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कोई जमाना था जब दिल्ली से निकलने वाले अखबार राष्ट्रीय और लखनऊ-लुधियाना से निकलने वाले अखबार क्षेत्रीय कहे जाते थे। हिंदी अखबारों की दुनिया इस बीच बहुत बदल चुकी है। सैटेलाइट संस्करणों ने जो महादृश्य उपस्थित किया है उसने हिंदी अखबारों की बाजार शक्ति की नए सिरे से पहचान कराई है। पारंपरिक अर्थ में गढ़ कहे जाने वाले, ध्वस्त हो रहे हैं। संपादक और स्वामी के पारस्परिक रिश्तों ने नई शक्ल ले ली है। जबर्दस्त पूँजी निवेश, आक्रामक बाजार नीति तथा पत्रकारिक फैशन परेड का नया पैकेज सामने आ रहा है। प्रसार की उछाल में पाठक के लिए नए विकल्प खुले हैं। लेकिन क्या यह नई दुनिया सचमुच एक अद्भुत दुनिया है? <br>एक रचनाकार होने के साथ-साथ, पत्रकारिता की उसी बदलती हुई दुनिया के अनुभव का हिस्सा होते हुए यशवंत व्यास जब क्षेत्रीय पत्रकारिता में बदलाव को आँकते हैं तो उनकी दृष्टि गहरी संवेदना से युक्त होती है। वे निरंतर हो रहे परिवर्तनों को गहन अनुभूतियों तथा स्पष्ट तथ्यों के बीच दर्ज करते हैं। इसके लिए वे न सिर्फ भाषा के स्तर पर बल्कि प्रस्तुति पर भी शोध को नया, ताज़गी-भरा आकार देते हैं। अंतर्विरोधों की पहचान के प्रति पैनी दृष्टि तथा क्षेत्रीय पत्रकारिता में सफलता असफलता की गंभीर पड़ताल करने की कोशिशों जैसी खूबियों के चलते ‘अपने गिरेबान’ में समकालीन क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता पर एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
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कोई जमाना था जब दिल्ली से निकलने वाले अखबार राष्ट्रीय और लखनऊ-लुधियाना से निकलने वाले अखबार क्षेत्रीय कहे जाते थे। हिंदी अखबारों की दुनिया इस बीच बहुत बदल चुकी है। सैटेलाइट संस्करणों ने जो महादृश्य उपस्थित किया है उसने हिंदी अखबारों की बाजार शक्ति की नए सिरे से पहचान कराई है। पारंपरिक अर्थ में गढ़ कहे जाने वाले, ध्वस्त हो रहे हैं। संपादक और स्वामी के पारस्परिक रिश्तों ने नई शक्ल ले ली है। जबर्दस्त पूँजी निवेश, आक्रामक बाजार नीति तथा पत्रकारिक फैशन परेड का नया पैकेज सामने आ रहा है। प्रसार की उछाल में पाठक के लिए नए विकल्प खुले हैं। लेकिन क्या यह नई दुनिया सचमुच एक अद्भुत दुनिया है? <br>एक रचनाकार होने के साथ-साथ, पत्रकारिता की उसी बदलती हुई दुनिया के अनुभव का हिस्सा होते हुए यशवंत व्यास जब क्षेत्रीय पत्रकारिता में बदलाव को आँकते हैं तो उनकी दृष्टि गहरी संवेदना से युक्त होती है। वे निरंतर हो रहे परिवर्तनों को गहन अनुभूतियों तथा स्पष्ट तथ्यों के बीच दर्ज करते हैं। इसके लिए वे न सिर्फ भाषा के स्तर पर बल्कि प्रस्तुति पर भी शोध को नया, ताज़गी-भरा आकार देते हैं। अंतर्विरोधों की पहचान के प्रति पैनी दृष्टि तथा क्षेत्रीय पत्रकारिता में सफलता असफलता की गंभीर पड़ताल करने की कोशिशों जैसी खूबियों के चलते ‘अपने गिरेबान’ में समकालीन क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता पर एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
Book Details
-
ISBN9788171194414
-
Pages248
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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विज्ञापनों का ख़ासा असर शुरुआती दौर में आहिस्ता-आहिस्ता किन्तु कालान्तर में धूम-धड़ाके के साथ भारतीय समाज में गहरे पसर चुका है। साफ़ शब्दों में, तमाम दर्जनों लांछनाओं के बावजूद आज हम विज्ञापनों के जिस मायावी संसार का सामना कर रहे हैं, उससे बचना हमारे लिए मुश्किल हो गया है। एक ओर अभिव्यक्ति के अधिकांश मंच-मचान और माध्यमों से इसका अटूट रिश्ता स्थापित हो चुका है तो दूसरी ओर यह सम्प्रेषण की मुकम्मल, पुख्ता और आकर्षक विधा और माध्यम तो बन ही गया है। अब यह व्यावसायिक शक्ति, विक्रय कला की प्रणाली, लोकसेवा, घोषणा, उपभोक्ता के लिए सूचना और सुझाव, व्यावसायिक ज़रिया और क्रय-शक्ति के संवर्धक के रूप में अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है।
