Aab Katek Chup Rahoo
(0)
₹
175
₹ 140 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
<span lang="HI">दीप नारायण अपन जीवनक भोगल यथार्थकेँ अपन शब्द-शिल्प</span>, <span lang="HI">उद्भावना आ कुशल अभिव्यक्तिक माध्यमे समकालीन मैथिली कविताक क्षेत्रमे अपन बेछप उपस्थिति दर्ज कएलनि अछि।</span><br />—<span lang="HI">तारानन्द वियोगी</span><br /><span lang="HI">दीप नारायणक कवितासँ समकालीन मैथिली कवितामे निस्संदेह सम्भावनाक एकटा नव बाट फुजैत अछि।</span><br />—<span lang="HI">नारायणजी</span><br /><span lang="HI">दीप नारायण मैथिलीक लोकप्रिय कवि छथि। मैथिली कविता आ समकालीन भारतीय कविता हिनक लेखनीसँ समृद्ध हैत।</span><br />—<span lang="HI">विद्यानन्द झा</span><br /><span lang="HI">दीप नारायण</span>, <span lang="HI">सरल सुबोध भाषामे दैनिक जीवनक बहुत रास शब्द जकर अंकुरण मिथिलाक माटिपानिमे भेलैक</span>, <span lang="HI">ओकरा अपन रचनात्मक कौशलसँ प्रभावी अर्थ दए</span>, ‘<span lang="HI">आब कतेक चुप रहू</span>’ <span lang="HI">लिखि एकटा सार्थक काज कएलनि अछि। प्रयुक्त प्रतीक-विम्बमे मानवीय-संवेदनाक अन्तर्वर्ती सौन्दर्य कवितासभकेँ विशिष्ट बनबैत छैक।</span><br /><span lang="HI">लोक</span>–<span lang="HI">संवेदनाक एहि कविक लिखबाक अपनहि ढ</span>’<span lang="HI">ब-ढर्रा छनि। जीवनक भोगल यथार्थकेँ अनुभूतिक र</span>’<span lang="HI">हीसँ र</span>’<span lang="HI">हिक</span>’ <span lang="HI">मानवीय संवेदनाक प्रतीति गढ़बामे निष्णात कवि दीप नारायणक कविताक बगएमे फूटल बकार समकालीन मैथिली कविताक एक विशिष्ट हाक भ</span>’ <span lang="HI">सकैत अछि।</span><br /><span lang="HI">अपन मौलिक शिल्पगत वैशिष्ट्यसँ काव्य-जगतमे फूट पहिचानक संग ई प्रतिष्ठित होएताह से हमर विश्वास अछि।</span><br />—<span lang="HI">कीर्ति नारायण मिश्र</span>
Read moreAbout the Book
<span lang="HI">दीप नारायण अपन जीवनक भोगल यथार्थकेँ अपन शब्द-शिल्प</span>, <span lang="HI">उद्भावना आ कुशल अभिव्यक्तिक माध्यमे समकालीन मैथिली कविताक क्षेत्रमे अपन बेछप उपस्थिति दर्ज कएलनि अछि।</span><br />—<span lang="HI">तारानन्द वियोगी</span><br /><span lang="HI">दीप नारायणक कवितासँ समकालीन मैथिली कवितामे निस्संदेह सम्भावनाक एकटा नव बाट फुजैत अछि।</span><br />—<span lang="HI">नारायणजी</span><br /><span lang="HI">दीप नारायण मैथिलीक लोकप्रिय कवि छथि। मैथिली कविता आ समकालीन भारतीय कविता हिनक लेखनीसँ समृद्ध हैत।</span><br />—<span lang="HI">विद्यानन्द झा</span><br /><span lang="HI">दीप नारायण</span>, <span lang="HI">सरल सुबोध भाषामे दैनिक जीवनक बहुत रास शब्द जकर अंकुरण मिथिलाक माटिपानिमे भेलैक</span>, <span lang="HI">ओकरा अपन रचनात्मक कौशलसँ प्रभावी अर्थ दए</span>, ‘<span lang="HI">आब कतेक चुप रहू</span>’ <span lang="HI">लिखि एकटा सार्थक काज कएलनि अछि। प्रयुक्त प्रतीक-विम्बमे मानवीय-संवेदनाक अन्तर्वर्ती सौन्दर्य कवितासभकेँ विशिष्ट बनबैत छैक।</span><br /><span lang="HI">लोक</span>–<span lang="HI">संवेदनाक एहि कविक लिखबाक अपनहि ढ</span>’<span lang="HI">ब-ढर्रा छनि। जीवनक भोगल यथार्थकेँ अनुभूतिक र</span>’<span lang="HI">हीसँ र</span>’<span lang="HI">हिक</span>’ <span lang="HI">मानवीय संवेदनाक प्रतीति गढ़बामे निष्णात कवि दीप नारायणक कविताक बगएमे फूटल बकार समकालीन मैथिली कविताक एक विशिष्ट हाक भ</span>’ <span lang="HI">सकैत अछि।</span><br /><span lang="HI">अपन मौलिक शिल्पगत वैशिष्ट्यसँ काव्य-जगतमे फूट पहिचानक संग ई प्रतिष्ठित होएताह से हमर विश्वास अछि।</span><br />—<span lang="HI">कीर्ति नारायण मिश्र</span>
Book Details
-
ISBN9789390971961
-
Pages127
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Itane Pas Apane
- Author Name:
Shamsher Bahadur Singh
- Book Type:

-
Description:
अति सूक्ष्म ऐन्द्रिक अनुभूतियों की कविताओं का मजमूआ है ‘इतने पास अपने’। यह संग्रह इस बात का परिचायक है कि शमशेर बहादुर सिंह की कविताएँ रूप और सौन्दर्य की अनुभूतियों में खोती नहीं, बल्कि श्रम से जुड़कर जीवन का यथार्थ बताते हुए कविता के शिखर पर पहुँचती
हैं।दूसरा सप्तक से चर्चित हुए कवि शमशेर बहादुर सिंह को कभी अज्ञेय ने ‘कवियों का कवि’ कहा था और हिन्दी कविता जगत में उनकी पहचान शमशेरियत से हुई थी। इस शमशेरियत की बानगी देखिए—‘बात बोलेगी, हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही।’ यह पंक्ति समकालीन कविता का मुहावरा बन चुकी है। इसमें सन्देह नहीं कि शमशेर हमारे समय के ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी लम्बी काव्य-यात्रा में हिन्दी कविता को समृद्ध किया है। उनकी कविताएँ कवि की प्रतिबद्धता और जिजीविषा का प्रमाण प्रस्तुत करती-सी प्रतीत होती हैं।
प्रकृति-प्रेम और मानवीय रूप-सौन्दर्य शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं के केन्द्र बिन्दु हैं।
Jeevan Karja Gadi Hai
- Author Name:
Avinash Das
- Book Type:

