Prarthnaye Kuchh is Tarah se Karo
Author:
Mukesh NirvikarPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 401.8
₹
490
Available
मुकेश निर्विकार की कविताओं में एक जागृत प्रतिरोध के साथ-साथ असीम जिजीविषा प्रतिबिम्बित होती है जो कवि और उसकी कविताओं की शक्ति है। —अश्वघोष, ('निकट' पत्रिका से) मुकेश निर्विकार की कविताओं की विशेषता है कि वह दार्शनिक धरातल पर चीज़ों को देखते हैं, मगर उससे कविता में कहीं भी उलझाव नहीं आने देते। बल्कि, दर्शन विसंगतियों को संघनित कर देखने के काम आता है। उनकी कविताएँ गूढ़ यथार्थ को बहुत पारदर्शी ढंग से सामने लाती हैं। कविताएँ कभी सृष्टि के रहस्यों पर बातें करती हैं तो कभी रोटी की मुश्किलों पर। कवि पूरे जीवन-जगत का सीधा मुकाबला करता है। —मनोज कुमार झा, ('पाखी' पत्रिका से) 'हत्यारी सदी में जीवन की खोज' की कविताओं के ज़रिए कवि ने अंधेरों की पुनर्रचना करते हुए निरन्तर अराजक हो रहे समय के क्रूर-यथार्थ को उजागर किया है। समग्र रूप में सभी कविताएँ जीवन के उजास की कविताएँ हैं। इनमें सर्वत्र एक गहरी आशावादिता के युगबोध का 'अंडर-करेन्ट' है। कई कविताओं का कथ्य तो विचलित कर देने वाला है। विलक्षण काव्य-भाषा के ज़रिए कवि ने ढेरों मौलिक बिम्ब रचे हैं, जिनकी सतरंगी छवियाँ किसी पाठक को सहज ही सम्मोहित कर देती है। मानवीय सरोकारों से जुड़ी और उनके कोमल भावों को दीमक की तरह चाटती क्रूर विसंगतियों का कवि ने सहज ही चित्रण किया है। रोज़ी-रोटी की तलाश में भटकता कामगार हो या महानगरीय जीवन के संत्रास को भोगता आम आदमी, कवि की नज़र हर तरफ है। जनसत्ता कुछ लोग कविता में जीवन की तलाश करते हैं। कुछ लोग कविता में जीवन को ढूँढ़ लेते हैं। मुकेश निर्विकार ने जि़न्दगी को कविता में इस तरह उतारा है कि उनकी कविताएँ दोनों तरह के लोगों के काम आती है। सरल और सहज शब्दों के ज़रिये भी उनकी कविताओं में कटाक्ष का स्वर बुलन्द है। अमर उजाला
ISBN: 9789391925871
Pages: 160
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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लेकिन वह कविता निर्जन की नहीं है, पहाड़ से लेकर मैदानों, शहरों और घर से लेकर दुनिया तक फैला उनके सरोकारों का एक बड़ा संसार वहाँ ऐसी भाषा में अभिव्यक्त होता रहा जो अपनी संरचना में अनायास ही विश्वसनीय और पारदर्शी है, जो अपनी धीरता और दृढ़ता के साथ फौरन आपकी अपनी अभिव्यक्ति हो जाती है।
आज जब मूढ़ता और मूर्खता समाज और राजनीति के सर्वाधिक प्रकाशित और वाचाल घटक हो चले हैं, हमें एक ऐसी अन्तर्यात्रा की ज़रूरत है जो हमें इस दिशाहीन शोर के बीच अकंप रख सके। मंगलेश डबराल की कविताओं के साथ यह यात्रा की जा सकती है।
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Description:
ज्ञानेन्द्रपति के कवि-कर्म ने कविता-प्रेमी हिन्दी जनता को आश्वस्त किया है कि जन-मन को सींचने-सँवारने वाली और ‘जन-शत्रु जीवन-शत्रु’ ताक़तों से लोहा लेनेवाली कविता-धारा आज के सुहावन भुलावन समय में भी सूखी नहीं है। कवि के पिछले संग्रह ‘गंगातट’ में स्थानिकता के जल-दर्पण में आज के वैश्विक समय की थाह मिली थी, तो ‘संशयात्मा’ का परिसर विश्व-विस्तृत है, जिसके केन्द्र में एक भारतीय अन्तःकरण है—करुणा से आप्लावित और सात्त्विक क्रोध से संतप्त।
‘संशयात्मा’ की कविताओं में हमारे समय की साँवली सच्चाइयाँ दर्ज हैं, दूधिया मिथ्याओं को सहज ही अनावृत करती हुईं। यहाँ झारखंड के पहाड़ों का अरण्यरोदन सुना जा सकता है और महानगर के कोलाहल में अनसुनी रह जानेवाली वह टेर भी जो अधरात लौटकर नींद के मुँदे कपाट खड़काती है। यहाँ इथियोपिया एक काली दुबली दौड़ाक लड़की का नाम है। यहाँ हवाई द्वीप के अपने दलदली ठिकाने में, इकला बचा, विदागीत गाता हुआ ओ-ओ आ-आ पाखी कभी नहीं मिले साइबेरियाई सारसों को सम्बोधित है जो उसके पीछे अनस्तित्व के आकाश में उड़ जानेवाले हैं। मिट रही प्रजातियों और नष्ट हो रही जैव विविधताओं का शोक-लेख इतना मार्मिक है कि मानवता की जयगाथा को मानवीयता की अपमृत्यु का अंदेशा कवलित कर लेता है। रह-रह हिंस्रता के हवाले होता मानव-मन हो, या सीवनों पर उधड़ता समाज—कवि की देखती-लेखती आँख अपलक खुली रहती है। सत्य का निष्कवच साक्षात्कार कवि-कर्म को अनायास उस उपक्रम में बदल देता है जिसे मुक्तिबोध ‘सभ्यता-समीक्षा’ कहते थे।
ज्ञानेन्द्रपति की काव्य-भाषा केवल इस मा’नी में समकालीन चलन से अलग नहीं कि वहाँ न देशज अपांक्तेय है, न तत्सम अछूत; बल्कि इसलिए भी कि वह ज़िन्दगी की धाह से अपना उजास पाती है; उसके शब्द धूल-गर्द और वनफूलों के परागकणों से अटे हैं। कविता केवल भाषा से रची ही नहीं जाती, वह भाषा को भी रचती चलती है और यह काम ज़िन्दगी की निहाई पर होता है—इस तथ्य को भी इन कविताओं को पढ़ते हुए महसूसा जा सकता है। संशयात्मा विनश्यति—गीता की उक्ति है; ‘संशयात्मा’ की कविताओं को पढ़कर बेहिचक यह कहा जा सकता है—संशयात्मा विपश्यति।
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