Tinka Tinka Tihar
(0)
Author:
Vartika Nanda, Vimlaa MehraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
595
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“दुनिया की हर औरत कभी न कभी एक ऐसे मुक़ाम से गुज़रती है जहाँ उसे अपनी चुप्पी और ज़बान के बीच में से किसी एक का चुनाव करना पड़ता है। जहाँ अदालतें महज़ सरकती हैं, सत्ताएँ सोचा करती हैं, संस्थाएँ दावे करती हैं और मन थरथराया करता है—वहाँ कविताएँ शर्म और धर्म को बचाए रखने का हौसला और मन में बुदबुदाता मंत्र बन जाती हैं। इन कविताओं में इतनी ताक़त है कि वे कह लेती हैं—थी.हूँ..रहूँगी...। तिहाड़ में उपजी इन कविताओं में आपको उधड़ चुकी कई लोरियों का अहसास होगा।” —विमला मेहरा, वर्तिका नन्दा यह किताब उन औरतों की है जिनका जिस्म क़ैद है, पर मन नहीं। इसमें तिहाड़ की चार महिला क़ैदियों की कविताएँ हैं जो उन्होंने सींखचों के पीछे रहकर लिखी हैं। कविताओं के साथ इसमें जेल नम्बर 6 की दुर्लभ तस्वीरें हैं जो इन्होंने ख़ुद ली हैं। मक़सद है—पाठक को उस जगह से परिचित करवाना जिसका नाम है—तिहाड़।
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“दुनिया की हर औरत कभी न कभी एक ऐसे मुक़ाम से गुज़रती है जहाँ उसे अपनी चुप्पी और ज़बान के बीच में से किसी एक का चुनाव करना पड़ता है। जहाँ अदालतें महज़ सरकती हैं, सत्ताएँ सोचा करती हैं, संस्थाएँ दावे करती हैं और मन थरथराया करता है—वहाँ कविताएँ शर्म और धर्म को बचाए रखने का हौसला और मन में बुदबुदाता मंत्र बन जाती हैं। इन कविताओं में इतनी ताक़त है कि वे कह लेती हैं—थी.हूँ..रहूँगी...। तिहाड़ में उपजी इन कविताओं में आपको उधड़ चुकी कई लोरियों का अहसास होगा।”
—विमला मेहरा, वर्तिका नन्दा
यह किताब उन औरतों की है जिनका जिस्म क़ैद है, पर मन नहीं। इसमें तिहाड़ की चार महिला क़ैदियों की कविताएँ हैं जो उन्होंने सींखचों के पीछे रहकर लिखी हैं। कविताओं के साथ इसमें जेल नम्बर 6 की दुर्लभ तस्वीरें हैं जो इन्होंने ख़ुद ली हैं। मक़सद है—पाठक को उस जगह से परिचित करवाना जिसका नाम है—तिहाड़।
Book Details
-
ISBN9788126725656
-
Pages139
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ये कभी-कभी कुछ ख़ुशबुएँ भी हैं,
जो जाने कौन-सी दिशा से किस सरहद के पार,
किस ज़हन में घुलीं, एक बेपरवाह बादल पर सवार हम तक पहुँच जाती हैं।
सिर्फ़ एक कहानी कहाँ है?
ये लम्हों की झालर है और इस बार
बिट्टु सफ़ीना संधू की इस झालर को नाम मिला है—‘सोनाशा’।
सोनाशा एक अहसास है ज़रा धीमे
ये उतरना इसके पन्नों की दहलीज़ पर
सोनाशा मुस्कुराहट तो ओढ़ती है
ज़रा सा कुरेदो तो ख़ामोश कुछ चीख़ें भी हैं
जो रूह की गुफा से ज़ुबान तक का सफ़र
तय नहीं कर पाती आँखों में तैर ज़रूर जाती है
कुछ अहसास हैं जो मुहब्बत को इश्क़ और इश्क़
को ख़ुदा बना देने का जिगर रखते हैं पर क्या हो
जब कोई ख़ुदा बनने से डर जाये?
जहाँ ख़ुदा से सजदा भी है, शिकवा भी है
सब कुछ समेट कर कुछ कविताएँ हैं
ये बिट्टु सफ़ीना संधू से जन्मी है भी और नहीं भी...क्योंकि अब जो इसे पाल पोसकर बड़ा किया है, क्या पता कौन सी ‘सोनाशा’ आप में से किस में समा जाए।
—बलप्रीत
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