- Description: collection of ghazals
Pyar Karta Hua Koi Ek
- Author Name:
Manoj Kumar Pandey
- Book Type:

-
Description:
प्यार जब जीवन और कविता, दोनों जगह दुर्लभ हो रहा हो, दोनों ही जगह जब समाज और व्यवस्था में उग रहीं विषैली, प्रेमविरोधी और हिंस्र प्रतिक्रियाएँ मुख्यधारा हो रही हों, तब 'प्यार करता हुआ कोई एक' भी बड़ी राहत, और गहरी आश्वस्ति का स्रोत मालूम होता है।
यह कविता-संग्रह उन प्रेमियों के लिए है जिनसे जाने-अनजाने उनका प्रेम खो गया है; और दुखद यह है कि आज के समय में जीनेवाले हम सभी उसी श्रेणी में आते हैं। कभी हम उसे समझ नहीं पाते, कभी उसे सँभाल नहीं पाते क्योंकि हम सिर्फ़ 'प्रेम में होकर' बने रह सकें, इस विकल्प को ही कर सकनेवालों ने असम्भव कर दिया है।
इसलिए ये कविताएँ हम सबके लिए हैं। ये प्रेम की उस खाली जगह से उद्भूत हुई हैं जहाँ से अभी-अभी उठकर कोई गया है, जहाँ अभाव से भरी हुई एक कुर्सी अभी भी रखी है, हिल रही है, लेकिन उसे छूते हुए हमारे हाथ काँपते हैं, जिसे देखकर हमें हमारी अपात्रता याद आती है।
बीती हुई नजदीकियों के चमकीले कणों से दमकती ये कविताएँ विछोह के असीम पठार पर प्रेम के सबसे गहन सत्य की खोज में भटकती हुई हमें प्रेम की कीमत समझाती हैं। बताती हैं कि जब वह होता है तब भी, और जब नहीं होता तब भी, वह अमूल्य है, वह हर रूप में हमें ज्यादा मानवीय और ज्यादा सम्भावनाशील बनाता है। और यह कि, उसके 'होने' और 'न होने' से परे का प्रेमच्युत संसार कुछ भी नहीं है। 'मुझसे लिपटती है मेरी जान/वो मुझे खाती है मैं उसे/मैं उसकी बाँहों में मजे से मर जाता हूँ।'
ये कविताएँ हमें कोंचकर पूछती हैं कि 'मजे से मरे' हुए हमें कितनी सदियाँ बीत गई हैं; कि कितना वक्त हो गया है हमें किसी की तलाश में भटककर खुद से जा मिले हुए।
ये कविताएँ प्रेम के अभाव में जीने के हमारे अभ्यास को तोड़ती हैं; वियोग की
अलग-अलग कन्दराओं से आहों की तरह निकली ये पंक्तियाँ हमें पुन: प्रेम की अबूझ दुनिया में जाने को उकसाती हैं।
Pran-Bhang Tatha Anya Kavitayen
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: ं वर्तमान संग्रह को अपनी प्रारम्भिक रचनाओं का संग्रह बनाना चाहता था और इसका मुख्य रूप वही है भी। किन्तु पुरानी बहियों को उलटते-पलटते समय कुछ कविताएँ और मिल गईं, जिन्हें प्रारम्भिक रचनाएँ तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु जो उसी न्याय से प्रकाश में आने के योग्य हैं, जिस न्याय से कवि की प्रारम्भिक रचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं।' दिनकर जी के इस कथन से स्पष्ट है कि यह उनकी प्रारम्भिक कविताओं का संग्रह है। बावजूद इसके यह उनका एक ऐसा संग्रह भी है जिसके महत्त्व को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में उल्लेख किया है। प्रस्तुत संग्रह में एक लघु खंड काव्य 'प्रण-भंग' नाम से है जो महाभारत युद्ध में घटित श्रीकृष्ण के शस्त्र-ग्रहण की घटना पर आधारित है जिसे दिनकर जी ने खुद 'जयद्रथ-वध' के अनुकरण पर लिखा गया माना है। इस खंड काव्य में परम्परा और आधुनिकता का अन्तर्विरोध अपनी तार्किकता के साथ है। यही नहीं, इसमें भक्ति भी अपनी आस्था के साथ रूपायित हुई है। ‘प्रण-भंग’ के अलावा संग्रह की स्फुट कविताओं–‘शहीद अशफाक के प्रति’, ‘वायसराय की घोषणा पर’, ‘महात्मा गांधी’, ‘शहीदों के नाम पर’, ‘मूक बलिदान’, ‘तपस्या’, ‘शहीद’ आदि–में हम स्वर्णिम अतीत के प्रति संवेदनशीलता और अपने यथार्थ के प्रति अन्तर्विरोध को गहरे लक्षित कर सकते हैं। वहीं पुस्तक के अन्त में संगृहित अट्ठाईस क्षणिकाओं में सामाजिक पीड़ा और सांस्कृतिक चिन्तन है, तो सत्ता की शोषक-प्रवृत्ति के प्रति धारदार नज़रिया भी है जिसे इन पंक्तियों में देखा जा सकता है–‘राजा/तुम्हारे अस्तबल के/घोड़े मोटे हैं।/प्रजा भूखी और नंगी है।/घोड़ों को कोई अभाव नहीं।/लेकिन लोगों को हर तरफ़ की तंगी है।’ ‘प्रण-भंग और अन्य कविताएँ’ संग्रह के बारे में दिनकर जी के ही शब्दों को लेकर कहें तो यह उनके 'सम्पूर्ण काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालता है
Shame-Shehre-Yaran
- Author Name:
Faiz Ahmed 'Faiz'
- Book Type:

- Description: ‘ग़ुबारे-अय्याम’ फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की आख़िरी कविता पुस्तक है जिसका प्रकाशन उनके निधन के बाद हुआ था। साल 1981 से 1984 के बीच लिखी गईं इन नज़्मों और ग़ज़लों का मुख्य स्वर अपने पूरे जीवन पर दृष्टिपात करने जैसा है। जैसाकि हमें मालूम है उनका निजी और सार्वजनिक जीवन असाधारण ढंग से घटनाप्रधान रहा। जेल भी गए और जीवन के कई साल निर्वासन में भी गुज़ारे। ‘ग़ुबारे-अय्याम’ की पहली कविता ‘तुम ही कहो क्या करना है’ में फ़ैज़ ने प्रगतिशील सोच वाले उन तमाम लोगों के संघर्ष को शब्द दिए हैं जिन्होंने पूरी मानवता के लिए बराबरी और इज़्ज़त के सपने देखे थे; जो जवान हौसलों के साथ एक बड़ी दुनिया बनाने निकले थे, लेकिन उन्हें गहरी निराशा मिली—‘जब अपनी छाती में हमने/इस देस के घाओ देखे थे/था वेदों पर विश्वास बहुत/और याद बहुत से नुस्ख़े थे/...’ पर घाव इतने पुराने और जटिल थे कि ‘वेद इनकी टोह को पा न सके/और टोटके सब बेकार गए’। ‘ग़ुबारे-अय्याम’ में संकलित ‘एक नग़्मा कर्बला-ए-बेरूत के लिए’, ‘एक तराना मुजाहिदीने-फ़िलस्तीन के लिए’, ‘हिज्र की राख और विसाल के फूल’ तथा ‘आज शब कोई नहीं है’ जैसी नज़्में और ग़ज़लें उनके आख़िरी दिनों की पीड़ा को व्यक्त करती हैं लेकिन उम्मीद से ख़ाली वे भी नहीं हैं।
Prasad Ka Sampoorna Kavya
- Author Name:
Satyaprakash Mishra
- Book Type:

-
Description:
कवि जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी कविता में 'छायावादी काव्य आन्दोलन' के जनक, प्रवक्ता और उन्नायक हैं। उन्होंने खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में अनिर्णय के प्रथम दौर से मुक्त करके उसे अद्भुत रूप से समृद्ध और अभिव्यक्ति सम्पन्न बनाया। उनकी काव्य भाषा में गहरी अनुभूति सम्पन्नता और रोमांसलता का एक सांस्कारिक तेवर विद्यमान है। गोस्वामी तुलसीदास की तरह ही वे भाषित संक्षिप्तता और बिम्बात्मक क्षमता का मर्म पहचानने वाले कवि हैं।
‘गीति तत्त्व’ प्रसाद की कविता का दूसरा प्रमुख गुण है। अनुभूतियों की भीतरी झनझनाहट उनके गीतों से लेकर उनके महाकाव्य 'कामायनी' तक में समान रूप से विद्यमान हैं। प्रसाद अपनी कविताओं के माध्यम से मनुष्य जाति की उन्हीं अनुभूतियों को चित्रित करते हैं जिनमें एक भीतरी करुणा का आवेश हो और जो शब्द का स्पर्श पाते ही संगीत की प्राणवक्ता से झंकृत हो उठें। ‘झरना’, ‘आँसू’ और ‘लहर’ के गीत इसका प्रमाण तो हैं ही, ‘कामायनी’ की सम्पूर्ण अर्थवत्ता इसी गीत्यात्मक अनुगूँज से भ्री हुई है।
प्रसाद का अपने सारे ऐतिहासिक, दार्शनिक और ‘मिथकीय’ आवरण के बावजूद अपने वर्तमान में ही प्रामाणिक है। इतिहास, दर्शन और पुराण-कथाओं का उपयोग प्रसाद जी ने अपनी संस्कृति धरोहर को पुनरुज्जीवित करने के लिए तो किया ही है, उसके माध्यम से अपने समय के भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन के मुख्य तेवर को पहचानने का काम भी वे करते हैं। इसीलिए उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता का एक गहरा सरोकार विद्यमान है।
Sukh Ko Bhi Dukh Hota Hai
- Author Name:
Shruti Kushwaha
- Book Type:

- Description: श्रुति की कविता का मानवीकरण किया जाए तो वह दिखेगी कच्ची लकड़ी के धुएँ से घिरी उस स्त्री की तरह जो जीवन का बुझता चूल्हा पूरे प्राणपण से फूँके जा रही है। कभी इधर से उचकुन लगाती, कभी उधर से यानी कभी इस ध्रुवान्त से, कभी उस ध्रुवान्त से और अन्त में उसकी धौंकनी देखती है कि आग तो दोनों ध्रुवान्तों के बीच से निकलती ऊर्ध्वमुखी हुई जा रही है। न इस अतिरेक में, न उसमें बल्कि उस सम्यक् दृष्टि में जो बुद्ध और गांधी की है : ‘जिन्होंने दुख दिया/उनके लिए अतिरिक्त उदार’, ‘जब भी मिलूँ ख़ुद से, आँखें नीची न हों’, ‘छोड़ना सबसे आसान हो जब, तब रोक लेना उसे’, ‘कड़वी बात निगल जाएँ बुख़ार की गोली की तरह’—इस तरह के कई आप्त वाक्य मिलेंगे इस संग्रह में जो यह सिद्ध करते हैं कि वैयक्तिक नैतिकता में इनकी आस्था है और ये बख़ूबी समझती हैं कि स्वयं में आचरणगत परिवर्तन घटित किए बिना कोई स्थायी परिवेशगत परिवर्तन असम्भव है। इस महीन प्रज्ञा पारमिता के बिना जीवन का गम्भीर सत्य अदेखा ही छूट जाता है—‘माँ की कोख’ और ‘पेड़ की जड़ों’ की तरह। जो भी ‘बत्तीस दिसम्बर’ को घटना है, यानी कि कभी नहीं घटना, उस बदलाव में और जो ‘रेगुलेटर’ से मौसम सँवारता है, उस परिवर्तन में कवि की आस्था नहीं है। वह हैरान है यह देखकर कि दुनिया ने चकित होना छोड़ दिया है, जबकि उसके लिए तो प्रकृति से निःशब्द ध्वनियाँ सीखने का सिलसिला ख़त्म ही नहीं होता। तभी तो उसके लिए पूरी पृथ्वी ही प्रेमपत्र है। वाक् संयम और कुछ प्रसिद्ध कविताओं से अन्तःपाठीय संवाद इस संग्रह को एक अलग खनक देते हैं। —अनामिका
Ishq hai Surma-e-Deewanagi
- Author Name:
Shah Niyaz Ahmad Barelvi
- Book Type:

