Etiyadi Jan

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Hindi

Category:

Poetry

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अभिजन’ और ‘इत्यादि जन’ के बीच का अलगाव, उनके बीच की दरार नई सभ्यता की संरचना में ही निहित है। लगता है, इस अलगाव और दरार की चेतना से ही ‘अभिजन’ और ‘इत्यादि जन’ को दूर रखना इस सभ्यता की मूल प्रकृति है ताकि अभिजन के अन्दर ऐसे प्रबुद्ध तत्त्वों की निर्मिति न हो सके जो अपनी जन-विमुख ही नहीं, जन-विरोधी जीवनशैली के प्रति आत्म-पीड़ा और उत्ताप महसूस कर सकें और जन के प्रति अपने दायित्व का भी उन्हें अहसास हो सके।</p> <p>सबसे अधिक चिन्ताजनक बात यह है कि उच्च और निम्न वर्गों के बीच की इस दरार के बारे में चेतना प्रसार के बदले मिथ्या चेतना प्रसार में राज्य पर दबाव डालने वाली स्थापित स्वार्थी संरचनाएँ ही नहीं, बौद्धिक और सर्जनात्मक तत्त्व भी जो समाज की आत्मा या अन्तःकरण माने जाते हैं, वे भी भागीदार नज़र आते हैं।</p> <p>मिथ्या चेतना प्रसार के इस बड़े व्यापार में बहुत बड़ी भूमिका संख्या शास्त्र की है या संख्या शास्त्र की मूल प्रेरणाओं के विपरीत व्यवहार में उसे पूर्व स्थापित और नव स्थापित स्वार्थों के साँचे में ढालने की है। संख्या शास्त्र के क्रियाकलाप में बड़ी भूमिका आँकड़ों की है। आँकड़े ही वह ‘ब्रह्मास्त्र’ हैं जिनके द्वारा विपन्नों की वास्तविक स्थिति का मिथकीकरण कर उनके बुनियादी हितों पर सबसे बड़ा आघात होता है। आँकड़ों का भ्रमजाल ज़मीनी स्तर पर समर्थ अभिजन और असमर्थ ‘इत्यादि जन’ की दरार को सामने नहीं आने देता।</p> <p>आँकड़ों द्वारा अँधेरे में रखे गए विकास के मूल्य-विमुख, समता-विरोधी, अमानुष और नकारात्मक पक्ष को ज़मीनी दृष्टि और अनुभव के आधार पर ये कविताएँ उजागर करती हैं। ये कविताएँ अध्ययन कक्ष के ‘एकान्त और प्रशान्त माहौल में स्मरण किए गए विचार मात्र नहीं हैं।’ न ये कवि के ‘संवेदी मन के स्वत:प्रसूत भावोद्गार मात्र हैं।’</p> <p>अधिकांश कविताएँ ग्रामीण जगत् के कठोर और भयावह यथार्थ से जूझते ‘इत्यादि जनों’ से ज़मीनी स्तर पर आमने-सामने के ट्रौमा से उपजी रचनाएँ हैं। विकास (या अपविकास) का अमानुष चेहरा महज़ एक बुद्धिजीवी के दिमाग़ से उपजी अवधारणा नहीं है, यह ‘इत्यादि जनों’ की वास्तविक जीवन-स्थिति है, इसी सच्चाई पर ये रचनाएँ प्रकाश डालती हैं।</p> <p> 

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ISBN
9788126721238
Pages
184
Avg Reading Time
6 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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About the Book

अभिजन’ और ‘इत्यादि जन’ के बीच का अलगाव, उनके बीच की दरार नई सभ्यता की संरचना में ही निहित है। लगता है, इस अलगाव और दरार की चेतना से ही ‘अभिजन’ और ‘इत्यादि जन’ को दूर रखना इस सभ्यता की मूल प्रकृति है ताकि अभिजन के अन्दर ऐसे प्रबुद्ध तत्त्वों की निर्मिति न हो सके जो अपनी जन-विमुख ही नहीं, जन-विरोधी जीवनशैली के प्रति आत्म-पीड़ा और उत्ताप महसूस कर सकें और जन के प्रति अपने दायित्व का भी उन्हें अहसास हो सके।</p>
<p>सबसे अधिक चिन्ताजनक बात यह है कि उच्च और निम्न वर्गों के बीच की इस दरार के बारे में चेतना प्रसार के बदले मिथ्या चेतना प्रसार में राज्य पर दबाव डालने वाली स्थापित स्वार्थी संरचनाएँ ही नहीं, बौद्धिक और सर्जनात्मक तत्त्व भी जो समाज की आत्मा या अन्तःकरण माने जाते हैं, वे भी भागीदार नज़र आते हैं।</p>
<p>मिथ्या चेतना प्रसार के इस बड़े व्यापार में बहुत बड़ी भूमिका संख्या शास्त्र की है या संख्या शास्त्र की मूल प्रेरणाओं के विपरीत व्यवहार में उसे पूर्व स्थापित और नव स्थापित स्वार्थों के साँचे में ढालने की है। संख्या शास्त्र के क्रियाकलाप में बड़ी भूमिका आँकड़ों की है। आँकड़े ही वह ‘ब्रह्मास्त्र’ हैं जिनके द्वारा विपन्नों की वास्तविक स्थिति का मिथकीकरण कर उनके बुनियादी हितों पर सबसे बड़ा आघात होता है। आँकड़ों का भ्रमजाल ज़मीनी स्तर पर समर्थ अभिजन और असमर्थ ‘इत्यादि जन’ की दरार को सामने नहीं आने देता।</p>
<p>आँकड़ों द्वारा अँधेरे में रखे गए विकास के मूल्य-विमुख, समता-विरोधी, अमानुष और नकारात्मक पक्ष को ज़मीनी दृष्टि और अनुभव के आधार पर ये कविताएँ उजागर करती हैं। ये कविताएँ अध्ययन कक्ष के ‘एकान्त और प्रशान्त माहौल में स्मरण किए गए विचार मात्र नहीं हैं।’ न ये कवि के ‘संवेदी मन के स्वत:प्रसूत भावोद्गार मात्र हैं।’</p>
<p>अधिकांश कविताएँ ग्रामीण जगत् के कठोर और भयावह यथार्थ से जूझते ‘इत्यादि जनों’ से ज़मीनी स्तर पर आमने-सामने के ट्रौमा से उपजी रचनाएँ हैं। विकास (या अपविकास) का अमानुष चेहरा महज़ एक बुद्धिजीवी के दिमाग़ से उपजी अवधारणा नहीं है, यह ‘इत्यादि जनों’ की वास्तविक जीवन-स्थिति है, इसी सच्चाई पर ये रचनाएँ प्रकाश डालती हैं।</p>
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Book Details

  • ISBN
    9788126721238
  • Pages
    184
  • Avg Reading Time
    6 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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