Samwad Samiti Ki Patrakarita
Author:
Kashinath Govindrao JoglekarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Media0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Unavailable
जानकारी शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत है। आज की व्यवस्था में जानकारी एकत्र करने और बाँटने के काम पर कुछ सीमित मीडिया समूहों और अख़बारों का एकाधिकार-सा है। छोटे अख़बार इनके मुक़ाबले टिक नहीं पाते क्योंकि वे देश-भर में संवाददाताओं का वह जाल नहीं फैला सकते जो ऐसी प्रतिस्पर्धा के लिए ज़रूरी है। संवाद समितियाँ-संवाद एजेंसियाँ कम खर्च में व्यापक क्षेत्र से विश्वसनीय समाचार एकत्र करने के महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं। उनके प्रभावी उपयोग से छोटे अख़बार बड़े और व्यापक क्षेत्र को कवर कर सकते हैं। सच कहा जाए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए सूचना तंत्र के विकेन्द्रीकरण में संवाद समितियों की महती भूमिका हो सकती है। पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए यह रोज़गार का महत्त्वपूर्ण माध्यम भी हो सकती हैं। संवाद समितियों के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी सरल ढंग से देनेवाली यह पुस्तक निश्चय ही पत्रकारिता से जुड़े सभी लोगों के काम आएगी, विशेषकर युवा पत्रकार वर्ग के।
ISBN: 9788171198436
Pages: 92
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Shyam Kashyap +1
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- Description: न्यूज़ चैनलों की जब भी बात होती है तो उनके एंकर की चर्चा ज़रूर की जाती है। और कैसे न हो। एंकर किसी भी चैनल की पहचान होते हैं। वे चैनलों के चेहरे होते हैं। किसी भी चैनल के एंकर जिस तरह के होते हैं, उसके आधार पर ही यह राय बनाई जाती है कि वह चैनल कैसा है। अगर एंकर ख़ूबसूरत, समझदार, चौकन्ने हैं तो उस चैनल को भी लोग उसी नज़र से देखेंगे। इसलिए कोई भी चैनल एंकर के चयन को सबसे ज़्यादा महत्त्व देता है। वह ऐसे चेहरों की तलाश में रहता है जो दर्शकों को बाँध सकें। ज़ाहिर है कि टेलीविज़न एंकरिंग एक आकर्षक एवं प्रभावशाली विधा है, पेशा है और यह बहुत स्वाभाविक है कि छात्र ही नहीं, टेलीविज़न में वर्षों से काम कर रहे पत्रकार भी यह सपना पाले रहते हैं कि उन्हें भी स्क्रीन पर आने का मौक़ा मिले। इसलिए सबसे ज़्यादा प्रतिस्पर्धा भी एंकरिंग के लिए होती है। चैनल चलानेवाले भी एंकर के चयन के मामले में बेहद कठोर होते हैं। कोई भी चैनल एंकर को लेकर समझौता नहीं करना चाहता। इसलिए एंकर बनने के इच्छुक लोगों को यह ज़रूर पता होना चाहिए कि उनकी राह बहुत आसान नहीं है और यह सपना कैसे पूरा हो सकता है या उसे पूरा करने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, इस पर सोचना ज़रूरी है। आजकल सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि एंकरिंग के बारे में विस्तार से जानने और फिर उसे सीखने का कोई इन्तज़ाम नहीं है। दिल्ली, मुम्बई जैसे कुछ बड़े शहरों को छोड़ दें तो कहीं ढंग के प्रशिक्षण संस्थान नहीं हैं। जहाँ हैं, वहाँ सिखानेवाले ख़ुद ही प्रशिक्षित नहीं हैं। बड़े शहरों में भी अधिकांश प्रशिक्षण संस्थान मोटी रक़म वसूलने के लिए ज़्यादा कुख्यात हैं। ऐसे में कमज़ोर हैसियत और छोटे तथा मझोले शहरों में रहनेवाले लोग क्या करें, कहाँ जाएँ? उन्हें तो किताबों की ही मदद से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा। लेकिन मुश्किल यह है कि टेलीविज़न एंकरिंग पर ढंग की किताबें भी नहीं हैं। जो हैं वे दशकों पुरानी एंकरिंग को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं जबकि अब उसमें आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है। टेलीविज़न पत्रकरिता माला के तहत ‘चैनलों के चेहरे’ शीर्षक से एंकरिंग पर किताब लिखने का मक़सद इस कमी को पूरा करना ही है। कोशिश रही है कि यह किताब एंकरिंग की एक परिपक्व गाइड की भूमिका अदा करे। इसलिए टेलीविज़न के मौजूदा दौर को ध्यान में रखकर और एंकरिंग के बारे में विस्तार से जानकारी जुटाकर इसे तैयार किया गया है। यह पुस्तक एंकरिंग के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराती है, जिससे वे ख़ुद अपनी तैयारी को आगे बढ़ा सकें।
Electronic Patrakarita
- Author Name:
Dr. Ajay Kumar Singh
- Book Type:

