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रवीन्द्र भारती की कविताओं में चारों ओर की वास्तविकताओं से मनुष्य के लिए रचनात्मक संस्कार खोजने की शक्ति दीखती है। अपनापे का यह अनुभव छायावादोत्तर रोमानी मिठास का नहीं, एक संघर्षरत मनुष्य के लौकिक-भौतिक प्रेम का अनुभव है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि उनकी कविता उन दृश्यों को भी साकार कर देती है, जो उसमें लिखे नहीं गए, परन्तु छाया की भाँति इसके तथ्यों से निसृत हैं। कई आयामों को एक में समाहित कर सकने की यह सामर्थ्य आज की कविता में दुर्लभ ही है। रवीन्द्र भारती की कविताएँ गाँव, घर, खेत, लोग आदि सबके दृश्यमान यथार्थ के पीछे करुणा के आयामों को खोलती और सम्पूर्ण अनुभव के आयामों को गहरा करती हैं। आज के दौर में जहाँ सरल भाषा में दुरूह कविता खुलेआम स्वीकृत की जा रही है, वहाँ यह कवि सरल भाषा में गहराई का अन्वेषण कर रहा है और भावुकता को आत्मदया बनाने से बचता हुआ सहानुभूति को व्यापक अर्थ देकर काव्य-भाषा को समृद्ध कर रहा है। रघुवीर सहाय; ‘रविवार’, 15-21 नवम्बर, 1987 रवीन्द्र भारती ने इतनी तीव्र और मर्मान्तक संवेदना से अपने अनुभवों को जो काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है, उसने मुझे बराबर प्रभावित किया है। गाँव के अनुभवों की जो सम्पदा आप अपने भीतर समोए हैं, वह अथाह जान पड़ती हैं—और जब उनमें से कुछ को चुनकर अभिव्यक्त करते हैं—बिलकुल अपने निजी मुहावरे में तो लोग, लैंडस्केप और चारों तरफ़ की पीड़ा का प्रदेश आलोकित हो उठता है। —निर्मल वर्मा; पत्रांश, 10.5.1981
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रवीन्द्र भारती की कविताओं में चारों ओर की वास्तविकताओं से मनुष्य के लिए रचनात्मक संस्कार खोजने की शक्ति दीखती है। अपनापे का यह अनुभव छायावादोत्तर रोमानी मिठास का नहीं, एक संघर्षरत मनुष्य के लौकिक-भौतिक प्रेम का अनुभव है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि उनकी कविता उन दृश्यों को भी साकार कर देती है, जो उसमें लिखे नहीं गए, परन्तु छाया की भाँति इसके तथ्यों से निसृत हैं। कई आयामों को एक में समाहित कर सकने की यह सामर्थ्य आज की कविता में दुर्लभ ही है।
रवीन्द्र भारती की कविताएँ गाँव, घर, खेत, लोग आदि सबके दृश्यमान यथार्थ के पीछे करुणा के आयामों को खोलती और सम्पूर्ण अनुभव के आयामों को गहरा करती हैं। आज के दौर में जहाँ सरल भाषा में दुरूह कविता खुलेआम स्वीकृत की जा रही है, वहाँ यह कवि सरल भाषा में गहराई का अन्वेषण कर रहा है और भावुकता को आत्मदया बनाने से बचता हुआ सहानुभूति को व्यापक अर्थ देकर काव्य-भाषा को समृद्ध कर रहा है।
रघुवीर सहाय; ‘रविवार’, 15-21 नवम्बर, 1987
रवीन्द्र भारती ने इतनी तीव्र और मर्मान्तक संवेदना से अपने अनुभवों को जो काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है, उसने मुझे बराबर प्रभावित किया है। गाँव के अनुभवों की जो सम्पदा आप अपने भीतर समोए हैं, वह अथाह जान पड़ती हैं—और जब उनमें से कुछ को चुनकर अभिव्यक्त करते हैं—बिलकुल अपने निजी मुहावरे में तो लोग, लैंडस्केप और चारों तरफ़ की पीड़ा का प्रदेश आलोकित हो उठता है।
