Pitamaha Bhishma
Author:
Pt. Vijay Shankar MehtaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 140
₹
175
Available
यह नाटक ‘महाभारत’ या भीष्म पर आधारित ऐतिहासिक कथा-चिंतन ही नहीं, वरन् भीष्म के माध्यम से हमारे स्वविवेक, उसकी महत्त्वाकांक्षा एवं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सीधे जीवन व चिंतन पर पड़नेवाले प्रभाव की व्याख्या है। वहीं सृष्टि के आरंभ से अब तक के सबसे जटिल मानवीय संबंध ‘स्त्री-पुरुष’ के संदर्भ में इस नाटक को मिथकीय रूपाकारों के माध्यम से आधुनिक चेतना-बोध एवं प्रश्नों को जोड़ने का यत्न है।
इस नाटक में भीष्म को दो रूपों में प्रस्तुत किया गया है—देह और अंतर्मन। इसलिए प्रस्तुति में देह कभी अंतर्मन हो सकता है तो अंतर्मन कभी देहाकार हो सकता है।
इस नाटक के पात्रों में कहीं-न-कहीं हम अपने आप को पा सकते हैं। कुछ घटनाएँ हमारे जीवन से होकर भी इसी रूप में गुजरती हैं। पढ़ें तो विचार है, निहारें तो नाटक है और देखें तो दर्पण।
ISBN: 9789352660322
Pages: 80
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
इसे शिवशंकरी का दुस्साहस ही कहा जाना चाहिए कि लगातार असंवेदनशील होती दुनिया में उनकी कहानियाँ मूलत: संवेदना की कहानियाँ हैं। मुख्य बात यह है कि उनकी संवेदना का कहीं अन्त नहीं होता बल्कि उनकी संवेदना इस समाज के अत्यधिक असंवेदनशील हो गए आदमी का हृदय-परिवर्तन करने का जोखिम उठाती है। ‘खाना ठंडा हो रहा है’ का बदचलन नायक नटराजन का यूँ बदलना नाटकीय भले ही लगे, मगर मानवता की यह ज़रूरी आवश्यकता है।
उनकी संवेदना प्रेम और ममता का जड़ रूप नहीं है। वे नक़ली और दिखावटी संवेदना के जाल में न फँसकर शाश्वत संवेदना रचती हैं। उनका मानना है कि ‘स्टेप्ती’ भावशून्य यंत्रों के काम आ सकती है, मानव के नहीं। लेखिका की संवेदना अपनी अलग ज़मीन तलाशती है। अर्थात् किसी ख़ास बने-बनाए ढर्रे पर केन्द्रित न होकर उनकी संवेदना मानवीय सम्बन्धों के विभिन्न पहलुओं की गहरी पड़ताल करती है। वे कहीं माँ-बेटी के सम्बन्धों को अर्थ देती हैं तो कहीं समाज द्वारा तिरस्कृत नारी को हौसला। वक़्त के इस दौर में उनकी कहानियों से गुज़रना सही मायने में अपना और अपने होने का अर्थ खोजना है।
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