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Pad Kupad

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‘पद-कुपद’ हिन्दी कविता की जनोन्मुख परम्परा में एक प्रतिमान है। अष्टभुजा शुक्ल ऐसे कवि हैं जिन्हें मनुष्यता के मौलिक मर्म का गहन ज्ञान है। उनकी कविताओं में वह गाँव और क़स्बा है जिसका संघर्ष निरन्तर बढ़ता जा रहा है। राजनीति और अर्थशास्त्र की भूमंडलीय परिभाषाओं के सम्मुख जो जीवन प्रायः भूलुंठित दिख रहा है, उसका प्रतिरोध अष्टभुजा शुक्ल की रचनाओं में गतिशील है। पद-शैली में अष्टभुजा की ये अधिकांश रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पहले ही पाठकों-आलोचकों की प्रशंसा प्राप्त कर चुकी हैं। यह छन्द की वापसी जैसा कोई उपक्रम नहीं है, बल्कि शताब्दियों से आ रही कबीरी पुकार का पुनर्नवन है। स्वीकृत पद-शैली के आयतन में कवि ने समकालीन समाज के अन्तर्विरोधों व अन्तःसंघर्षों को व्यक्त किया है। ‘लोहे के कुछ चने सुबह थे, सायं जिन्हें भिगोया/पानेवाले राज पा गए, अष्टभुजा सब खोया।’ —आम जन के दु:ख-दर्द को प्रकट करते हुए अष्टभुजा शुक्ल इसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति, प्रवृत्ति, व्यवस्था तक जाते हैं। जिस प्रखर राजनीतिक विवेक की आज हिन्दी कविता में सर्वाधिक आवश्यकता है, वह ‘पद-कुपद’ का प्राण-तत्त्व है। शब्द की त्रिशक्ति के पारखी अष्टभुजा शुक्ल के इन पदों में व्याप्त व्यंग्य अनायास कवि नागार्जुन की याद दिलाता है। इन रचनाओं में जाने ऐसे कितने शब्द हैं जो विस्मृतप्राय पुरखों की तरह सामने आ खड़े होते हैं। कहना न होगा कि यह काव्यभाषा केवल अष्टभुजा के रचना-संसार में ही सम्भव है। यदि एक उदाहरण देना हो तो गन्ना पर रचा पद पढ़ा जा सकता है। बीस पंक्तियों में समूचा जीवन और उसका दर्शन समाया है—‘कटकर, छिलकर, निचुड़-निचुड़कर होकर गेंड़ी-गेंड़ी/अष्टभुजा की गाँठ बची तो फिर पनपेगी पेंड़ी’। ‘पद-कुपद’ वस्तुतः हिन्दी की जातीय कविता का अर्थवान विस्तार है। पथरीले यथार्थ के बीच अदम्य जिजीविषा की दूब अर्थात् अनहारी हरियाली की पहचान इन पदों को महत्त्वपूर्ण बनाती है।

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‘पद-कुपद’ हिन्दी कविता की जनोन्मुख परम्परा में एक प्रतिमान है। अष्टभुजा शुक्ल ऐसे कवि हैं जिन्हें मनुष्यता के मौलिक मर्म का गहन ज्ञान है। उनकी कविताओं में वह गाँव और क़स्बा है जिसका संघर्ष निरन्तर बढ़ता जा रहा है। राजनीति और अर्थशास्त्र की भूमंडलीय परिभाषाओं के सम्मुख जो जीवन प्रायः भूलुंठित दिख रहा है, उसका प्रतिरोध अष्टभुजा शुक्ल की रचनाओं में गतिशील है।

पद-शैली में अष्टभुजा की ये अधिकांश रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पहले ही पाठकों-आलोचकों की प्रशंसा प्राप्त कर चुकी हैं। यह छन्द की वापसी जैसा कोई उपक्रम नहीं है, बल्कि शताब्दियों से आ रही कबीरी पुकार का पुनर्नवन है। स्वीकृत पद-शैली के आयतन में कवि ने समकालीन समाज के अन्तर्विरोधों व अन्तःसंघर्षों को व्यक्त किया है।

‘लोहे के कुछ चने सुबह थे, सायं जिन्हें भिगोया/पानेवाले राज पा गए, अष्टभुजा सब खोया।’ —आम जन के दु:ख-दर्द को प्रकट करते हुए अष्टभुजा शुक्ल इसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति, प्रवृत्ति, व्यवस्था तक जाते हैं। जिस प्रखर राजनीतिक विवेक की आज हिन्दी कविता में सर्वाधिक आवश्यकता है, वह ‘पद-कुपद’ का प्राण-तत्त्व है।

शब्द की त्रिशक्ति के पारखी अष्टभुजा शुक्ल के इन पदों में व्याप्त व्यंग्य अनायास कवि नागार्जुन की याद दिलाता है। इन रचनाओं में जाने ऐसे कितने शब्द हैं जो विस्मृतप्राय पुरखों की तरह सामने आ खड़े होते हैं। कहना न होगा कि यह काव्यभाषा केवल अष्टभुजा के रचना-संसार में ही सम्भव है। यदि एक उदाहरण देना हो तो गन्ना पर रचा पद पढ़ा जा सकता है। बीस पंक्तियों में समूचा जीवन और उसका दर्शन समाया है—‘कटकर, छिलकर, निचुड़-निचुड़कर होकर गेंड़ी-गेंड़ी/अष्टभुजा की गाँठ बची तो फिर पनपेगी पेंड़ी’।

‘पद-कुपद’ वस्तुतः हिन्दी की जातीय कविता का अर्थवान विस्तार है। पथरीले यथार्थ के बीच अदम्य जिजीविषा की दूब अर्थात् अनहारी हरियाली की पहचान इन पदों को महत्त्वपूर्ण बनाती है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2012
Weight
238 grams
ISBN-13
9788126723409
Pages
96
Reading time
~3 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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