Apne Gireban Mein
(0)
₹
795
636 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
कोई जमाना था जब दिल्ली से निकलने वाले अखबार राष्ट्रीय और लखनऊ-लुधियाना से निकलने वाले अखबार क्षेत्रीय कहे जाते थे। हिंदी अखबारों की दुनिया इस बीच बहुत बदल चुकी है। सैटेलाइट संस्करणों ने जो महादृश्य उपस्थित किया है उसने हिंदी अखबारों की बाजार शक्ति की नए सिरे से पहचान कराई है। पारंपरिक अर्थ में गढ़ कहे जाने वाले, ध्वस्त हो रहे हैं। संपादक और स्वामी के पारस्परिक रिश्तों ने नई शक्ल ले ली है। जबर्दस्त पूँजी निवेश, आक्रामक बाजार नीति तथा पत्रकारिक फैशन परेड का नया पैकेज सामने आ रहा है। प्रसार की उछाल में पाठक के लिए नए विकल्प खुले हैं। लेकिन क्या यह नई दुनिया सचमुच एक अद्भुत दुनिया है? <br>एक रचनाकार होने के साथ-साथ, पत्रकारिता की उसी बदलती हुई दुनिया के अनुभव का हिस्सा होते हुए यशवंत व्यास जब क्षेत्रीय पत्रकारिता में बदलाव को आँकते हैं तो उनकी दृष्टि गहरी संवेदना से युक्त होती है। वे निरंतर हो रहे परिवर्तनों को गहन अनुभूतियों तथा स्पष्ट तथ्यों के बीच दर्ज करते हैं। इसके लिए वे न सिर्फ भाषा के स्तर पर बल्कि प्रस्तुति पर भी शोध को नया, ताज़गी-भरा आकार देते हैं। अंतर्विरोधों की पहचान के प्रति पैनी दृष्टि तथा क्षेत्रीय पत्रकारिता में सफलता असफलता की गंभीर पड़ताल करने की कोशिशों जैसी खूबियों के चलते ‘अपने गिरेबान’ में समकालीन क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता पर एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
Read moreAbout the Book
कोई जमाना था जब दिल्ली से निकलने वाले अखबार राष्ट्रीय और लखनऊ-लुधियाना से निकलने वाले अखबार क्षेत्रीय कहे जाते थे। हिंदी अखबारों की दुनिया इस बीच बहुत बदल चुकी है। सैटेलाइट संस्करणों ने जो महादृश्य उपस्थित किया है उसने हिंदी अखबारों की बाजार शक्ति की नए सिरे से पहचान कराई है। पारंपरिक अर्थ में गढ़ कहे जाने वाले, ध्वस्त हो रहे हैं। संपादक और स्वामी के पारस्परिक रिश्तों ने नई शक्ल ले ली है। जबर्दस्त पूँजी निवेश, आक्रामक बाजार नीति तथा पत्रकारिक फैशन परेड का नया पैकेज सामने आ रहा है। प्रसार की उछाल में पाठक के लिए नए विकल्प खुले हैं। लेकिन क्या यह नई दुनिया सचमुच एक अद्भुत दुनिया है? <br>एक रचनाकार होने के साथ-साथ, पत्रकारिता की उसी बदलती हुई दुनिया के अनुभव का हिस्सा होते हुए यशवंत व्यास जब क्षेत्रीय पत्रकारिता में बदलाव को आँकते हैं तो उनकी दृष्टि गहरी संवेदना से युक्त होती है। वे निरंतर हो रहे परिवर्तनों को गहन अनुभूतियों तथा स्पष्ट तथ्यों के बीच दर्ज करते हैं। इसके लिए वे न सिर्फ भाषा के स्तर पर बल्कि प्रस्तुति पर भी शोध को नया, ताज़गी-भरा आकार देते हैं। अंतर्विरोधों की पहचान के प्रति पैनी दृष्टि तथा क्षेत्रीय पत्रकारिता में सफलता असफलता की गंभीर पड़ताल करने की कोशिशों जैसी खूबियों के चलते ‘अपने गिरेबान’ में समकालीन क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता पर एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
Book Details
-
ISBN9788171194414
-
Pages248
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Kavi Shailendra : Zindagi Ki Jeet Mein Yakeen
- Author Name:
Prahlad Agarwal
- Book Type:

- Description: कुछ अकेले नहीं हैं और पहले भी नहीं हैं—शैलेन्द्र, विद्वज्जनों ने जिनकी ओर नज़र नहीं डाली—ऐसे अनेकानेक लोककवि हैं। यूँ हर ज़माने ने अपने ज़माने की लोकरचना की सादगी की संश्लिष्टता को स्वीकार करने में कोताही की—और होकर यूँ रहा कि समय के साथ वह रंग और गहरा होता चला गया। पीढ़ियाँ-दर-पीढ़ियाँ उनके शब्दों में ज़िन्दगी के नए मायने तलाशती रहीं। शैलेन्द्र के गीत हमारे बचपन की गुनगुनाहटों में शामिल होकर आज तक हमसफ़र हैं। दुनिया-भर की पुरकशिश कविता की तरह उन्होंने ज़िन्दगी की पुरपेच गलियों में आलोकित राजपथ प्रशस्त किया। इतने सरल और लुभावने कि आवारामिज़ाजी से ज़ुबाँ पर चढ़ जाएँ, क़दम-ब-क़दम ज़िन्दगी के फ़लसफ़े में तब्दील होते हुए। अपनी मासूम गुनगुनाहटों के शब्द के फ़नकार का नाम हमें सालों बाद पता चला और इस परिचय के ऊषाकाल में ही वह सितारा टूट गया। जब शैलेन्द्र ने आत्मघात किया, हम उन्नीस साल के थे। इसके चंद महीने पहले ही शैलेन्द्र निर्मित एकमात्र फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ प्रदर्शित हुई थी। नहीं मालूम सच है या झूठ, लेकिन कहा जाता है कि शैलेन्द्र को यक़ीन था, इसे ‘राष्ट्रपति स्वर्णपदक’ मिलेगा—और मिला, लेकिन वह दिन देखने के लिए शैलेन्द्र नहीं थे। जनकवि शैलेन्द्र के बहुआयामी रचनात्मक अवदान का आकलन करने की विनम्र कोशिश है यह पुस्तक।
Patrakarita Mein Anuwad
- Author Name:
Priyadarshan
- Book Type:

- Description: अनुवाद की बात आते ही हमें दो भाषाओं का परिदृश्य ध्यान में आता है। अनुवाद की ज़रूरत केवल दो भाषाओं के सन्दर्भ में ही हो ऐसा ज़रूरी नहीं है। अनुवाद के कई ऐसे आयाम होते हैं जिन पर हम आम तौर पर ग़ौर नहीं करते। दो विरोधी दर्शन और विचार रखनेवालों के बीच संवाद के लिए भी अनुवाद की ज़रूरत होती है। अनुवाद के ऐसे ग़ैर-पारम्परिक अर्थ और प्रसंग को छोड़ भी दें तो भी पत्रकारिता के क्षेत्र में अनुवाद का अहम स्थान है।हिन्दी के प्रति प्रेम राष्ट्र-गौरव की भावना आत्म-सम्मान जैसे सराहनीय और वांछनीय आदर्शों के सशक्त हिमायती होने के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अख़बारों द्वारा अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य के निरन्तर अद्यतन और सही ढंग से अंकन के लिए अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद की ज़रूरत अभी भी बरकरार है। अनुवाद की कला कठिन है क्योंकि दो भिन्न भाषाओं की अभिव्यक्ति शैली भी भिन्न होती है। हर भाषा का एक अपना चरित्र होता है और उस चरित्र के कारण भाषा की शैली की विशिष्टता होती है। विद्वान लेखकों द्वारा तैयार इस पुस्तक के ज़रिए इस कला को विस्तार देने और सँवारने की कोशिश की गई है। पत्रकारिता से जुड़े हर व्यक्ति के लिए यह उपयोगी पुस्तक है।
Kasauti Par Media
- Author Name:
Mukesh Kumar
- Book Type:

-
Description:
पूँजी के भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारवाद के आगमन के साथ शुरू हुए विस्मयकारी विस्तार ने मीडिया को यदि शक्तिशाली बनाया है तो उसका चरित्र भी बदल डाला है। वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के ‘हंस’ में लिखे स्तम्भ लेखों का संकलन है—यह पुस्तक। जिसके माध्यम बताया है कि मीडिया में आए इस परिवर्तन की वजहें क्या हैं, कौन से दबाव और प्रभाव इसके पीछे काम कर रहे हैं और इनके उद्देश्य क्या हैं? यह एक बहुत ही ज़रूरी काम था जो हिन्दी में बहुत देर से शुरू हुआ और बहुत कम हुआ। ‘हंस’ और मुकेश कुमार को इसका श्रेय जाता है कि उन्होंने इस ज़िम्मेदारी को पूरी गम्भीरता के साथ निभाया।
मुकेश कुमार पिछले लगभग चालीस साल से ज़्यादा समय से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। ‘हंस’ में प्रकाशित उनके लेखों से ज़ाहिर हो जाता है कि इस दौरान पत्रकारिता के सामने आनेवाली चुनौतियों को वे देखते-समझते रहे हैं। साथ ही उन्होंने इन समस्याओं के भीतर झाँककर उनके कारणों को भी जानने की कोशिश की है। मीडिया के सामने खड़ी चुनौतियों का सामना करने के रास्तों पर भी उनकी नज़र रही है। उन्होंने मीडिया उद्योग के हर आयाम को क़रीब से देखा-समझा है, इसलिए वे मीडिया में आए परिवर्तनों को ज़्यादा विश्वसनीय तरीक़े से लिख सके। ऐसा करते हुए उन्होंने अतिरिक्त साहस का परिचय भी दिया, क्योंकि अपने ही पेशे की ख़ामियों को बेबाकी से लिखना सबके लिए आसान नहीं।
मुझे लगता है कि मुकेश कुमार ने इस पूरे दौर में पैदा हुई मीडिया की हर आहट, उसकी हर करवट और हर दिन बदलते उसके पैतरों को अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने दिया है। फिर चाहे वह स्टिंग ऑपरेशन की सच्चाई हो, साम्राज्यवाद और बाज़ारवाद का दबदबा हो, फ़िल्मी चकाचौंध हो या क्रिकेट का कारवाँ हो, दंगा-फसाद हो या चमत्कारियों का संसार हो। हर चीज़ को उन्होंने ईमानदारी से परखा है और अपनी साफ़ राय दी है। मीडिया के बदलते रंग-ढंग की परीक्षा करते हुए उनका नज़रिया बहुत ही स्पष्ट रहता है और वे यह काम पूरी जनपक्षधरता के साथ करते हैं। टीआरपी की होड़ से पैदा हुई दुष्प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ अपनाने से वे कभी पीछे नहीं हटे। उनकी क़लम ने मीडिया के उन्मादी स्वरूप की जमकर चीर-फाड़ की और उसके जातीय तथा साम्प्रदायिक चरित्र को बेनकाब करने में अगुआ रहे।
इन लेखों में एक चिन्ता साफ़ दिखाई देती है कि ख़बर जो भी हो मीडिया अक्सर असल मुद्दे से हटकर, उसे भावुकता की चाशनी में डुबाकर उन्माद पैदा करने की कोशिश करता है। मुकेश कुमार ने इस बात को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया है कि रामजन्मभूमि विवाद के ज़माने में भी हालात ऐसे ही थे, और गुजरात के दंगे को लेकर विवाद हो या भारत पाक के बीच संकट की स्थिति, मीडिया में उन्माद के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता।
Patrakarita : Parivesh Aur Pravrittiyan
- Author Name:
Prithvi Nath Pandey
- Book Type:

-
Description:
आज के समाचार-पत्र साध्य और साधन दोनों हैं। वे करुणा भी हैं और चेतना भी; दृष्टि भी हैं और ज्ञान भी; बोध भी हैं और व्याप्ति भी; इतिहास की तिथि भी हैं और भूगोल की परिधि भी; सन्तुलन भी हैं और मर्यादा भी। इसीलिए जनतंत्र की जितनी बड़ी जवाबदेही पत्रों और पत्रकारों का है, कदाचित् किसी और की नहीं।
हर किसी को आज भारतीय पत्रकारिता से बहुत बड़ी आशा है और अपेक्षा भी। संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘पेंटागन-पत्रों का प्रकाशन’ और ‘वाटरगेट कांड’ का रहस्योद्घाटन भारतीय पत्रकारिता के लिए भी चुनौती है। हमारे यहाँ भी कई रहस्य ज्यों के त्यों पड़े हैं और उन पर समय का मलबा पड़ता जा रहा है, जिसका कोई वस्तुत: निर्भीक पत्रकार ही रहस्योद्घाटन कर सकता है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं, जब भारतीय पत्रकारों ने मामले उठाए हैं। आज भी हवा के बवंडर के समान कई प्रश्न आन्दोलित हो रहे हैं। उनके उत्तर प्रतीक्षा में हैं कि ‘कार्लबर्न स्टोन’ और ‘बुडवर्ड’ के समान कोई पत्रकार आगे बढ़कर रहस्यों का उद्घाटन कर दे।
आज आर्थिक और राजनीतिक समस्याएँ, फिर भले ही वे राष्ट्रीय हों अथवा अन्तरराष्ट्रीय, इतनी क्लिष्ट और संश्लिष्ट हो गई हैं कि उनकी पृष्ठभूमि और पेचीदगियों को सही-सही जानना-समझना अतीव आवश्यक हो गया है। इन्हें विशेषज्ञ ही समझा सकते हैं और वे विशेषज्ञ हैं, सुलझे हुए और अनुभवी पत्रकार।
पत्रकार को आज विषम स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में यदि उसका ध्यान दायित्व की अपेक्षा अपने ‘बचाव’ पर अधिक रहता है तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है; फिर दायित्व की मर्यादा को आज की राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था जीवित रहने की इजाज़त कहाँ देती है? राजनीति को पेशा बनानेवालों ने ही क्या पत्रकारों को भी प्रथमत: पेशा मानने के लिए बाध्य नहीं किया है। समाचार-पत्र-जगत पर छाए व्यवसायीकरण के लिए कौन ज़िम्मेदार है? सुविधाएँ देने का प्रलोभन देकर पत्रकारों को अपने पक्ष में बनाए रखने का दुराचार कौन करता है? कौन यह नहीं समझने का भूल दोहराता रहता है कि पत्रकार भी मानव-समाज का एक अंग है और वह भी मानवीय दुर्बलताओं से परे नहीं है। कौन इस सत्य को स्वीकार करने से कतराता है—व्यक्ति-विशेष ही तपस्वी हो सकता है, पूरा समुदाय नहीं?
पत्रकारिता-जगत के लब्ध-प्रतिष्ठ पत्रकार डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने अपनी इस कृति में पत्रकारिता की परिवेश-प्रवृत्तियों पर सांगोपांग और समीचीन प्रकाश डालते हुए अपनी वस्तुपरक दृष्टि का सम्यक् परिचय दिया है।
Television Ki Kahani : Part-1
- Author Name:
Shyam Kashyap +1
- Book Type:

-
Description:
टेलीविज़न की कहानी वर्तमान समय सूचना-समाचारों के विस्फोट का है। हर घर-आँगन में चौबीस घंटे की टेलीविज़न-उपस्थिति है। चकमक करती रौशनियाँ हैं, दमक-हुमक-भरे चेहरे हैं। हर्ष, विषाद, रुदन की आक्रामकता है। कहीं समाचार, कहीं फ़िल्म और घर-घर की कहानी बयान करते रंग-बिरंगे धारावाहिक। लेकिन क्या आप जानते हैं, इस चमक-दमक के आविष्कारक कौन थे? टेलीविज़न का कब और कैसे आविष्कार हुआ? टेलीविज़न के अतीत-वर्तमान को ही जानने-समझने का सार्थक प्रयत्न करती है यह पुस्तक। वरिष्ठ लेखक-पत्रकार डॉ. श्याम कश्यप और चर्चित युवा टीवी पत्रकार मुकेश कुमार की क़लम-जुगलबन्दी ने टेलीविज़न की कहानी को आप तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया है।
टेलीविज़न के विभिन्न आयामों का समावेश करती इस पुस्तक में कुल बारह अध्याय हैं, जिनमें टेलीविज़न की ईजाद और उसके क्रमिक विकास की कहानी के साथ उनके विशिष्ट आन्तरिक संरचना, चरित्र और सामाजिक प्रभावों की भी प्रभावी पड़ताल की गई है। इसमें प्रसंगवश उन तमाम समकालीन प्रश्नों से भी मुठभेड़ करने का प्रयास किया गया है, जिनका सामना टीवी पत्रकार को अक्सर करना पड़ता है।
पुस्तक में टीवी पत्रकारिता से जुड़ी उन तमाम बातों का ज़िक्र है, जिसकी ज़रूरत इस क्षेत्र के छात्रों और पत्रकारों को पड़ती है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए मददगार साबित होगी। न सिर्फ़ छात्रों और पत्रकारों के लिए बल्कि आम पाठक, जो टेलीविज़न के इतिहास और उसके संसार को जानना और समझना चाहते हैं, उनके लिए भी उपयोगी और रुचिकर पुस्तक।
Mitata Bharat Banta India
- Author Name:
Shashi Shekhar Tiwari
- Book Type:

-
Description:
20वीं सदी के अन्तिम दशक में भारत की राजसत्ता द्वारा अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उदारीकरण की नीति अपनाई गई। धीरे-धीरे बाज़ार मुक्त किया जाने लगा तथा अनेक महत्त्वपूर्ण सरकारी क्षेत्रों के निजीकरण होने लगे। इस पहल का भारतीय समाज की संरचना पर गहरा असर हुआ। उसके आधार पर ऊपरी ढाँचे में अनेक निर्णायक परिवर्तन घटित होने लगे। उसका प्रभाव राजनीति, समाज, शिक्षा, जीवन-शैली तथा अन्तरराष्ट्रीय मामलों पर सीधे दिखाई देने लगा। 21वीं सदी के पहले दशक में इस परिवर्तन को जिन लोगों ने सबसे पहले पहचानने की कोशिश की, उनमें शशि शेखर पहली क़तार में हैं।
उदारीकरण की आँधी में मिटते भारत और बनते इंडिया की गूँज अगर सुननी हो तो शशि शेखर की इस पुस्तक के इन लेखों को पढ़ जाइए। 2001 से 2010 के बीच उन्होंने लगभग हर हफ़्ते अपने कॉलम ‘आजकल’ में अपने समय का साप्ताहिक इतिहास दर्ज किया है। यह पुस्तक इस कॉलम के उन्हीं लेखों का संकलन है। इन लेखों के द्वारा आप शशि शेखर के नज़रिए से 21वीं सदी के पहले दशक की धड़कनों की समग्रता में महसूस कर सकेंगे। इन लेखों में समय पर बहस है। समय से शिकायत है। समय की प्रशंसा है। समय की कठोरता को जीत लेने का दम-खम है। समय के वास्तविक स्वरूप को पहचानने का तीक्ष्ण विवेक भी है।
Media Jantantra Aur Atankvad
- Author Name:
Sudhish Pachauri
- Book Type:

-
Description:
ग्यारह सितम्बर की सुबह दो अमेरिकी टॉवरें ही नहीं गिरीं, मीडिया की ‘बाइनरी’ यानी ‘विलोमवाची मीडिया’ टावरें भी गिर गईं। ग्यारह सितम्बर के बाद का मीडिया एक क़िस्म के विकेन्द्रण की चपेट में है। अब एक मामूली-सा अरबी चैनल ‘अलजजीरा’, ‘सी.एन.एन.’ पर भारी है। मीडिया का कंटेंट अब ‘पहचान के चिह्नों’ को, उसके ‘भावकों’ को सक्रिय करता है और वे ही पलटकर उसका कंटेंट बनाते हैं। आप स्टूडियो में जो बनाते हैं, वही कंटेंट नहीं होता। जो उसे रिसीव करता है, ग्रहण करता है वह अपना कंटेंट बनाता है। यह एक प्रकार की उत्तर-संरचनावादी अनेकार्थता है जो मीडिया बनाने लगा है और जो नज़र आने लगी है।
आतंकवाद जनतन्त्र का विलोम है। वह स्वयं किसी जनतन्त्र को नहीं मानता। न उसे बने रहने देना चाहता है। ऐसे में यदि जनतन्त्र स्वयं ही सिकुड़ने लगे या कि उसे सत्ता सिकोड़ने लगे तो आतंकवाद को ही ताकत मिलती है। शुरू में लग सकता है कि आतंकवादी जनतन्त्र का लाभ उठा रहे हैं, उन्हें रोकना चाहिए। चूँकि मीडिया अब तक सत्ता संवलित जनतन्त्र पर पलता आया है और उसने आतंकवाद को हमेशा ऑफ़िसियल नज़र से देखा है, इसलिए वह उसे न दिखाने में यक़ीन किया करते हैं। इससे आतंकवाद की साख बढ़ती है, बिन लादेन का मिथक्करण इसी कारण है। तब क्या करें ? इस मामले में बाबा तुलसीदास हमारे बड़े काम के हैं और अपने चैनलों को तुलसीदास का रावण-वर्णन इन दिनों ज़रूर पढ़ना चाहिए। आतंकवाद सूचना की पकड़ से बाहर रहस्य बनकर सूचना बनता है। उसे और बाहर कर देने से उसी की मदद होती है। आतंकवाद मीडिया युग की राजनीतिक कार्रवाई है। उसका भूत मीडिया ही उतार सकता है। वह जितना सूचना में रहेगा उतना ही संवाद में रहेगा। जितना संवाद में रहेगा उतना ही जनतन्त्र में आकर सहज बनेगा।
Samachar Evam Praroop Lekhan
- Author Name:
Dinesh Kumar Gupta +1
- Book Type:

- Description: इस पुस्तक के उद्देश्य और स्वरूप को लेकर लेखकीय टिप्पणी इस प्रकार है—“प्रशासनिक, व्यावसायिक एवं कार्यालयी स्तर पर हिन्दी प्रयोग के प्रयास विभिन्न स्तरों पर किए जा रहे हैं, किन्तु उनमें विभिन्न कारणों से एकरूपता और एकसूत्रता का अभाव है। प्रस्तुत पुस्तक में इन अभावों के आधारभूत कारणों को तलाशते हुए, प्रायोगिक स्तर पर हिन्दी के व्यावहारिक स्वरूप का एक सुस्पष्ट प्रतिमान सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।” निश्चय ही लेखक–द्वय के इस प्रयास को यहाँ सार्थक हुआ देखा जा सकता है। उन्होंने इस पुस्तक को तीन अध्यायों में विभाजित कर विषय–विवेचन को एक सुसंगति प्रदान की है, ख़ासकर ‘समाचार–लेखन’ और ‘प्रारूप– लेखन’ नामक अध्यायों में। इनके अतिरिक्त तीसरे अध्याय ‘अशुद्धि–शोधन’ में अशुद्धि के विभिन्न स्तरों का गम्भीरतापूर्वक विवेचन किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने संक्षिप्त कलेवर में भी अपने विषय की यह एक संग्रहणीय पुस्तक है।
Patrakarita : Mission se Media tak
- Author Name:
Akhilesh Mishra
- Book Type:

-
Description:
यह पुस्तक अपने पेशे के सहकर्मियों और पाठकों के साथ एक ऐसे व्यक्ति की बहस, नोक-झोंक है जो चीजों को उनके सही नाम से पुकारता है, धुँधलके में रहना और किसी को रखना पसंद नहीं करता। वह व्यक्ति थेµ अखिलेश मिश्र, जिनकी धर्म-संस्कृति विषयक पुस्तक ‘धर्म का मर्म’ पाठक पढ़ चुके हैं।
इस पुस्तक में अखिलेश जी के वे लेख संकलित हैं जिनमें उन्होंने पत्रकारिता के विविध आयामों, उसकी समस्याओं, संकटों, उसके विचलनों, उसकी ताकत और कमजोरियों की चर्चा की है। पुस्तक चार खंडों में है। पहले खंड में वे लेख हैं जिनमें पत्रकारिता सम्बन्धी विविध विषयों, समस्याओं का गहन विश्लेषण है। द्वितीय खंड में ‘वर्कर्स हेरल्ड’ में लिखे उनके वे संपादकीय हैं जिनका विषय पत्रकार अथवा पत्रकारिता है। इस खंड का पहला आलेख ‘स्वतंत्र भारत’ में लगभग सत्रह वर्ष तक अनवरत चले उनके पाक्षिक स्तम्भ ‘दिल्ली का रंगमंच’ से लिया गया है। इसमें श्री मिश्र ने लोकतान्त्रिाक मूल्यों में गहरी आस्था के लिए जाने जानेवाले नेहरू जैसे प्रधानमंत्राी की भी अखबारों की उस आजादी के प्रति नाराजगी को पकड़ा है जो सत्ता के लिए परेशानी पैदा कर दे।
खंड तीन में ‘वर्कर्स हेरल्ड’ में ही संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित वे लेख लिये गए हैं जिनमें पत्रकारिता के सरोकारों की चर्चा है। इस खंड में अन्य अनेक समस्याएँ उठाने के अतिरिक्त लेखक ‘श्रम नीति का दुरंगापन’ बेपर्दा करते हुए ‘पत्रकारों की सुरक्षा’ के सवाल से जुड़ी पेचीदगियों से दो-चार होता है। खंड चार में दो लेख शामिल हैं, जिनमें समाचार क्या है, कैसे लिखे जाते हैं, आदि व्यावहारिक पहलुओं पर उनके विचार हैं।
पत्रकारिता इस समय एक संकट के दौर में है। पुराने दबावों (मालिक और सत्ता) तथा अपनी कमजोरियों के अतिरिक्त भूमंडलीकरण के इस दौर में अब एक नया खतरा उसके सामने हैµअखबारी उद्योग में विदेशी पूँजी निवेश जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। हमारा विश्वास है कि अखिलेश जी की यह पुस्तक न केवल धुँधलका छाँटकर परिदृश्य स्पष्ट करेगी बल्कि अपनी स्पष्ट दृष्टि से आगामी पत्रकारिता का मार्गदर्शन भी करेगी।
Samachar Patra Prabandhan
- Author Name:
Gulab Kothari
- Book Type:

-
Description:
आज आम शिकायत यह है कि सम्पादक नाम की संस्था का लोप हो रहा है। जहाँ वह मौजूद है, वहाँ या तो प्रतीकात्मक है या उसके कार्य-अधिकार, विवेक और निर्णय का दायरा घटता जा रहा है। वैश्वीकरण की अदम्य आँधी ने समाचार-पत्रों को भी एक बाज़ार की वस्तु का रूप ग्रहण करने के लिए बाध्य कर दिया है। ऐसी स्थिति में समाचार-पत्रों में प्रबन्धन की महत्ता और महिमा निरन्तर बढ़ती जा रही है।
समाचार-पत्र का एक व्यावसायिक वस्तु बनकर रह जाना दर्दनाक हादसा है। बाज़ारजनित दृष्टिकोण के कारण समाज में समाचार-पत्र के स्थान, सम्मान और विश्वसनीयता में परिवर्तन की प्रक्रिया धीरे-धीरे चल रही है।
इस माहौल में समाचार-पत्र प्रबन्धन के सम्बन्ध में एक ऐसी परिपक्व दृष्टि की ज़रूरत है जो बाज़ार की बढ़ती हुई ताक़त की व्यावहारिक ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए उन बुनियादी मूल्यों पर अडिग रहने की कला, दृष्टि और शक्ति दे, जिसके कारण समाचार-पत्रों ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का दर्जा पाया है। पत्रकारिता के पुरोधा गुलाब कोठारी की इस पुस्तक से यह सब मिल सकेगा, ऐसा विश्वास है।
Patkatha Lekhan : Vyavaharik Nirdeshika
- Author Name:
Asghar Wajahat
- Book Type:

- Description: फ़िल्मों और टी.वी. के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम, धारावाहिक के लिए पटकथा अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त डाक्यूड्रामा और डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों के लिए भी दृश्य-श्रव्य केन्द्रित लेखन आवश्यक है। फ़िल्म और टेलीविज़न के व्यापक होते क्षेत्र में शिक्षापरक/ज्ञानपरक मल्टीमीडिया कार्यक्रम भी आकर जुड़ गए हैं। ज्ञान और शिक्षा के अपार भंडार को दृश्य-श्रव्य माध्यम से उपलब्ध कराने की चुनौती भारत सरकार के मानव-संसाधन मंत्रालय के अतिरिक्त अनेक अन्य संगठनों ने ली है। प्रोग्राम प्रोडक्शन के क्षेत्र में यदि अभाव है तो पटकथा लेखकों का है। इसके कई कारण हैं। प्रोग्राम प्रोडक्शन सम्बन्धी तकनीकी प्रशिक्षण देने की तुलना में पटकथा-लेखन के पाठ्यक्रम बहुत कम हैं। जिन संस्थानों में पटकथा-लेखन के कार्यक्रम चलाए जाते हैं, वहाँ प्रायः अच्छे शिक्षकों की कमी बनी रहती है और यह भी ज़रूरी नहीं है कि अच्छा पटकथा लेखक अच्छा शिक्षक भी हो। प्रस्तुत पुस्तक में सिनेमा के इतिहास, सैद्धान्तिकी और समीक्षा इत्यादि पर कोई चर्चा नहीं की गई है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य पटकथा के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाना है। यह पुस्तक पटकथा-लेखन में रुचि लेनेवाले विद्यार्थियों तथा अन्य सभी पाठकों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इस व्यावहारिक निर्देशिका में पटकथा के एक-एक बिन्दु की चर्चा की गई है। पुस्तक का उद्देश्य है कि इसके माध्यम से पटकथा-लेखन की तकनीक सीखी जा सके।
Web Patrikarita : Naya Media Aur Rujhan
- Author Name:
Shalini Joshi +1
- Book Type:

-
Description:
एक ऐसे दौर में जब मीडिया प्रिंट, रेडियो और टीवी से होता हुआ वेब पर उतर आया है और वहाँ भी उसके कई रूप दिखने लगे हैं, ऐसे न्यू मीडिया के दौर में जर्नलिज़्म से जुड़े छात्रों, शोधकर्ताओं और अध्यापकों, पेशेवरों और विशेषज्ञों के सामने कुछ नई चुनौतियाँ और सवाल भी आए हैं। न्यू मीडिया कमोबेश उसी समय प्रकट हुआ जब ग्लोबल विलेज की अवधारणा ज़ोर मार रही थी, भूमंडलीकरण ने आकार ग्रहण कर लिया था और नवउदारवादी शर्तें व्यापक कॉरपोरेट मिज़ाज का निर्माण कर रही थीं।
आधुनिकतम तकनीकी से लैस इस मीडिया सिस्टम में नए सवाल और नई पेचीदगियाँ भी जुड़ती जा रही हैं। उन्हें समझने, उनके हल के औज़ार तैयार करने के लिए एक बिलकुल ही नए तेवर वाले मुस्तैद जर्नलिस्ट की दरकार है। कहने को वे मल्टीमीडिया न्यूज़पर्सन होंगे लेकिन उन्हें सिर्फ़ स्किल्स में ही दक्षता हासिल नहीं करनी होगी बल्कि उन्हें समाचार के बुनियादी मूल्यों और अपने पेशे की बुनियादी नैतिकताओं पर भी फिर से नज़र डालनी होगी। उन्हें नए ढंग से विश्वसनीयता और प्रामाणिकता हासिल करनी होगी जो इधर कॉरपोरेट मीडिया के विभिन्न क़िस्मों के दबावों, स्वार्थों और लालचों में कमज़ोर पड़ गई है या बिखर गई है या मिटा ही दी जा रही है।
न्यू मीडिया सिर्फ़ वेब का ही मीडिया नहीं माना जाना चाहिए, इसे विश्वास का भी न्यू मीडिया समझना चाहिए। ऐसा करते हुए हमें डॉ. शिलर का यह कथन भी नहीं भूलना चाहिए कि कथित विविधता सांस्कृतिक परजीवीपन है। इसे सांस्कृतिक वैविध्य नहीं समझना चाहिए। प्रस्तुत किताब इंटरनेट की इन तात्कालिक कमज़ोरियों और अन्तर्विरोधों की ओर भी इशारा करती है। यह किताब वेब मीडिया के छात्रों और प्रशिक्षुओं को इस माध्यम की बारीकियों के बारे में बताते हुए लिखी गई है। यह उन सहूलियतों का भी विवरण पेश करती है जो न्यू मीडियाकर्मी के लिए हो सकती हैं। और इसमें पत्रकारिता के बुनियादी उसूल, समाचार ज़रूरतें, भाषा और प्रयोग की विविधताओं जैसे पाठ तो स्वाभाविक रूप से शामिल हैं ही।
Bhojpuri Sanskar geet Aur Prasar Madhyam
- Author Name:
Shailesh Shrivastva
- Book Type:

-
Description:
लोकगीत माटी की महक हैं, संस्कारों के स्वर हैं, अन्तर की आवाज़ हैं। इनकी पूरी व्यापक धरोहर श्रव्य परम्परा में सिमटी हुई है। शैलेश जी ने लुप्त होते लोकगीतों को सुरक्षित रखने और इनके संरक्षण हेतु स्तुतनीय प्रयास किया है। वह स्वयं एक जानी-मानी गायिका हैं। कुछ लोकगीतों की स्वरलिपि व सी.डी. देने से पुस्तक का महत्त्व और बढ़ गया है।
—गोपाल चतुर्वेदी
इस पुस्तक में संस्कार सम्बन्धी उत्सवों के अवसरों पर गाए जानेवाले भोजपुरी लोकगीतों का सामाजिक मूल्यांकन तथा उनके संरक्षण और प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों विशेषकर दूरदर्शन, आकाशवाणी की भूमिका पर एक संक्षिप्त अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। कुछ लोकगीतों की स्वरलिपियाँ व धुनों की सी.डी. संलग्न हैं, जो संरक्षण की दिशा में एक सार्थक प्रयास है।
—डॉ. विद्याविन्दु सिंह
शैलेश इन लोकगीतों को गाती नहीं, जीती हैं। इसलिए आधुनिकता के नाम पर लोकगीतों के विकृत स्वरूप उन्हें पीड़ा देते हैं। उनकी यह पुस्तक इस विकृति को समझने की उनकी एक सार्थक कोशिश है।
—विश्वनाथ सचदेव
शैलेश श्रीवास्तव पिछले अनेक वर्षों से बिना अपनी दुंदुभी बजाए हुए हिन्दी के लोकसंगीत प्रेमियों के बीच पाश्चात्य संस्कृति के अन्धानुकरण के चलते अपनी जड़ों से उखड़ लगभग विलुप्ति के कगार पर आ खड़े हुए संस्कार गीतों की जन-मानस में पुनर्प्रतिष्ठा के लिए प्रयत्नशील हैं। बच्चे के जन्म पर गाए जानेवाले सोहर से लेकर मुंडन, छेदन, घुड़चढ़ी, लगुन भाँवरे; झूला (सावन), होली (फाग), टोना, नजर, सगुन, चैती, ठुमरी आदि सभी को उन्होंने अपना कंठ ही नहीं दिया है, बल्कि सुदूर गाँव-जवार के ओने-कोने की यात्राएँ कर उन्हें बड़ी-बूढ़ियों की कंठस्थ संचित पूँजी से बीन-चुन अपनी संगीत मंजूषा को निरन्तर समृद्ध भी किया है। प्रस्तुत शोध पुस्तक ‘भोजपुरी संस्कार गीत और प्रसार माध्यम’ उनकी श्रम-साध्य मेहनत का ही नतीजा है।
—चित्रा मुद्गल
Cinema Ke Mudde : Muddon Ka Cinema
- Author Name:
Shivani Rakesh
- Book Type:

- Description: सिनेमा विधा की जानकारी मुझे बहुत कम है लेकिन केवल इस किताब को पढ़ने से मैं कह सकता हूँ कि मैंने न केवल भारतीय सिनेमा, बल्कि प्रकारान्तर से विश्व सिनेमा की भी अत्यन्त मूल्यवान जानकारी हासिल कर ली। इस किताब को विषयवार भी वर्गीकृत किया गया है और कालक्रमवार भी। मेरा अनुमान है कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हज़ार फ़िल्मों का उल्लेख या सन्दर्भ तो मिल ही जाता है जिनमें हिन्दी सिनेमा किस प्रकार क्रमश: आमजन के मुद्दों से भटककर अभिजन वर्ग का हित करने का साधन बन गया, किस प्रकार जातिवाद को पोषित करने और उच्च जाति का गौरवगान करने का माध्यम बन गया, इसे सोदाहरण और विस्तार से बताया गया है। इसके साथ ही किताब में किसानों के, मजदूरों के, वेश्याओं के, दृष्टिबाधितों के, खिलाड़ियों के, डाकुओं, पत्रकारों और भूमाफ़िया के मुद्दों को विषय बनाकर बनाई गई फ़िल्मों का भी विशद विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक के लिए सामग्री का चयन करने और उसको संयोजित करने में जो अथक परिश्रम किया गया है वह अत्यन्त प्रशंसनीय है। हिन्दी में सिनेमा पर इतनी समृद्ध किताब मैंने दूसरी नहीं पढ़ी। इसकी भाषा इतनी सरल और सुगम है कि सामान्य पाठक और सिनेमा के शोधार्थियों—दोनों के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है। —शिवमूर्ति
Media Aur Bazarvad
- Author Name:
Ramsharan Joshi
- Book Type:

- Description: बाज़ार नाम की संस्था आदिम समाज के लिए भी रही है, और आज के समाज के लिए भी है। इसलिए बाज़ार से बैर करके आप अपना समाज और अपना जीवन चला सकें, इसकी सम्भावना नहीं है। लेकिन जब बाज़ार मनुष्य की नियति तय करे तो इसका मतलब यह है कि अब तक जो मनुष्य का सेवक रहा है, वह मनुष्य का मालिक होना चाहिए। बाज़ार मनुष्य का बहुत अच्छा सेवक है। कोई पाँच हज़ार साल से उसकी सेवा कर रहा है। शायद उससे भी ज़्यादा वर्षों से कर रहा हो। अगर वो मनुष्य की नियति तय करेगा तो उसमें एक मूल खोट आनेवाला है, क्योंकि बाज़ार भाव से चलता है, बाज़ार मूल्य से नहीं चलता और मूल्यों के बिना किसी भी मानव समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। मानव समाज भाव से नहीं चल सकता, मूल्य से ही चल सकता है। मानव समाज को मूल्य से चलना है। अब जो बाज़ार की शक्तियाँ दुनिया में इकट्ठा हुई हैं उनसे आप कैसे निपटेंगे? मुझे कई लोगों ने कहा कि यह तो हिन्दुस्तान है जो जाजम की तरह बिछने के लिए तैयार है, नहीं तो जहाँ-जहाँ बाज़ार गया है, वह उस देश के समाज की शर्तों पर गया है। पर हमने एक कमज़ोर देश की तरह से अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार को स्वीकारा है। इसलिए अब हमारे यहाँ जाजम की तरह बिछ जाने का लगभग कुचक्र चल रहा है!
Yaksha Prashna Barkarar
- Author Name:
Manikant Bajpai
- Book Type:

- Description: Media
Television Lekhan
- Author Name:
Asghar Wajahat
- Book Type:

-
Description:
उपन्यासकारों और कहानीकारों के लिए फ़िल्म व टेलीविज़न जैसे अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यमों के लिए लेखन-कार्य चुनौतीपूर्ण रहा है। उपन्यास और कहानी से सम्पृक्ति बनाए रखने के बावजूद पटकथा-लेखन थोड़ा अलग है। यहाँ ‘दो आँखों को चार’ बनाने की ज़रूरत पड़ती है। रचनात्मक प्रतिभा, बुनियादी जानकारी, अभ्यास और अनुशासन ही सफल पटकथा का राज़ है। यह पुस्तक विषयगत प्राथमिक जानकारियाँ देने के साथ उक्त सभी गुर बनाती है और प्रेरित भी करती है।
टेलीविज़न लेखन में व्यावहारिक पक्षों को सोदाहरण मित्रवत् शिक्षक की तरह समझाया गया है। पुस्तक हमें बताती है कि बुद्धि, विचार, संवेदना तथा प्रतिक्रिया को किस तरह गुंफित कर उसे ‘विजुलाइज’ करना है। यहाँ पृष्ठभूमि सम्बन्धित तमाम वांछित जानकारियाँ हैं। टेलीविज़न लेखन की संरचना और उसके निर्माण की सभी प्रविधियों के उल्लेख के साथ महत्त्पूर्ण और चर्चित पटकथाओं के अंश भी दिए गए हैं। जिनकी पटकथाएँ आज मानक की हैसियत अख़्तियार कर चुकी हैं, ऐसे नामचीन पटकथा लेखकों—कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, अशोक चक्रधर और अरुण प्रकाश से लिए गया साक्षात्कार विषयगत कई बारीकियाँ खोलता है। अन्त में दी गई तकनीकी शब्दावली पुस्तक को महत्त्पूर्ण बनाती है।
Masi Kagad
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

-
Description:
‘जनसत्ता’ के प्रारम्भिक वर्षों में छपे प्रभाष जोशी के सैकड़ों लेखों और सम्पादकीय टिप्पणियों में से किया गया एक चयन है—‘मसि कागद’। ज़ाहिर है इन लेखों में वे सभी विशेषताएँ प्रतिबिम्बित हैं, जिनके चलते ‘जनसत्ता’ ने पाठकों की आत्मीयता प्राप्त की।
ये रचनाएँ प्रभाष जोशी की ख़ास शैली का उदाहरण तो हैं ही, वे यह भी बताती हैं कि राजनीति हो या खेल, समाज हो या संस्कृति, संगीत हो या सिनेमा—लेखक की निगाह घटनाओं के नए सन्दर्भ देखती है, उनके अनदेखे पहलुओं को परखती है और उन्हें लोक-जीवन और विवेक की कसौटी पर कसती है।
इन लेखों में प्रभाष जोशी राजनीति को नैतिक सवालों में बदलते हैं। सिनेमा को समाज से जोड़ते हैं। उनकी पत्रकारिता सत्ता के गलियारों में नहीं भटकती। वे अपने लेखन में पाठकों के प्रति अपनी जवाबदेही को सर्वाधिक महत्त्व देते हैं। इन लेखों में समाज के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त हुआ है। इनमें सामाजिक विसंगतियों को बदलने की बेचैनी भी दिखाई देती है।
Media Ka Loktantra
- Author Name:
Vineet Kumar
- Book Type:

-
Description:
इसमें अब कोई सन्देह नहीं रह गया कि भारत का पॉपुलर मीडिया, खासतौर से टीवी, अब वह बिलकुल नहीं कर रहा है जिसकी अपेक्षा हम एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते उससे करते हैं। वह कुछ और कर रहा है, और इतने साफ़ ढंग से कर रहा है कि यह भी बिना कोशिश के दिख जाता है कि क्या कर रहा है!
लेकिन देश का हर दर्शक इसे नहीं देख पाता; हमारी जनसंख्या का वह बड़ा हिस्सा, जिसे साक्षर होने के बावजूद शिक्षित नहीं कहा जा सकता, जिसे अपनी समझ का परिष्कार करने के लिए अभी और समय चाहिए था, अधबीच ही उस गोरखधंधे के हत्थे चढ़ गया है जिसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विज्ञापन और पीआर एजेंसियों, भाषा के जादूगर विज्ञापन लेखकों, फ़ेक न्यूज़ की फैक्ट्रियों, सच्ची- झूठी समाचार संस्थाओं और सोशल मीडिया के सहारे चला रहा है। दर्शक देशवासियों का यह विशाल हिस्सा आज भी मुद्रित और प्रसारित छवियों/शब्दों को लगभग देववाणी मान लेता है, इसलिए वह मीडिया के उस प्रचार का बहुत आसान शिकार हो जा रहा है, जो प्रचार, जो नैरेटिव न तो उसका है और न उसके हित में है, जिसका उद्देश्य नागरिक को महत अपने काम की चीज बनाना है।
प्रखर मीडिया विश्लेषक और माध्यमों की लोकतांत्रिकता के प्रति गहरे चिन्तित विनीत कुमार की लम्बे समय से प्रतीक्षित यह किताब मीडिया के मौजूदा इस संजाल को अपेक्षित तथ्यों, आँकड़ों, सन्दर्भों, विवरणों और विश्लेषणों से रेशा- रेशा खोल देती है।
इस किताब को पढ़ना आज हर उस व्यक्ति के लिए जरूरी है, जिसे देश, देश के लोगों और लोकतंत्र की सचमुच में चिन्ता है।
Dakhinn Bharat Ki Hindi Patrakarita
- Author Name:
Ravindra Katyayan
- Book Type:

- Description: Dakhinn Bharat Ki Hindi Patrakarita
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book