Barbareek Uvach
Author:
KunalPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 82
₹
100
Available
Drama
ISBN: 9789380044521
Pages: 104
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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“कुरुक्षेत्र में दिन में ही रहो, बस! रात में वहाँ मत रहो। यदि तुम रात में वहाँ रहे तो दिन में जो देखोगे, ठीक उसका उलटा पाओगे।” ‘शस्त्र-सन्तान’ का यह सूत्र वाक्य—केवल ‘महाभारत’ (आरण्यक पर्व) तक ही सीमित नहीं है। अस्तित्व के तब से अब तक के महावृत्तान्त में यह गूँज रहा है और यह उसके अन्तर्विरोधों तथा दर्दनाक विडम्बना को एक झटके में उजागर करता है। क्या पता हम जो देख रहे हैं—अगले क्षण उसका अर्थ उलट जाए! यह नाटक निःशब्द रात्रि में गांधारी, शववाहक, शस्त्र संचयकर्ताओं और विलाप करती स्त्रियों के मद्धिम स्वरों से शुरू होकर एक ऐसी बीहड़ सांगीतिक रचना में परिवर्तित होता है, जहाँ करुणा के साथ शब्द और महारंग काक की आवाज़ें भी हैं। एक ऐसी सांगीतिक रचना जो खींचती है, रुलाती है और सत्य के काँटों से भरी मरुभूमि पर ढकेल देती है।
यह नाटक कुरुक्षेत्र की रातों के बहाने रक्त में ऊभ-चूभ विगत, वर्तमान, आगत की भी कथा है, जिसमें जटिल सम्बन्धों और सत्य के लिए संघर्षरत आत्माओं का पुनरुद्घाटन होता है।
बहुविदित महाआख्यान के बहाने ‘शस्त्र-सन्तान’ हिन्दी नाटक के इतिहास में समकालीन काव्य की भाषा के नाटकीय प्रक्षेपण का अप्रतिम उदाहरण है।
Badi Buajee
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इस नाटक की मुख्य शक्ति इसके चुटीले और व्यंग्य सिद्ध संवाद हैं। कथा का विकास और प्रवाह संवादों के जरिए होता रहता है। एक उदाहरण, बूआजी के व्यक्तित्व को व्यंजित करता शशांक नामक पात्र का यह कथन, ‘कोन्नगर से बूआजी को प्रमीला कैसे खींचकर यहाँ ला रही है, यह या तो भगवान जाने या तुम...यह खबर सुनने के बाद से मेरे तो होश फाख्ता हो रहे हैं। गोली खाकर मरने के समय आँखों के सामने अँधेरा आने के बजाय बूआजी आ खड़ी होती हैं।’ यही कारण है कि सारे प्रमुख पात्र पाठकों और दर्शकों की स्मृति में टिक जाते हैं।
सुप्रसिद्ध रंगकर्मी डॉ. प्रतिभा अग्रवाल द्वारा अनूदित यह प्रहसन नई साज-सज्जा में पाठकों व रंगकर्मियों को भाएगा, ऐसा विश्वास है।
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- Description: भवभूति 8वीं शताब्दी के भारतीय विद्वान थे, जो संस्कृत में लिखे गए अपने नाटकों और कविताओं के लिए विख्यात थे। उनके नाटकों को कालिदास की रचनाओं के बराबर माना जाता है। उन्हें उत्तररामचरित नामक उनकी रचना के लिए "करुणा रस के कवि" के रूप में जाना जाता है। भवभूति का जन्म महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के पद्मपुरा, आमगांव में हुआ था। उनका जन्म विद्वानों के एक औदुंबर/उदुंबर ब्राह्मण[1] परिवार में हुआ था।[2][3] उन्हें यायावर परिवार का वंशज बताया जाता है, जिनका उपनाम उदुंबर था। उनके कश्यप ब्राह्मण पूर्वज काले यजुर्वेद का पालन करते थे और पाँच पवित्र अग्नि रखते थे।[4] उनका असली नाम श्रीकंठ औदुंबर था। वे नीलकंठ औदुंबर और जतुकर्णी औदुंबर के पुत्र थे। उन्होंने ग्वालियर से लगभग 42 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में पद्मपवाया में अपनी शिक्षा प्राप्त की। दयाननिधि परमहंस को उनका गुरु माना जाता है। उन्होंने यमुना नदी के तट पर कालपी में अपने ऐतिहासिक नाटकों की रचना की। माना जाता है कि वे कन्नौज के राजा यशोवर्मन के दरबारी कवि थे। 12वीं सदी के इतिहासकार कल्हण ने उन्हें राजा के दल में शामिल किया है। 736 ई. में, राजा को कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तपीड़ ने पराजित किया था।
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