—निर्मल वर्मा; पत्रांश, 10.5.1981
Book Details
-
ISBN9788171195220
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अरविन्द कुमार सिंह की कविताओं से गुज़रते हुए हमें एक दुर्लभ संयोग दिखाई पड़ता है। एक तरफ़ उनकी भाषा में दिनकर का ओज है और दूसरी तरफ़ नागार्जुन के यहाँ दिखाई पड़ने वाली रोज़मर्रा जीवन की हलचलें। ये हजारीबाग की पहाड़ियों का सौन्दर्य है, हरिद्वार का कुम्भ स्नान है, गाँव के मेले की बिसरी हुई यादें हैं, नदियाँ हैं, शाम हैं। प्रकृति इन कविताओं में बार-बार आती है—इसके बहुत सारे रंग उनकी कविताओं में दिखाई पड़ते हैं। दूसरी तरफ़ मज़लूमों, किसानों, मज़दूरों की पीड़ा भी उनकी कविताओं में मुखर हुई है। ये कविताएँ हमारे समय, समाज, धरती और हमारे आसपास के लोगों की आकांक्षाओं, पीड़ाओं, भावनाओं का आईना बनती हैं। इनमें हम अपने समय की धड़कन को सुन सकते हैं। इनमें सौन्दर्य है, प्रकृति है, धूमिल गाँव हैं, नदियाँ हैं और उनके बीच मनुष्य का श्रम भी है और उसका समूचा सौन्दर्य भी है—जो इस धरती को सुन्दर बनाता है।
Yadi Pyar Karo
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Taslima Nasrin +1
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प्रेम। अकुंठ प्रेम। निर्बंध प्रेम। देह और आत्मा को आप्लावित करता प्रेम। शरीर के सर्वांग को कँपाता आग-सा जलता, बर्फ़-सा शीतल प्रेम। प्रेम जिसके चिह्न देर तक साथ रहते हैं, देह पर भी, मन पर भी, रूह के भीतर गहरे अँधेरे में भी। यादों में चहकता, उम्मीद और इन्तज़ार में छटपटाता प्रेम! प्रेम की इन कविताओं को तसलीमा नसरीन के अलावा भला कौन लिख सकता था। प्रेम के समूचे अनुभव को शब्द देने के लिए एक साहसी क़लम की ज़रूरत हर दौर में पड़ेगी, उनके पास वह क़लम है, वह साहस भी। उनके भीतर की प्रेमाकांक्षी स्त्री कहती है—‘यदि प्यार करो’ तो उसे कहो, और इस तरह कहो कि ‘चिड़ियाँ कहें, पेड़ के पत्ते, फूल बोलें, आकाश बोले, मेघ-वर्षा बोलें, धूप बोले, चन्द्रमा की रोशनी बोले, पड़ोसी बोलें, तालाब का घाट बोले, कि तुम मुझे प्यार करते हो।’ ‘यदि प्यार करो’ में संकलित तसलीमा नसरीन की इन कविताओं में वह सब कुछ है जिसका आविष्कार प्रेम ने अब तक किया है—बेशर्त समर्पण भी, अधिकार भी, ईर्ष्या भी, और हाँ, अपने होने का गहरा बोध भी, अपने अस्तित्व को अपनी हद में सम्पूर्ण बनाए रखने की ज़िद भी, क्योंकि अगर मैं ही नहीं हूँगी तो प्यार कौन करेगी, और तुम किससे प्यार करोगे? तसलीमा का प्यार न समाज के सामने शर्मिन्दा है, न उम्र के सामने अवश, न मानक-स्वीकृत रिश्तों की चहारदीवारी तक सीमित। यह सम्पूर्ण प्रेम है, जैसा उसे होना चाहिए।
Prem Bhi Ek Yatana Hai
- Author Name:
Savita Singh
