Apra
(0)
Author:
Suryakant Tripathi 'Nirala'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
595
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Available
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‘अपरा’ पहली बार सन् 1946 में प्रकाशित हुई थी, इसमें महाकवि निराला की उस समय तक प्रकाशित उनके सभी संग्रहों में से चुनी हुई कविताएँ संकलित हैं। चयन स्वयं निराला ने किया था, इसलिए इसकी महत्ता स्वतःसिद्ध है। यहाँ संकलित कविताओं से निराला के कवि-रूप का समग्र परिचय प्राप्त किया जा सकता है। इस अर्थ में यह संकलन ‘गागर में सागर’ ही है।
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‘अपरा’ पहली बार सन् 1946 में प्रकाशित हुई थी, इसमें महाकवि निराला की उस समय तक प्रकाशित उनके सभी संग्रहों में से चुनी हुई कविताएँ संकलित हैं। चयन स्वयं निराला ने किया था, इसलिए इसकी महत्ता स्वतःसिद्ध है। यहाँ संकलित कविताओं से निराला के कवि-रूप का समग्र परिचय प्राप्त किया जा सकता है। इस अर्थ में यह संकलन ‘गागर में सागर’ ही है।
Book Details
-
ISBN9788126705528
-
Pages183
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अदनान ‘शाम के पृष्ठ पर एक असम्भव की तरफ़’ खुलते कवि हैं। कविता में ऐसी डूब विरल है। समकालीन संकटों के साये में यह कवि सिर्फ़ अपने देस, मुलुक और अपनी ज़बान का नहीं—अचम्भित और दबी-सहमी मनुष्यता का गहन पर्यवेक्षक और उसकी मरम्मत में मुस्तैद कारीगर भी है। अपने सन्ताप और अपनी घुटन को अदनान ने इतना कसा, इतना भुगता, इतना तपाया है कि उसकी निष्पत्ति में ही ऐसी कविता पैदा हो सकती है जिसमें ‘झाड़ियों सी जलती है रात।’ उस्ताद अमीर ख़ान कहते थे कि नग़्मा वही नग़्मा है जिसे रूह सुने और रूह सुनाए। अपने मर्म में संगीत का रुख़ करने वाली अदनान की कविता भी सच्चाई की इस असाधारण कसौटी पर खरा उतरती महसूस होती है। ‘लानत का प्याला’ संग्रह की कविताओं का शीर्षक—क्रम देखो तो वो भी मानो दूर तक खिंची चली आती एक लम्बी कविता है या अलग-अलग कविताओं की लड़ी। प्रेम और उदासियों से रची-बिंधी और नये-नये चक्कर बनाती कविताओं में नागरिक जीवन के तहस-नहस होने का दर्दनाक, ऐतिहासिक सिलसिला इस कदर बेकली और रुंधी हुई ख़ामोशी में दर्ज हुआ है कि पढ़ते हुए एक गहरी टूट, एक तीखी शर्मिंदगी दिल में पैबस्त हुई जाती हैं। उनकी चोटें हमारी याददिहानी हैं। आने वाली पीढ़ियाँ पढ़कर जानेंगी कि उनका कवि सिर्फ़ कविता नहीं कर रहा था। वह प्रकांडता और पांडित्य की धज से फूटने वाला कवि नहीं, सुदूर स्मृति के देहातों से टूटा-निकला एक कवि है जो यातना और दुष्चक्र का एक असाधारण बिंब बना रहा है, जिसे मालूम है प्रचंड आँधियाँ चल रही हैं और नयी गर्जनाएँ उसकी ओर लपकती आ रही हैं, वह कुछ-कुछ ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉल्टियूड’ उपन्यास के आत्मनिर्वासित और अकेले, बूढ़े जिप्सी कीमियागर मेल्केदिएस जैसा है जिसे दुनिया के विकट यथार्थों जितना ही यक़ीन अपनी नाज़ुक, अपार कल्पनाओं पर है लेकिन वो अवश्यंभाविता के लिए नहीं मानवीय प्रयत्न और जिजीविषा के लिए खड़ा है। अदनान को यक़ीनन कविता से किसी सर्वकालिक महानता का तोहफ़ा नहीं चाहिए, जो चाहिए वो यहाँ पेश है! —शिवप्रसाद जोशी
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Awating description for this book
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