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परिपक्व जीवन-अनुभवों और भाषा की गहरी समझ के साथ लिखी गई ये कविताएँ लोकजीवन की आत्मीय छवियों और सामाजिक सरोकारों से उपजी ज़िम्मेदार दृष्टि की परिचायक हैं।</p> <p>केदार जानते हैं कि ‘एक पूरी ज़िन्दगी लिखना नहीं ठट्ठा-हँसी है / खीर है टेढ़ी’—ये कविताएँ ज़िन्दगी को लिखने के इसी कठिन उद्यम से निर्मित हुई हैं। इन कविताओं का कवि किसी धारा से बाँधा हुआ नहीं है। अनुभूति की प्रामाणिकता और परिवेश की पुनर्रचना केदार के काव्यात्म को एक सघन आयाम देते हैं। बचपन से लेकर जीवन के विभिन्न चरणों के विशिष्ट अनुभव इन कविताओं में उतरे हैं तो बतौर मनुष्य स्वयं से साक्षात्कार से लेकर समाज की स्थूल परिधियों और वहाँ मौजूद विसंगतियों तक उनकी दृष्टि जाती है।</p> <p>‘सर्कस’, ‘होमवर्क’ और ‘कक्षा’ जैसी पारदर्शी कविताएँ जो बचपन का उत्सव मनाती हुईं हमें अपने सहज छन्द-प्रवाह से निर्भार करती हैं तो ‘नसीहत’ और ‘चिट्ठीरसैन’ जैसी कविताएँ हमें सोच के एक भिन्न और गम्भीर स्तर पर ले जाती हैं।</p> <p>‘एक-एक शब्द की / चुकानी पड़ती क़ीमत / बहुत जलता लहू / हाथ, उस दिन ख़ाली हो जाता / शब्दों में जिस दिन कुछ / उतरता’—कहने वाले केदार अभिव्यक्ति का दायित्व भी जानते हैं और मूल्य भी।
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परिपक्व जीवन-अनुभवों और भाषा की गहरी समझ के साथ लिखी गई ये कविताएँ लोकजीवन की आत्मीय छवियों और सामाजिक सरोकारों से उपजी ज़िम्मेदार दृष्टि की परिचायक हैं।</p>
<p>केदार जानते हैं कि ‘एक पूरी ज़िन्दगी लिखना नहीं ठट्ठा-हँसी है / खीर है टेढ़ी’—ये कविताएँ ज़िन्दगी को लिखने के इसी कठिन उद्यम से निर्मित हुई हैं। इन कविताओं का कवि किसी धारा से बाँधा हुआ नहीं है। अनुभूति की प्रामाणिकता और परिवेश की पुनर्रचना केदार के काव्यात्म को एक सघन आयाम देते हैं। बचपन से लेकर जीवन के विभिन्न चरणों के विशिष्ट अनुभव इन कविताओं में उतरे हैं तो बतौर मनुष्य स्वयं से साक्षात्कार से लेकर समाज की स्थूल परिधियों और वहाँ मौजूद विसंगतियों तक उनकी दृष्टि जाती है।</p>
<p>‘सर्कस’, ‘होमवर्क’ और ‘कक्षा’ जैसी पारदर्शी कविताएँ जो बचपन का उत्सव मनाती हुईं हमें अपने सहज छन्द-प्रवाह से निर्भार करती हैं तो ‘नसीहत’ और ‘चिट्ठीरसैन’ जैसी कविताएँ हमें सोच के एक भिन्न और गम्भीर स्तर पर ले जाती हैं।</p>
<p>‘एक-एक शब्द की / चुकानी पड़ती क़ीमत / बहुत जलता लहू / हाथ, उस दिन ख़ाली हो जाता / शब्दों में जिस दिन कुछ / उतरता’—कहने वाले केदार अभिव्यक्ति का दायित्व भी जानते हैं और मूल्य भी।
Book Details
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ISBN9788119092451
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ‘याद आता है मुझको अपना तरौनी ग्राम, याद आती लीचियाँ और आम’ बाबा नागार्जुन की इन पंक्तियों में अत्यंत सूक्ष्म संकेतों में उनके ‘तरौनी ग्राम’ की स्मृति अवश्य बँध गई है, लेकिन उत्तराखंड के गौरवकवि डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की ‘कोरोना काल’ में रची गई ‘प्रकृति की गोद में माँ की पाठशाला’ कविता संग्रह की कविताओं में तो उनके ‘बचपन’ की लगभग हर स्मृति के साथ माँ के वात्सल्य का अमृत पाठकों को मिलेगा, जो सहज ही प्रत्येक पाठक के हृदय को झकझोरकर रख देगा। डॉ. ‘निशंक’ की इन ‘स्मृति-कविताओं’ में पहाड़ की धड़कन को महसूस किया जा सकता है। पर्वतीय लोक-जीवन, लोक-संस्कृति और संवेदनाओं से महकती हुई डॉ. ‘निशंक’ की ये कविताएँ पर्वतीय समाज की अदम्य जिजीविषा का निर्मल दर्पण कही जा सकती हैं। निश्चित रूप से विश्वव्यापी ‘कोरोना महामारी’ की भयंकर विभीषिका में कवि ‘निशंक’ ने इन रचनाओं के रूप में ‘स्मृति-काव्य’ का अनुपम उपहार हिंदी जगत् को दिया है। देवभूमि की पावन स्मृतियों को अपनी कविताओं में साकार करने वाले कवि डॉ. ‘निशंक’ की भावनाओं में ‘पर्वतीय समाज और परिवेश’ आपको शब्दशः जीवंत मिलेगा। —इसी पुस्तक की भूमिका से
