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उर्दू ग़ज़लों के चुनिन्दा शे’रों के प्रस्तुत संकलन में अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के सात जाने-माने शायरों और उनके लगभग 800 चुनिन्दा शे’र शामिल किए गए हैं। यह संकलन उस पाठक के लिए है जो उर्दू से प्यार करता है, ग़ज़ल का दीवाना है, ग़ज़ल गायकी का क़द्रदान है, मगर उर्दू की लिपि से वाक़िफ़ नहीं है। उसकी ज़रूरतों और अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे शे’र चुने गए हैं जिनमें विचार और भाव की उत्कृष्टता है मगर भाषा अपेक्षाकृत सरल है, जिनकी अदायगी मन को मोह लेती है और धार सीधे दिल में उतर जाती है।</p> <p>कुछ ग़ज़लों के एक से अधिक शे’र भी संकलन में शामिल हैं। ये बहुधा ऐसी ग़ज़लें हैं जो बहुत लोकप्रिय हैं और शायर की ख़ास पहचान भी। शे’र विषय के अनुरूप संयोजित किए गए हैं। दर्शन, अध्यात्म, रहस्यवाद, हुस्न-ओ-इश्क़, एक विशिष्ट सोच या प्रतीक अथवा किसी विशेष काव्य चरित्र जैसे नासेह, कासिद, वाइज इत्यादि से सम्बद्ध विभिन्न शायरों के शे’र आपको एक ही स्थान पर मिलेंगे।
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उर्दू ग़ज़लों के चुनिन्दा शे’रों के प्रस्तुत संकलन में अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के सात जाने-माने शायरों और उनके लगभग 800 चुनिन्दा शे’र शामिल किए गए हैं। यह संकलन उस पाठक के लिए है जो उर्दू से प्यार करता है, ग़ज़ल का दीवाना है, ग़ज़ल गायकी का क़द्रदान है, मगर उर्दू की लिपि से वाक़िफ़ नहीं है। उसकी ज़रूरतों और अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे शे’र चुने गए हैं जिनमें विचार और भाव की उत्कृष्टता है मगर भाषा अपेक्षाकृत सरल है, जिनकी अदायगी मन को मोह लेती है और धार सीधे दिल में उतर जाती है।</p>
<p>कुछ ग़ज़लों के एक से अधिक शे’र भी संकलन में शामिल हैं। ये बहुधा ऐसी ग़ज़लें हैं जो बहुत लोकप्रिय हैं और शायर की ख़ास पहचान भी। शे’र विषय के अनुरूप संयोजित किए गए हैं। दर्शन, अध्यात्म, रहस्यवाद, हुस्न-ओ-इश्क़, एक विशिष्ट सोच या प्रतीक अथवा किसी विशेष काव्य चरित्र जैसे नासेह, कासिद, वाइज इत्यादि से सम्बद्ध विभिन्न शायरों के शे’र आपको एक ही स्थान पर मिलेंगे।
Book Details
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ISBN9788183611473
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Pages119
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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एक के बाद एक मज्मूआ मिरा आता रहा
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मर तो शायद काफ़ी पहले गया था...
मैंने इस एहसास को,
आत्मा तक उतरने नहीं दिया।
आख़िर अपनों की मौत से कौन समझौता कर पाया है!’’