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अपने हठधर्मी स्त्रीवाद के लिए जानी जाती सविता सिंह की प्रेम कविता हिन्दी की दिलचस्प परिघटना इस मानी में है कि जैसे वह उस बहु परीक्षित सिद्धान्त का पुनर्स्मरण हो कि अपरिमेय कोमल को बचाने के लिए विकट दृढ़ता अपरिहार्य होती है। ‘प्रमे भी एक यातना है’ संग्रह सविता की अब तक की लिखी प्रेम कविताओं का संचयन है—प्रेम जो कैशोर्य, युवा और प्रौढ़ होते जीवन में लगभग उसी तापमान और तनाव में बना तो रहता है लेकिन उसमें आते सूक्ष्म बदलावों का अलक्षित रहना असंभव होता जाता है। मसलन प्रेम की चहलक़दमियों के दौरान जो प्रकृति बर्फ़ और बारिश में बाह्य का रोमांटिक परिपार्श्व निर्मित करती थी, वह आभ्यन्तर का हिस्सा बनती जाती है। सखा के उन्मन प्रतीक्षा पलों में वह सखी होती जाती है। चाँद, तारे, पत्तियाँ, फूल, चींटे-चींटियाँ—इनसे जीवन्त संवाद का जो नाता बनता है वह विफल होती मनुष्यता का नैसर्गिक विकल्प बनता जाता है। हिन्दी की स्त्री कविता में इस अपूर्वत्व को अलक्षित छोड़ देना वैचारिक अपराध से कम नहीं होगा। प्रकृति सविता की मुँहबोली बहन है—उसके साथ लेसबियन तन्मयता का आध्यात्मिक समकालीन हिन्दी की मार्मिक निधि। एको फ़ेमिनिज़्म की वह विरल उदाहरण हैं। सविता स्त्रीवाद के अध्येता और सिद्धान्तकार के तौर पर प्रहारात्मक होती हैं लेकिन अपनी कविता में वह बिना किसी आहट के धीमे पदचाप के साथ गुज़रती हैं। इसीलिए उन्होंने समकालीन कविता के शब्दकोष के सबसे मुलायम और अवसाद भरे पदों को चुना है। इतनी सारी प्रेम कविताओं को पढ़कर यह भी लगता है कि प्रेम को सोचने-समझने, उसमें संसक्त होने और उसके देह-विदेह में विकंपित बने रहने के सिवा उनके पास कोई काम नहीं है—प्रेम सबसे बड़ा मानवीय मूल्य है। युद्धों, कड़वाहट, वर्चस्ववाद के इस विषाक्त युग में सविता सिंह की कविता पारस्परिकता का अनन्त पुनर्वास करती है : ढहते सम्बन्धों के समय में मर्ममय मरम्मत का कॉस्मिक सख्य भाव! देवीप्रसाद मिश्र
Shreyasi
- Author Name:
Vinay Kumar
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विनय कुमार की ‘श्रेयसी’ सरस्वती के अनाविल उज्ज्वल स्वरूप का साक्षात्कार है। इसे पढ़ते हुए ऋग्वेद के वाक्सूक्त के मन्त्र चित्त में विवर्तित होने लगते हैं। ये कविताएँ चेतना के गह्वरों तक उतरती हैं और अतीत और इतिहास ही नहीं, वर्तमान को स्वरित करते हुए भविष्य की आहटों से भी परिचित कराती हैं। विनय कुमार बदलते परिवेश में अपने अक्षुण्ण सांस्कृतिक बोध के साथ कविता को वहाँ ले जाते हैं जहाँ ज्ञान शब्दों में सिमटकर नहीं रह जाता, अनुभव में संवेद्य बन जाता है।
—राधावल्लभ त्रिपाठी
विनय कुमार की ‘यक्षिणी’ को लोगों ने नए ढंग का खंड-काव्य कहा था। सात सर्गों में बँटा इस पुस्तक का कलेवर उससे आगे जाता है। एक लम्बी, गहरी और बहुआयामी विचार-यात्रा से सम्भव हुई इस कृति में सूखी वैचारिकी नहीं है। गीतात्मक तरलता, आख्यान-कुशलता, नए और अनोखे बिम्बों के साथ-साथ इसमें एक बंकिमता भी है जो कविताओं को मार्मिक और बेधक बनाती है।