HINDI KI CHUNINDA GHAZALEN
- Author Name:
Editor : Gourinath
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- Description: collection of best hindi ghazals
Mohabbat Karke Dekho Na
- Author Name:
Farhat Ehsas
- Book Type:

-
Description:
फ़रहत एहसास अपने समकालीनों में एक मुमताज़ शाइर हैं। इससे पहले फ़रहत एहसास के एक-दो छोटे-छोटे संग्रह उर्दू लिपि में प्रकाशित हुए हैं जो किसी भी तरह उनकी कुल रचनात्मकता की नुमाइंदगी नहीं करते। मेरी दिली ख़्वाहिश थी कि ‘रेख़्ता’ उनकी शाइरी के तमाम रंगों पर आधारित एक संचयन प्रकाशित करे। आज से तीन बरस पहले देखे गए इस ख़्वाब की ताबीर की शक्ल में ये किताब आपके हाथों में है। मैं इसे अपनी ख़ुशनसीबी समझता हूँ कि उनकी शाइरी को उसके हज़ारों पाठकों तक पहुँचाने का श्रेय मेरे हिस्से में आया। इस सफ़र में सबसे मुश्किल मर्हला फ़रहत एहसास को राजी करना था। उनकी तख़लीक़ी बेनियाज़ी उन्हें अपनी शाइरी बाज़ार तक लाने से रोकती रही है। उन्हीं का शे’र है—
एक के बाद एक मज्मूआ मिरा आता रहा
और मैं शाइर बिचारा ग़ैर-मत्बूआ रहा।
ऐसे महत्त्वपूर्ण शाइर के कलाम का इन्तिख़ाब करके हम ख़ुशी और फ़ख़्र महसूस करते हैं। फ़रहत एहसास की शाइरी की तरह उनकी ज़िन्दगी भी मेरे लिए उतनी ही पुरकशिश है। उनसे तआरुफ़ का अर्सा अगरचे अभी मुख़्तसर है लेकिन सोचने पर ऐसा लगता है कि हम बरसों के शनासा हैं। ऐसे हम-रंग और हम-मिज़ाज से मिलना मेरे लिए एक ख़ुशगवार अनुभव रहा।
फ़रहत एहसास के मिज़ाज की क़लन्दरी बेबाक़ी और बज़्लासन्जी, उन्हें हरदिल अज़ीज़ बनाती है। फ़रहत एहसास की दिलचस्पियाँ सिर्फ़ शाइरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, धर्मशास्त्र, अध्यात्म, मौसीक़ी और फ़लसफ़े पर उनसे बातचीत एक रौशनी अता करती है। इसके अलावा उनका खुला-डला तर्ज़, व्यापकता और इनसान-दोस्ती का रवैया मेरे लिए ज़ाती तौर पर बहुत मुतास्सिर करनेवाला रहा।
ये मेरी ख़ुशबख़्ती है कि मुझे एक ऐसे शाइर और एक ऐसे इनसान से मिलने, उसके साथ वक़्त गुज़ारने और उनकी शाइरी और शख्स़ियत को इतने क़रीब से जानने का मौक़ा मिला। उम्मीद है कि उर्दू शाइरी के बाज़ौक़ पाठकों में हमारी ये पेशकश भी मक़बूल होगी।
Ghar Ke Bahar Ghar
- Author Name:
Vishnu Nagar
- Book Type:

- Description: Poems
Sampoorn Kavitayein : Manglesh Dabral
- Author Name:
Mangalesh Dabral
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Description:
मंगलेश डबराल ने अपने अन्तिम दिनों के एक व्याख्यान में कहा था कि ‘यह समय ‘पोएटिक इज़ पॉलिटिकल’ का है। जो काव्यात्मक है, वह राजनीतिक है।’ भाषा को निरर्थक बनाए जाने की सर्वव्यापी कोशिशों के मद्देनज़र काव्यात्मकता को एक सक्रिय हस्तक्षेप की तरह देखते हुए वे शायद कह रहे थे कि वह कविता ही है जो भाषा को उसके मंतव्य वापस कर सकती है, उसे भरोसे के लायक बना सकती है। शब्द और उसके अर्थ को एक कर सकती है।
उनकी अपनी कविता हमेशा यह काम करती रही। उथले अनुभवों को जल्दबाजी में जुटाए गए वाक्यों में प्रस्तुत कर देने के बजाय उन्होंने भाषा की गुरुता को बरकरार रखते हुए उसका प्रयोग किया, उसे काव्यात्मकता दी और सावधानी से चुनी गई शब्दावली में अपने अनुभवों, अपनी उम्मीदों, अपने दुखों और स्मृतियों को अनुस्यूत किया। उनकी कविताएँ पहाड़ के निर्जन में बहती उस निर्मल जलधारा की तरह हैं जिसके पानी में सबकुछ साफ़-साफ़ दिखाई देता है, नीचे तली में पड़े सब पत्थर, एक-एक कण रेत।
