Electronic Patrakarita
Author:
Dr. Ajay Kumar SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Media0 Ratings
Price: ₹ 480
₹
600
Unavailable
सूचना क्रान्ति के इस युग में, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र जैसे रेडियो, एफएम. चैनल, टेलीविज़न, फ़ोटोग्राफ़ी तथा टेलीविज़न प्रोडक्शन के क्षेत्र में, रोज़गार के अवसर निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के तकनीकी एवं प्रायोगिक पक्ष को समझने के लिए हिन्दी की ऐसी पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं, जो भावी पत्रकारों को इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का आधुनिक एवं प्रायोगिक ज्ञान उपलब्ध करा सकें।</p>
<p>यह पुस्तक विशेष रूप से टेलीविज़न, रेडियो, फ़ोटोग्राफ़ी, फ़िल्म एवं इंटरनेट के क्षेत्र में क़दम रखनेवाले युवा पत्रकारों को ध्यान में रखकर लिखी गई है।</p>
<p>इस पुस्तक में इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के फ़ोटोग्राफ़ी, रेडियो तथा टेलीविज़न चैनलों की कार्यप्रणाली, प्रयोग होनेवाले उपकरण, प्रोडक्शन टीम की भूमिका, स्क्रिप्ट राइटिंग, कैमरे एवं लाइटिंग का प्रयोग तथा वीडियो एडिटिंग को सरल-सहज तरीक़े से समझाया गया है। पुस्तक में इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रयोग होनेवाले शब्दों एवं उपकरणों का शब्दकोश भी दिया गया है जिससे कि टेलीविज़न, फ़ोटोग्राफ़ी तथा रेडियो के क्षेत्र में प्रशिक्षण प्राप्त करनेवाले छात्रों के साथ जनमानस भी इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता की दुनिया को भली-भाँति समझ सकें।
ISBN: 9788180317729
Pages: 272
Avg Reading Time: 9 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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संचार एक आधारभूत सामाजिक विज्ञान है। इसी से जुड़कर समस्त सामाजिक विज्ञान अपनी विकास यात्रा में है। संचार को हम सामाजिक विज्ञानों एवं धरती के समस्त ज्ञान की प्राणवायु भी कह सकते हैं।
यह पुस्तक संचार के प्रकार, प्रक्रिया तथा विविध सिद्धान्तों पर केन्द्रित है। संचार और अन्य सामाजिक विज्ञानों के परस्पर सम्बन्धों का विस्तृत विवेचन प्रथम बार इस पुस्तक में प्रस्तुत है। संचार के क्षेत्र एवं उपयोगिता के विवेचन के साथ-साथ संचार के विभिन्न प्रकारों का व्यापक वर्णन भी इसमें है। इस पुस्तक की सहायता से अध्येता आभ्यन्तर संचार, अन्तर्वैयक्तिक संचार, समूह संचार एवं जनसंचार के अतिरिक्त ग्रामीण तथा परम्परागत संचार के सम्बन्ध में भी व्यापक दृष्टि का विकास कर सकता है।
उक्त आधारभूत तथ्यों के ज्ञान के साथ-साथ इस पुस्तक के द्वारा भारतीय संचार सिद्धान्त का भी ज्ञान सरलतापूर्वक मिल सकता है।
यह पुस्तक संचार एवं पत्रकारिता के अध्येताओं के अतिरिक्त भाषा-विज्ञान, मानवशास्त्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों के अध्येताओं के लिए उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है। इस पुस्तक की सहायता से संचार को समग्र रूप में समझा तथा आत्मसात् किया जा सकता है। उक्त विशेषताओं के कारण यह पुस्तक संचार के अध्येताओं के लिए उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी, ऐसी धारणा एवं विश्वास के साथ यह पुस्तक आपके बीच प्रस्तुत है।
TRP : Media Mandi Ka Mahamantra
- Author Name:
Mukesh Kumar
- Book Type:

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Description:
पिछले ढाई दशकों में टेलीविज़न की सामग्री बड़े पैमाने पर बदली है। ख़ासतौर पर न्यूज़ चैनलों का चरित्र बुनियादी रूप से बदल गया है। मीडिया संस्थानों के स्वामित्व में आया बदलाव, बड़े कार्पोरेट घरानों का बढ़ता नियंत्रण और हस्तक्षेप, बाज़ार का प्रभाव इसके प्रमुख कारण हैं। आर्थिक उदारवाद के दौर में सत्ता के चरित्र में आए परिवर्तनों का भी इसमें योगदान रहा है। सत्ता के निरंकुशतावादी स्वरूप ने एक आतंक भी पैदा किया है, जिसके सामने मीडिया को नतमस्तक होना पड़ा है।
कार्पोरेट तथा सत्ता के अपने गणित भी हैं और मीडिया को उनसे तालमेल बैठाने के लिए भी बाध्य होना पड़ा है। मगर जहाँ तक बाज़ार का सवाल है तो उसका सबसे बड़ा हथियार है विज्ञापन। वह विज्ञापनों पर भारतीय मीडिया की निर्भरता का लाभ उठाता है। इसके लिए उसके पास एक बहुत ही कारगर हथियार है–टीआरपी यानी टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट।
टीआरपी दरअसल क्या है, वह क्यों है और न्यूज़ चैनलों की सामग्री को कैसे नियंत्रित और संचालित करती है, इस बारे में ठोस जानकारियाँ कम ही उपलब्ध हैं। यही नहीं, अत्यधिक चर्चाओं में रहने के बावजूद टीआरपी मापने की प्रणाली में क्या ख़ामियाँ हैं, उसमें कैसे धाँधली की जाती है और वह कितनी विश्वसनीय है, है भी या नहीं, इस बारे में सामग्री का अभाव रहता है, जबकि इन सब पहलुओं के बारे में जाने बगैर न टीआरपी को समझा जा सकता है और न ही बाज़ार के ऑपरेट करने के तरीक़े को। यह किताब टीआरपी के इन तमाम रहस्यों से परदा उठाती है।
यह सवाल भी बड़ी अहमियत रखता है कि टीवी न्यूज़ या न्यूज़ चैनल टीआरपी के दुष्चक्र से निकल सकते हैं या नहीं? इस पुस्तक में इन प्रश्नों पर विचार करके कुछ रास्ते सुझाने की कोशिश भी की गई है।
शैक्षणिक, अकादमिक और पत्रकारिता तीनों ही क्षेत्रों में सक्रिय लोगों के लिए तो पुस्तक उपयोगी है ही, वे पाठक भी इससे लाभ उठा सकेंगे जिनकी दिलचस्पी मीडिया में आई विसंगतियों या नई प्रवृत्तियों को जानने-समझने में रहती है।
Feature Lekhan : Swarup Aur Shilpa
- Author Name:
Manohar Prabhakar
- Book Type:

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Description:
माखनलाल चतुर्वेदी कवि थे, नाटककार थे, निबन्ध लेखक भी थे, अर्थात् उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी क़लम चलाई थी। वे देश की स्वतंत्रता के लिए लेखनी चलानेवाले एक अग्रणी पत्रकार भी थे। उनकी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। साहित्य और पत्रकारिता का यह संगम हमारी परम्परा में हमेशा रहा है। फिर भी यह दुर्भाग्य की बात है कि आजकल पत्रकारिता और साहित्य को दो अलग-अलग खाँचों में बाँटा जाता है। इस विभाजक रेखा को भी लाँघनेवाली विधाएँ हैं। उनमें से कुछ हैं—फ़ीचर, रिपोर्ताज, यात्रा-वृत्तान्त एवं संस्मरण।
इस पुस्तक के ज़रिए फ़ीचर लेखन के कौशल को सरल ढंग से पेश करने की कोशिश की गई है। उम्मीद है कि इससे पाठक साहित्य और पत्रकारिता की विभाजक रेखा को जोड़कर इन दोनों के सम्मिश्रण को नए सिरे से स्थापित कर सकेंगे। फ़ीचर लेखन जितनी अधिक मात्रा में होगा, उतनी ही मात्रा में साहित्य और पत्रकारिता को जनमानस में भी जुड़ा हुआ देखने की प्रवृत्ति विकसित होगी।
डॉ. मनोहर प्रभाकर ने, जो स्वयं उच्च कोटि के फ़ीचर लेखक रहे हैं और जिन्होंने ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘नवज्योति’ एवं अन्य समाचार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने लेखन कौशल को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है, इस पुस्तक में अपने अनुभवों का सार इस ढंग से प्रस्तुत किया है कि उसे सरलता से व्यवहार में लाया जा सके।
Ruktapur
- Author Name:
Pushyamitra
- Book Type:

- Description: यह किताब एक सजग-संवेदनशील पत्रकार की डायरी है, जिसमें उसकी ‘आँखों देखी’ तो दर्ज है ही, हालात का तथ्यपरक विश्लेषण भी है। यह दिखलाती है कि एक आम बिहारी तरक़्क़ी की राह पर आगे बढ़ना चाहता है पर उसके पाँवों में भारी पत्थर बँधे हैं, जिससे उसको मुक्त करने में उस राजनीतिक नेतृत्व ने भी तत्परता नहीं दिखाई, जो इसी का वादा कर सत्तासीन हुआ था। आख्यानपरक शैली में लिखी गई यह किताब आम बिहारियों की जबान बोलती है, उनसे मिलकर उनकी कहानियों को सामने लाती है और उनके दुःख-दर्द को सरकारी आँकड़ों के सामने रखकर दिखाती है। इस तरह यह उस दरार पर रोशनी डालती है जिसके एक ओर सरकार के डबल डिजिट ग्रोथ के आँकड़े और चमचमाते दावे हैं तो दूसरी तरफ़ वंचित समाज के लोगों के अभाव, असहायता और पीड़ा की झकझोर देने वाली कहानियाँ हैं। इस किताब के केन्द्र में बिहार है, उसके नीति-निर्माताओं की 73 वर्षों की कामयाबी और नाकामी का लेखा-जोखा है, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे देश के हरेक राज्य की सचाई हैं। सरकार द्वारा आधुनिक विकास के ताबड़तोड़ दिखावे के बावजूद उसकी प्राथमिकताओं और आमजन की ज़रूरतों में अलगाव के निरंतर बने रहने को रेखांकित करते हुए यह किताब जिन सवालों को सामने रखती है, उनका सम्बन्ध वस्तुत: हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है।
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