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Sab Itna Asamapt

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‘सब इतना असमाप्त’ अपने शीर्षक से ही संग्रह की अन्तर्वस्तु का आभास देता है। इसकी अधिकांश कविताएँ वर्ष 2010 के बाद लिखी गई हैं। यहाँ कुछ अन्य काव्य-प्रयोग भी शामिल हैं जो कविता और उसकी एक बड़ी दुनिया में कवि की निरन्तर आवाजाही के प्रमाण हैं। कुँवर नारायण ने किसी भी क़ीमत पर कविता की भूमिका को सीमित करके नहीं देखा। उन्होंने अपनी एक कविता में प्रतीकात्मक लहजे़ में कहा है कि मैं कभी भी अपनी कविताओं का अन्त नहीं लाना चाहता। उस जीवन्त नाते को बनाए रखना चाहता हूँ जिसे अन्त समाप्त कर देता है। वे हमेशा अनन्तिम कविताएँ लिखना चाहते थे, इसलिए अन्तहीन भी। प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ अपने आप में उनकी इस चिन्ता को मूर्त करती हैं और इस तरह अन्त और आरम्भ की एक व्यापक और परस्पर अभिन्न परिकल्पना हमारे सामने रखती हैं। संग्रह की कविताएँ बहुत अनोखे ढंग से बेचैन करती हैं और आश्वस्त भी। इनमें एक बड़े कवि के समस्त अनुभवों की काव्यात्मक फलश्रुति है और अक्सर एक भव्य उदासी का गूँजता हुआ स्वर। यहाँ कुछ भूली-बिसरी यादों का कोलाज है और अप्रत्याशित विडम्बनाओं की ओर लुढ़कते हुए समाज की चिन्ता भी। पूरे संग्रह में सागर के दो तटों की तरह जीवन और मृत्यु के विविध अनुभवों-आहटों की कविताएँ एक सायुज्य में हैं। हिन्दी के शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण ने अपनी कृतियों के माध्यम से एक पूरा अलग 'पैराडाइम’ रचा है। इसी क्रम में प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ एक नए रूप में उनकी उपस्थिति को सम्भव बनाती हैं। इसमें उनकी काव्य-यात्रा भौतिक-अभौतिक, नैतिक-अनैतिक, लौटना-जाना, अन्त और आरम्भ, जिजीविषा और मुमुक्षा की परस्पर यात्रा रही है। पूरे संग्रह में यह संवेदनशीलता क्रमश: बहुआयामी विस्तार पाती गई है और कुँवर नारायण का एक बेहद सघन और अनुभव-समृद्ध काव्य-संसार पाठकों के सामने खुलता चला जाता है।

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‘सब इतना असमाप्त’ अपने शीर्षक से ही संग्रह की अन्तर्वस्तु का आभास देता है। इसकी अधिकांश कविताएँ वर्ष 2010 के बाद लिखी गई हैं। यहाँ कुछ अन्य काव्य-प्रयोग भी शामिल हैं जो कविता और उसकी एक बड़ी दुनिया में कवि की निरन्तर आवाजाही के प्रमाण हैं। कुँवर नारायण ने किसी भी क़ीमत पर कविता की भूमिका को सीमित करके नहीं देखा। उन्होंने अपनी एक कविता में प्रतीकात्मक लहजे़ में कहा है कि मैं कभी भी अपनी कविताओं का अन्त नहीं लाना चाहता। उस जीवन्त नाते को बनाए रखना चाहता हूँ जिसे अन्त समाप्त कर देता है। वे हमेशा अनन्तिम कविताएँ लिखना चाहते थे, इसलिए अन्तहीन भी। प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ अपने आप में उनकी इस चिन्ता को मूर्त करती हैं और इस तरह अन्त और आरम्भ की एक व्यापक और परस्पर अभिन्न परिकल्पना हमारे सामने रखती हैं।

संग्रह की कविताएँ बहुत अनोखे ढंग से बेचैन करती हैं और आश्वस्त भी। इनमें एक बड़े कवि के समस्त अनुभवों की काव्यात्मक फलश्रुति है और अक्सर एक भव्य उदासी का गूँजता हुआ स्वर। यहाँ कुछ भूली-बिसरी यादों का कोलाज है और अप्रत्याशित विडम्बनाओं की ओर लुढ़कते हुए समाज की चिन्ता भी। पूरे संग्रह में सागर के दो तटों की तरह जीवन और मृत्यु के विविध अनुभवों-आहटों की कविताएँ एक सायुज्य में हैं।

हिन्दी के शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण ने अपनी कृतियों के माध्यम से एक पूरा अलग 'पैराडाइम’ रचा है। इसी क्रम में प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ एक नए रूप में उनकी उपस्थिति को सम्भव बनाती हैं। इसमें उनकी काव्य-यात्रा भौतिक-अभौतिक, नैतिक-अनैतिक, लौटना-जाना, अन्त और आरम्भ, जिजीविषा और मुमुक्षा की परस्पर यात्रा रही है। पूरे संग्रह में यह संवेदनशीलता क्रमश: बहुआयामी विस्तार पाती गई है और कुँवर नारायण का एक बेहद सघन और अनुभव-समृद्ध काव्य-संसार पाठकों के सामने खुलता चला जाता है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2018
Weight
282 grams
ISBN-13
9789388183598
Pages
107
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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