विज्ञापनों के बिना, बिलाशक बाज़ार चल नहीं सकता। बाज़ार को यह सुसम्पन्न और लुभावना बनाता है, उसे सजाता और साधता है। बिना इसके मीडिया के सामने अस्तिव का संकट पैदा हो सकता है। इसने भाषा, संस्कृति के साथ जीवन की कई चीज़ों को बदल दिया है।
Feature Lekhan : Swarup Aur Shilpa
- Author Name:
Manohar Prabhakar +1
- Book Type:

- Description:
माखनलाल चतुर्वेदी कवि थे, नाटककार थे, निबन्ध लेखक भी थे, अर्थात् उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी क़लम चलाई थी। वे देश की स्वतंत्रता के लिए लेखनी चलानेवाले एक अग्रणी पत्रकार भी थे। उनकी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। साहित्य और पत्रकारिता का यह संगम हमारी परम्परा में हमेशा रहा है। फिर भी यह दुर्भाग्य की बात है कि आजकल पत्रकारिता और साहित्य को दो अलग-अलग खाँचों में बाँटा जाता है। इस विभाजक रेखा को भी लाँघनेवाली विधाएँ हैं। उनमें से कुछ हैं—फ़ीचर, रिपोर्ताज, यात्रा-वृत्तान्त एवं संस्मरण।
इस पुस्तक के ज़रिए फ़ीचर लेखन के कौशल को सरल ढंग से पेश करने की कोशिश की गई है। उम्मीद है कि इससे पाठक साहित्य और पत्रकारिता की विभाजक रेखा को जोड़कर इन दोनों के सम्मिश्रण को नए सिरे से स्थापित कर सकेंगे। फ़ीचर लेखन जितनी अधिक मात्रा में होगा, उतनी ही मात्रा में साहित्य और पत्रकारिता को जनमानस में भी जुड़ा हुआ देखने की प्रवृत्ति विकसित होगी।
डॉ. मनोहर प्रभाकर ने, जो स्वयं उच्च कोटि के फ़ीचर लेखक रहे हैं और जिन्होंने ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘नवज्योति’ एवं अन्य समाचार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने लेखन कौशल को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है, इस पुस्तक में अपने अनुभवों का सार इस ढंग से प्रस्तुत किया है कि उसे सरलता से व्यवहार में लाया जा सके।
Ruktapur
- Author Name:
Pushyamitra
- Book Type:

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यह किताब एक सजग-संवेदनशील पत्रकार की डायरी है, जिसमें उसकी ‘आँखों देखी’ तो दर्ज है ही, हालात का तथ्यपरक विश्लेषण भी है। यह दिखलाती है कि एक आम बिहारी तरक़्क़ी की राह पर आगे बढ़ना चाहता है पर उसके पाँवों में भारी पत्थर बँधे हैं, जिससे उसको मुक्त करने में उस राजनीतिक नेतृत्व ने भी तत्परता नहीं दिखाई, जो इसी का वादा कर सत्तासीन हुआ था। आख्यानपरक शैली में लिखी गई यह किताब आम बिहारियों की जबान बोलती है, उनसे मिलकर उनकी कहानियों को सामने लाती है और उनके दुःख-दर्द को सरकारी आँकड़ों के सामने रखकर दिखाती है। इस तरह यह उस दरार पर रोशनी डालती है जिसके एक ओर सरकार के डबल डिजिट ग्रोथ के आँकड़े और चमचमाते दावे हैं तो दूसरी तरफ़ वंचित समाज के लोगों के अभाव, असहायता और पीड़ा की झकझोर देने वाली कहानियाँ हैं। इस किताब के केन्द्र में बिहार है, उसके नीति-निर्माताओं की 73 वर्षों की कामयाबी और नाकामी का लेखा-जोखा है, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे देश के हरेक राज्य की सचाई हैं। सरकार द्वारा आधुनिक विकास के ताबड़तोड़ दिखावे के बावजूद उसकी प्राथमिकताओं और आमजन की ज़रूरतों में अलगाव के निरंतर बने रहने को रेखांकित करते हुए यह किताब जिन सवालों को सामने रखती है, उनका सम्बन्ध वस्तुत: हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है।
