Humanist Social Vision of a Jungle Poet
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This book carries 51 poems of Kuvempu in translation with a long introduction to give the pan India audience an understanding of Kuvempu's major concerns. Prof Raghunath has made his choice carefully to represent Kuvempu's social concern, and that seems to be at the heart of his introductory piece.
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This book carries 51 poems of Kuvempu in translation with a long introduction to give the pan India audience an understanding of Kuvempu's major concerns. Prof Raghunath has made his choice carefully to represent Kuvempu's social concern, and that seems to be at the heart of his introductory piece.
Book Details
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ISBN9788126048522
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Pages176
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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केन्दुविल्व (केन्दुली) नामक ग्राम में बारहवीं शती में जन्मे महाकवि जयदेव जगन्नाथ की आराधना से प्राप्त भोजदेव और रमादेवी की सन्तान थे। उत्कल राजा एकजात कामदेव के राजकवि के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने 'गीतगोविन्द’ की रचना की। देवशर्मा की जगन्नाथ की कृपा से प्राप्त पुत्री पद्मावती से उनका विवाह हुआ। वह आन्ध्र के एक ब्राह्मण की पुत्री थी, ऐसी भी आख्यायिका है। जयदेव ने ‘गीतगोविन्द' की उन्नीसवीं अष्टपदी से उसे पुनरुज्जीवित किया, ऐसी भी कथा है। जिस दिन रथयात्रा होती है, यही उन्नीसवीं अष्टपदी—‘प्रिये चारुशीले’ मखमल के कपड़े पर लिखकर जगन्नाथ के हाथों दी जाती है।
महीपति ने ‘भक्तविजय' में जयदेव को व्यास का अवतार कहा है। विश्व-साहित्य में राधा-कृष्ण के दैवी प्रेम पर आधारित भाव-नाट्य के रूप में यह एक अप्रतिम रस काव्य है। इस नृत्यनाट्य में पद्मावती राधा की और जयदेव कृष्ण की भूमिका करते थे और वह मन्दिर में खेला जाता था। दोनों केरल में गए और यह काव्य प्रस्तुत किया, ऐसा उल्लेख है। चैतन्य सम्प्रदाय के अनुयायी ‘गीतगोविन्द’ को भक्ति का उत्स मानते हैं। जगन्नाथ मन्दिर के एक शिलालेख के अनुसार देव सेवकों को प्रति संध्या जगन्नाथ के आगे यह नृत्यगायन करने का आदेश दिया गया है। इस काव्य में सहजयान बौद्ध प्रभाव का सूक्ष्म दर्शन होता है : प्रज्ञा और उपाय तत्त्व ही राधा और कृष्ण हैं। राधा-कृष्ण का मिलन इस काव्य में जीव-ब्रह्म के मिलन का प्रतीक है—सुमुखि विमुखिभावं तावद्विमुंच न वंचय। जयदेव के नाम से बंगाली पद मिलते हैं। ‘गुरुग्रन्थ साहब’ में और दादूपंथी साधकों के पद-संग्रह में भी जयदेव की बानी है। राजस्थानी में भी जयदेव के पद मिले हैं।
भारतीय भाषा परिषद् ने दिनांक 18-19 मई, 1980 को ‘गीतगोविन्द’ संगोष्ठी आयोजित की थी। उसमें पढ़े गए बंगाली, मराठी, ओड़िया, मलयाली, गुजराती, हिन्दी-भाषी विद्वानों के निबन्धों और भाषणों का हिन्दी अनुवाद, इस विषय की विशेषज्ञा, डॉ. कपिला वात्स्यायन की भूमिका के साथ प्रस्तुत है।
Jeene Ke Liye Zamin
- Author Name:
Atma Ranjan
- Book Type:

- Description: आत्मा रंजन की ये कविताएं जीवन की उन लुकी छिपी संभावनाओं को बचाने की कविताएँ हैं जिनमें उड़ाने हैं, बीज के छतनार वट–वृक्ष में बदलने की संभावनाएं हैं। यह एक ऐसी आग की कविता है जिससे जलने की नहीं पकने की गंध आती है। जो मनुष्य की रोटी और रोशनी से जुड़ी है। आत्मा रंजन की कविता वस्तुतः जीवन की बहुत साधारण चीज़ों और बहुत साधारण और सामान्य लगती क्रियाओं में नये अर्थ तलाश करती है। वह साधारणता में छिपी असाधारणता को ढूंढ लेती है। वह स्पर्श और थपकी में लड़ने के हौसले को देख लेती है, क्योंकि वह थपकी के बीच आटे की लोई के रोटी के आकार में बदलने की क्रिया को लक्ष्य कर सकती है। यही कारण है कि वह जड़ों के जड़ हो गये या मान लिए गये अर्थ से अलग उसमें छिपी ऊर्जा को देख भी सकती है और समझ भी सकती है। यह एक ऐसी कविता है जो बार बार कुचले जाने के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने वाली घास को पहचानती है। इस कविता को किसी भी चीज़ के किसी अन्य चीज़ में होने की आकांक्षा नहीं है, वह अपने होने में ही चीज़ों के सुंदर होने को देख सकती है। यह कविता बंद पड़े दरवाज़ो पर साँकल की तरह दस्तक देती है। यह हमारे समय की विडंबनाओं और विद्रूपों के ख़िलाफ़ न केवल प्रतिरोध की बल्कि एक लगातार जूझते व्यक्ति की कविता है। यह कविता सबके जीने के लिए ज़मीन की आकांक्षा की कविता है। इसमें अपनी ज़मीन और अपनी भाषा की गंध है। झूंंब, हूल, कुटुवा, गाडका, बियूल की टहनियां जैसे अनेक स्थानीय संदर्भ हमारी भाषा में कुछ नया जोड़ते हैं। इन कविताओं में हमारे समय के बहुत सारे सवाल, महामारी से उपजे संकट और नफ़रत की राजनीति से बढ़ रही हिंसा, बाज़ारवाद और यूज़ एंड थ्रो की संस्कृति के अनेक चेहरे उजागर होते हैं। ये कविताएं न होने में होने की संभावनाओं को देखने की कविताएं हैं। – राजेश जोशी
Parchhain ka Sach
- Author Name:
Narmada Prasad Upadhyaya
- Book Type:

- Description: मन से परछाईं दूर नहीं हो पाती, लेकिन जब जीवन की देहलीज पर साँझ दस्तक देती है, तब जीवन का अर्थ समझ आने लगता है। अपनी जिंदगी की शाम में कैफ भोपाली जीवन और उससे जुड़ी परछाईं इन दोनों का अर्थ इन पंक्तियों में समझा गए हैं— जिंदगी शायद इसी का नाम है, दूरियाँ, मजबूरियाँ, तन्हाइयाँ। क्या यही होती है शामे इंतजार, आहटें, घबराहटें, परछाइयाँ। जीवन की साँझ में ये परछाइयाँ हमें अपने अस्तित्व का स्मरण करा देती हैं। नंदकिशोर कहते हैं— सूरज ढला तो कद से ऊँचे हो गए साये, कभी पैरों से रौंदी थीं यही परछाइयाँ हमने। सोचता हूँ, ये परछाइयाँ साँझ होते-होते क्यों लंबी होने लगती हैं? इसलिए कि ये ढल जाने की बाट जोहती हैं। इनके रिश्ते ऊषा से नहीं होते, भोर से नहीं होते, सुबह के आँचल में छुपी आशाओं से नहीं होते। इनके रिश्ते उस रात से होते हैं, जिसकी प्रकृति से परछाईं की प्रकृति मिलती है। दोनों स्याह होते हैं, दोनों भटकाते हैं और दोनों उजास की पराजय में अपनी जय के उत्सव रचते हैं। रात का उत्सव अँधेरा है और परछाईं का पर्व वह ढलती साँझ है, जिसके आगमन पर उजास की धड़कनें मंद होने लगती हैं। परछाईं छलना है। उसकी परिणति अंधकार है। वह अपना उत्तराधिकार रात को सौंपती है। इसलिए भले परछाईं कुछ देर हमारे साथ-साथ चलकर हमें अपने साथ होने का आभास कराए, वह आश्वस्ति नहीं है, विश्वास नहीं है। —इसी संग्रह से
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