‘श्रेयसी’ में परम्परागत अवधारणाओं का स्वीकार भी है और प्रतिरोध भी, विस्तार भी है और तिक्रमण भी। कवि दिव्य से आँखें तो मिलाता है मगर नाहक अभिभूत नहीं होता। वह ज्ञान की परम्परा को समझने का प्रयास करता है और इस क्रम में आवश्यक प्रतिवाद और भविष्यगामी संवाद भी सम्भव करता है जिसे इस यात्रा की उपलब्धि कह सकते हैं। सरस्वती की अवधारणा यूँ तो भारतीय है मगर इसे रचनेवाले तत्त्व कमोबेश हर संस्कृति में हैं। कवि ने भू-राजनीतिक और भाषिक सीमाओं का सहज भाव से अतिक्रमण करते हुए मानव-सभ्यता की सारस्वत-सर्जनात्मक यात्राओं की शक्तियों और चुनौतियों को स्वर दिया है।
यह कृति भारतीय होकर भी वैश्विक है, और धर्मों और संस्कृतियों के विभाजन से परे जाती है। ‘श्रेयसी’ में सरस्वती बड़ी सहजता के साथ गलेटिया, हाइपैटिया, बहादुरशाह ज़फ़र और वाजिद अली शाह से बात करती दिखती है। यह वंदना की किताब नहीं। श्रेयसी कोई देवी नहीं, एक तरलता है जो प्रकृति, कथा और सर्जनात्मक प्रज्ञा तीनों में बहती है। इन तरलताओं के बिना न तो मनुष्य का जीवन सम्भव है और न ही मनुष्यता का।
महाकाव्यात्मक सम्भावनाओं को अपने वितान में समेटती ‘श्रेयसी’ को वर्तमान हिन्दी काव्य-जगत में एक सार्थक हस्तक्षेप की तरह देखा जाएगा।
Jyamiti
- Author Name:
Shanti Nair
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भारतीय स्त्री-कविता को बहुत दिनों से तलाश थी एक ऐसे स्त्री-स्वर की जिसके लेखन में निराला की नायिका पूरे ठस्से के साथ हँसती दिखाई दे, सबको दाँव देती हुई-सी हँसी। शान्ति नायर के कविता-संग्रह ‘ज्यामिति’ की कविताओं में सबको दाँव देती उसी हँसी का ताना-बाना मुझे विस्मय-विमुग्ध कर गया। उनमें बृहत्तर जगत के सरोकार अधिक मुखर और स्पष्ट रूप से सामने आते हैं, पर कविता की व्यंजना शक्ति की तिलांजलि दिये बग़ैर। संग्रह की ‘मैच द फ़ॉलोइंग’, ‘संजीवनी’, ‘दूध फटना’, ‘अनुष्ठान’ जैसी कविताओं में हमारे राजनीतिक-सामाजिक जीवन की समस्त विडम्बनाएँ जिस सजग बाँकपन के साथ व्यक्त हैं, वह किसी को भी एक झटके में उठाकर बैठा सकती हैं। ‘ट्रैफ़िक जाम’ कविता भास्वर प्रमाण है इस बात का कि पढ़ी-लिखी मध्यवर्गीय स्त्रियों पर अब कोई यह अभियोग लगा नहीं सकता कि दमित वर्गों-वर्णों की स्त्रियों का दुख उनके निजी दुखों में शामिल नहीं। चौके-चूल्हे, पास-पड़ोस, हाट-बाज़ार, दैनन्दिन जीवन के अन्य जीवंत प्रसंगों से धारोष्ण बिम्ब उठाकर जैसे भक्त-कवयित्रियाँ ध्वनि और रस-बोध से उच्छल कविताएँ सहज ही रच देती थीं, शान्ति नायर भी घरेलू बिम्बों को अद्भुत दार्शनिक उठान दे लेती हैं—‘अनिद्रा’ कविता में उदासीनता में ख़मीर का उठकर रात की सीमा के पार फूल जाना एक ऐसा बिम्ब है जो स्त्री ही साध सकती है। इसी तरह ‘पुट्टू’ कविता में तैयार पुट्टू को साँचे के बाहर कर देने की ख़ातिर जो धक्का दिया जाता है, उसका मर्म स्त्री, एक समधीत स्त्री ही समझ सकती है जो घर के काम ही नहीं करती, सब कामों से समय चुराकर पढ़ती भी है, जिसमें यह समझने की भी विलक्षण प्रज्ञा है कि जीवन की असल चुनौती है ज्ञान का संज्ञान में बदलना। दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना—कैसे—यह आपको शान्ति नायर की कविताएँ बख़ूबी समझा देती हैं। स्त्री की पसलियों का ‘लाड़ला दर्द’, ‘कर्तव्य के बिछावन’ पर यहाँ कुनमुनाकर सोता है पर नींद में मुस्कुराता हुआ।