Television KI Bhasha
- Author Name:
Harish Chandra Barnwal
- Book Type:

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अनुमान के मुताबिक़ हिन्दी में लगभग एक लाख पैंतालीस हज़ार शब्द हैं, लेकिन हिन्दी टेलीविज़न पत्रकारिता के लिए महज़ पन्द्रह सौ शब्दों की जानकारी ही काफ़ी है
यानी अगर आपने इतने शब्दों की जानकारी हासिल कर ली तो यक़ीन मानिए, आप भाषा के लिहाज़ से हिन्दी के अच्छे टेलीविज़न पत्रकार तो ज़रूर बन जाएँगे। अफ़सोस की बात है कि ये जानकारी भी टेलीविज़न पत्रकारों को भारी लगती है। शब्दों की सही समझ की कमी, भाषा के आधे–अधूरे ज्ञान की वजह से टेलीविज़न पत्रकार ऐसी ग़लतियाँ कर बैठते हैं कि कई बारगी मज़ाक़ का पात्र तक बन जाते हैं। यही नहीं, शब्दों के ग़लत इस्तेमाल से अर्थ का अनर्थ तक हो जाता है। इसलिए पत्रकारिता के लिहाज़ से भाषा की सही जानकारी बेहद ज़रूरी है।
हिन्दी न्यूज़ चैनलों की दुनिया भले ही समय के साथ काफ़ी व्यापक होती चली गई हो, लेकिन हक़ीक़त यही है कि आज भी टीवी पत्रकारिता में भाषा को लेकर एक भी ऐसी किताब नहीं है, जो भाषा और पत्रकारिता को जोड़ते हुए एक मुकम्मल जानकारी दे सके। यही परेशानी टीवी पत्रकारिता की पढ़ाई करनेवाले छात्र–छात्राओं के साथ है। हिन्दी के प्रोफ़ेसर ही पत्रकारिता के बच्चों को भी पढ़ाते हैं, ऐसे में पत्रकारिता की भाषा का व्यावहारिक ज्ञान कभी भी विद्यार्थियों को सही से नहीं हो पाता और इसका ख़मियाज़ा टेलीविज़न पत्रकारिता को होता है।
टेलीविज़न की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है। इसकी भाषा आम बोलचाल की भाषा होते हुए भी अलग है। इसकी भाषा मानकता के क़रीब रहते हुए भी इसके नियमों का पालन कभी नहीं करती। नए–नए शब्द समय और ज़रूरत के हिसाब से गढ़े जाते हैं तो कई शब्दों को हमेशा के लिए त्याग दिया जाता है। इस भाषा को अंग्रेज़ी, उर्दू और दूसरी भाषाओं से कोई परहेज़ नहीं। इसकी भाषा मीडिया के अन्य माध्यमों मसलन अख़बार या फिर रेडियो की भाषा से बेहद अलग है।
TRP : Media Mandi Ka Mahamantra
- Author Name:
Mukesh Kumar
- Book Type:

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पिछले ढाई दशकों में टेलीविज़न की सामग्री बड़े पैमाने पर बदली है। ख़ासतौर पर न्यूज़ चैनलों का चरित्र बुनियादी रूप से बदल गया है। मीडिया संस्थानों के स्वामित्व में आया बदलाव, बड़े कार्पोरेट घरानों का बढ़ता नियंत्रण और हस्तक्षेप, बाज़ार का प्रभाव इसके प्रमुख कारण हैं। आर्थिक उदारवाद के दौर में सत्ता के चरित्र में आए परिवर्तनों का भी इसमें योगदान रहा है। सत्ता के निरंकुशतावादी स्वरूप ने एक आतंक भी पैदा किया है, जिसके सामने मीडिया को नतमस्तक होना पड़ा है।
कार्पोरेट तथा सत्ता के अपने गणित भी हैं और मीडिया को उनसे तालमेल बैठाने के लिए भी बाध्य होना पड़ा है। मगर जहाँ तक बाज़ार का सवाल है तो उसका सबसे बड़ा हथियार है विज्ञापन। वह विज्ञापनों पर भारतीय मीडिया की निर्भरता का लाभ उठाता है। इसके लिए उसके पास एक बहुत ही कारगर हथियार है–टीआरपी यानी टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट।