- Description: शाह नियाज़ अहमद साहब के फ़ारसी, उर्दू और हिन्दवी कलाम का संग्रह पहली बार हिंदी पाठकों के समक्ष आ रहा है, जिस में शाह नियाज़ अहमद बरेलवी द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध कलाम शामिल हैं. किताब का संपादन सुमन मिश्र ने किया है..
Itani Paas Tumhare
- Author Name:
Anuradha Sharma
- Book Type:

- Description: Aसात साल की अबोध बच्ची कहती है मुझसे— दादी माँ, आप कभी बूढ़े मत होना। सुना है बूढ़े लोग मर जाते हैं और मैं किसी भी अपने को खोना नहीं चाहती। ____ तुम्हारे बेइंतहा प्यार ने दी जुबान मेरे खयाल को तुम्हारी चाहतों के फूल महकाते हैं डाल-डाल को। ये खयाल है छलावा ये महक है महज सपना यह जानती हूँ मैं फिर भी तुम्हारे अहसास का अहसान बहुत मानती हूँ मैं।
Shahar Is Taraf Hai
- Author Name:
Shaheen Abbas
- Book Type:

- Description: शाहीन अब्बास को पढ़ते समय उनके यहाँ मौजूद मुश्किल ख़यालों को रवानी से बयान कर देने की ख़ूबी जिस तरह उजागर होती है, वह एक ख़ुशगवार हैरत से दो-चार करवाती है। उनके कलाम में रिवायत और जदीदियत का ऐसा मिलन है जो आम तौर पर शायरी करने वाले दूसरे शायरों के यहाँ इस ख़ूबसूरती से कम ही अपनी जगह बना पाता है। शाहीन अब्बास की ग़ज़ल को पढ़े बग़ैर इस दौर की शेरी समझ को पूरी तरह ख़ुद में उतार पाना ना-मुमकिन-सा काम है। वह अपनी शायरी में शहर के बदलते हुए इनसान, जज़्बों की टूट फूट और सियासत को भी कई बार उस बारीक ऐनक से देखते हैं, जिसकी वजह से उनकी ग़ज़ल में मौजूद इशारे पढ़ने वाले पर ज़्यादा आसानी से वाज़ेह होते चले जाते हैं। वह पिछले तीस-पैंतीस बरस से ग़ज़ल की दुनिया में अपने अनोखे उस्लूब का जादू जगा रहे हैं और उनकी आवाज़ वक़्त के साथ-साथ और मज़बूत होती जा रही है। आसान ज़बान और दुश्वार ख़यालात से बुनी गई उनकी ग़ज़ल ‘इश्क़-ओ-आशिक़ी’ के अलावा वुजूद और ज़हन से जुड़े मसलों की तरफ़ भी बख़ूबी इशारे करती है। वह हर लिहाज़ से एक ना-क़ाबिल-ए-फ़रामोश शायर हैं, जिन्होंने अपने ज़माने में ही अपनी बेहतरीन शेरी और फ़िक्री दुनियाओं के नक़्शे बना लिए हैं। उनको पढ़ कर शेर कहने का सच्चा सलीक़ा सीखा जा सकता है।
Tarapath
- Author Name:
Sumitranandan Pant
- Book Type:

-
Description:
‘तारापथ’ का यह परिवर्धित संस्करण पंत जी के समग्र काव्य-साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है। ‘वीणा’ से लेकर अधुनातन कृति ‘संक्रान्ति’ तक के काव्य-संग्रहों से उनकी रचनाओं का सुरुचिपूर्ण चयन इसमें प्रस्तुत किया गया है। इस संकलन की विशेषता यह है कि इसमें पंत जी की नवीनतम कृतियों का प्रतिनिधित्व पाठकों को मिलेगा।
पंत जी ने इस युग को एक ‘महासंक्रान्ति युग’ कहा है। इस महासंक्रान्ति काल की कविता में आस्था और लोकमंगल को प्रतिष्ठित करना किसी भी साधारण प्रतिभा और जीवन-दृष्टि के कवि के बूते के बाहर की बात है। जबकि विघटन, विशृंखलता, नैतिक मूल्यों का ह्रास चारों ओर दिखाई पड़ रहा है, उसमें महाकवि पंत का यह स्वप्न (‘मुझे स्वप्न दो, मुझे स्वप्न दो’) एक महान जीवन और विराट आस्था की परिकल्पना करता है। यही वह सन्देश है, जो समस्त पंत-काव्य के अन्दर-ही-अन्दर प्रवाहित होता हुआ हमें मिलता है।
उनका समस्त काव्य अन्तर्मुखता का काव्य न होकर आत्मोत्कर्ष का काव्य है। यह आत्मोत्कर्ष अपनी समग्र संरचना में एक सार्वभौमिक शुभेच्छा तक ले जाता है। इसीलिए उनका काव्य अतीतोन्मुख न होकर वर्तमान के फलक पर भविष्योन्मुखी काव्य है। यह सार्वभौमिक शुभेच्छा ही वह तत्त्व है, जिसके भीतर से कवि पंत ने विश्व-मानव और नव-मानव की परिकल्पना को अपनी कविता में सार्थक किया है। अपनी सम्पूर्ण काव्य-सम्पदा के भीतर से उन्होंने एक नए और निजी अध्यात्म की रचना की है। यह अध्यात्म अपनी मंगलकामना में निजी होते हुए भी ‘स्व’ भावना से पूर्णतया मुक्त है।
Dhoop Se Roothi Chandni
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
- Rating:
- Book Type:

- Description: This book has no description
Itihas Mein Abhage
- Author Name:
Dinesh Kushawah
- Book Type:

-
Description:
दिनेश कुशवाह हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उनकी काव्य-प्रतिभा का क्या कहना! निरन्तर अमूर्त, नीरस, उजाड़ और अपठनीय होती हिन्दी कविता को उन्होंने 'इसी काया में मोक्ष' जैसा मुहावरा दिया जो समकालीन हिन्दी कविता के लिए नया अध्याय साबित हुआ। उनका दूसरा कविता-संग्रह 'इतिहास में अभागे' मानुष सत्यों की बेजोड़ कविताई है। दिनेश जी 'असिधाराव्रती' हैं। तलवार की धार पर चलने में उन्हें मज़ा आता है।
अद्भुत कथन-शैली, देशी मिठास और शास्त्रीय परिर्माजन से भरी भाषा का जो मणिकांचन योग दिनेश कुशवाह की कविता में उपस्थित होता है, अन्यत्र दुर्लभ है। कल्पना, प्रतीकों और बिम्बों से सज्जित अपनी कविता में वे वैज्ञानिक-दार्शनिक तर्कों के साथ ऐसी सरसता न जाने कहाँ से लाते हैं। जबकि वैचारिक आधार और राजनीतिक दृष्टि ही उनकी कविता के पाथेय हैं। प्रेम एवं करुणा की जो पुकार दिनेश कुशवाह की कविता में मिलती है, उसके अनुकरण में बार-बार अनेक कवि कंठ फूट पड़ते हैं। वे कबीर की तरह सच को सबसे बड़ा तप मानते हैं, और मुक्तिबोध की तरह अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाना जानते हैं।
'चल्लू भर पानी का सनातन प्रश्न', 'भूमंडलीकृत आषाढ़ का एक दिन', 'महारास', 'आज भी खुला है अपना घर फूँकने का विकल्प', 'उजाले में आजानुबाहु', 'इतिहास में अभागे', 'मैंने रामानन्द को नहीं देखा', 'बहेलियों को नायक बना दिया', 'अच्छे दिनों का डर', 'विश्वग्राम की अगम अँधियारी रात', 'भय सेना', 'प्रेम के लिए की गई यात्राएँ', 'ईश्वर के पीछे', 'प्राणों में बाँसुरी' 'हर औरत का एक मर्द है', 'हरिजन देखि', 'यह पृथ्वी बच्चों के लिए है' तथा 'पूछती है मेरी बेटी' आदि कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं।
काव्य विषयों के नवाचार के मामले में तो दिनेश कुशवाह का कोई शानी नहीं है। वे वाणी के उद्भट पंडित और काव्य के मर्मज्ञ कवि हैं। रूढिय़ों, अवैज्ञानिक धारणाओं, अन्धविश्वासों, अविचारित आस्थाओं, नियोजित पाखंडों, सुनियोजित षड्यंत्रों तथा कपट कुचालों पर कठिन कुठाराघाट करने से वे कभी नहीं चूकते। कविता और जीवन, दोनों में उनकी वाक्शक्ति से हतप्रभ विरोधी भी सहज बैर बिसराकर उनका बखान करने लगते हैं।
—शिवमूर्ति
Andhere Se Bahar Nikalate Huye
- Author Name:
Amar Kushwaha
- Book Type:

- Description: ‘अँधेरे से बाहर निकलते हुए’ अमर कुशवाहा की बहुत सहज और सीधी लेकिन अर्थवान कविताओं का पहला संग्रह है। अपनी जमीन, अपनी जिन्दगी, अपने संघर्षों की कथा कहती ये कविताएँ मानवीय संवेदनाओं को एक नई दृष्टि देती हैं, साथ ही कविता के माध्यम से समाज को एक नए रूप में संस्कारित करने का प्रयास भी करती हैं। समाज की यांत्रिकता, बाजारूपन एवं व्यक्ति के संवेदनहीन होते जाने की समस्या को उकेरती ये कविताएँ विकासशील भारत के एकपक्षीय विकास को रेखांकित करते हुए जीवन से साहित्य एवं संस्कृति के लुप्त हो जाने पर चिन्ता भी प्रकट करती हैं। समकालीन जीवन को अपनी कविता का विषय बनाता कवि इन कविताओं में समय के दर्द को भी चित्रित करता है और आधुनिक जीवन की आकुलताओं-व्याकुलताओं को एक नया स्वर देता है। ये स्वर यथार्थ की तह तक जाने के स्वर हैं, जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद के स्वर हैं, दैनिक जीवन के गणित के स्वर हैं, व्यवस्था के स्वर हैं और समाज के मार्मिक प्रसंगों के स्वर हैं। इन कविताओं का खासतौर पर देखने लायक पक्ष ये है कि आधुनिक जीवन-शैली के अनुसार कवि की कविताओं के छंद भी आधुनिक हैं। छंदों में उतार है, चढ़ाव है, लहर है, प्रवाह है, किन्तु इस सबके बावजूद कविताएँ बारम्बार गाँव के सुख-दुःख की ओर लौट आती हैं। गाँव के नदी-नालों, खेत-खलिहानों की ओर लौट आती हैं। समाज और राजनीति में व्याप्त झूठ-फरेब, लूट-खसोट, अत्याचार-अनाचार से क्षुब्ध कवि अपनी स्पष्ट एवं बेबाक पंक्तियों से राजनेताओं को आगाह करते हुए किसी भी समाज की मुक्तिकामी चेतना को ऊर्जस्वित करने का प्रयास भी करता है.
Chuka Bhi Hun Main Nahin !
- Author Name:
Shamsher Bahadur Singh
- Book Type:

-
Description:
शमशेर बहादुर सिंह की कविता एक विलक्षण संसार की रचना करती है जिसमें आपको अपनी नहीं उसकी शर्तों पर जाना होता है। इस कविता को आप चलते-जाते ऐसे ही नहीं पढ़ सकते, यह कविता अपने काठिन्य से नहीं, जैसा कि कुछ लोग आरोप लगाते हैं, बल्कि अपनी अद्वितीयता से आपको पढ़ने की आपकी कंडीशंड आदतों से छूटकर वापस नए सिरे से सावधान होने को कहती है।
यह शमशेर का उस दौर में आया संग्रह है जब कवि के रूप में उनका स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण हो चुका था। इससे पहले उनकी ‘कुछ कविताएँ’, ‘कुछ और कविताएँ’, और ‘इतने पास अपने’ जैसे संकलन आ चुके थे और हिन्दी कविता की दुनिया में उन्हें लेकर पक्ष-विपक्ष बन चुका था। इसलिए यह संग्रह और भी महत्त्वपूर्ण है, हालाँकि जिस तरह उनके पहले कविता-संग्रह के लिए कविताओं का चयन जगत् शङ्खधर ने किया था, इस किताब में भी चयन उन्हीं का रहा, अर्थात् अब तक अपनी कविता को लेकर उनका संकोच जस का तस था। इस संग्रह की भूमिका में भी वे कहते हैं—‘अपनी काव्य-कृतियाँ मुझे दरअसल सामाजिक दृष्टि से कुछ बहुत मूल्यवान नहीं लगतीं। उनकी वास्तविक सामाजिक उपयोगिता मेरे लिए एक प्रश्नचिह्न-सा ही रही है, कितना ही धुँधला सही।’ अपने काव्य-कर्म को लेकर उनके इसी संशय ने शायद उन्हें भाषा और शिल्प के उस मानक तक पहुँचाया जिसे उनके जीते-जी ही ‘शमशेरियत’ कहा जाने लगा था, और उन्हें ‘कवियों का कवि’। बकौल नामवर सिंह, ‘शमशेर की आत्मा ने अपनी अभिव्यक्ति का जो एक प्रभावशाली भवन अपने हाथों तैयार किया है, उसमें जाने से मुक्तिबोध को भी डर लगता था—उसकी गम्भीर प्रयत्नसाध्य पवित्रता के कारण।’ और बकौल मलयज, ‘एक नितान्त निजी मुहावरा अपने पवित्र दर्प में तना हुआ।’
बहरहाल ‘चुका भी हूँ नहीं मैं’ का यह संस्करण हिन्दी की नई पीढ़ी को एक आमंत्रण के रूप में प्रस्तुत है कि वह भी अपने इस पूर्वज, और कविता-परम्परा के श्रेष्ठतम पैमानों में से एक, कवि की कविताओं को जाने।
Chand Par Chandni Nahee Hoti
- Author Name:
Sanjay Chaturvedi
- Rating:
- Book Type:

- Description: This book has no description
Meri Zameen Mera Aasman
- Author Name:
Lovlin
- Book Type:

- Description: षों पुरानी बात है, ऑल इंडिया रेडियो के परिसर में, वहाँ के मटमैले वातावरण में एक नवयुवती, कसी हुई जींस और लम्बे बूट पहने खट-खट करती गहरे आत्मविश्वास का दुशाला ओढ़े आती-जाती दिखाई पड़ती थी। पता चला, वह रूसी भाषा, तोल्स्तोय-दोस्तोयेवस्की जैसे महान लेखकों की भाषा जानती है और रेडियो में रूसी भाषा की विभागाध्यक्षा थी। यही नहीं, वह बड़े-बड़े समारोहों और विचार-गोष्ठियों में रूसी अतिथियों और भारत के मंत्रिगण, जैसे कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी, श्री नरसिंह राव, श्री इन्द्र कुमार गुजराल, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, के मध्य दुभाषिए के रूप में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। वहीं पता चला, उसका नाम लवलीन है और वह रेडियो ही नहीं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी रूसी भाषा पढ़ाती है। उसे निकट से देखा—सुन्दर मुखाकृति, बड़ी-बड़ी आँखें जिनमें मुझे ढेर सारे सपने झिलमिलाते नज़र आए थे। उसके बेपरवाह घुँघराले बाल और कर्मठ कसावट वाला व्यक्तित्व मुझे बड़ा प्रभावशाली लगा था। तब परिचय हो नहीं पाया और बीच से बहुत से वर्ष फिसल गए। परन्तु उसके चेहरे का, व्यक्तित्व का प्रभाव मेरी ‘इमोशनल मेमोरी’ में सदा बना रहा। जब मिली तो वह लवलीन, लवलीन थदानी बन चुकी थी, वेदान्त और कर्मण्य की माँ भी, परन्तु आश्चर्य हुआ मुझे, उम्र के परिवर्तन ने उसके शरीर को अनछुआ छोड़ दिया था, वह पहले जैसी ही थी—सौम्य और मधुर। इंडिया इंटरनेशनल सेन्टर के किसी कार्यक्रम में उसकी अंग्रेज़ी की कविताएँ सुनीं, उसकी कविताएँ मेरे मन के भीतर उतर गईं, जाने-अनजाने भावनाओं के गर्भगृह में हमारा एक जुड़ाव पनप गया। तब से हम जितना बन पड़ा, मिलते रहे। मेरी फ़िल्म ‘पंचवटी’ पर एक कार्यक्रम का संचालन लवलीन को करना था तो एक पूरा दिन हम एक सूने कमरे में साथ-साथ बैठे रहे एक-दूसरे को जानने के तहत...मैं उसकी दीदी हो गई। कुछ भावनाओं की केमिस्ट्री पता नहीं कैसे एक दूसरे जैसी हो जाती है। मुड़कर देखती हूँ तो याद पड़ता है, मैंने लवलीन का कोई भी कार्यक्रम, कविताएँ हों या उसकी बनाई फ़िल्में, कुछ नहीं छोड़ा...तो, उसका व्यक्तित्व हर प्रस्तुति में, जैसा वह कहती है, ‘थकती नहीं मैं जीने से’ बड़ा सार्थक लगा था, उसका अन्दाज़-ए-बयाँ उसका अपना था। अपनी कविताओं के सभी रूपों में वह स्वयं सम्मोहित थी और अब भी है, आकारों में, धरती के उन कणों में जहाँ वह गुलाब भी रखती है और चिराग़ भी जलाती है। ज़मीं से आसमाँ तक वह ख़ुद को तलाशती नज़र आती है। वह मानती भी है ֹ‘हमें ख़ुद ही देना होगा अपना साथ।’ अपनी लेखन यात्रा में उसने कोई तंत्र-मंत्र नहीं जपा, बिना किसी औपचारिकता में उलझे, वह चलती चली गई—सांसारिक होकर भी तपस्विनी। जब भी मैं उसे देखती, मुझे लगता, कृष्ण भक्त मीरा की तरह लवलीन सन्त-महात्माओं के बताए निर्गुण शब्द से अलग, सगुण प्रेम में लीन है। यह भी सच था कि अपनी दीवानगी की रहगुज़र बनीं वे पगडंडियाँ, जो उसे उन पुराने अन्धविश्वास को जीनेवाले, गली-कूचों और गाँव में ले गईं, जहाँ गुमराह करनेवाला अँधेरा पसरा हुआ था। लवलीन ने अपनी नाजुक उँगलियों से कुरेद-कुरेदकर उन सभी कुरीतियों की दास्तानें जमा कीं जो मनुष्यत्व के नाम पर एक-एक कालिख जैसी थीं। उसकी फ़िल्में मैंने देखी हैं...वह फ़ॉर्मूलाबद्ध फ़िल्में नहीं थीं, उनमें सामाजिक कुरीतियों (विशेष रूप से स्त्री के प्रति समाज का दृष्टिकोण, विसंगतियाँ) के प्रति गहरा आक्रोश है, एक विषाद और हताशा जिसकी चोट से विकृत रूप को बड़ी नाटकीयता से सबके सामने रखती है और साथ ही दर्शक को एक तर्कयुक्त निर्णय तक पहुँचाती है। उसकी फ़िल्में आत्मा को झकझोरतीं...भीतरी मानसिकता को भी, जहाँ क़ानून, पुलिस या अदालत नहीं होते, होता है एक आत्मिक दंड। वह कोई दावा नहीं करती, केवल समाज को उसका असली चेहरा दिखाती है। वह घुल जाती है अपने कथानक में, घुमड़ते दु:ख में...