Anrahani Rahane Do
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
About the book
विचारक और संगीतविद् मुकुन्द लाठ चार दशकों से अधिक कविता लिखते रहे हैं। उनका यह संग्रह 1970 से लेकर 2012 के दौरान लिखी कविताओं का संग्रह है। जितना अचरज की बात है कि उन जैसा अधीत विद्वान चुपचाप इतने बरसों से कविता लिख रहा है, उससे कम अचरज की बात यह नहीं है कि ये कविताएँ किसी भी काव्य-निकष या काव्य-रुचि के आधार पर कविताएँ हैं। इन कविताओं में शास्त्र और लोक दोनों समाहित हैं—उनमें परम्परा की आधुनिक अन्तर्ध्वनियाँ हैं और आधुनिकता के कई मर्म और उत्सुकताएँ गुँथी हुई हैं। वे बहुत सहजता से तत्सम और तद्भव को एक साथ साधती हैं। उन पर विचार हावी नहीं है और वे कविता की काया में हस्तक्षेप नहीं करते हैं बल्कि अनुभव की तरंगित सघनता में घुल-मिलकर आते हैं। हमारे समय या शायद सभी समयों में मनुष्य की स्थायी विडम्बना यह है कि उसकी स्थिति हमेशा ही अन्तर्विरोध की है। मुकुन्द लाठ की कविता इस स्थायी और अटल अन्तर्विरोध से न मुँह मोड़ती है, न ही उसको सरलीकृत करती है। मुकुन्द जी के यहाँ शब्द और बिम्ब की लीला के साथ-साथ गहरा विनोद भाव भी सक्रिय है। कविता अगर एक स्तर पर सार्थक होने के लिए एक समूचे जीवन को उसकी जटिलता और सूक्ष्मता में प्रकट करती है और एक ऐसी मानवीय गरमाहट और हमआहंगी देती है जो अन्यथा सम्भव नहीं है तो मुकुन्द लाठ की कविता भरी-पूरी जीवन-कविता है। —अशोक वाजपेयी
Read more₹
795
636 20% off
Available
Rachnaye membership
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format
100% Original
Fast Dispatch
Secure Payment
About the Book
विचारक और संगीतविद् मुकुन्द लाठ चार दशकों से अधिक कविता लिखते रहे हैं। उनका यह संग्रह 1970 से लेकर 2012 के दौरान लिखी कविताओं का संग्रह है। जितना अचरज की बात है कि उन जैसा अधीत विद्वान चुपचाप इतने बरसों से कविता लिख रहा है, उससे कम अचरज की बात यह नहीं है कि ये कविताएँ किसी भी काव्य-निकष या काव्य-रुचि के आधार पर कविताएँ हैं।
इन कविताओं में शास्त्र और लोक दोनों समाहित हैं—उनमें परम्परा की आधुनिक अन्तर्ध्वनियाँ हैं और आधुनिकता के कई मर्म और उत्सुकताएँ गुँथी हुई हैं। वे बहुत सहजता से तत्सम और तद्भव को एक साथ साधती हैं। उन पर विचार हावी नहीं है और वे कविता की काया में हस्तक्षेप नहीं करते हैं बल्कि अनुभव की तरंगित सघनता में घुल-मिलकर आते हैं।
हमारे समय या शायद सभी समयों में मनुष्य की स्थायी विडम्बना यह है कि उसकी स्थिति हमेशा ही अन्तर्विरोध की है। मुकुन्द लाठ की कविता इस स्थायी और अटल अन्तर्विरोध से न मुँह मोड़ती है, न ही उसको सरलीकृत करती है।
मुकुन्द जी के यहाँ शब्द और बिम्ब की लीला के साथ-साथ गहरा विनोद भाव भी सक्रिय है।
कविता अगर एक स्तर पर सार्थक होने के लिए एक समूचे जीवन को उसकी जटिलता और सूक्ष्मता में प्रकट करती है और एक ऐसी मानवीय गरमाहट और हमआहंगी देती है जो अन्यथा सम्भव नहीं है तो मुकुन्द लाठ की कविता भरी-पूरी जीवन-कविता है।
—अशोक वाजपेयी
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2013
- Weight
- 404 grams
- ISBN-13
- 9788126723522
- Pages
- 208
- Reading time
- ~7 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 22 cm
- Language
- Hindi
Recommended for you
Gaganvat : Sanskrit Muktakon Ka Sweekaran
- Author Name:
Mukund Laath +1
- Book Type:

- Description:
'स्वीकरण’ शब्द मेरा नहीं, पुराना है—12वीं सदी के काव्याचार्य राजशेखर का है। मैंने शब्द 'कविता का एक भाषा से दूसरी भाषा में काव्यानुवाद’—इस अर्थ में लिया है। राजशेखर ने 'स्वीकरण’ का प्रयोग इसे 'हरण’ से व्यावृत्त—अलग—करने के लिए किया है। राजशेखर कहते हैं कि नई कविता बनती ही पुरानी चली-आती कविताओं की परम्परा के भीतर है—यों पुरानी कविता को 'ले लेना’ कोई बुरी बात नहीं—बल्कि अनिवार्य है। पर उसे सचमुच 'अपना लेना’ उपाय-कौशल चाहता है। राजशेखर ऐसे उपायों का विस्तार से वर्णन करते हैं। इसके लिए पुरानी कविता का रूपान्तर आवश्यक था जो कई तरह से किया जा सकता था, जिन्हें राजशेखर खोल कर दिखाते हैं। 'स्वीकरण’ शब्द राजशेखर ने गढ़ा था। पर इसके पीछे जो धारणा है, विचार है, वह 'ध्वन्यालोक’ के विख्यात लेखक, भाषा में एक नए अर्थलोक—व्यंजना—के द्रष्टा, महत् दार्शनिक आनन्दवर्धन का है। आनन्दवर्धन अपने ग्रन्थ में ध्वनि (व्यंजना) की शास्त्रीय स्थापना करने के बाद पूछते हैं कि यह जो स्थापना हुई है, यह क्या शास्त्रमात्र-सार नहीं? इससे कवि को क्या लाभ? उत्तर देते हुए आचार्य कहते हैं कि मनुष्य के चित्त में जितने भाव हैं, पुरानी कविता में उनकी सक्षम अभिव्यक्ति हो चुकी है, आज का कवि नया क्या कर सकता है? पर कविता तो नई ही होती है। आनन्दवर्धन की दृष्टि में यह नयापन व्यंजना का ही नयापन होता है। पुरानी कविता की व्यंजना बदल दी जाए तो कविता नई हो जाती है। मेरे अनुवाद इन पुराने रास्तों पर नहीं चलते। 'स्वीकरण’ मेरे लिए अनूदित कविता का रूपान्तरण नहीं, उलटे उस कविता के स्वरूप-स्वभाव को, भाव-मर्म को बजा रखते हुए उसे एक नई भाषा में उतारना है। एक बात और कहना चाहूँगा। संस्कृत कविता मुक्तक-प्रधान है। बड़ी कविताओं में, महाकाव्यों में भी, यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। मैंने अपने 'अनुवचन’ में मुक्तक पर कुछ लम्बी चर्चा की है। पाठक उसे देखेंगे तो इन कविताओं में उसकी पैठ बढ़ सकती है। —प्रस्तावना से संस्कृत काव्य की विपुलता और वैभव का अक्सर ज़िक्र होता है। मुकुन्द लाठ उन बिरले कवि-चिन्तकों में से हैं जिन्होंने इस काव्य के अपार लालित्य को हिन्दी में सुघरता और संवेदनशीलता से लाने की कोशिश की है। राजशेखर के हवाले से वे इन्हें 'स्वीकरण’ कहते हैं। वे इस अर्थ में स्वीकरण हैं भी कि उन्हें पढ़ते लगता है कि आप मूल हिन्दी कविता ही पढ़ रहे हैं। हमें प्रसन्नता है कि हम रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत इस संचयन को एक बार फिर हिन्दी पाठकों के समक्ष रसास्वादन के लिए ला रहे हैं। —अशोक वाजपेयी
Andhere Ke Rang
- Author Name:
Mukund Laath +1
- Book Type:

- Description:
मुकुन्द लाठ हमारे मूर्धन्य विचारकों और संगीतवेत्ताओं में से एक हैं। सुखद संयोग यह है कि उन्होंने कविताएँ भी लिखी हैं और वे अपने ढंग के अकेले कवि हैं। विस्मय की बात यह है कि उनकी कविता में संसार की पदार्थमयता और उनकी सहज वैचारिकता में न तो कोई अलगाव है और न ही एक का दूसरे पर कोई बोझ। वे अपने आसपास को जिस सजग संवेदनशीलता और नन्हीं सचाइयों में देख पाते हैं, वह अनोखा गुण है। उनके अवलोकन में सूक्ष्मता है, उनकी अभिव्यक्ति में सफ़ाई है। वे मर्म के कवि हैं, किसी विचार के प्रवक्ता नहीं। उनकी कविता का वितान बड़ा है पर उनमें सहज विनय है, कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं। वे सहज भाव से कह पाते हैं : ‘उडऩा तो/चिडिय़ा से सीख लिया/अब तो आकाश कहाँ पूछता हूँ।’ उनके अलावा हिन्दी में और कवि हैं जो कह सके ‘है इन्हीं पत्तों में कहीं/ढूँढ़ना मत/पंख हूँ, आकाश है।’ रज़ा पुस्तक माला में अपनी आयु के आठवें दशक में लिखी गईं एक कवि की इन कविताओं को हम सादर-सहर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। —अशोक वाजपेयी
Bhavan : Sahitya Aur Anya Kalaon Ka Anushilan
- Author Name:
Mukund Laath +1
- Book Type:

- Description:
मुकुन्द लाठ भारत के उन बहुत थोड़े लेखकों में से एक हैं जिनके यहाँ साहित्य और कलाओं को लेकर ऐसी गहरी और सूक्ष्म दृष्टि है जो प्राचीन साहित्य और शास्त्र, दर्शन और चिन्तन, संगीत और नाट्य, कविता, परम्परा और आधुनिकता आदि सबको एक संग्रथित समावेश में शामिल कर रूपायित होती रही है। वह परम्परा से जैसे कि आधुनिकता से भी अनाक्रान्त रहकर एक प्रश्नवाचक दूरी रखती है। साहित्य और कलाओं के स्वरूप पर ऐसा मौलिक चिन्तन, कुछ कृतियों की सूक्ष्म समीक्षा, हिन्दी में बहुत कम देखने को मिलता है। हिन्दी में पहले ऐसे लोग थे, जैसे कि वासुदेवशरण अग्रवाल, मोतीचन्द्र, हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि, जो ऐसी समावेशी और आधुनिकता के लिए भेदक दृष्टि रखते थे। मुकुन्द लाठ उस परम्परा में ही दशकों से सक्रिय रहे हैं और उनकी यह संचयिता हम बहुत उत्साह और उम्मीद के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं कि अपने समय, समाज, साहित्य और कलाओं को समझने की यह दृष्टि हिन्दी के विचार-जगत में हस्तक्षेप की तरह पहचानी-गुनी जाएगी। यह निश्चय ही हिन्दी की विचार-सम्पदा का अपेक्षाकृत अब तक का जाना विस्तार है। —अशोक वाजपेयी
Kant Ke Darshan Ka Tatparya
- Author Name:
Acharya Krishnachandra Bhattacharya +1
- Book Type:

- Description:
आचार्य ने पदावली को विशेष पारिभाषिक रूप दिया है। अपनी परिभाषाओं को कृष्णचन्द्र जी खोलते भी चलते हैं। आचार्य का प्रतिपादन भी बड़ा कसा-गठा है, उसके विचार-सूत्र अपनी बुनावट में निबिड़ परस्परभाव के साथ आपस में गझिन गुँथे हुए हैं। आपको याद न दिलाना होगा कि आचार्य कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य ने स्वातंत्र्य आन्दोलन के समय विचार के स्वातंत्र्य—स्वराज—का उद्घोष किया था। अंग्रेज़ी में किया था, जो विचार की भाषा बन चली थी। और है। पर उनके कथन में सहज ही ऊह्य और व्यंजित था कि ऐसे स्वराज का मार्ग अपनी भाषा के ही द्वार की माँग करता है। प्रस्तुत निबन्ध में उन्होंने काण्ट के दर्शन का नितान्त स्वतंत्र स्थापन-प्रतिपादन किया है जो अपनी तरह से विलक्षण है। इसके लिए उन्होंने भाषा भी अपनी ही ली है। जहाँ तक मैं जानता हूँ, बांग्ला में यह उनकी अकेली रचना है। पर इस एक रचना से ही स्पष्ट है कि वे अपने शेष चिन्तन को भी बांग्ला में विदग्ध अभिव्यक्ति दे सकते थे। उनके इस एक प्रौढ़ लेखन में भाषा की सम्भावनाओं का स्पष्ट, समृद्ध इंगित है। आचार्य संस्कृत के निष्णात पण्डित थे। उनकी पदावली यहाँ स्वभावत: पुराने परिनिष्ठित शब्दों की ओर मुड़ती है पर इस मार्ग पर वे स्वभावत: ही नहीं, 'स्वरसेन’ चलते दिखते हैं। पुरानी पदावली रूढ़ ही नहीं है—जो कि कोई भी पदावली होती है—उसमें महत् लोच है। आचार्य इस पदावली को एक नई दिशा, नई व्याप्ति, नया आयाम देते हैं।
Kavya Chayanika
- Author Name:
Pramod Kovaprath
- Book Type:

- Description:
बिगड़ते पर्यावरण की समस्या आज मनुष्य के लिए भूख के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। भूख जिस तरह एक देह के अस्तित्व के लिए आसन्न ख़तरा होती है, उसी तरह पर्यावरण-विनाश सृष्टि के अस्तित्व के लिए होता है। एक-एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हम लोगों की आँखों से वह ख़तरा भले ही इतने स्पष्ट और ठोस रूप में न दिखाई देता हो, और भले ही हम बीच-बीच में प्रकृति द्वारा दी जानेवाली चेतावनियों को नज़रअन्दाज़ करने की ढीठता भी जुटा लेते हों, लेकिन जल, ज़मीन, हवा और हरियाली का सतत क्षरित होता जीवन उन निगाहों से अनचीन्हा नहीं रह जाता जो प्रस्तुत उल्लास की झीनी चदरिया के पार दूर क्षितिज के धुँधलके में लिखी जा रही नाश-विनाश की पटकथाओं की पंक्तियाँ पढ़ लेती हैं, यानी कवियों और रचनाशील हृदयों की निगाहें। यह पुस्तक प्रकृति और कवि के इसी अपने, और समाज की रिश्तेदारियों के धोखादेह प्रपंच से परे, उनके निहायत पवित्र और निजी रिश्ते का दस्तावेज़ है। पाठकगण इस किताब को सरकारों और संस्थाओं के रस्मी पर्यावरण-प्रेम और शुष्क रुदन के काव्यानुवाद के रूप में न लें। यह समष्टि-मन के रचनाकुल और ईमानदार स्नायुओं की पीड़ाजनित प्रतिक्रियाओं का संकलन है जिसमें हिन्दी के नए-पुराने, वरिष्ठ, श्रेष्ठ और सजग रचनाकारों ने प्रकृति के साथ अपनी सम्बन्ध-यात्रा के सबसे चिन्तित क्षणों को वाणी दी है। संग्रह में एक सौ एक समकालीन कविताएँ और पैंतालीस कवि शामिल हैं। कौन छोटा है, कौन बड़ा है, यह सवाल अप्रासंगिक है। क्योंकि कविता का विषय महत्त्वपूर्ण है, समस्याओं की भयंकरता प्रासंगिक है। एक ही त्रासदपूर्ण मुद्दा सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। सब में आशंकाएँ हैं तो साथ ही आशाएँ भी हैं। प्रकृति की आसन्न मृत्यु पर चीख़ने के बजाय प्रतिरोध खड़ा करना ये रचनाकार अपना दायित्व समझते हैं।
Ullanghan
- Author Name:
Rajesh Joshi
- Book Type:

- Description:
उल्लंघन संग्रह में कवि हुक्म-उदूली की अपनी प्राकृतिक इच्छा से आरम्भ करते हुए मौजूदा दौर की उन विवशताओं से अपनी असहमति और विरोध जताता है, जिन्हें सत्ता हमारी दिनचर्या का स्वाभाविक हिस्सा बनाने पर आमादा है। एक ऐसे समय में ‘जिसमें न स्मृतियाँ बची हैं/न स्वप्न और जहाँ लोकतंत्र एक प्रहसन में बदल रहा है/एक विदूषक किसी तानाशाह की मिमिक्री कर रहा है’—ये कविताएँ हमें निर्प्रश्न अनुकरणीयता के मायाजाल से निकलने का रास्ता भी देती हैं, और तर्क भी। कवि देख पा रहा है कि ‘सिकुड़ते हुए इस जनतंत्र में सिर्फ़ सन्देह बचा है’, ताक़त के शिखरों पर बैठे लोग नागरिकों को शक की निगाह से देखते हैं, तरह-तरह के हुक्मों से अपने को मापते हैं; कहते हैं कि साबित करो, तुम जहाँ हो वहाँ होने के लिए कितने वैध हो, और तब कविता जवाब देती है–‘ओ हुक्मरानो/मैं स्वर्ग को भूलकर ही आया हूँ इस धरती पर/तुम अगर मुझे नागरिक मानने से इनकार करते हो/तो मैं भी इनकार करता हूँ /इनकार करता हूँ तुम्हें सरकार मानने से!’ लगातार गहरे होते राजनीतिक-सामाजिक घटाटोप के विरुद्ध पिछले चार-पाँच सालों में जो स्वर मुखर रहते आए हैं, राजेश जोशी उनमें सबसे आगे की पाँत में रहे हैं। इस संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ इसी दौर में लिखी गई हैं। कुछ कविताएँ महामारी के जारी दौर को भी सम्बोधित हैं जिसने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने के सरकारी उद्यम पर जैसे एक औपचारिक मुहर ही लगा दी–‘सारी सड़कों पर पसरा है सन्नाटा/बन्द हैं सारे घरों के दरवाज़े/एक भयानक पागलपन पल रहा है दरवाज़ों के पीछे/दीवार फोड़कर निकल आएगा जो/किसी भी समय बाहर/और फैल जाएगा सारी सड़कों पर!’
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
- Book Type:

- Description:
अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है। अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है। —सुमित्रानन्दन पंत
Chand Ki Vartani
- Author Name:
Rajesh Joshi
- Book Type:

- Description:
राजेश जोशी का यह कविता-संग्रह हिन्दी कविता का एक नया शिखर है। तीन दशकों से भी अधिक की काव्य-साधना एवं जीवन के लगभग साठ वसन्तों की हरीतिमा से दीप्त यह संग्रह अनेक स्वरों का विलक्षण पुंज है। राजेश ने न केवल अपने को बदला है, बल्कि अपने को बदलते हुए समस्त समकालीन काव्य में सर्वथा नए घूर्ण उत्पन्न कर दिए हैं। वे सारे गुण और स्वाद जिनके लिए राजेश जोशी जाने और माने जाते हैं, यहाँ अपनी पूर्णता एवं सौष्ठव के साथ उपस्थित हैं, साथ ही बहुत कुछ ऐसा भी है जो नितान्त अप्रत्याशित पर आह्लादकारी है और वह है जीवन को उसकी जटिलता में जाकर देखने का उपक्रम, सभी तहों-परतों को उलट-पुलट अनुभव के नामिक तक उत्खनन का धैर्य—‘दिखने में जो अक्सर आसान से दिखते हैं एक कवि को करने होते हैं ऐसे कई पेचीदा काम’। और इसके लिए राजेश तदनुरूप भाषा की खोज भी करते हैं, बनी-बनाई भाषिक आदतों को छोड़ते हुए वह अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाते हैं—‘ताप से भरे शब्दों’ को ढूँढ़ते दूर बीहड़ में जाते हैं और ‘आँसुओं के लिए’ भी ढूँढ़ लाते हैं वैसे ही ‘पारदर्शी शब्द’। राजेश की कविता हमारे समय का ऐसा संघनित दस्तावेज़ है कि केवल उसके आधार पर हम समकालीन भारत का एक दृश्य-लेख बना सकते हैं। इतने तात्कालिक ब्योरे हैं यहाँ, इतने प्रसंग, पात्र और राजनीतिक-सामाजिक उद्वेलन। साथ ही उनकी कविता जीवन के उन तन्तुओं की खोज करती है जहाँ उन उद्वेलनों का कम्प सबसे तीव्र है, और उन लोगों का यशोगान करती है जो निरन्तर संघर्ष करते हुए जीवन को बदलने का ताब रखते हैं। उनकी कविता साहस के साथ सत्ता के सभी पायदानों पर वार करती है, एक विराट सत्ता जो अर्थव्यवस्था से लेकर हमारी रसोई तक व्याप्त है। नागार्जुन और धूमिल के बाद सत्ता के तिलिस्म को उघाड़नेवाले सर्वाधिक सशक्त कवि राजेशी जोशी हैं। आख्यान, कथोपकथन, लोक-कथाओं के स्वप्न-वृत्तान्त, जातीय मिथक, अतियथार्थ के खम, सपाटबयानी, शब्दों के खेल और कल्पना-क्रीड़ा, फंतासी सब कुछ मिलकर एक नया रसायन बनाते हैं जो अन्यत्र दुलर्भ है। राजेश की कविता अब भाषा के नए उपकरणों एवं आयुधों का व्यवहार करती है तथा कविता को वहाँ ले जाती है जहाँ भाषा ‘अर्थ से अधिक अभिप्रायों में निवास करती है’। यह ठोस जगत् की, ठोस जीवन की कविता है उर्फ़ चाँद की वर्तनी नीले नभ पर। — अरुण कमल
Hum Jo Nadiyon Ka Sangam Hein
- Author Name:
Bodhisatwa
- Book Type:

- Description:
यह संग्रह अपनी कविताओं के तीव्र आवेग, भाव–विविधता एवं वस्तु–बहुलता के कारण महत्त्वपूर्ण माना जाएगा। बोधिसत्व की कविताएँ मानो अनेक नदियों का संगम हैं। लोकगीतों की ऊष्मा तथा रागात्मकता, वर्तमान जीवन के ‘दुख–तंत्र’ की कठोर प्रतीति और वैचारिक दृढ़ता एवं प्रतिरोध—इन सबके संयोग से ये कविताएँ हमारे लिए एक वैकल्पिक पाठ की सृष्टि करती हैं। ‘हाहाकार के बीच से गुज़रती’ इन कविताओं में दर्ज हैं ‘बेनूर आँखों के ख़्वाब’, ‘सिले होंठों की मुस्कुराहट’ और ‘बँधे हाथों की छटपटाहट’। लोकगीत और बोलियों की शक्ति का उपयोग, जिसके लिए बोधिसत्व की आरम्भिक कविताएँ चिह्नित की गई थीं, उनका अद्यतन रूप यहाँ मिलता है, कुछ ज्वाया और सख़्त। इनमें बेचैन कर देनेवाली ऐन्द्रिकता है—‘ताज़े आटे की गर्मी थी उसकी ख़ुशी/वसन्त उसके लिए अब उखड़े नाखून की तरह है’। एक विरल करुणा और क्रोध। इनमें जीवन के प्रति समर्थन और लालसा है जैसे कि ‘ऐसा ही होता है’ कविता में, जो साधारण मनुष्य के दैनंदिन प्रेम को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। ‘गंध’ शीर्षक कविता स्वयं बोधिसत्व की कविताओं में अलग से उल्लेखनीय है। यह एक बड़ी कविता है, हमारे जीवन की दारुण विपत्ति, विडम्बना एवं निजी और सामाजिक के सीमा–प्रदेश पर निरन्तर विद्यमान द्वन्द्व की कविता। एक बात और—ये कविताएँ गहरे राजनैतिक आशय एवं नैतिक संकल्प की कविताएँ हैं। बोधिसत्व का ही शब्द लेकर कहें तो यह वह कविता है ‘जो समाज के हारे–गाढ़े काम दे’। —अरुण कमल
Tokri Mein Digant
- Author Name:
Anamika
- Book Type:

- Description:
अनामिका के नए संग्रह ‘टोकरी में दिगन्त—थेरी गाथा : 2014’ को पूरा पढ़ जाने के बाद मेरे मन पर जो पहला प्रभाव पड़ा, वो यह कि यह पूरी काव्य-कृति एक लम्बी कविता है, जिसमें अनेक छोटे-छोटे दृश्य, प्रसंग और थेरियों के रूपक में लिपटी हुई हमारे समय की सामान्य स्त्रियाँ आती हैं। संग्रह के नाम में 2014 का जो तिथि-संकेत दिया गया है, मुझे लगता है कि पूरे संग्रह का बलाघात थेरी गाथा के बजाय इस समय-सन्दर्भ पर ही है। संग्रह के शुरू में एक छोटी-सी भूमिका है, जिसे कविताओं के साथ जोड़कर देखना चाहिए। बुद्ध अनेक कविताओं के केन्द्र में हैं, जो बार-बार प्रश्नांकित भी होते हैं और बेशक एक रोशनी के रूप में स्वीकार्य भी। इस नए संकलन में अनेक उद्धरणीय काव्यांश या पंक्तियाँ मिल सकती हैं, जो पाठक के मन में टिकी रह जाती हैं। बिना किसी तार्किक संयोजन के यह पूरा संग्रह एक ऐसे काव्य-फलक की तरह है, जिसके अन्त को खुला छोड़ दिया गया है। स्वयं इसकी रचयिता के अनुसार “वर्तमान और अतीत, इतिहास और किंवदन्तियाँ, कल्पना और यथार्थ यहाँ साथ-साथ घुमरी परैया-सा नाचते दीख सकते हैं।” आज के स्त्री-लेखन की सुपरिचित धारा से अलग यह एक नई कल्पनात्मक सृष्टि है, जो अपनी पंक्तियों को पाठक पर बलात् थोपने के बजाय उससे बोलती-बतियाती है, और ऐसा करते हुए वह चुपके से अपना आशय भी उसकी स्मृति में दर्ज करा देती है। शायद यह एक नई काव्य-विधा है, जिसकी ओर काव्य-प्रेमियों का ध्यान जाएगा। समकालीन कविता के एक पाठक के रूप में मुझे लगा कि यह काव्य-कृति एक नई काव्य-भाषा की प्रस्तावना है, जो व्यंजना के कई बन्द पड़े दरवाज़ों को खोलती है और यह सब कुछ घटित होता है एक स्थानीय केन्द्र के चारों ओर। कविता की जानी-पहचानी दुनिया में यह सबाल्टर्न भावबोध का हस्तक्षेप है, जो अलक्षित नहीं जाएगा। —केदारनाथ सिंह
Saptaparna
- Author Name:
Mahadevi Verma
- Book Type:

- Description:
मनुष्य की स्थूल पार्थिव सत्ता उसकी रंग-रूपमयी आकृति में व्यक्त होती है। उसके बौद्धिक संगठन से जीवन और जगत सम्बन्धी अनेक जिज्ञासाओं, उनके तत्त्व के शोध और समाधान के प्रयास, चिन्तन की दिशा आदि संचालित और संयमित होते हैं! उसकी रागात्मक वृत्तियों का संघात उसके सौन्दर्य-संवेदन, जीवन और जगत के प्रति आकर्षण-विकर्षण, उन्हें अनुकूल और मधुर बनाने की इच्छा, उसे अन्य मानवों की इच्छा से सम्पृक्त कर अधिक विस्तार देने की कामना और उसकी कर्म-परिणति आदि का सर्जक है।
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
- Book Type:

- Description:
Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
- Book Type:

- Description:
‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है। गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह। यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं। —नन्दकिशोर आचार्य
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
- Book Type:

- Description:
विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है। काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है। उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
- Book Type:

- Description:
Book
Aatishdan
- Author Name:
Azm Shakri
- Book Type:

- Description:
अज़्म शाकिरी की ये किताब अपनी जज़्बाती गहराई और असरदार अंदाज़ के कारण दिलों को छूती है। उनके अशआर ज़िंदगी, मोहब्बत और वुजूद के गहरे मायनों को बड़ी खूबसूरती से बयान करते हैं। उनकी ये किताब इस बात की मिसाल है कि वो पारम्परिक ग़ज़ल के ढाँचे को मौजूदा दौर के एहसासात से जोड़ने में माहिर हैं। अज़्म शाकिरी (मोहम्मद मियाँ ) 23 फ़रवरी 1972 को गंजडुंडवारा, ज़िला कासगंज, उत्तर प्रदेश में पैदा हुए और वहीं शिक्षा प्राप्त की। बाद में मौलाना आज़ाद विश्वविद्यालय से उर्दू में एम. ए. किया। 1987 में शायरी शुरू की। 2003 में पहली किताब “बर्फ़” के नाम से आई। दूसरी किताब 2008 में “सुर्ख़ाब” के नाम से आई। तीसरी किताब 2014 में “मेहराब-ए-इश्क़” और चौथी किताब 2019 में “क्या पत्थर के हो गए हम” के नाम से आई। अज़्म शाकिरी मुशायरों और कवि सम्मेलनों में काफ़ी प्रसिद्ध हुए। ग़ज़ल उनकी ख़ास पहचान बनी। भारत से बाहर भी कई दूसरे देशों में गए और यह सिलसिला आज भी जारी है।
Ek Charwahe Ka Geet
- Author Name:
Ketan Yadav
- Book Type:

- Description:
वे न मनु थे न आदम/ग्रन्थों की गढ़ी हुई छवियों के बाहर/वे केवल और केवल चरवाहे थे। यह एक चरवाहे का गीत है जो सभ्यता के समानान्तर बजते हुए एक अपनी दुनिया का दावा पेश कर रहा है—उस सभ्यता के बरक्स जिसमें चारागाह दफ़्न होते जा रहे हैं। यह सभ्यता की आलोचना नहीं बल्कि प्रकृति के साहचर्य में जीती उस दुनिया का स्मरण है जो अगर अपने ही रास्ते आगे बढ़ती तो वैसी न होती जैसी आज हमारी यह दुनिया है। इन कविताओं को पढ़ते हुए अग्रगामिता की किसी वैकल्पिक सरणि का अभाव हमें लगातार विचलित करता है। हिंसा के नवीनतम दृश्यों की आदी होती आँखें जो कुछ भी देखने की तैयारी कर चुकी हैं, हमारे वर्तमान की आँखें हैं, जिनके लिए अद्यतित होने का अर्थ है और अधिक संवेदनशून्य होना, और भी भीषण को पचा लेने को प्रस्तुत रहना। ये कविताएँ इस प्रक्रिया को अलग-अलग कोणों से देखती हैं, और कहीं अपनी सावधानी को ढीला नहीं होने देतीं। तकनीक के आधुनिक युवा संसार की सत्ता को लेकर भी ये कविताएँ कम सजग नहीं हैं— मेरे मनुष्य के सामने तुमसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, पुरखा कवियो!/यहाँ मनुष्य बनाम मनुष्य नहीं, मशीन है। ऐन्द्रीय स्पर्श के दिन-ब-दिन संकीर्ण और सपाट होते जाने के मुकाबले प्रेम यहाँ एक उम्मीद की तरह आता है, लेकिन क्या वह भी हमारी पहुँच में है, मशीनों की इस्पाती निस्पन्द धवल चौंध को चीरकर क्या उस तक हमारा वह आर्त स्वर पहुँच पाता है जिसके सामने ‘कभी सूर्योदय न होनेवाली रात’ किसी भी दिन आ खड़ी होगी! आशंका जो मौजूदा समय की निर्मिति के अभिन्न हिस्से के रूप में हमारे चारों ओर उपस्थित है, इन कविताओं में बार-बार लौटती है। यह इस युवा कवि की सूक्ष्म संवेदना का प्रमाण है और सामाजिक-राजनीतिक बोध का भी जिसका एक सिरा जरूरी तौर पर तकनीक के आतंक से जा जुड़ता है जो अब मनुष्य को सामने से नहीं, ऊपर से देख रही है—देवता की तरह। पेड़ों, पशुओं और पत्तियों की भाषा से लेकर मशीनों की चीख तक को सुनतीं ये कविताएँ पाठक को निःसन्देह एक भिन्न धरातल पर ले जाएँगी।
Fiza Ke Samandar Mein
- Author Name:
Ramswaroop Kisan
- Book Type:

- Description:
ग्रामीण जीवन के अनूठे चित्र और मनुष्य के संसार के ऐसे बिम्ब जिन पर सामान्यतः हमारी निगाह कम ही ठहरती है, रामस्वरूप किसान की कविताओं में बहुतायत से मिलते हैं। मिसाल के तौर पर इस संग्रह की पहली ही कविता-शृंखला ‘पीठ’ को लिया जा सकता है जिसमें कुल सोलह कविताएँ शामिल हैं। ‘पीठ एक कारुणिक क्षेत्र’ है जिसे देखकर कवि-मन बार-बार कभी अपने भीतर और कभी बाहर की ओर एक प्रश्नाकुल चिन्तन-यात्रा पर निकल जाता है। ‘फ़िज़ा के समन्दर में’ शीर्षक कविता-शृंखला की ग्यारह कविताएँ पुनः कवि की विशिष्ट दृष्टि का पता देती हैं जिसमें प्रेम के लिए घर से भागती हुई लड़की हमें और हमारे समाज को पुनः पुनः सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है— यह रहा/तुम्हारा दूल्हा/साथ-साथ रहोगे तो/प्यार हो जाएगा/पापा ने कहा।...नहीं, ऐसा कहो पापा/यह रहा तुम्हारा प्यार/साथ-साथ रहोगे/तो दूल्हा हो जाएगा। संग्रह में शामिल अधिकांश कविताएँ इसी तरह पाठक को सहसा चौंका देती हैं और हमारी देखी जानी चीज़ों को नये ढंग से हमारे सामने ला देती हैं। आम जन-जीवन के दैनन्दिन दुखों, व्यवस्था-जनित असहायताओं और मनुष्य की आन्तरिक और बाह्य पीड़ाओं के साथ इन कविताओं की राजनैतिक चेतना भी मुखर रूप में सामने आती है— पब्लिक लड़ती है चुनाव—पैसों से/बातों से/लातों से/भालों-बन्दूक़ों-तलवारों से/ख़ून के फ़व्वारों से/और लड़ा-लड़ाया चुनाव/उनके गले में डाल देती है.../वे चुनाव नहीं लड़ते/वे तो पहनते हैं चुनाव।
Nihshabd Noopur : Rumi Ki 100 Gazalein
- Author Name:
Rumi +1
- Book Type:

- Description:
रूमी ईरान के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी ग़ज़लें ऊर्जस्वी काव्य के दुर्लभ उदाहरणों में से हैं। रूमी की ग़ज़लें सामान्य कविताओं की तुलना में अलग हैं। इनकी प्रत्येक ग़ज़ल का हर शे’र आत्म-अनुभूति की परिपूर्णता से उच्छलित है। इनकी कविता केवल काव्यात्मक चमत्कारों को प्रदर्शित कर पाठकों को लुब्ध करने में पर्यवसित नहीं होती, बल्कि दिल से निकलकर मस्तिष्क और हृदय को भिगोती हुई आत्मा तक का स्पर्श कर लेती है। प्रस्तुत पुस्तक उनकी चुनिन्दा 100 ग़ज़लों का अनुवाद है। इस पुस्तक के माध्यम से रूमी पहली बार सीधे फ़ारसी से हिन्दी में अनूदित हुए हैं। इसमें सबसे पहले फ़ारसी ग़ज़लों का देवनागरी में लिप्यन्तरण प्रस्तुत किया गया है, फिर साथ में ही उनका हिन्दी अनुवाद दिया गया है। अन्त में मूल ग़ज़लें फ़ारसी लिपि में भी रखी गई हैं। पुस्तक के अन्त में दिए गए अनेक परिशिष्टों के माध्यम से फ़ारसी काव्य-भाषा को समझने के महत्त्वपूर्ण उपकरण जुटाए गए हैं। ग़ज़लों में प्रयुक्त सभी छन्दों को ईरानी तथा भारतीय काव्यशास्त्रीय रीति से समझाया गया है। क्लासिकल फ़ारसी कविता के सम्यक् परिचय के लिए आवश्यक संक्षिप्त फ़ारसी व्याकरण जोड़ा गया है। अन्त में प्रत्येक शब्द का अर्थ भी दिया गया है। इस प्रकार मूल से जुड़े रसपूर्ण अनुवाद की प्रस्तुति के साथ ही यह पुस्तक रूमी-रीडर के तौर पर भी उपयोग में आने योग्य है।
Kavi Man Jani Man :Aadivasi Stri Kavitayen
- Author Name:
Vandana Tete
- Book Type:

- Description:
आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।
Customer reviews
Be the first to write a review
Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.