टीआरपी दरअसल क्या है, वह क्यों है और न्यूज़ चैनलों की सामग्री को कैसे नियंत्रित और संचालित करती है, इस बारे में ठोस जानकारियाँ कम ही उपलब्ध हैं। यही नहीं, अत्यधिक चर्चाओं में रहने के बावजूद टीआरपी मापने की प्रणाली में क्या ख़ामियाँ हैं, उसमें कैसे धाँधली की जाती है और वह कितनी विश्वसनीय है, है भी या नहीं, इस बारे में सामग्री का अभाव रहता है, जबकि इन सब पहलुओं के बारे में जाने बगैर न टीआरपी को समझा जा सकता है और न ही बाज़ार के ऑपरेट करने के तरीक़े को। यह किताब टीआरपी के इन तमाम रहस्यों से परदा उठाती है।
यह सवाल भी बड़ी अहमियत रखता है कि टीवी न्यूज़ या न्यूज़ चैनल टीआरपी के दुष्चक्र से निकल सकते हैं या नहीं? इस पुस्तक में इन प्रश्नों पर विचार करके कुछ रास्ते सुझाने की कोशिश भी की गई है।
शैक्षणिक, अकादमिक और पत्रकारिता तीनों ही क्षेत्रों में सक्रिय लोगों के लिए तो पुस्तक उपयोगी है ही, वे पाठक भी इससे लाभ उठा सकेंगे जिनकी दिलचस्पी मीडिया में आई विसंगतियों या नई प्रवृत्तियों को जानने-समझने में रहती है।
Chautha Khambha (Private) Limited
- Author Name:
Dilip Mandal
- Book Type:

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जनविरोधी होना मीडिया का षड्यंत्र नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक मजबूरी है। एक समय था जब मास मीडिया पर यह आरोप लगता था कि वह कॉरपोरेट हित में काम करता है। 21वीं सदी में मीडिया ख़ुद कॉरपोरेट है और अपने हित में काम करता करता है। कॉरपोरेट मीडिया यानी अख़बार, पत्रिकाएँ, चैनल और अब बड़े वेबसाइट भी प्रकारान्तर में पूँजी की विचारधारा, दक्षिणपन्थ, साम्प्रदायिकता, जातिवाद और तमाम जनविरोधी नीतियों के पक्ष में वैचारिक गोलबन्दी करने की कोशिश करते नज़र आते हैं। पश्चिमी देशों के मीडिया तंत्र को समझने के लिए नोम चोम्स्की और एडवर्ड एस. हरमन ने एक प्रोपेगंडा मॉडल दिया था। इसके मुताबिक़, मीडिया को परखने के लिए उसके मालिकाना स्वरूप, उसके कमाई के तरीक़े और ख़बरों के उसके स्रोत का अध्ययन किया जाना चाहिए। इस मॉडल के आधार पर चोम्स्की और हरमन इस नतीजे पर पहुँचे कि अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया का पूँजीपतियों के पक्ष में खड़ा होना और दुनिया-भर के तमाम हिस्सों में साम्राज्यवादी हमलों का समर्थन करना किसी षड्यंत्र के तहत नहीं है। मीडिया अपनी आन्तरिक संरचना के कारण यही कर सकता है। साम्राज्यवाद को टिकाए रखने में मीडिया कॉरपोरेशंस का अपना हित है। उसी तरह, पूँजीवादी विचार को मज़बूत बनाए रखने में मीडिया का अपना स्वार्थ है।
भारत के सन्दर्भ में चोम्स्की और हरमन के प्रोपेगंडा मॉडल में एक तत्त्व और जुड़ता है। वह है भारत की सामाजिक संरचना। इस नए आयाम की वजह से भारतीय मुख्यधारा का मीडिया पूँजीवादी के साथ-साथ जातिवादी भी बन जाता है। उच्च और मध्यवर्ग में, ऊपर की जातियों की दख़ल ज़्यादा होने के कारण मीडिया के लिए आर्थिक रूप से भी ज़रूरी है कि वह उन जातियों के हितों की रक्षा करे। आख़िर इन्हीं वर्गों से ऐसे लोग ज़्यादा आते हैं, जो महत्त्वपूर्ण ख़रीदार हैं और इनकी वजह से विज्ञापनदाताओं को मीडिया में इनकी उपस्थिति चाहिए। यह एक ऐसा दुश्चक्र है, जिसकी वजह से भारतीय मीडिया न सिर्फ़ गरीबों, किसानों, ग्रामीणों और मज़दूरों बल्कि पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों की भी अनदेखी करता है। मीडिया के इस स्वरूप के पीछे किसी की बदमाशी या किसी का षड्यंत्र नहीं है। यह मीडिया और समाज की संरचनात्मक बनावट और इन दोनों के अन्तर्सम्बन्धों का परिणाम है। प्रस्तुत किताब इन्हीं अन्तर्सम्बन्धों को समझने की कोशिश है। इसे जानना मीडिया के विद्यार्थियों के साथ ही तमाम भारतीय नागरिकों के लिए आवश्यक है, क्योंकि जाने-अनजाने हम सब मीडिया से प्रभावित हो रहे हैं।
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