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Ek Parityakt Pul Ka Sapna

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ये कविताएँ बीते दो-एक दशकों में उपजी बेचैनियों और निराशाओं को स्वर देने का प्रयास करती हैं। वक़्त की चोट को शब्दों में महसूसना चोट पर मरहम का ही काम नहीं करता, बल्कि उसे ज़िन्दा भी रखता है। यह संग्रह अपने ज़ख़्मों के प्रति उत्तरदायी बने रहने की अपील करता हुआ, उनके भरने की उम्मीद की व्यर्थ और अश्लील सकारात्मकता से मुक्त उम्मीद भी करता है। जैसे-जैसे इस दौर की अलामतें हम पर नुमायाँ हुई हैं, कविता, विचार और संवेदना में भ्रम और कुहासा बढ़ा है। दृश्य के धुँधलाने के साथ दृष्टि भी क्षीण होती-सी महसूस हुई है। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ इस सन्दर्भ में दृष्टि की खोज भी हैं और उसके थिर और स्पष्ट बने रहने की टॉर्च भी। हालाँकि इन कविताओं में रोशनी की दिशोन्मुखता नहीं, आग की दहनप्रियता अधिक है और इस जलने में केवल सन्ताप नहीं, प्रतिदिन की, सम्बन्धों की, स्थितियों और संघर्षों की ऊष्मा भी है जो जीवन को ठंडेपन से दूर रखते हुए जीवन्त-जाग्रत बनाए रखती है। शिल्प और भाषा के स्तर पर अपने को परस्पर काटते हुए प्रयोग भी उस विकलता को अपने में विन्यस्त करते हैं जो अन्तर्वस्तु की ज़मीन पर जगह-जगह उद्घाटित हुई है। इन कविताओं में एक कवि की यात्रा भी है जो गणित, विज्ञान, दर्शन और समाजशास्त्र की गलियों में भटकती हुई बार-बार कविता के दयार पर लौटती है। ये लौटना ही उसका अरमान भी है और उसका निकष भी। नतीजन इनमें जो धधक रहा है, कई पाँवों का चक्कर, कई हाथों की दुआ है जो हर बार कविता पर आकर ख़त्म होती है। इसलिए तमाम उत्कंठाओं और व्याकुलताओं के बाद भी इन कविताओं में एक बसेरापन भी है और अपनी जगह की ठसक भी।

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ये कविताएँ बीते दो-एक दशकों में उपजी बेचैनियों और निराशाओं को स्वर देने का प्रयास करती हैं। वक़्त की चोट को शब्दों में महसूसना चोट पर मरहम का ही काम नहीं करता, बल्कि उसे ज़िन्दा भी रखता है। यह संग्रह अपने ज़ख़्मों के प्रति उत्तरदायी बने रहने की अपील करता हुआ, उनके भरने की उम्मीद की व्यर्थ और अश्लील सकारात्मकता से मुक्त उम्मीद भी करता है। जैसे-जैसे इस दौर की अलामतें हम पर नुमायाँ हुई हैं, कविता, विचार और संवेदना में भ्रम और कुहासा बढ़ा है। दृश्य के धुँधलाने के साथ दृष्टि भी क्षीण होती-सी महसूस हुई है। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ इस सन्दर्भ में दृष्टि की खोज भी हैं और उसके थिर और स्पष्ट बने रहने की टॉर्च भी। हालाँकि इन कविताओं में रोशनी की दिशोन्मुखता नहीं, आग की दहनप्रियता अधिक है और इस जलने में केवल सन्ताप नहीं, प्रतिदिन की, सम्बन्धों की, स्थितियों और संघर्षों की ऊष्मा भी है जो जीवन को ठंडेपन से दूर रखते हुए जीवन्त-जाग्रत बनाए रखती है। शिल्प और भाषा के स्तर पर अपने को परस्पर काटते हुए प्रयोग भी उस विकलता को अपने में विन्यस्त करते हैं जो अन्तर्वस्तु की ज़मीन पर जगह-जगह उद्घाटित हुई है। इन कविताओं में एक कवि की यात्रा भी है जो गणित, विज्ञान, दर्शन और समाजशास्त्र की गलियों में भटकती हुई बार-बार कविता के दयार पर लौटती है। ये लौटना ही उसका अरमान भी है और उसका निकष भी। नतीजन इनमें जो धधक रहा है, कई पाँवों का चक्कर, कई हाथों की दुआ है जो हर बार कविता पर आकर ख़त्म होती है। इसलिए तमाम उत्कंठाओं और व्याकुलताओं के बाद भी इन कविताओं में एक बसेरापन भी है और अपनी जगह की ठसक भी।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2024
Weight
180 grams
ISBN-13
9788119996865
Pages
208
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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