Apne Samne
(0)
₹
395
316 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
जीवन को अनुभूति और चिन्तन के विभिन्न धरातलों पर ग्रहण करनेवाले कवि कुँवर नारायण अपनी कविताओं में सीमाएँ नहीं बनाते; उनकी ज़्यादातर कविताएँ किसी एक ही तरह की भाषा या विषय में विसर्जित-सी हो गई नहीं लगतीं—दोनों को विस्तृत करती लगती हैं। अनेक कविताएँ मानो समाप्त नहीं होतीं, एक ख़ास तरह की हमारी बेचैनियों का हिस्सा बन जाती हैं। इस तरह से देखें तो वे अपने को सिद्ध करनेवाले कवि हमें नहीं नज़र आते। वे बराबर अपनी कविताओं में मुहावरों से बचते हैं और अपने ढंग से उनसे लड़ते भी हैं। उनकी कविता की भाषा में धोखे नहीं हैं। अधिकांश कविताओं का पैनापन ज़िन्दगी के कई हिस्सों को बिलकुल नये ढंग से छूता है।</p> <p>वे मानते हैं कि दैनिक यथार्थ के साथ कविता का रिश्ता नज़दीक का भी हो सकता है और दूर का भी और दोनों ही तरह वह जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है—सवाल है, कविता कितने सच्चे और उदार अर्थों में हमें आदमी बनाने की ताक़त रखती है। कविता उनके लिए जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र नहीं, जीवन का सबसे आत्मीय प्रसंग है—कविता, जो अपने चारों तरफ़ भी देखती है और अपने को सामने रखकर भी। उनकी कविताओं में हमें बहुत सतर्क क़िस्म की भाषा का इस्तेमाल मिलता है; वह कभी बहुत गहराई से किसी ऐतिहासिक या दार्शनिक अनुभव की तहों में चली जाती है और कभी इतनी सरल दिखती है कि वह हमें अपने बहुत क़रीब नज़र आती है। बहुआयामी स्तरों पर भाषा से यह लड़ाई और प्यार कुँवर नारायण को चुनौती देता है, ख़ास तौर पर एक ऐसे वक़्त में जब कविता का एक बड़ा हिस्सा एक ही तरह की भाषा में अपने को अभिव्यक्त किए चला जा रहा है।</p> <p>हिन्दी के अग्रणी आधुनिक कवि कुँवर नारायण की कविता की दुनिया में जाने का मतलब ज़िन्दगी को गहराई और विस्तार से देखने और जानने का अच्छा मौक़ा पा लेना है।
Read moreAbout the Book
जीवन को अनुभूति और चिन्तन के विभिन्न धरातलों पर ग्रहण करनेवाले कवि कुँवर नारायण अपनी कविताओं में सीमाएँ नहीं बनाते; उनकी ज़्यादातर कविताएँ किसी एक ही तरह की भाषा या विषय में विसर्जित-सी हो गई नहीं लगतीं—दोनों को विस्तृत करती लगती हैं। अनेक कविताएँ मानो समाप्त नहीं होतीं, एक ख़ास तरह की हमारी बेचैनियों का हिस्सा बन जाती हैं। इस तरह से देखें तो वे अपने को सिद्ध करनेवाले कवि हमें नहीं नज़र आते। वे बराबर अपनी कविताओं में मुहावरों से बचते हैं और अपने ढंग से उनसे लड़ते भी हैं। उनकी कविता की भाषा में धोखे नहीं हैं। अधिकांश कविताओं का पैनापन ज़िन्दगी के कई हिस्सों को बिलकुल नये ढंग से छूता है।</p>
<p>वे मानते हैं कि दैनिक यथार्थ के साथ कविता का रिश्ता नज़दीक का भी हो सकता है और दूर का भी और दोनों ही तरह वह जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है—सवाल है, कविता कितने सच्चे और उदार अर्थों में हमें आदमी बनाने की ताक़त रखती है। कविता उनके लिए जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र नहीं, जीवन का सबसे आत्मीय प्रसंग है—कविता, जो अपने चारों तरफ़ भी देखती है और अपने को सामने रखकर भी। उनकी कविताओं में हमें बहुत सतर्क क़िस्म की भाषा का इस्तेमाल मिलता है; वह कभी बहुत गहराई से किसी ऐतिहासिक या दार्शनिक अनुभव की तहों में चली जाती है और कभी इतनी सरल दिखती है कि वह हमें अपने बहुत क़रीब नज़र आती है। बहुआयामी स्तरों पर भाषा से यह लड़ाई और प्यार कुँवर नारायण को चुनौती देता है, ख़ास तौर पर एक ऐसे वक़्त में जब कविता का एक बड़ा हिस्सा एक ही तरह की भाषा में अपने को अभिव्यक्त किए चला जा रहा है।</p>
<p>हिन्दी के अग्रणी आधुनिक कवि कुँवर नारायण की कविता की दुनिया में जाने का मतलब ज़िन्दगी को गहराई और विस्तार से देखने और जानने का अच्छा मौक़ा पा लेना है।
Book Details
-
ISBN9788126705627
-
Pages109
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Patte Chinaron Ke
- Author Name:
Dr. Vinod Prakash Gupta 'Shalabh'
- Book Type:

- Description: डॉ. विनोद प्रकाश गुप्ता ‘शलभ’ की ग़ज़लों के कथ्य के पीछे विचार होता है और क्राफ़्ट के पीछे है उनका गहरा अभ्यास जो लगातार और गहरा होता गया है। ‘पत्ते चिनारों के’ उनका तीसरा ग़ज़ल-संग्रह है और इसमें संकलित अधिकांश ग़ज़लों में अनेक छवियाँ उन बीते दिनों की हैं जब पूरी दुनिया पर कोरोना के रूप में एक भयावह संकट की छाया मँडरा रही थी। एक सजग नागरिक और संवेदनशील रचनाकार होने के नाते ‘शलभ’ जी उन हालात पर पैनी निगाह रखते हैं जो हमारे व्यक्तिगत जीवन से लेकर प्रकृति तक को प्रभावित करते हैं। वह चाहे धर्मभीरु अवाम की आस्थाओं का दोहन करने के लिए धर्म और राजनीति की दुरभिसन्धियाँ हों, लगातार बढ़ती सामाजिक-आर्थिक विषमता हो, लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सत्ता द्वारा उल्लंघन और अवमूल्यन हो या आम आदमी के उपभोक्ताकारी संजाल में उलझकर व्यक्तित्वहीन हो जाने की दुर्घटना हो, उनकी ग़ज़लें हर इलाके में होकर आती हैं— हर किसी पर हो रहा है दोषारोपण देश अपना कटघरा क्यों हो गया है उनकी ग़ज़लों की ख़ास विशेषता उनकी ज़बान और सहजता है। सुनते ही याद हो जाने वाले उनके शेर अलग-अलग सन्दर्भों में, जीवन और अहसास के अलग-अलग मौकों पर बरबस याद आ जाने की सलाहियत रखते हैं। हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा को और-और समर्थ बनाती हुई उनकी ग़ज़लगोई प्रेम और प्रकृति को भी साथ लेकर चलती है, उम्मीद का दामन भी नहीं छोड़ती और वक़्त को घायल करने वाली ताक़तों को बख़्शती भी नहीं।
Meerabai Ki Sampurna Padawali
- Author Name:
Ramkishor Sharma
- Book Type:

- Description: भक्तिकाल में मीराँ की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी। मीराँ के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ भी गढ़ ली गईं। किंवदन्तियाँ भले ही ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न हों, किन्तु उनसे इतना अवश्य ज़ाहिर होता है कि मीराँ अपनी विद्रोही चेतना के कारण लोकप्रिय अवश्य हो गई थीं। जो रचनाकार जितना अधिक लोकप्रिय होता है, उतना अधिक उसके कृतित्व का देशकाल के अनुसार रूपान्तरण होता है। मीराँ के पद गेय थे, अत: एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में साधु, सन्तों तथा गायकों के द्वारा मौखिक ढंग से प्रचारित-प्रसारित होते रहे। मीराँ सर्जनात्मक चेतना को भी उद्वेलित करती हैं। मीराँ के पदों में पाठ-भेद होने के लिए प्रादेशिक भेद तथा मौखिक गेय परम्परा को ज़िम्मेदार ठहराया गया है। उनके औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगाए बिना एक सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मीराँ ने कुछ पदों को दुबारा कुछ विस्तार से तथा कुछ परिवर्तन के साथ गाया होगा। आत्मोल्लास या उन्माद के क्षणों में गाए जानेवाले गीतों में गायक को इसकी सुध-बुध कहाँ रहती है कि वह अपने पूर्व कथन को दुहरा रहा है। उन्होंने अपने जीवन में घटित हुए कटु एवं तीक्ष्ण अनुभवों को वाणी दी है, राणा के द्वारा जो व्यवहार किया गया था, मीराँ भावावेश के क्षणों में उनका कई पदों में स्मरण करती हैं और भगवद् कृपा की महिमा का अनुभव करती हैं। शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय पुस्तक।
Pratinidhi Shairy : 'Majaz' Lakhnavi
- Author Name:
Majaz Lakhnavi
- Book Type:

-
Description:
‘मजाज़’ की गिनती उन थोड़े से शायरों में की जा सकती है जिन्होंने कम उम्र में ही ऐसी शोहरत हासिल की कि आगे आनेवाली सारी नस्लें उनकी शायरी पर सर धुनें। ‘मजाज़’ की ख़ासकर ‘आवारा’ जैसी नज़्में तो भाषा की तमाम दीवारें तोड़कर व्यापक रूप से तमाम साहित्य–प्रेमियों के दिलों में अपनी जगह बना चुकी हैं। ‘मजाज़’ की शायरी उस दौर की शायरी है जब उर्दू में तरक़्क़ीपसन्द अदब का आन्दोलन रफ़्ता– रफ़्ता अपने लड़कपन से शबाब की ओर बढ़ रहा था। आज़ादी की जंग और उसी के साथ तरक़्क़ीपसन्द अदब की सारी आशा–निराशा, उसके उतार–चढ़ाव, उसके सारे दु:ख–दर्द, ख़ुशियाँ, उसकी सारी उमंगें और उसका सारा आदर्शवाद कला के स्तर पर ‘मजाज़’ की शायरी में साफ़ दिखाई देते हैं, और यही सब तत्त्व हैं जिन्होंने ‘मजाज़’ को इनसान की क़ुव्वत और उसके सुनहरी मुस्तक़बिल में भरोसा रखना सिखाते हुए उनसे ‘ख़्वाबे–सेहर’ और ‘रात और रेल’ जैसी ख़ूबसूरत नज़्में कहलवार्इं। और यही कारण है कि जहाँ तरक़्क़ीपसन्द मुसन्निफ़ीन की अंजुमन को दुनिया के रंगमंच से विदा हुए कोई आधी सदी का अरसा गुज़र चुका है, वहीं उसकी बेहतरीन पैदावारों में से एक के रूप में ‘मजाज़’ की शायरी आज भी अपने पूरे तबो–ताब के साथ हमारे सामने आती है, और ज़िन्दगी-भर दर्दो–रंज से निहाल रहनेवाला यह ‘शायरे–आवारा’ अपने तमाम दर्दो–रंज से ऊपर उठकर दुनिया और दुनिया के सारे दुखों पर छा जाता है।
एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति।
Thithak Gai Boondein
- Author Name:
Arvind Kumar Singh
- Book Type:

- Description: अरविन्द कुमार सिंह की कविताओं से गुज़रते हुए हमें एक दुर्लभ संयोग दिखाई पड़ता है। एक तरफ़ उनकी भाषा में दिनकर का ओज है और दूसरी तरफ़ नागार्जुन के यहाँ दिखाई पड़ने वाली रोज़मर्रा जीवन की हलचलें। ये हजारीबाग की पहाड़ियों का सौन्दर्य है, हरिद्वार का कुम्भ स्नान है, गाँव के मेले की बिसरी हुई यादें हैं, नदियाँ हैं, शाम हैं। प्रकृति इन कविताओं में बार-बार आती है—इसके बहुत सारे रंग उनकी कविताओं में दिखाई पड़ते हैं। दूसरी तरफ़ मज़लूमों, किसानों, मज़दूरों की पीड़ा भी उनकी कविताओं में मुखर हुई है। ये कविताएँ हमारे समय, समाज, धरती और हमारे आसपास के लोगों की आकांक्षाओं, पीड़ाओं, भावनाओं का आईना बनती हैं। इनमें हम अपने समय की धड़कन को सुन सकते हैं। इनमें सौन्दर्य है, प्रकृति है, धूमिल गाँव हैं, नदियाँ हैं और उनके बीच मनुष्य का श्रम भी है और उसका समूचा सौन्दर्य भी है—जो इस धरती को सुन्दर बनाता है।
Samay Ka Hisab
- Author Name:
Vandana Devendra
- Book Type:

-
Description:
जितना अचरज यह जानकर होता है कि पिछले क़रीब दो दशकों से लिखते रहने के बावजूद वंदना देवेन्द्र ने अब तक अपनी कोई भी रचना किसी पत्र-पत्रिका में नहीं दी है, उससे कहीं ज़्यादा अचम्भा उनकी इन कविताओं की गहराई, वैविध्य और विस्तार को देखकर होता है। मसलन हम पूछते रह जाते हैं कि जिस कवयित्री ने ‘छाते’ और ‘रँगे हाथ’ सरीखी मृदु, गीतात्मक रचनाएँ दी हों, वह ‘राक्षस पहले राक्षस थे’ या ‘धूमिल’ का स्मरण दिलानेवाली ‘उत्तर प्रदेश’ जैसी निर्मम, यथार्थवादी, राजनीतिपरक कविताएँ कैसे लिख सकी ? यदि ‘विजेता’ और ‘राजा था कन्नौज’ में वंदना इतिहास तथा सामन्ती मानसिकता को लेकर नए प्रश्न उठाती हैं तो ‘ताजमहल के बाद’ और ‘कोई चिल्लाता है’ में वे भारतीय और वृहत्तर मानव-इतिहास को एक विसंगति-भाव से देखती हैं, और ‘समय का हिसाब’ में वे इतिहास से भी आगे जाकर करोड़ों सूर्य, लाखों आकाश गंगाओं के बीच अपने कबाड़ के साथ हमारे प्रवेश की बात करती हैं और इससे पहले कि हम यह समझें कि वे ‘बड़े’ विषयों की महत्त्वाकांक्षी कवयित्री हैं, ‘रंग बिरंगे पाल’ और ‘कविता जैसा’ की उदास एकान्तिकता उनकी निजी संवेदनशीलता का परिचय दिलाती है।
वंदना एक (चर्चित) चित्रकार भी हैं और अपने इस फ़न का विनम्र, स्वाभाविक संकेत उन्होंने अपनी कुछ कविताओं में दिया भी है किन्तु हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि शायद उनकी चित्रकार-प्रतिभा उन्हें भारतीय मानवीयता की विभिन्न रंगतों और सूक्ष्म तथा स्थूल रेखाओं को देखने में मदद करती है—या उनका कवि उनके चित्रकार के इस तरह काम आता हो, या दोनों ही वक़्त-ज़रूरत एक-दूसरे को प्रेरित करते हों। बहरहाल, नतीज़ा यह है कि उनकी कविता का कैनवस एक अद्भुत वैराट्य लिए हुए है और उसमें स्टिल लाइफ़, पोर्ट्रेट, व्यक्ति-समूह, लैंडस्केप (जो उनकी पर्यावरण-चेतना का हिस्सा है), पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंग आदि सब-कुछ है। उनकी रचनाओं में यदि निजी, पराए और वृहत्तर सामाजिक दु:ख-तकलीफ़ों के गाढ़े रंग हैं तो छोटी-बड़ी ख़ुशियों, विसंगतियों, चुनौतियों, शरारत और व्यंग्य के शोख़-चटख़ वर्ण भी हैं।
शायद सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि वंदना देवेन्द्र की सृजनशीलता के मूल में एक ऐसी सामाजिक तथा नारी-प्रतिबद्धता है जो उन्हें एक अनूठी अस्मिता देती है। एक स्तर पर वे अमेरिकी राष्ट्रपति से भारतीय लुम्पेन राजनेताओं तक को, यानी भूमंडलीय से देशी राजनीति तक को, पहचानती हैं तो दूसरे स्तर पर वे स्त्री, पत्नी, माँ होने के अपने निजी अनुभव-संसार के साथ-साथ किसी लड़की, सहेली, फुलनियाँ, कम्मो आदि की जीवनियों को भी जानती हैं। नारी-प्रवृत्ति तथा औरत की आज़ादी पर आजकल बहुत-कुछ कहा लिखा जा रहा है लेकिन ‘रे फुलनियाँ भाज धरी’ जैसी लोकगीतनुमा कविता में वंदना ने एक असहाय विवाहिता का एक नया, चौंकानेवाला रूपान्तर प्रस्तुत किया है। फ़िरोज़ाबाद के चूड़ी बनानेवाले पर उनकी कविता ‘चूड़ियाँ’ हिन्दी के लिए एकदम नई है और दंगों में अपना जवान बेटा खो चुके बूढ़े मुस्लिम पर लिखी उनकी छोटी कविता ‘बेटा’ काव्य के उद्देश्य और असामर्थ्य को मार्मिकता से उभारती है।
‘कमल’, ‘बादशाह’, ‘सोचते हुए लोग’, ‘पेंटर’ आदि उनकी ऐसी रचनाएँ हैं जो अपनी दृष्टि और कला में हिन्दी के किन्हीं भी बेहतर कवि-कवयित्रियों के समकक्ष निस्संकोच रखी जा सकती हैं। कुछ अत्यन्त निजी अनुभवों और स्मृतियों पर चन्द ऐसी कविताएँ वंदना ने लिखी हैं जो उनके काव्य-विश्व को और जटिल तथा चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। यह देखकर हैरत होती है कि उन्होंने यह सब एक ऐसी भाषा और शैली में उपलब्ध किया है जो अपनी सादगी में इतनी कारगर हैं कि उन्हें शब्दों या शिल्प के चमत्कार की ज़रूरत नहीं पड़ती। उनकी कविता में पश्चिमोत्तर उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक तथा संघर्षशील स्त्री-पुरुष-किशोर-बच्चे वैसे ही स्वाभाविक ढंग से मौजूद हैं जैसे कि वे वास्तविक भारतीय समाज में उपस्थित हैं। शिनाख़्त के लिए कह सकते हैं कि वंदना देवेन्द्र अनायास ही कात्यायनी, सविता सिंह, अनीता वर्मा, नीलेश रघुवंशी, अनामिका, निर्मला गर्ग जैसी प्रासंगिक कवयित्रियों में उल्लेख्य हो गई हैं जबकि सच यह है कि इन सबके साथ वे उस वृहत्तर सर्जक पीढ़ी में शामिल हैं जो रघुवीर सहाय के बाद हिन्दी कविता को अपूर्व विस्तार, वैविध्य और समृद्धि प्रदान कर रही हैं।
—विष्णु खरे
Sampoorna Kavitayein : Vijaydev Narayan Sahi
- Author Name:
Vijaydev Narayan Sahi
- Book Type:

- Description: विजयदेव नारायण साही निरपेक्ष और आत्मस्थ ब्रह्माण्ड में मनुष्य की लघुता को भली भांति देख सकते हैं, और काल के उस अग्निकमल को भी जिसमें सब भस्म हो जाता है। इस नश्वरता में अर्थ की सतत तलाश उनकी कविता के केन्द्र में है, चाहे वह अर्थ अपनी तलाश को पहचानने में ही निहित हो, सृष्टि के वास्तविक स्वरुप को देखने में हो, वर्तमान क्षण के सौन्दर्य को जी लेने में हो अथवा मूल्यों को परिभाषित करने तथा उनकी चौकीदारी करने में हो। इन सभी को वे सत्य के रूप में देखते हैं, और सत्य को पहचानने का यह सधा हुआ और सघन बौद्धिक प्रयास उनकी कविता को विलक्षण बनाता है। आन्तरिक और बाह्य लय उनकी कविता की विशेषता है जो गीत और ग़ज़ल से होते हुए काव्यात्मक एकालाप में भी व्यक्त होती है, और विराट शब्दावली से सटीक शब्द चुन लेने की उनकी क्षमता सूक्ष्म अभिव्यंजनाओं को गुंजरित कर सघनता को पुष्ट करती है। कहीं बहुत गहरे स्तर पर साही एक नागरिक हैं। मूल्यों की परिभाषा उनके लिए सामाजिक सन्दर्भ रखती है और बहुत हद तक उनकी कविता भी एक सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन करती है। उनकी कविताओं की इस समग्र प्रस्तुति में कविताएँ लेखन-क्रम में व्यवस्थित हैं एवं पूर्व में अप्रकाशित कुछ कविताएँ भी इसमें शामिल हैं। पुस्तक में शामिल विस्तृत सम्पादकीय और उसके अलावा कुछ अन्य आलोचनात्मक लेख व परिशिष्ट में संकलित उनकी पुस्तकों से जुड़ी सामग्री इस संचयन को एक सम्पूर्ण अध्ययन बना देती है।
Orhan Aur Anya Kavitayen
- Author Name:
Shriprakash Shukla
- Book Type:

-
Description:
‘आँधी में टूटकर गिरा हुआ मकान/तूफ़ान में सूखकर रेत हुई नदी/थककर गिरा हुआ आदमी/ज़्यादे भरोसे का होता है/अपनी-अपनी सम्भावनाओं में/समर्पित सफलता से/ज़्यादा मूल्यवान होती है/तनी हुई विफलता।’ श्रीप्रकाश शुक्ल के कविता-संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ में शामिल कविता ‘तनी हुई विफलता’ की ये पंक्तियाँ रचनाकार के पक्ष को स्पष्ट कर देती हैं। प्रत्येक सजग और समर्थ रचनाकार बार-बार निजी और सामाजिक अनुभवों को चेतना की कसौटी पर कसता है। इसे ‘पुन:पाठ’ कहें या ‘अर्थान्तर’ सच्चाई यही है कि हर शब्द एक अनुभव माँगता है और हर अनुभव एक जीवन। इस आन्तरिक प्रक्रिया से गुज़रकर जो कवि समय को व्यक्त कर रहे हैं, उनमें श्रीप्रकाश शुक्ल महत्त्वपूर्ण हैं।
प्रस्तुत संग्रह को पढ़ते हुए यह लगना अनायास नहीं कि ‘बनारस’ इसकी केन्द्रीयता है। बनारस के अनेक प्रसंग, स्थान और स्वभाव कविताओं में निहित व निनादित हैं।...और एक ‘सनातन नगर’ के बहाने कवि ने आधुनिकता के श्वेत-श्याम आवासों को टटोला है। श्रीप्रकाश शुक्ल में यह कहने का साहस व सलीका भी है कि, ‘सब कुछ बहुवचन में नहीं सोचा जा सकता।’ अपने तरीक़े से सोचते हुए उन्होंने ‘ओरहन’, ‘एक कवि की तलाश में’, ‘हमारे समय का एक शोकगीत’, ‘एक स्त्री घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती है’ व ‘छठ की औरतें’ जैसी कई उदाहरणीय कविताएँ रची हैं।
इस संग्रह में ‘स्त्री’ को लेकर कुछ बेहद ख़ास कविताएँ हैं। बिना शब्दों का डमरू बजाए। निजी देसी मुहावरे में श्रीप्रकाश ‘लरिकोर’ जैसी अनूठी कविता लिखते हैं। भाषा के स्वीकृत विन्यास को सतर्क चुनौती देते हुए रची गई ये कविताएँ हमें संवेदनाओं के एक सघन संसार में ले जाती हैं, जहाँ अपेक्षित भाषाई मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर भी है जिसमें प्रकृति के साहचर्य से दूर जाते समाज की चालाकियों का पर्दाफ़ाश भी है।
Neera Ke Liye
- Author Name:
Sunil Gangopadhyay
- Book Type:

-
Description:
सुनील गंगोपाध्याय के देहावसान के बाद विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने एक कविता लिखी—‘पत्र जिसे पढ़नेवाला चला गया’। इसकी पंक्तियाँ हैं—‘कौन जाने नीरा का पत्र हो जिसके लिए लिखता रहा वह कविताएँ और कविताएँ और कविताएँ।’
सुनील गंगोपाध्याय की रचनाशीलता में 'नीरा' का एक विचित्र स्थान है। एक साथ ऐन्द्रिक और अतीन्द्रिय। 'नीरा के लिए' कविता-संग्रह में इसका अनुभव किया जा सकता है। प्रस्तुत कविता-संग्रह की भूमिका में सुनील गंगोपाध्याय स्वीकारते हैं, “...तमाम बीते बरसों में नीरा बार-बार घूम-फिरकर आती रही मेरी कविता में। मेरी उम्र ढल रही है पर नीरा आज भी किसी स्थिर चित्र की तरह ‘नव-यौवना’ है। मैं उसे रक्त-मांस की मानवी बनाकर रखना चाहता हूँ पर कभी-कभी अचानक से वह प्रवेश कर जाती है शिल्प की सीमाओं के भीतर।
मैं उसे फिर वापस ले आना चाहता हूँ, उसके पाँव में काँटे चुभ जाते हैं, उसकी आँखों में अश्रु झिलमिलाने लगते हैं। यह दूरी, साथ ही यह आलिंगन की निकटता, नीरा के साथ यह खेल चलता ही रहा है जीवन-भर।”
मूलत: बांग्ला में लिखी इन कविताओं का सोमा बंद्योपाध्याय द्वारा किया गया यह अनुवाद मौलिक आस्वाद प्रदान करता है। आसक्ति व अनासक्ति के बीच विचरण करती अद्भुत कविताओं का प्रीतिकर संग्रह।
Isliye Kahungi Main
- Author Name:
Sudha Upadhyaya
- Book Type:

-
Description:
यह दर्ज करना उचित होगा कि इधर की हिन्दी कविता में अभिधा के प्रति बढ़ती उदासीनता के बावजूद सुधा उपध्याय उसकी शक्ति और सम्भावनाओं का अन्वेषण करने से नहीं हिचकतीं और सीधी बात को सीधे तरीक़े से कहने में संकोच नहीं करतीं...
‘उन सबका आभार/जिनके नागपाश में बँधते ही/यातना ने मुझे रचनात्मक बनाया उनका भी हृदय से आभार/जिनके घात-प्रतिघात/छल-छद्म के संसार में/मैं घंटे की तरह बजती रही।/मेरे आत्मीय शत्रु/तुमने तो वह सब कुछ दिया/जो मेरे अपने भी न दे सके।’
यहाँ कटुता या प्रतिहिंसा नहीं, जीवन की शर्तों का सामना उद्वेगरहित भाव से करनेवाला साहस है। वह इस कवयित्री को ‘अबला जीवन, हाय तुम्हारी यही कहानी—आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ वाली पारम्परिकता से तो भिन्न बनाता ही है; बल्कि सुधा उपाध्याय की इन कविताओं में जो नारी-चेतना आदि से अन्त तक फैली हुई है, वह न अबला की ‘हाय’ से शुरू होती है, न जगत के दु:ख-संकटमय जंत्र को ‘चकनाचूर’ करने की दुराशा में ख़त्म दिखती है। उलटे, वह हालात को बदलने में यक़ीन करती है जिसके तमाम पड़ावों में से कुछ ये हैं—‘सुना है वह स्त्री/हो गई है अब ख़ुद के भी ख़िलाफ़/चीख़-चीख़कर दर्ज करा रही है सारे प्रतिरोध/कहती है, सहना और चुपचाप रहना/कल की बात थी।’
यदि कोई पूछे कि अँधेरों से लड़ने की क़ूवत/औरत, तूने कहाँ से जुटाई/ये आईना जो दरक गया था कभी का/इसे फिर कहाँ से उठा लाई?’ तो सुधा के पास उत्तर मौजूद है—‘अब पेंसिलों की धार बनाने से पहले/हँसिए की धार बनानी होगी/दिमाग़ चलाने के साथ, चलाने होंगे हाथ/दूसरों को कहने से पहले/अब दिखाना होगा ख़ुद करके।’
लेकिन यह समझने के लिए दूर जाना ज़रूरी नहीं कि सुधा को हँसिए की धार बनानी है—ख़ुद करके दिखाने के लिए, न कि प्रतिपक्ष की गरदन रेतने के लिए : ‘जब पक कर खड़ी हो जाए फ़सल/बाँट दो बूरा-बूरा/चूरा-चूरा/यही है सृजन।’
सन्तोष का विषय यह है कि सुधा उपाध्याय की दृष्टि निकट और तत्काल तक सीमित नहीं; वह इतिहास और अतीत को भी अपने फलक का हिस्सा बनाती हैं। वहाँ सम्भावनाओं के अनेक द्वार खुलने की प्रतीक्षा में होंगे।
Piramidon Ki Tahon Mein
- Author Name:
Suman Keshari
- Book Type:

-
Description:
सुमन केशरी का काव्य संसार विस्तृत है। यह विस्तार क्षैतिज भी है और उर्ध्वाधर भी। वे ग़म-ए-दौराँ तक भी जाती हैं और ग़म-ए-जाना तक भी। वह भौतिक संसार के चराचर दु:खों की शिनाख़्त के लिए मिथकों से स्वप्नों तक भटकती हैं, तो आत्मा के आयतन के विस्तार के लिए रोज़-ब-रोज़ की जद्दोजेहद में भी मुब्तिला होती हैं। लगभग तीन दशकों के अपने सक्रिय जीवन में उन्होंने लगातार अपने समय और समाज की हलचलों को उनकी जटिल विडम्बनाओं के साथ दर्ज करने का प्रयास तो किया ही है, साथ ही एक स्त्री के लिए, जो साझा और अलग अभिधार्थ हो सकते हैं, उन्हें बहुत स्पष्ट तौर पर अभिलक्षित भी किया है। पिरामिड की तहों के घुप्प अँधेरों में ‘जहाँ नहीं हैं एक बूँद जल भी तर्पण को’ रोशनी के क़तरे तलाशकर मनुष्यता के लिए जीवन-रस संचित करने की अपनी इस कोशिश में परम्परा के साथ उनका सम्बन्ध द्वंद्वात्मक है। एक ओर गहरा अनुराग तो दूसरी ओर एक सतत असन्तोष।
‘शब्द और सपने’ जैसी कविता में सुमन केशरी का चिन्ताओं का सबसे सघनित रूप दृष्टिगत होता है। छोटे-छोटे नौ खंडों में बँटी यह लम्बी कविता अपने पूरे वितान में पाठक के मन में भय ही नहीं पैदा करती, बल्कि समकालीन वर्तमान का एक ऐसा दृश्य निर्मित करती हैं जहाँ इसके शिल्प में अन्तर्विन्यस्त बेचैनी पाठक की आत्मा तक उतरकर मुक्ति की चाह और उसके लिए मनुष्यता के आख़िरी बचे चिन्हों को बचा लेने का अदम्य संकल्प भी भरती है।
स्त्री उनके काव्य-जगत का अभिन्न हिस्सा है। ‘माँ की आँखों के जल में तिरने' की कामना के साथ, अपने जीवन में मुक्ति और संघर्ष करती, स्वप्नों से यथार्थ के बीच निरन्तर आवाजाही करती, ‘किरणों का सिरा थाम लेने’ का स्वप्न देखती वह यह भी जानती है कि 'चोंच के स्पर्श बिना घर नहीं बनता’ और यह भी कि ‘औरत ही घर बनाती है/पर जब भी बात होती है घर की/तो वह हमेशा मर्द का ही होता है।’ इस स्त्री के संवेदना जगत में मनुष्यों के साथ-साथ प्रकृति भी है तो मातृहीन बिलौटे और अजन्मे बच्चे भी।
जीवन के हर सफे़ पर लिखे ‘असम्भव' से टकराती और ‘घर की तरह घर में रहने' ही नहीं ‘संगीनों के साए तले प्रेम करने की अदम्य जिजीविषा से भरी सुमन केशरी की ये कविताएँ समकालीन कविता के रुक्ष वातावरण में मिथक, लोक और स्वप्न का एक भव्य वातायन ही सृजित नहीं करतीं अपितु प्रेम, करुणा और औदार्य के मानवीय जीवन-मूल्यों पर आधारित एक समन्वयवादी वितान भी रचती हैं जिसमें भविष्य के स्वप्न देखे जा सकें। ‘पिरामिडों की तहों में’ में संकलित कविताएँ अनिवार्यतः हिन्दी कविता के पाठक के संवेदनाजगत को और निर्मल करेंगी तथा असहनीय होते जा रहे इस दौर में मनुष्य बने रहने के लिए आवश्यक मानवीय चेतना का संचार भी करेंगी।
—अशोक कुमार पांडेय
Rabiya Ka Khat
- Author Name:
Medha
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Aaj Ri Kavitavan
- Author Name:
Hiralal Maheshwari +1
- Rating:
- Book Type:

- Description: आज री राजस्थानी कवितावाँ एक कानी तो आपरी धरती री परंपरावा सूं कट्योडी है अर दूजै कानी वा हाल आपरी न्यारी पीछाण भी नीं बना पाई है। इण पोथी में गेली करयोड़ी आज री कवितावाँ इण साचनै तो उजागर करसी ही पण आपरै विसय अर बरवाण री विविधता नै भी सामरत करसी।
Itani Paas Tumhare
- Author Name:
Anuradha Sharma
- Book Type:

- Description: Aसात साल की अबोध बच्ची कहती है मुझसे— दादी माँ, आप कभी बूढ़े मत होना। सुना है बूढ़े लोग मर जाते हैं और मैं किसी भी अपने को खोना नहीं चाहती। ____ तुम्हारे बेइंतहा प्यार ने दी जुबान मेरे खयाल को तुम्हारी चाहतों के फूल महकाते हैं डाल-डाल को। ये खयाल है छलावा ये महक है महज सपना यह जानती हूँ मैं फिर भी तुम्हारे अहसास का अहसान बहुत मानती हूँ मैं।
Daste-Saba
- Author Name:
Faiz Ahmed 'Faiz'
- Book Type:

- Description: दस्ते-सबा’ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का दूसरा कविता-संग्रह है, जिसका न सिर्फ़ उनके साहित्य में, बल्कि समूचे प्रगतिशील साहित्य में ऐतिहासिक महत्त्व है। यह जब नवम्बर 1952 में प्रकाशित हुआ था, तब फ़ैज़ रावलपिंडी ‘साज़िश’ मुक़दमे के तहत हैदराबाद सेंट्रल जेल (पाकिस्तान) में बन्द थे। कॉलेज के दिनों में रोमान से भरपूर फ़ैज़ ने देश-दुनिया की जिन सच्चाइयों का सामना करते हुए ‘ग़मे-जानाँ’ और ‘ग़मे-दौराँ’ को एक ही तजुर्बे के दो पहलू माना था, वे और भी ठेठ सूरत में उनके सामने आ चुकी थीं। लेकिन अब इस तजुर्बे के साथ एक और चीज़ जुड़ चुकी थी—जेल का तजुर्बा। फ़ैज़ ने इसका ज़िक्र करते हुए ख़ुद लिखा है—‘जेलख़ाना आशिक़ी की तरह ख़ुद एक बुनियादी तजुर्बा है, जिसमें फ़िक्र-ओ-नज़र का एकाध नया दरीचा ख़ुद-ब-ख़ुद खुल जाता है।’ इसलिए इस संग्रह में हम फ़ैज़ के उस जज़्बे को और पुरज़ोर होता देख सकते हैं, जिसे कभी उन्होंने ‘क्यों न जहाँ का ग़म अपना लें’ कहकर दिखाया था। साथ ही अपने उसूलों के लिए लड़ने का फौलादी इरादा भी कि ‘मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है।’
Kaise Chand Lafzon Mein Saara Pyaar Likhun
- Author Name:
Dinesh Gupta
- Book Type:

- Description: "कैसे चंद लफ्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ" एक कविता-संग्रह है, जिसमें प्यार मुहब्बत विषय पर कविता, शायरी, गीत और ग़ज़लें सम्मिलित है |
Aakhiri Ishq Sabse Pahle Kiya
- Author Name:
Noman Shauq
- Book Type:

- Description: इस किताब में एक ऐसे शाइ’र की शाइ’री है जो शहर के बाज़ारों के बीचो-बीच अपने वजूद के सेहरा में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं। उनकी शाइ’री से ये नुमाया होता है कि उन्होंने वक़्त को अपने जिस्म के चाक पर रखकर उससे अपनी रफ़्तार का हम-रक़्स कर दिया है। वो किसी की मदहोश बाँहों की ख़्वाहिशों के नशे में इ’श्क़ के लामुतनाही सफ़र में अपने हम-अ’सरों से काफ़ी आगे निकल आए हैं और उनकी शाइ’री को इ’श्क़ का सफ़र-नामा भी कहा जा सकता है। उनके सहराई बदन का अहाता इतना वसीअ’ है कि इ’श्क़-ओ-हवस के तमाम ज़ावियों ने इस दश्त में अपना घर कर लिया है। नो’मान शौक़ सुब्ह-ओ-शाम अपने दश्त-ए-बदन में अपने मेहबूब को सोचते और लिखते रहते हैं।
Waqt Ka Main Lipik
- Author Name:
Yash Malviya
- Book Type:

-
Description:
‘वक़्त का मैं लिपिक’ अपने समय से सीधे मुठभेड़ तो है ही, इसमें कवि की व्यक्तिगत पीड़ा भी अनुस्यूत है। उनके व्यक्तिगत जीवन में जो कुछ घटित हुआ है, उसी का प्रतिबिम्बन इसमें हुआ है और शायद ये गीत न होते तो वे बिखर गए होते, टूट गए होते, हिंस्र पशु हो गए होते, लेकिन इन गीतों ने उन्हें सहारा देकर मनुष्य बने रहने की ताक़त दी है।
यश स्वयं ही मानते हैं कि ये गीत, उनके लिए गीत नहीं उनके जीवन की तारीख़ें हैं। इनमें बाबरी मस्जिद का क़त्ल है तो गुजरात कांड के फफोले और छाले भी इनके बदन पर हैं। इन पर रोज़-रोज़ बलात्कार का शिकार होती सुबहों की पथरा गई चीख़ों का प्रतिरोध भी दर्ज़ है।
...एक रचनाकार अपने जीवन-संघर्ष में किन-किन मोड़ों से गुज़रता है, यह देखना हो तो यश मालवीय के इन गीतों से दो-चार हुआ जा सकता है।
वे अपने गीतों को नवगीत कहलवाना पसन्द करते हैं और मानते हैं कि ढेर सारी विडम्बनाओं के साथ तकनीक के कंट्रास्ट को साधने में नवगीतों की भूमिका ऐतिहासिक रही है। लेकिन उनका ज़ोर इस बात पर सदैव रहता है कि नवगीतों की बुनियादी शर्त उनका गीत होना है।
इस संकलन में शामिल उनके गीत इस शर्त को बख़ूबी पूरा करते हैं।
Ujla Aasman
- Author Name:
Sangita Swarup
- Book Type:

- Description: Book
Daya Nadi : Kaling Yuddha Ki Sakshi
- Author Name:
Gayatribala Panda
- Book Type:

- Description: गायत्रीबाला पंडा की कविताएँ समकालीन काव्य-जगत में अपनी अलग पहचान रखती हैं। अपने ब्योरों और रंग-ढंग में अद्वितीय। दया नदी की कविताएँ इसका प्रमाण हैं। ये कविताएँ इतिहास प्रसिद्ध कलिंग युद्ध पर आधारित हैं, जिनमें दया नदी उस ऐतिहासिक युद्ध के दौरान हुए भीषण रक्तपात के बरअक्स मानवीय करुणा और संवेदना के प्रतीक के रूप में दिखलाई पड़ती है। वस्तुतः ये कविताएँ इतिहास की काव्यात्मक चर्चा नहीं हैं, बल्कि उस काव्यात्मक भावना का प्रतिफल हैं जो इतिहास के माध्यम से यात्रा करती है। इनमें इतिहास को एक अलग और व्यक्तिगत दृष्टिकोण से देखा गया है, लेकिन इनका लक्ष्य मनुष्य मात्र का ऐसा भविष्य है जो युद्ध की सभी भयावहताओं से मुक्त हो।
Kumhlaai Kaliyan
- Author Name:
Dr. Seema Sharma
- Book Type:

- Description: Book
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book