Alfaaz Sitaaron Jaise
- Author Name:
Malvi Malhotra
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अब कहाँ आँसू हैं उसके नाम के ज़ब्त मैं जाने कहाँ से लाई हूँ मालवी मल्होत्रा यूँ तो एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं, सिने-स्क्रीन का एक जाना-पहचाना चेहरा, लेकिन इसके अलावा वे एक संजीदा ग़ज़लगो भी हैं। यह उनकी ग़ज़लों की किताब है जिसमें ग़मे-दौराँ और ग़मे-जानाँ को एक साथ समेटने वाली उनकी कुछ यादगार ग़ज़लें शामिल हैं। प्रेम की अलग-अलग मनःस्थितियों और अहसासात को शे’रों में पिरोते हुए ये ग़ज़लें हमें मजबूर करती हैं कि हम उन्हें बार-बार पढ़ें। एक शे’र देखें,ग़ा वो ज़माने को आया था देकर मगर शर्म से थी मैं क्यों पानी-पानी इसी तरह के कई शे’र इन ग़ज़लों में आपके सामने बार-बार आते हैं जिनमें इश्क़ का पारम्परिक फ़्रेम अपनी हदों को बढ़ाता दिखता है। कुछ ग़ज़लें यहाँ ऐसी भी हैं जो समाज और आसपास के मौजूदा हालात की तरफ़ हमारा ध्यान खींचती हैं; मसलन कोरोना के दौर के हवाले से लिखी गई ग़ज़लें और क़ौमी एकता की ज़रूरत को रेखांकित करती ग़ज़लें।
Fiza Ke Samandar Mein
- Author Name:
Ramswaroop Kisan
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ग्रामीण जीवन के अनूठे चित्र और मनुष्य के संसार के ऐसे बिम्ब जिन पर सामान्यतः हमारी निगाह कम ही ठहरती है, रामस्वरूप किसान की कविताओं में बहुतायत से मिलते हैं।
मिसाल के तौर पर इस संग्रह की पहली ही कविता-शृंखला ‘पीठ’ को लिया जा सकता है जिसमें कुल सोलह कविताएँ शामिल हैं। ‘पीठ एक कारुणिक क्षेत्र’ है जिसे देखकर कवि-मन बार-बार कभी अपने भीतर और कभी बाहर की ओर एक प्रश्नाकुल चिन्तन-यात्रा पर निकल जाता है।
‘फ़िज़ा के समन्दर में’ शीर्षक कविता-शृंखला की ग्यारह कविताएँ पुनः कवि की विशिष्ट दृष्टि का पता देती हैं जिसमें प्रेम के लिए घर से भागती हुई लड़की हमें और हमारे समाज को पुनः पुनः सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है—
यह रहा/तुम्हारा दूल्हा/साथ-साथ रहोगे तो/प्यार हो जाएगा/पापा ने कहा।...नहीं, ऐसा कहो पापा/यह रहा तुम्हारा प्यार/साथ-साथ रहोगे/तो दूल्हा हो जाएगा।
संग्रह में शामिल अधिकांश कविताएँ इसी तरह पाठक को सहसा चौंका देती हैं और हमारी देखी जानी चीज़ों को नये ढंग से हमारे सामने ला देती हैं।
आम जन-जीवन के दैनन्दिन दुखों, व्यवस्था-जनित असहायताओं और मनुष्य की आन्तरिक और बाह्य पीड़ाओं के साथ इन कविताओं की राजनैतिक चेतना भी मुखर रूप में सामने आती है—
पब्लिक लड़ती है चुनाव—पैसों से/बातों से/लातों से/भालों-बन्दूक़ों-तलवारों से/ख़ून के फ़व्वारों से/और लड़ा-लड़ाया चुनाव/उनके गले में डाल देती है.../वे चुनाव नहीं लड़ते/वे तो पहनते हैं चुनाव।
Shoonya Ki Jheel Mein Prem
- Author Name:
Mayank Murari