वह अपना माज़ी और वरसे में मिली धरती और उसकी सुन्दरता बयान करते हैं और उनमें छोटे-छोटे चित्र भी उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा रहे हैं। स्कूल के पीछे इमली का पेड़ खेतों की कोरों पर मिट्टी की मेंड़ सब गुम हो गया मेरे बच्चो, मैं तुमसे शर्मिन्दा हूँ—विरासत के नाम पर छोड़कर जाऊँगा उजड़ी-सी धरती, स्याह आसमान। विजय जितनी CASUALLY लिखते हैं, उतने ही ग़ौर से पढ़ने के क़ाबिल हैं, क्योंकि इस सादगी के पीछे एक निहायत ज़िम्मेदार की आत्मा जाग रही है।
Chaand Mein Bhi Daag Hai
- Author Name:
Dilip Kumar Chauhan 'Baaghi'
- Book Type:

- Description: The title "Chaand Mein Bhi Daag Hai" is written by Dilip Kumar Chauhan "Baaghi" which is a Hindi Poetry Book
Mook Bimbon Se Bahar
- Author Name:
Aarti
- Book Type:

-
Description:
‘यह समय मेरा समय नहीं है फिर भी मैं इस समय में हूँ’, इस द्वन्द्व के चलते अपने समय के सच को पाने के लिए आरती समय के अन्तर्द्वन्द्वों और अन्तर्विरोधों को समझने-परखने के लिए, उसकी अनेक अन्दरूनी परतों में झाँकती हैं। इस समय को कहने के लिए वो मिथकों, स्मृतियों और इतिहास के स्मृत-विस्मृत संदर्भों को खँगालती हैं। लेकिन उनकी नज़रें मिथकीय आख्यान को मिथक की तरह या इतिहास की तरह नहीं वर्तमान की तरह देखती हैं। ऐसा करते हुए वह बार-बार मिथक और इतिहास के सन्दर्भों से बाहर अपने समय की सच्चाई से रूबरू होने की जद्दोजहद से गुजरती हैं। इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए इस द्वैत और द्वन्द्व को लगातार महसूस किया जा सकता है।
क्या ये कविताएँ सिर्फ़ स्त्री की आँख से देखा हुआ समय हैं? अगर ऐसा है भी तो भी ये उन सीमा रेखाओं का अतिक्रमण करती हैं। इनमें पुरुष वर्चस्व और स्त्री के संघर्ष की दीर्घ परम्परा की ध्वनियों और उसके अनुरणन को तो सुना ही जा सकता है, लेकिन संघर्ष के वर्तमान दृश्यों को भी लक्ष्य किया जा सकता है। इन दृश्यों में—सिरफिरे और आवारा समझे जाने वाले लेखक-कलाकार बैनर, पोस्टर लिये राजमार्गों पर खड़े युद्ध के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ हमारे समय की लोकतान्त्रिक सत्ताएँ जेल की दीवारों को मज़बूत करने में लगी हैं।
‘विधवा उत्सव मनाती मेरे गाँव की औरतें’ एक लम्बी कविता है। आरती की कविता मिथकों और इतिहास के सन्दर्भों में ही नहीं जाती वह उन कर्मकाण्डों को भी लक्ष्य करती है जो आज भी ज़ारी हैं। आत्यन्तिक परिणितियाँ अब कर्मकाण्डों से अलग कर दी गई हैं। ‘औरतों को ज़िन्दा मार सकने के नए तरीक़े समाज ने अपने विकास के साथ ईजाद कर लिए हैं’ लेकिन कर्मकाण्डों का स्वरूप बहुत नहीं बदला है। धर्मग्रन्थों के पास अपने तर्क हैं जिनके आगे ज्ञान-विज्ञान के सारे तर्क और धाराएँ झूठी पड़ जाती हैं। इस समय समाज के एक हाथ में मनुस्मृति है और दूसरे में संविधान—संविधान सबके लिए है लेकिन स्त्रियों के लिए मनुस्मृति सुरक्षित है।
आरती की इन कविताओं में विशेषरूप से ‘विधवा उत्सव मनाती मेरे गाँव की औरतें’ लम्बी कविता के शिल्प और भाषा में पूरा नाटकीय विधान मौजूद है। बल्कि इस लम्बी कविता में तो आरती ने नाटक की अनेक प्रविधियों का भी जगह-जगह इस्तेमाल किया है।
—राजेश जोशी
Kalam Aaj Unki Jai Bol
- Author Name:
Vinamra Sen Singh
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Description:
भारत का युवा जो साहित्य का विद्यार्थी है उसे भी या जो नहीं है वह भी ऐसे महान रचनाकारों के जीवन और सृजन से परिचित कराना पुस्तक का उद्देश्य है जिन्होंने भारत की स्वाधीनता में अपना तन-मन-धन सब कुछ समर्पित तो किया ही परन्तु अपनी लेखनी से ऐसा व्यापक जन जागरण किया कि सारा देश उस स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ा और अन्ततः अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही पड़ा। इस दृष्टि से इस पुस्तक में आधुनिक हिन्दी साहित्य के ऐसे 14 रचनाकारों के जीवन और सृजन पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया गया है जिन्होंने अपनी लेखनी के द्वारा स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया, जिनकी रचनाएँ भारतीय समाज को उसके स्वाभिमान, गौरव और स्वतन्त्रता के महत्त्व का बोध कराती हैं। ऐसे रचनाकारों के बारे में देश के प्रत्येक व्यक्ति को जानना आवश्यक है जिनके प्रति हम सभी भारतवासियों का कृतज्ञता भाव रखना कर्तव्य है। ऐसा नहीं कि यह विशेषता केवल इन 14 कवियों में ही थी। परन्तु पुस्तक की एक सीमा है। इसीलिए मेरी दृष्टि से जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण थे उन्हें इस पुस्तक में सम्मिलित किया गया।
पुस्तक में इन कवियों के जीवन और सृजन के साथ ही उनकी तीन-तीन ऐसी प्रमुख रचनाएँ भी संकलित की गई हैं जो राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
Chalo Shanti Ki Or
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Udasi Baal Khole So Rahi Hai
- Author Name:
Nasir Kazmi
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- Description: 'उदासी बाल खोले सो रही है' उर्दू के मश्हूर-ओ-मारूफ़ शाइर जनाब नासिर काज़मी के चुनिन्दा कलाम का संग्रह है जिसे उर्दू शाइरी के चाहनेवालों के लिए देवनागरी लिपि में पेश किया जा रहा है।
Kahin Nahin Vahin
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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अनुपस्थिति, अवसान और लोप से पहले भी अशोक वाजपेयी की कविता का सरोकार रहा है, पर इस संग्रह में उनकी अनुभूति अप्रत्याशित रूप से मार्मिक और तीव्र है। उन्हें चरितार्थ करनेवाली काव्यभाषा अपनी शान्त अवसन्नता से विचलित करती है। निपट अन्त और निरन्तरता का द्वन्द्व, होने–न–होने की गोधूलि, आसक्ति और निर्मोह का युग्म उनकी इधर लगातार बढ़ती समावेशिता को और भी विशद और अर्थगर्भी बनाता है।
अशोक वाजपेयी उन कवियों में हैं जो कि निरे सामाजिक या निरे निजी सरोकारों से सीमित रहने के बजाय मनुष्य की स्थिति के बारे में, अवसान, रति, प्रेम, भाषा आदि के बारे में चरम प्रश्नों को कविता में पूछना और उनसे सजग ऐन्द्रियता के साथ जूझना, मनुष्य की समानता से बेपरवाह हुए जाते युग में, अपना ज़रूरी काम मानते हैं। बिना दार्शनिकता का बोझ उठाए या आध्यात्मिकता का मुलम्मा चढ़ाए उनकी कविता विचारोत्तेजना देती है।
अशोक वाजपेयी की गद्य कविताएँ, उनकी अपनी काव्य-परम्परा के अनुरूप ही, रोज़मर्रा और साधारण लगती स्थितियों का बखान करते हुए, अनायास ही अप्रत्याशित और बेचैन करनेवाली विचारोत्तेजक परिणतियों तक पहुँचती हैं।
यह संग्रह बेचैनी और विकलता का एक दस्तावेज़ है—उसमें अनाहत जिजीविषा और जीवनरति ने चिन्ता और जिज्ञासा के साथ नया नाजुक सन्तुलन बनाया है। कविता के पीछे भरा–पूरा जीवन, अपनी पूरी ऐन्द्रियता और प्रश्नाकुलता में, स्पन्दित है। एक बार फिर यह बात रेखांकित होती है कि हमारे कठिन और कविताविमुख समय में कविता संवेदनात्मक चैकन्नेपन, गहरी चिन्तनमयता, उत्कट जीवनासक्ति और शब्द की शक्ति एवं अद्वितीयता में आस्था से ही सम्भव है। यह साथ देनेवाली पासपड़ोस की कविता है, जिसमें एक पल के लिए हमारा अपना संघर्ष, असंख्य जीवनच्छवियाँ और भाषा में हमारी असमाप्य सम्भावनाएँ विन्यस्त और पारदर्शी होती चलती हैं ।
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