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Parsi Theater : Udbhav Evam Vikash

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Plays

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डॉ. सोमनाथ गुज ने सन् 1947 में हिन्दी नाटक साहित्य का इतिहास लिखा था । प्रस्तुत रचना में यथास्थान यह बताया गया है कि विक्टोरिया थियोट्रिकल मण्डली की स्थापना से पहले भी पारसियों और गैर-पारसियों की मण्डलियाँ नाटक किया करती थीं परन्तु बड़े और सुदृढस्‍तर पर नाट्यकला को प्रतिष्ठित करने का श्रेय विक्टोरिया, एलफिनस्‍टन और जोरास्ट्रियन नाटक मण्डलियों को ही था । इनके सम्बन्ध में गुजराती के साप्ताहिक पत्र ' रास्तगोफ्तार ', में थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती है । इसके सम्पादक कैखुसरो कावराजी स्वयं नाटककार, निर्देशक और अभिनेता थे । अंग्रेजी के ' बाम्बे टाइम्स ' और ' बाम्बे कूरियर एण्ड टेलिग्राफ ' की पुरानी फाइलें अनेकों सूचनाओं से भरी पड़ी हैं । महाराष्ट्र सरकार के ' आलेख और पुरातत्व विभाग' की सामग्री जीर्ण-शीर्ण है । सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण गुजराती साप्ताहिक ' कैसरेहिन्द ' है । इसी पत्र में धनजी भाई नसरवानजी पटेल के पारसी नाटक सम्बन्धी अनेकों लेख निरन्तर रूप से प्रकाशित हुए थे । इन लेखों में अधिकांशत: पारसी अभिनेताओं की चर्चा है । कुछ नाटक मण्डलियों, उनके मालिकों और निर्देशकों का विवरण भी आ गया है । जहाँगीर खम्बाता की रचना ' मारो नाटकी अनुभव ' भी बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई है । सभी नाटक मण्डलियाँ जहाँगीर की अभिनय-कला और निर्देशन शक्ति का लोहा मानती थी । सबसे अधिक उपयोगी और प्रमाणित वे दीबाचे (भूमिकाएँ) है जो किसी-किसी नाटक के आदि में मिलते हैं । इन दीबाचों से यह पता चलता है कि नाटक किसने लिखा? किस नाटक मण्डली के लिए लिखा? कब उसका प्रकाशन हुआ? तथा नाटककार का नाटक-विशेष के लिए क्या दृष्टिकोण है? प्रस्तुत कृति में सभी प्राप्य और दुधार सामग्री का उपयोग किया गया है । ऐसा ग्रंथ हिन्दी में पारसी थियेटर पर नहीं लिखा गया जिसमें मूलभूत स्रोतों पर अवलम्बित इतनी अधिक सामग्री मिलती हो ।

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About the Book

डॉ. सोमनाथ गुज ने सन् 1947 में हिन्दी नाटक साहित्य का इतिहास लिखा था । प्रस्तुत रचना में यथास्थान यह बताया गया है कि विक्टोरिया थियोट्रिकल मण्डली की स्थापना से पहले भी पारसियों और गैर-पारसियों की मण्डलियाँ नाटक किया करती थीं परन्तु बड़े और सुदृढस्‍तर पर नाट्यकला को प्रतिष्ठित करने का श्रेय विक्टोरिया, एलफिनस्‍टन और जोरास्ट्रियन नाटक मण्डलियों को ही था । इनके सम्बन्ध में गुजराती के साप्ताहिक पत्र ' रास्तगोफ्तार ', में थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती है । इसके सम्पादक कैखुसरो कावराजी स्वयं नाटककार, निर्देशक और अभिनेता थे । अंग्रेजी के ' बाम्बे टाइम्स ' और ' बाम्बे कूरियर एण्ड टेलिग्राफ ' की पुरानी फाइलें अनेकों सूचनाओं से भरी पड़ी हैं । महाराष्ट्र सरकार के ' आलेख और पुरातत्व विभाग' की सामग्री जीर्ण-शीर्ण है । सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण गुजराती साप्ताहिक ' कैसरेहिन्द ' है । इसी पत्र में धनजी भाई नसरवानजी पटेल के पारसी नाटक सम्बन्धी अनेकों लेख निरन्तर रूप से प्रकाशित हुए थे । इन लेखों में अधिकांशत: पारसी अभिनेताओं की चर्चा है । कुछ नाटक मण्डलियों, उनके मालिकों और निर्देशकों का विवरण भी आ गया है । जहाँगीर खम्बाता की रचना ' मारो नाटकी अनुभव ' भी बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई है । सभी नाटक मण्डलियाँ जहाँगीर की अभिनय-कला और निर्देशन शक्ति का लोहा मानती थी । सबसे अधिक उपयोगी और प्रमाणित वे दीबाचे (भूमिकाएँ) है जो किसी-किसी नाटक के आदि में मिलते हैं । इन दीबाचों से यह पता चलता है कि नाटक किसने लिखा? किस नाटक मण्डली के लिए लिखा? कब उसका प्रकाशन हुआ? तथा नाटककार का नाटक-विशेष के लिए क्या दृष्टिकोण है? प्रस्तुत कृति में सभी प्राप्य और दुधार सामग्री का उपयोग किया गया है । ऐसा ग्रंथ हिन्दी में पारसी थियेटर पर नहीं लिखा गया जिसमें मूलभूत स्रोतों पर अवलम्बित इतनी अधिक सामग्री मिलती हो ।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
3rd
Publication year
2015
Weight
438 grams
ISBN-13
9788180319907
Pages
296
Reading time
~10 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22.5 cm
Language
Hindi

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