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‘शून्य की झील में प्रेम’ में लौकिक प्रेम को अलौकिक प्रेम में परिवर्तित होते हुए देखना सुखद अनुभूति है। प्रेम जिसकी महिमा आदिकाल से आराध्य देवताओं से लेकर साधारण मनुष्य तक व्याप्त है जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया और जब तक जीवित रहा।-ख़ुदेजा ख़ान मयंक मुरारी का नवीनतम कविता-संग्रह ‘शून्य की झील में प्रेम’ विश्व के प्रेम साहित्य को नए अरमानों से सुसज्जित करने का सुपर्ण सुयत्न है जिसके महत्त्व पर ख़ुदेजा ख़ान और स्वयं कवि ने यथेष्ट प्रकाश डाला है। कुछ आरम्भिक उद्धरण इसे पूर्णता प्रदान करते हैं। इसमें मेरे जैसे पाठक के लिए कुछ भी जोड़ पाना असम्भव है। यह प्रेम का मधु है जो मौन की अपेक्षा करता है। मयंक जी सिद्धहस्त एकान्त निस्पृह साधक हैं जिनका कवि-कर्म किसी तारीफ का मोहताज नहीं। उन्होंने इन टुकड़ों में अपना हृदय-रस उड़ेल दिया है जो समस्त भारतीय मानस को रसाप्लावित करेगा। शून्य की झील इश्क और अध्यात्म के सामासिक ऐश्वर्य को इंगित करने वाला प्रतीक बन मयंक मुरारी की काव्य-साधना का महत्तम राग बन जाती है। इसी के साथ वे न केवल हिन्दी बल्कि सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के उन सारस्वत कवियों के शिरोमणि बनने की ओर अग्रसर हैं जो इश्क़ के रूहानी और डिवाइन तत्वों का प्रतिनिधित्व करने की सामर्थ्य रखते हैं। प्रत्येक टुकड़े की शिरोरेखा की भाँति प्रदत्त गद्य मुखड़े पूरी पुस्तक को नई रश्मियों से आलोकित करते हैं। यह पुस्तक सहृदय पाठकों का हृदय हार बने, यही कामना है। अस्तु। अरुण कमल
Zameen Pak Rahi Hai
- Author Name:
Kedarnath Singh
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“केदार जी की कविताओं में व्यक्तिगत और सार्वजनीन, सूक्ष्म और स्थूल, शान्त और हिंस्र के बीच आवाजाही, तनाव और द्वन्द्वात्मकता लगातार देखी जा सकती है। ‘सूर्य’ कविता की पहली आठ या शायद नौ पंक्तियाँ कुहरे में धूप जैसा गुनगुना मूड तैयार करती ही हैं कि ‘ख़ूँख़ार चमक, आदमी का ख़ून, गंजा या मुस्तंड आदमी, सिर उठाने की यातना’ इस गीतात्मक मूड को जहाँ एक ओर नष्ट करते से लगते हैं वहाँ उसका कंट्रास्ट भी देते हैं। दुनिया की सबसे आश्चर्यजनक चीज़ रोटी ताप, गरिमा और गन्ध के साथ पक रही है। केदार जी चाहते तो इस मृदु चित्र को कुछ और पंक्तियों में ले जा सकते थे लेकिन शीघ्र ही रोटी एक झपट्टा मारनेवाली चीज़ में बदल जाती है और कवि आदिमानव के युग में पहुँच जाता है—वह कहता अवश्य है कि पकना लौटना नहीं है जड़ों की ओर, किन्तु रोटी का पकना उसे आदिम जड़ों की ओर ही ले जाता है। उसकी गरमाहट उसे नींद में जगा रही है, आदमी के विचारों तक पहुँच रही है और वह समझ रहा है कि रोटी भूखे आदमी की नींद में नहीं गिरेगी, बल्कि उसका शिकार करना होगा और यह समझना कविता लिखते हुए भी कविता लिखने की हिमाकत नहीं बल्कि आग की ओर इशारा करना है। केदार जी की कविताओं का अपनापन असन्दिग्ध है और वे कवि और कविताओं की भारी भीड़ में भी तुरन्त पहचानी जा सकती हैं।” —विष्णु खरे
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