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गीत कहाँ है अब यहाँ/गीत जैसा कुछ है’—गीतकार स्वानंद किरकिरे इस संग्रह की एक कविता की शुरुआत इन पंक्तियों से करते हैं। वे इधर की फ़िल्मों के चहेते गीतकारों में से एक हैं, जिसकी वजह शायद यह ईमानदारी ही है? इन कविताओं की उपलब्धि भी और औज़ार भी यही ईमानदारी है। कवि के रूप में उन्होंने कहीं अपने व्यक्ति से बेईमानी नहीं की, न ख़ुद से यह कहा कि वे शायर हैं, न यह कि गीतकार हैं, न यह कि कवि हैं। वे तेज़गाम दुनिया के बीचोंबीच बैठे, अपने-आप के परदे से दुनिया को देख रहे हैं और वह जितना उन्हें समझ आ रही है, उसे लिख रहे हैं। कविताओं की इस पुस्तक को पढ़ना एक अनुभव है...। और उम्मीद है, हिन्दी का नया पाठक इसे अपनी अनुभव-सम्पदा में मोती की तरह जड़कर रखेगा।</p> <p>
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गीत कहाँ है अब यहाँ/गीत जैसा कुछ है’—गीतकार स्वानंद किरकिरे इस संग्रह की एक कविता की शुरुआत इन पंक्तियों से करते हैं। वे इधर की फ़िल्मों के चहेते गीतकारों में से एक हैं, जिसकी वजह शायद यह ईमानदारी ही है? इन कविताओं की उपलब्धि भी और औज़ार भी यही ईमानदारी है। कवि के रूप में उन्होंने कहीं अपने व्यक्ति से बेईमानी नहीं की, न ख़ुद से यह कहा कि वे शायर हैं, न यह कि गीतकार हैं, न यह कि कवि हैं। वे तेज़गाम दुनिया के बीचोंबीच बैठे, अपने-आप के परदे से दुनिया को देख रहे हैं और वह जितना उन्हें समझ आ रही है, उसे लिख रहे हैं। कविताओं की इस पुस्तक को पढ़ना एक अनुभव है...। और उम्मीद है, हिन्दी का नया पाठक इसे अपनी अनुभव-सम्पदा में मोती की तरह जड़कर रखेगा।</p>
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Book Details
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ISBN9788126730063
-
Pages127
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: आधुनिक मैथिलीक समग्र पत्रकारिताक इतिहास मे दिल्ली सँ प्रकाशित 'अंतिका'क भूमिका बहुत तरहें अन्यतम रहल छै। कोनो पूर्व वा समकालीन मैथिली पत्रकारिताक उपरौंझ मे वा प्रतिस्पर्धा मे नहि, अपितु पत्रिकाक अपन प्रयोगशील संरचना, दृष्टिकोण ओ बहुकोणीय साहित्य-प्रयोगक समानांतर अभ्यास रूप मे। हमरा बुझने मैथिलीक समकालीन आधुनिक बोधक रचनाशीलता केँ देशक समस्त भाषा-साहित्यक मुख्य प्रवाह मे आनि वैश्विक गतिविधि पर्यंत जोड़बा मे 'अंतिका'क भूमिका सदैव अहम आ उल्लेखनीय रहतैक। अपन एहि विशेष भूमिकाक अद्यतन शृंखला मे 'अंतिका'क आरंभिक 25 अंक सभ मे सँ आजुक समय मे हस्तक्षेप करैत महत्त्वपूर्ण चौंतीस कविक बीछल कविताक संकलन 'नवमल्लिका'क प्रकाशनक प्रयोग सेहो हमरा अभिनव आ प्रीतिकर लागलए तथा प्रासंगिक सेहो। हमरा जनैत एहि प्रक्रिया मे रचना ओ रचनाकारक सामाजिक प्रयोजनीयता एक टा नव संदर्भ मे भविष्योन्मुख होइत छै। निश्चये एहन उपक्रम कोनो सजग सचेष्ट सम्पादकीय बोध आ रचनात्मक ऊहिए सँ संभव होइत छै। -गंगेश गुंजन # मैथिली पत्रकारिताक परंपरा मे 'अंतिका' नवाचारक लेल जानल जाइत अछि जकर प्रमाण थिक ई कविता संचयन। 'नवमल्लिका' मे संकलित चारि पीढ़ीक कवि आ हुनक कविताक कैनवास बहुआयामी अछि आ प्रयोगधर्मी सेहो। मैथिलीक कोनो एक पत्रिकाक अंक सँ एहन उत्कृष्ट संकलन निकालब हमरा जनतबे असंभव। विषयक विविधता, काव्यगत-प्रयोगधर्मिता आ समग्र-प्रभावान्विति मे ई संकलन छात्र-प्राध्यापक आ कविताक विज्ञ पाठक लेल अनमोल उपहार थिक। — प्रो. ज्ञानतोष कुमार झा
Do Sharan
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

