Bina Munder Ki Chaat
Author:
Prem Ranjan AnimeshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Available
प्रेम रंजन अनिमेष भारतीय लोक की जड़ों में जीवित जिजीविषा के गायक हैं। उनकी कविताएँ हमारे आसपास फैली उन चीज़ों तक पहुँचती हैं जिन्हें हमने अब लगभग देखना बन्द कर दिया है लेकिन इसके बावजूद वे दुनिया को चलाए रखने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। ये कविताएँ न किसी बड़े परिवर्तन का आह्वान करती हैं और न ऊँची हाँक लगाकर हमें कुछ ऐसा करने को कहती हैं जो हमें हमारे अतीत से काटकर किसी नए अनोखे संसार में स्थापित कर दे। भले ही वह कितना भी सुन्दर, कितना भी अद्भुत, कितना भी पूरा क्यों न हो। ये कविताएँ हमें अपने इसी अधूरे संसार में रच-बसकर जीने के सूत्र थमाती हैं। इसके दुखों की सुन्दरता, इसके अभावों का मोहक आकर्षण, इसकी विसंगतियों के भीतर छिपी आन्तरिक लय, और हर हाल में मौजूद उम्मीद, वे चीज़ें हैं जिन पर, लगता है कवि को आज के दावों-वादों की बड़बोली दुनिया में सबसे ज़्यादा यक़ीन है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यही यक़ीन इस देश का सबसे बड़ा सम्बल आज भी है जब हर तरफ़ क़िस्म-क़िस्म के उद्धारकर्ता अपने-अपने ढंग से अपना-अपना उद्धार कर रहे हैं। ‘किसी बच्चे के कुछ सवाल लिए चला आया हूँ/एक सहपाठी के इम्तिहान कैसे गए जानना चाहता हूँ.../’ (पहली गली); ‘भरी हुई गाड़ी में/कैसे कहाँ रखूँ/टपटप चूता अपना छाता/जो बचाकर यहाँ तक लाया?’ (मनुष्यता); ‘इस विकसित तंत्र में/है नहीं ऐसा जरिया/जो पहुँचा पाए/रास्ते में पड़े एक पाँव के जूते को/उसके संगी तक...मैं ईश्वर को देखना चाहता हूँ इस नन्ही दुनिया में/अपने बड़े पाँव में एक नन्हा जूता पहने/दूसरे की तलाश में...’ (एक पाँव का जूता)।</p>
<p>धीमी आँच पर सिंकती-सेंकती ऐसी अनेक कविता-पंक्तियाँ, अनेक कविताएँ हैं जिन्हें आप उपलब्धियों की तरह हमेशा साथ रखना चाहेंगे। लोकभाव को बहुत गहरे में जीने और पुनर्रचित करनेवाले प्रेम रंजन अनिमेष इस संग्रह में पुन: साबित करते हैं कि लोक-बिम्ब काव्य-प्रविधि मात्र नहीं हैं, वे वैकल्पिक जीवन-दृष्टि के संवाहक हैं।
ISBN: 9788126729739
Pages: 160
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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—जावेद अख्तर
कविता किसे कहते हैं? वह शब्द है या शब्दार्थ? भाव है या भाव का भाषिक विस्फोट या फिर अति संवेदनशील लोक-मानस की असाधारण भाव प्रतिक्रिया—इस सब पर बरसों से विचार होता चला आ रहा है और समाज और कला-संस्कृति की परम्परा में इस सबको अलग-अलग समयों में स्वीकार-प्रतिस्वीकार किया जाता है।
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यह संकलन सम्पूर्ण निराला-काव्य का परिचय देने के लिए नहीं, बल्कि इस उद्देश्य से तैयार किया गया है कि इससे पाठकों को उसकी मनोहर तथा उदात्त झाँकी-भर प्राप्त हो, जिससे वे उसकी ओर आकृष्ट हों और आगे बढ़ें।