लेकिन वह कविता निर्जन की नहीं है, पहाड़ से लेकर मैदानों, शहरों और घर से लेकर दुनिया तक फैला उनके सरोकारों का एक बड़ा संसार वहाँ ऐसी भाषा में अभिव्यक्त होता रहा जो अपनी संरचना में अनायास ही विश्वसनीय और पारदर्शी है, जो अपनी धीरता और दृढ़ता के साथ फौरन आपकी अपनी अभिव्यक्ति हो जाती है।
आज जब मूढ़ता और मूर्खता समाज और राजनीति के सर्वाधिक प्रकाशित और वाचाल घटक हो चले हैं, हमें एक ऐसी अन्तर्यात्रा की ज़रूरत है जो हमें इस दिशाहीन शोर के बीच अकंप रख सके। मंगलेश डबराल की कविताओं के साथ यह यात्रा की जा सकती है।
यह उनकी कविताओं की सम्पूर्ण प्रस्तुति है।
Via Nayi Sadi
- Author Name:
Shriprakash Shukla
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Description:
‘वाया नई सदी’ दस्तावेज़ है समय की असहजताओं और अस्वाभाविकताओं का जिन्हें हमने जीवन की स्वाभाविक मुद्राओं की तरह स्वीकार कर लिया है। ये कविताएँ इस स्वीकृति के विरुद्ध उठी मुट्ठियों की तरह हैं। यह समय जहाँ बोलने, चीखने और विरोध करने पर लगातार कठोर होती पाबन्दियाँ हमारी चुप्पियों पर हँसने लगी हैं, और हम प्यार को, जनतन्त्र को, मानवीयता को धीरे-धीरे छीजते देख रहे हैं, और ख़ामोश हैं।
‘हमारे समय के करुण इतिहास पर/हिंसा की तरह दर्ज अभिलाषाओं में/महामौन की तरह खड़ी है एक गाय/जो अभी-अभी खूँटे पर आई है/लहूलुहान’—‘गाय’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ भारत की नयी सदी की उस महाविडम्बना की ओर संकेत करती है जहाँ करुणा में रसे-बसे सांस्कृतिक प्रतीकों को हिंसक बिम्बों में बदलने की कोशिश बाक़ायदा सत्ता के इशारों पर हो रही है और समाज, जैसे कि उसे इसी का इंतज़ार था, इस प्रक्रिया को पूरा करने में जुटा हुआ है : ‘उनमें ग़ज़ब की सामूहिक सहमति है’, और ‘एक सीधी सरल गाय/हिंसक पशु में बदल जाती है।’
श्रीप्रकाश शुक्ल भारतीयता के इस क्षरण के प्रति अपनी असहमति, अपना प्रतिरोध दर्ज कराना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि हम बोलें, 'चुप्पी के काइएँपन से दूसरे की हत्या करने से बेहतर है/बोल-बोलकर ख़ुद के भीतर जमी काइयों का वध करना।’ वे कहते हैं कि ‘बोलता आदमी जब चुप हो जाए/तो समझिए कि इस व्यवस्था में एक तानाशाह का जन्म हो चुका है/जो हमारे मुँह से प्रवेश करता है और जीभ को चीरता हुआ/अंतड़ियों में उतर जाता है।’ इसीलिए वे एक मुखर आदमी के पक्ष में अपना बयान देते हैं, ‘मनुष्यों के मुद्दे राजनीति से बड़े होते हैं/और अर्थनीति से ज़्यादा उलझे हुए/...कि लोकतंत्र के मुद्दे भुजा से नहीं/भाषा से तय होते हैं।’
श्रीप्रकाश शुक्ल के इस नए संग्रह में कई कविताएँ ऐसी हैं जो इस विचित्र सदी को सीधे-सीधे सम्बोधित हैं और कई ऐसी जो समय के शोर में बिला रही मनुष्यता की सरस, सहज, सकारात्मक भंगिमाओं को आवाज़ देती हैं। उनके ‘नहीं होने’ को रेखांकित करती हैं ताकि हम उन्हें लौटा लाएँ। कोरोना काल के भीषण विद्रूप भी इन कविताओं में अंकित हुए हैं, और प्रकृति के साहचर्य से पल्लवित संवेदनाएँ भी। लेकिन ‘वाया’ की ओट से समय की लय को भंग करनेवाली ताक़तों को लेकर चेतावनी कहीं धूमिल नहीं पड़ती : ‘बादल होंगे लेकिन नमी नहीं होगी/...रक्षक होंगे लेकिन रक्षार्थ कुछ नहीं होगा.../और तब वे अपने वर्तमान से मुक्त होकर/एक शानदार विरासत का जश्न मनाएँगे/...मानव-मुक्त विकास का जश्न!’
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