चतुराई से पद्य-बद्ध किए जाते हैं कि इन्हें याद भी किया जा सकता है और अपने व्यावहारिक जीवन में उपयोग भी किया जा सकता है। इस पुस्तक के सुभाषित विभिन्न विषयों से सम्बन्धित हैं और इनका कैनवस बहुत बड़ा है। ये अनुभव और अध्ययन के साँचे में ढले हुए सुभाषित हैं। इसलिए इनमें जो एक अलग छन्दात्मक रंग देखने को मिलता है, उसके प्रभाव में ग़ज़ब का आकर्षण और माधुर्य है। व्यंग्य-विनोद का पुट तो ख़ास है ही।
दिनकर ने अपने इन सुभाषितों में जिस काव्य-कौशल का परिचय दिया है, वह अपनी सम्प्रेषणीयता में एक मिसाल है। मिसाल इस मायने में भी कि आम पाठकों को ध्यान में रखकर भी ऐसे काव्य की रचना की जानी चाहिए। यही कारण है कि ये सुभाषित पढ़नेवाले को अपनी ही कहन का हिस्सा लगने लगते हैं और हृदयतल को छू वहीं ठहर जाते हैं।
इस पुस्तक में ऐसे कई सुभाषित हैं जो आज के उथल-पुथल-भरे समय में साठ साल पहले लिखे जाने के बाद भी प्रासंगिक हैं। इसलिए यह पुस्तक सिर्फ़ पठनीय ही नहीं, एक ज़रूरी पुस्तक भी है।
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