Aab Katek Chup Rahoo
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<span lang="HI">दीप नारायण अपन जीवनक भोगल यथार्थकेँ अपन शब्द-शिल्प</span>, <span lang="HI">उद्भावना आ कुशल अभिव्यक्तिक माध्यमे समकालीन मैथिली कविताक क्षेत्रमे अपन बेछप उपस्थिति दर्ज कएलनि अछि।</span><br />—<span lang="HI">तारानन्द वियोगी</span><br /><span lang="HI">दीप नारायणक कवितासँ समकालीन मैथिली कवितामे निस्संदेह सम्भावनाक एकटा नव बाट फुजैत अछि।</span><br />—<span lang="HI">नारायणजी</span><br /><span lang="HI">दीप नारायण मैथिलीक लोकप्रिय कवि छथि। मैथिली कविता आ समकालीन भारतीय कविता हिनक लेखनीसँ समृद्ध हैत।</span><br />—<span lang="HI">विद्यानन्द झा</span><br /><span lang="HI">दीप नारायण</span>, <span lang="HI">सरल सुबोध भाषामे दैनिक जीवनक बहुत रास शब्द जकर अंकुरण मिथिलाक माटिपानिमे भेलैक</span>, <span lang="HI">ओकरा अपन रचनात्मक कौशलसँ प्रभावी अर्थ दए</span>, ‘<span lang="HI">आब कतेक चुप रहू</span>’ <span lang="HI">लिखि एकटा सार्थक काज कएलनि अछि। प्रयुक्त प्रतीक-विम्बमे मानवीय-संवेदनाक अन्तर्वर्ती सौन्दर्य कवितासभकेँ विशिष्ट बनबैत छैक।</span><br /><span lang="HI">लोक</span>–<span lang="HI">संवेदनाक एहि कविक लिखबाक अपनहि ढ</span>’<span lang="HI">ब-ढर्रा छनि। जीवनक भोगल यथार्थकेँ अनुभूतिक र</span>’<span lang="HI">हीसँ र</span>’<span lang="HI">हिक</span>’ <span lang="HI">मानवीय संवेदनाक प्रतीति गढ़बामे निष्णात कवि दीप नारायणक कविताक बगएमे फूटल बकार समकालीन मैथिली कविताक एक विशिष्ट हाक भ</span>’ <span lang="HI">सकैत अछि।</span><br /><span lang="HI">अपन मौलिक शिल्पगत वैशिष्ट्यसँ काव्य-जगतमे फूट पहिचानक संग ई प्रतिष्ठित होएताह से हमर विश्वास अछि।</span><br />—<span lang="HI">कीर्ति नारायण मिश्र</span>
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<span lang="HI">दीप नारायण अपन जीवनक भोगल यथार्थकेँ अपन शब्द-शिल्प</span>, <span lang="HI">उद्भावना आ कुशल अभिव्यक्तिक माध्यमे समकालीन मैथिली कविताक क्षेत्रमे अपन बेछप उपस्थिति दर्ज कएलनि अछि।</span><br />—<span lang="HI">तारानन्द वियोगी</span><br /><span lang="HI">दीप नारायणक कवितासँ समकालीन मैथिली कवितामे निस्संदेह सम्भावनाक एकटा नव बाट फुजैत अछि।</span><br />—<span lang="HI">नारायणजी</span><br /><span lang="HI">दीप नारायण मैथिलीक लोकप्रिय कवि छथि। मैथिली कविता आ समकालीन भारतीय कविता हिनक लेखनीसँ समृद्ध हैत।</span><br />—<span lang="HI">विद्यानन्द झा</span><br /><span lang="HI">दीप नारायण</span>, <span lang="HI">सरल सुबोध भाषामे दैनिक जीवनक बहुत रास शब्द जकर अंकुरण मिथिलाक माटिपानिमे भेलैक</span>, <span lang="HI">ओकरा अपन रचनात्मक कौशलसँ प्रभावी अर्थ दए</span>, ‘<span lang="HI">आब कतेक चुप रहू</span>’ <span lang="HI">लिखि एकटा सार्थक काज कएलनि अछि। प्रयुक्त प्रतीक-विम्बमे मानवीय-संवेदनाक अन्तर्वर्ती सौन्दर्य कवितासभकेँ विशिष्ट बनबैत छैक।</span><br /><span lang="HI">लोक</span>–<span lang="HI">संवेदनाक एहि कविक लिखबाक अपनहि ढ</span>’<span lang="HI">ब-ढर्रा छनि। जीवनक भोगल यथार्थकेँ अनुभूतिक र</span>’<span lang="HI">हीसँ र</span>’<span lang="HI">हिक</span>’ <span lang="HI">मानवीय संवेदनाक प्रतीति गढ़बामे निष्णात कवि दीप नारायणक कविताक बगएमे फूटल बकार समकालीन मैथिली कविताक एक विशिष्ट हाक भ</span>’ <span lang="HI">सकैत अछि।</span><br /><span lang="HI">अपन मौलिक शिल्पगत वैशिष्ट्यसँ काव्य-जगतमे फूट पहिचानक संग ई प्रतिष्ठित होएताह से हमर विश्वास अछि।</span><br />—<span lang="HI">कीर्ति नारायण मिश्र</span>
Book Details
-
ISBN9789390971961
-
Pages127
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह संस्करण उसी परिमार्जित एवं शुद्धतम पाठ की प्रस्तुति है जिसका आरम्भ उनकी एक सुदीर्घ भूमिका से होता है। इस भूमिका में प्रो. अग्रवाल ने पाठ-परिमार्जन की इस पूरी श्रम-साध्य प्रक्रिया पर तो प्रकाश डाला ही है, कबीर पर अपने अब तक के अध्ययन से प्राप्त अद्यतन धारणाओं को भी सूत्र रूप में दे दिया है।
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