निराला की ख़ासियत क्या है? वे प्रचंड रूमानी होते हुए भी क्लासिकी हैं, भावुक होते हुए भी बौद्धिक, क्रान्तिकारी होते हुए भी परम्परावादी तथा जहाँ सरल हैं, वहाँ भी एक हद तक कठिन। उनकी अपनी शैली है, अपनी काव्य-भाषा। अभिव्यक्ति की अपनी भंगिमाएँ और मुद्राएँ।
यह सर्वथा स्वाभाविक है कि उनके निकट जानेवाले पाठकों से यह अपेक्षा की जाए कि उनका काव्यानुभव बच्चन, दिनकर या मैथिलीशरण गुप्त तक ही सीमित न हो। जब वे किंचित् प्रयासपूर्वक उक्त कवियों से हटकर उनके काव्य-लोक में प्रवेश करेंगे, तो पाएँगे कि उनकी तुलना में वे उनके ज़्यादा आत्मीय हैं।
निराला के प्रसंग में सरलता का यह मतलब क़तई नहीं है कि उनकी कविताएँ पाठकों के मन में बेरोक-टोक उतर जाएँ। कारण यह है कि उनके लिए काव्य-राचन सशक्त भावनाओं का मात्र अनायास विस्फोट नहीं था, बल्कि वे अपनी प्रत्येक कविता को किंचित् आयासपूर्वक पूरी बौद्धिक सजगता के साथ गढ़ते थे। स्वभावतः उनकी सम्पूर्ण अभिव्यकि कलात्मक अवरोध से युक्त है, जिसे ग्रहण करने के लिए थोड़ा धैर्य और श्रम आवश्यक है।
इस पुस्तक में निराला के काव्य-विकास की तीनों अवस्थाओं—पूर्ववर्ती, मध्यवर्ती और परवर्ती—की सौ चुनी हुई सरल कविताएँ संकलित की गई हैं, प्राय रचना-क्रम से। आरम्भिक दोनों अवस्थाओं में सृजन के कई-कई दौर रहे हैं, कविता और गीत के, जिसकी सूचना अनुक्रम से लेकर पुस्तक के भीतर सामग्री-संयोजन तक में दी गई है।
पाठक मानेंगे कि यह कविता की एक नई दुनिया है, अधिक आत्मीय और प्रत्यक्ष, जिसे भाषा सजाती नहीं बल्कि अपनी भीतरी शक्ति से खड़ी करती है।
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- Description: शमशेर के यहाँ कविता मनुष्य की सबसे अनश्वर रचना है : वह समयविद्ध होते हुए भी समयातीत है। न तो इतिहास के सबसे दयनीय शिकार तानाशाह कविता लिख सकते हैं और न ही विचारधारा की जुगाली करते गम्भीर उपदेष्टा ही। ऐतिहासिक राजनीति को परास्त करती हुई कविता भाषा की कालातीत राजनीति है। शमशेर कालातीत के कवि हैं, उनकी काँपती-सी आवाज़ हमारी दुनिया की ऐसी सिम्तें दिखाती है जिनके होने का पता जैसे पहली बार उससे ही चलता है पर जिन्हें जाने बिना हमारी दुनिया अधूरी और अधसमझी ही रह जाती। उनकी दुनिया टूटी हुई, बिखरी हुई है, पर अपनी सुन्दरता और अर्थमयता में मुकम्मल। उसमें टूटे-बिखरे हुए से ही अपनी सजग, पर सहज, संयमित, पर तनाव-भरी मानवीयता सहेजने और हम तक पहुँचने की संकोच और सन्देह-भरी चेष्टा है। उसमें होने का, हमारे समय में मनुष्य होने के आश्चर्य और रहस्य का अर्थ और विचार का अद्वितीय संगुम्फन है। उनकी दुनिया हमारी जानी-पहचानी दुनिया से रगड़ खाती दुनिया है, पर ऐसी संरचना भी, जिसे हम शमशेर के बनाए बिना कभी न देख पाते। लगभग आधी सदी से शमशेर अपने ही ढंग की कविता-जद पर, संकोच से, लेकिन अड़े रहे हैं। उन्होंने इस तरह जो जगह बनाई है, वह धड़कती और रौशन है। अलग, पर इतने पास अपने, वह इतिहास में है और सच्ची आत्मविश्वस्त कविता द्वारा किया गया इतिहास का अतिक्रमण भी।
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