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Description:
निराला की सम्पूर्ण गीत-रचना का एक बहुत बड़ा भाग शरणागति या प्रपत्ति-भाव के गीतों से सम्बद्ध है। भक्ति, प्रार्थना और शरणागति के गीत ‘परिमल’ संग्रह से ही हमें मिलने लगते हैं। इसकी क्षीण ध्वनि उनके पहले संग्रह ‘अनामिका’ की ‘माया’ कविता में हमें सुनाई देती है। ‘या कि ले कर सिद्धि तू आगे खड़ी, त्यागियों के त्याग की आराधना’—कहकर कवि अपनी रचनात्मकता की उस विशेष दिशा की ओर संकेतित करता है, जो आगे चलकर उसके अवसाद, उसकी उदासी, खिन्नता, मृत्यु-भय और आत्म-जर्जरता से होती हुई, अन्ततः शरणागति की प्रार्थना-भूमि पर उसे उतारती है।
‘आराधना’ और ‘अर्चना’ में उसकी संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। अकेले ‘अर्चना’ में शरणागति के लगभग 34-35 गीत संगृहीत हैं। ‘गीत-गुंज’ और उनके अन्तिम संग्रह ‘सांध्य काकली’ में भी यह प्रार्थना-क्रम तिरोहित नहीं हुआ है। यद्यपि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में निराला ‘प्रार्थना की व्यर्थता’ की बात भी करते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन यह उत्कट नैराश्य के क्षणों की ही अभिव्यक्ति लगती है, अन्यथा वे अपनी कारुणिक आत्म-जर्जरता में लगातार ‘प्रभु’ की अमर फ़ैंटेसी में शरण लेते हुए दिखाई देते हैं। उनके सारे संग्रहों को मिलाकर शरणागति और प्रार्थना-क्रम के इन गीतों की संख्या लगभग 90 के आस-पास पहुँचती है। इस तरह निराला के अन्तःसंगीत का एक बहुत महत्त्वपूर्ण भाग ‘प्रभु’ के इसी साक्षात्कार से सम्बद्ध है।
वरिष्ठ लेखक दूधनाथ सिंह ने निराला की प्रपत्ति भाव की कविताओं को संकलित किया है। इन कविताओं में मनुष्य की उस आत्मिक मुक्ति की जद्दोजहद को सहज ही परिलक्षित किया जा सकता है, जो दरअसल सम्पूर्ण मानवमुक्ति का एक महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा है।
Thoda Badal Thoda Pani
- Author Name:
Vinod Kushwaha
- Book Type:

- Description: Book
Sampoorn Kavitayein : Om Prakash Valmiki
- Author Name:
Omprakash Valmiki
- Book Type:

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Description:
ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएँ एक ओर दलित समाज के वेदना, अपमान और यातना से भरे जीवन-अनुभवों का मार्मिक दस्तावेज हैं तो दूसरी तरफ वर्ण और जाति के नाम पर थोपी गई अपात्रता और वंचन के विरुद्ध प्रतिवाद का तप्त स्वर। ये कविताएँ आक्रोशभरा आह्वान हैं कि भारतीय समाज में हजारों सालों से जारी वर्चस्ववादी-ब्राह्मणवादी व्यवस्था को तत्काल खत्म कर देना चाहिए, क्योंकि यह व्यवस्था बराबरी पर आधारित मानवीय समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है। वास्तव में ये कविताएँ बाबा साहब आम्बेडकर के उस विचार का सृजनात्मक प्रसार हैं, जिसमें उन्होंने कहा था—“हमारे जीवन-मूल्य और सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए दलित साहित्यकारों को जागरूक और प्रयत्नशील हो जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में साहित्यकारों का मैं आह्वान करता हूँ कि वे विभिन्न साहित्यिक विधाओं के द्वारा उदात्त जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को रेखांकित करें। अपने लक्ष्य को मर्यादा में मत बाँधो, उसे और अधिक विशाल बनने दो। वाणी का विस्तार करो। अपनी लेखनी को केवल अपने प्रश्नों तक सीमित मत रखो। उसे तेजस्वी बनाओ जिससे गाँव में फैला अन्धकार दूर हो सके। यह मत भूलो कि इस भारत देश में उपेक्षित दलितों का बहुत बड़ा विश्व है। अपनी रचनाओं द्वारा उनकी वेदना को समझकर उनके जीवन को उज्ज्वल बनाने की कोशिश करो। यही मानवता की सचाई है।”
कहना न होगा कि अपने एक-एक शब्द से, उत्पीड़ित मनुष्यता की तरफदारी करती, वाल्मीकि की कविताएँ उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि तो हैं ही, हिन्दी कविता की भी उपलब्धि हैं।
Jungle Ka Dard
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
- Book Type:

- Description: ‘जंगल का दर्द’ में कवि सर्वेश्वर की अपने अन्तर्जगत और बाह्य-जगत के जानवरों से लड़ाई, समसामयिक हिन्दी कविता की उपलब्धि है। ‘कुआनो नदी’ की कविताएँ डूबते सूरज की लम्बी परछाइयाँ थीं। अब ‘जंगल का दर्द’ में अंधकार सिमटकर बुलेट–सा छोटा, ठोस और भारी हो गया है। काव्य–विन्यास में इस परिवर्तन को कवि की यातना और दृष्टि से जोड़कर ही समझा जा सकता है। भेड़िए, कुत्ते, तेन्दुए, चिड़ियाँ, तितलियाँ, इस जंगल में सबसे उसका सामना होता है, उनसे वह जूझता है, बचता है, सीखता है और मानव नियति की राह टटोलता, झाड़ियों की रगड़ से अपनी देह का संगीत सुनता, ख़ुद को उधेड़ता–बुनता आगे बढ़ता जाता है। यह यात्रा जारी है, और हिन्दी कविता की भावी यात्रा के प्रति आश्वस्त करती है। यह काव्य–संग्रह ढहते मूल्यों के बीच खड़े रहने की सामर्थ्य देता है और यह स्पष्ट करता है कि कविता का मुख्य प्रयोजन सौन्दर्य–बोध के विस्तार के साथ–साथ मानव–आत्मा को निर्भीक करना और उसे कर्म से जोड़ना है।
Gazal Kumbh 2018
- Author Name:
Dixit Dankauri
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
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