कष्ट में, पाप में—तब न पाप बचता है, न सारे के सारे द्वैत भाव जो मिट जाते हैं—वह अकेले बचती है, पार उतर जाती है और आनन्द ही तो होता है, सुख-दु:ख दोनों के पार। लवलीन के भावचित्र कविता हो या फ़िल्म, अपनी तरह से पुराने विश्वासों, संकल्पों, भावनाओं को नए-नए शब्द देते हैं। सत्य को वह भिन्न-भिन्न रूप से परिभाषित करती है...नहीं तो उसका अपनापन, सनातन सत्य, पुराने ढाँचों में आबद्ध दम तोड़ देता। उसे लगता है, सत्य को नई उद्भावना चाहिए, नई तरंग—“इनसानियत को मुस्कुराहट के तोहफ़ों से सजाएँगे अपने बुज़ुर्गों की ग़लतियों को, हरगिज़ नहीं दोहराएँगे?” अद्भुत है लवलीन की आत्मिक ऊर्जा, उसका व्यापक चैतन्य, जब वह अमृता प्रीतम के जीवन पर आधारित नाटक में अमृता प्रीतम की भूमिका निभा रही थी। पूरी की पूरी मानसिकता में अमृता प्रीतम को वह हर पल जी रही थी—मंच पर और मंच के बाद भी। नाटक में, उर्दू के प्रसिद्ध शायर साहिर लुधियानवी की मृत्यु पर फूट-फूटकर रोती लवलीन, लवलीन नहीं बची थी, पूरी अमृता हो गई थी। मैं हैरानी से सोचती कहाँ से ले आती है वह इतनी ऊर्जा? इतने सारे काम एक साथ कर डालती है बिना थके, बिना हार माने। कितना जोखिम-भरा रहा होगा उसके लिए कारागार में जाकर अपनी फ़िल्म 'बलात्कार' या 'रेप' की शूटिंग करना—औरत पर हुए ज़ुल्मों को बयान करना। परन्तु वह मगन है अपनी तपश्चर्या में, दीवानगी में, फक्कड़पन में, बिना मेहनत-मशक्कत किए जी नहीं पाती...अपना बहुमूल्य ज्ञान बाँटने में जुटी है। और उसके लिए वह जाने कहाँ-कहाँ से जाती है, बेझिझक यह कविता संग्रह ‘मेरी ज़मीन मेरा आसमान’ ही आख़िरी मंज़िल नहीं है उसकी, लवलीन के पास अभी भी ढेर सारे अनगाए गीत हैं…नज़्में हैं। प्रेम में पागल होकर पद्य गाए जाते हैं और दीवानगी में जिया जाता है—उसकी बेचैन रूह उसे जीने कहाँ देती है! चाहे वह जितना कहे—“मैं पौधे को पानी देती गई और प्यास मेरी बुझती गई।” वैसा होता कहाँ है! अभी यहाँ है, कल उसकी प्यासी आत्मा किसी पहाड़ की अँधेरी गुफ़ा में कुछ नया तलाशती मिल जाएगी आपको। परन्तु एक उसी क्षण उसका चेहरा आत्मसन्तुष्टि से भरा चमचमाता है, जब वह अपने बच्चों का नाम लेती है—वेदान्त और कर्मण्ये, जैसे नाम नहीं ले रही, मंत्रोच्चारण कर रही है। ज़िन्दगी के हर पहलू को लवलीन भरपूर जीती है—पूरी सच्चाई और शिद्दत के साथ। –डॉ. कुसुम अं
Tatpurush
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
अशोक वाजपेयी के इस संग्रह में उनकी गहरी जीवनासक्ति और जिजीविषा ने प्रौढ़ता और नया विस्तार पाया है। समकालीनता की अनेक सीमित और इकहरी धारणाओं से आक्रान्त कविता की आज की दुनिया में ये कविताएँ कुछ अलग और अकेली जान पड़ेंगी। उनमें अक्सर सभी तत्काल है और अभी और अनन्त के बीच, यहाँ और वहाँ के बीच सहज और लगभग अनिवार्य आवाजाही है। वे पड़ोस की संरचना करती कविताएँ हैं जिनमें कई बार अनेक सदियों का, देशकाल और नश्वरता का अतिक्रमण होता है। परिचित और सामान्य को थोड़ा–सा विचलित कर वे अप्रत्याशित को सहज स्वायत्त बनाती हैं। विराट सत्यों से अभिभूत होने या उनसे अपने लिए वैधता जुटाने के बजाय वे नगण्य को खोजती, बीनती और सहेजती कविताएँ हैं—अपने सच पर टिकी और गतिशील। वे बँधे–बँधाये ढर्रों से स्वयं तो मुक्त हैं ही, काव्यभाषा और दृष्टि को भी मुक्त करती हैं और हमें उस मुक्ति के लिए आविष्ट करती हैं।
पहले की ही तरह उनमें वैचारिकता अन्त:सलिल है और गहरी ऐन्द्रिय संहति है। उनका धुँधलका और झुटपुटा, उनमें कभी–कभार कौंधती रोशनी की लकीरें और उनमें हर समय मौजूद तलाश अपने खरेपन और तीखी पारदर्शिता से हमें अपनी दुनिया और अपनी भाषा पहचानने और शब्द और मनुष्य में अपनी पुनरास्था को स्वीकार करने की ओर ले जाती है। वह एक बार फिर ऐसी इन दिनों विरल कविता है जो प्रेम, समय, मृत्यु, नियति जैसे चरम प्रश्नों से जूझने की ओर प्रवृत्त करती है। एक अंगभंग समय में, अशोक वाजपेयी की ये नई कविताएँ, थोड़े से आदमी की पूरी मानवीयता की सम्भावना का सत्यापन हैं।
Eelam Deel
- Author Name:
Habib Ali +1
- Book Type:

- Description: Nirankardev Sevak's poems are read by every Hindi-speaking child. He is one of the foremost voices in the Hindi-speaking belt. Nirankardev Sevak writes with an unparalleled simplicity, which is reflected in the following lines: अगर मगर दो भाई थे लड़ते खूब लड़ाई थे, अगर मगर से छोटा था, मगर अगर से खोटा था। or पैसा पास होता तो चार चने लाते, चार में से एक चना तोते को खिलाते It is rare to find a poet who has imagined such an individual. This collection of poems has 35 such poems. These wonderfully witty poems are accompanied by equally beautiful illustrations by Habib Ali. Readers will find his compositions, colour schemes, and detailing engaging. Age group 6-8 years
Madhu-Sa La
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description: हिंदी साहित्य जगत में विलक्षण प्रयोगों, नए-नए मुहावरों, अछूते प्रतीकों, पैनी और व्यंग्यात्मक भाषाशैली के साथ-साथ जनसापेक्ष रचनाशीलता के बल पर श्री रमेशराज ने एक महत्वपूर्ण मुक़ाम हासिल किया है। आपके मौलिक चिंतन में एक तरफ जहां असीम गहराई है, वहीं सम्प्रेषणशीलता सर्वत्र मौजूद होने के कारण पाठक-मन ऊबता नहीं। हर तथ्य आसानी के साथ ग्रहण करते हुए वह आत्मतोष से भर जाता है। तेवरी विधा के सूत्रधार श्री रमेशराज एक तेवरीकार के रूप में ही विख्यात हों, ऐसा कदापि नहीं है। आपने बेहतरीन मुक्तछंद कविताएं लिखी हैं। बालगीत कार के रूप में भी आपकी पहचान है। आपके गीत-नवगीत मन को गहराइयों तक छूते हैं। व्यंग्य व्यंजना का अद्भुत रंग लिए होते हैं। आपका चिंतन 'कविता क्या है?' जैसे मूलभूत प्रश्न को सुलझाता है। रस पर आपकी सूक्ष्म पकड़ है। समकालीन यथार्थवादी काव्य की रस-समस्या का समाधान खोजते हुए आपने एक नए रस "विरोधरस" की मौलिक खोज की है। काव्य की आत्मा पर चिंतन करते हुए "साधारणीकरण" के स्थान पर एक नया सिद्धांत "आत्मीयकरण" दिया है। नए-नए छन्दों को प्रतिष्ठापित करने वाले श्री रमेशराज की ताजा काव्यकृति मधु-सा ला (चतुष्पदी-शतक) है, जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक विकृतियों और विसंगतियों पर तीखे प्रहार किए गए हैं।यथा- नसबंदी पर देते भाषण, जिनके दस लल्ली-लाला हाला पीकर बोल रहे हैं, ‘बहुत बुरी होती हाला’। अंधकार के पोषक देखो, करने आये भोर नयी नयी आर्थिक नीति बनी है, आज प्रगति की मधुशाला।। कवि ने अधर्मी साधुओं मौलवियों के दुराचरण पर बिना भेदभाव किये तटस्थ भाव से तीखे व्यंग्य कसे हैं- मुल्ला-साधु-संत ने चख ली, राजनीति की अब हाला गुण्डे-चोर-उचक्के इनके, आज बने हैं हमप्याला। जनसेवक को शीश नवाते, झट गिर जाते पाँवों पर ये उन्मादी-सुख के आदी, प्यारी इनको मधुशाला।। दूषित होते पारिवारिक परिवेश का सजीव चित्रण देखिए- बेटे के हाथों में बोतल, पिता लिये कर में प्याला इन दोनों के साथ खड़ी है, कंचनवर्णी मधुबाला। गृहणी तले पकौड़े इनको, गुमसुम खड़ी रसोई में नयी सभ्यता बना रही है, पूरे घर को मधुशाला।। पारिवारिक मूल्यों में आयी गिरावट पर कवि की पैनी पकड़ इसप्रकार है- बेटे की आँखों में आँसू, पिता दुःखों ने भर डाला मजा पड़ोसी लूट रहे हैं, देख-देख मद की हाला। इन सबसे बेफिक्र सुबह से, क्रम चालू तो शाम हुयी पूरे घर में महँक रही है, सास-बहू की मधुशाला।। आज हमारा समाज सभ्यता के नाम पर कितना संस्कारविहीन हो गया है- मरा पड़ौसी, उसके घर को दुःख-दर्दों ने भर डाला हरी चूड़ियाँ टूट गयीं सब, हुई एक विधवा बाला। अर्थी को मरघट तक लाते, मौन रहे पीने वाले दाहकर्म पर झट कोने में, महँकी उनकी मधुशाला।। एक चतुष्पदी में सियासत का षडयंत्र देखिए- उसने की है यही व्यवस्था, दुराचरण की पी हाला प्याला जिसके हाथों में हो, बन जा ऐसा मतवाला। मत कर चिन्ता तू बच्चों की, मत बहरे सिस्टम पर सोच तेरी खातिर जूआघर हैं, कदम-कदम पर मधुशाला।। समाज को चेतना प्रदान करने वाले कवि का आचरण आज कैसा जनविरोधी हो गया है- कलमकार भी धनपशुओं का, बना आजकल हमप्याला दोनों एक मेज पर बैठे, पीते हैं ऐसी हाला। निकल रहा उन्माद कलम से, घृणा भरी है लेखों में महँक छोड़ती अब हिंसा की, अलगावों की मधुशाला।। दुष्टों, दुराचारियों के सम्मुख नतमस्तक होते क़लम के सिपाहियों पर तंज कसते हुए कवि कहता हैं- सबसे अच्छी मक्खनबाजी, हुनर चापलूसी का ला तुझको ऊँचा पद दिलवाये, चाटुकारिता की हाला। स्वाभिमान की बात उठे तो, दिखला दे तू बत्तीसी कोठी बँगला कार दिलाये, बेशर्मी की मधुशाला।। सारा परिवेश विषैला हो चुका है। हर सियासी दल से जनता को धोखा मिल रहा है। पूरा का पूरा सिस्टम एक अनसुलझा सवाल बन गया है। फिर भी कवि हार न मानते हुए रहनुमाओं से यह सवाल करता है तो करता है- कब तक सपना दिखलाओगे, गांधी के मंतर वाला और पियें हम बोलो कब तक, सहनशीलता की हाला। अग्नि-परीक्षा क्यों लेते हो, बंधु हमारे संयम की कब तक कोरे आश्वासन की, भेंट करोगे मधुशाला।। कुल मिलाकर रमेशराज जी के इस मधु-सा ला (चतुष्पदी-शतक) का साहित्य-जगत में उनकी अन्य कृतियों की तरह स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है। ~अनिल 'अनल'
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book