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Description:
सूचना क्रान्ति के इस युग में, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र जैसे रेडियो, एफएम. चैनल, टेलीविज़न, फ़ोटोग्राफ़ी तथा टेलीविज़न प्रोडक्शन के क्षेत्र में, रोज़गार के अवसर निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के तकनीकी एवं प्रायोगिक पक्ष को समझने के लिए हिन्दी की ऐसी पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं, जो भावी पत्रकारों को इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का आधुनिक एवं प्रायोगिक ज्ञान उपलब्ध करा सकें।
यह पुस्तक विशेष रूप से टेलीविज़न, रेडियो, फ़ोटोग्राफ़ी, फ़िल्म एवं इंटरनेट के क्षेत्र में क़दम रखनेवाले युवा पत्रकारों को ध्यान में रखकर लिखी गई है।
इस पुस्तक में इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के फ़ोटोग्राफ़ी, रेडियो तथा टेलीविज़न चैनलों की कार्यप्रणाली, प्रयोग होनेवाले उपकरण, प्रोडक्शन टीम की भूमिका, स्क्रिप्ट राइटिंग, कैमरे एवं लाइटिंग का प्रयोग तथा वीडियो एडिटिंग को सरल-सहज तरीक़े से समझाया गया है। पुस्तक में इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रयोग होनेवाले शब्दों एवं उपकरणों का शब्दकोश भी दिया गया है जिससे कि टेलीविज़न, फ़ोटोग्राफ़ी तथा रेडियो के क्षेत्र में प्रशिक्षण प्राप्त करनेवाले छात्रों के साथ जनमानस भी इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता की दुनिया को भली-भाँति समझ सकें।
Dakhinn Bharat Ki Hindi Patrakarita
- Author Name:
Ravindra Katyayan
- Book Type:

- Description: Dakhinn Bharat Ki Hindi Patrakarita
Lutian Ke Tile Ka Bhugol
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

-
Description:
‘लुटियन के टीले का भूगोल’ में प्रभाष जोशी के वे लेख संकलित किए गए हैं जिनके केन्द्र में हैं राजनीतिक दल और उनसे जुड़े राजनीतिज्ञ तथा लोकतंत्र को क़ायम रखनेवाली संस्थाएँ। इसके अलावा ऐसे लेख भी हैं जो समाज और समुदाय के समकालीन प्रसंगों का विवेचन करते हैं और अपने समय की राजनीति से भी जुड़ते हैं।
प्रभाष जोशी अपनी भूमिका में लिखते हैं :
“ ‘लुटियन के टीले का भूगोल’ में ऐसे कागद हैं जो मैंने राजनीति पर कारे किए। नई दिल्ली में जहाँ केन्द्र सरकार बैठकर काम करती है—वह लुटियंस हिल कहलाती है। वहाँ अंग्रेज़ राजधानी लाए, उसके पहले रायसीना गाँव था और जिस पर अंग्रेज़ों ने अपनी सरकार के बैठने के लिए भवन बनवाए, वह रायसीना की पहाड़ी कही जाती थी। लुटियन उस वास्तुशास्त्री का नाम था जिसने रायसीना पहाड़ी पर वायसराय की लॉज (जो अब राष्ट्रपति भवन है) नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक और उसके नीचे एसेम्बली (जो अब संसद भवन है) बनवाए। बाद में यह पूरा परिसर लुटियंस हिल कहलाने लगा। उज्जैन के विक्रम के टीले की तर्ज पर इसे मैंने लुटियन का टीला बना लिया—दोनों का अन्तर्विरोध और विडम्बना दिखाने के लिए। आज की राजनीति और सत्ता का केन्द्र यह लुटियन का टीला है।
लेकिन ये मेरे राजनीति पर लिखे लेख नहीं हैं। वे मैंने ‘जनसत्ता’ के सम्पादकीय पेज पर लिखे और यहाँ संकलित नहीं हैं। ‘कागद कारे’ में राजनीति के मानवीय और निजी पहलुओं को खोलने की कोशिश करता हूँ। इनमें उन दस सालों की सभी राजनीतिक घटनाओं और उनके नायक-नायिकाओं के मानवीय और निजी पक्षों को समझने की कोशिश की गई है। नरसिंह राव, सोनिया गांधी, चन्द्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी, मायावती आदि राजनीतिक व्यक्तित्वों को महज़ राजनीति के नज़रिए से नहीं देखा गया है। इनमें वे पहलू खोजे गए हैं जिनके बिना राजनीति नहीं होती। राजनीति के बिना लोकतंत्र नहीं हो सकता।”
Sanchar Shodh Aur Media
- Author Name:
Dhananjai Chopra
- Book Type:

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Description:
वास्तव में जैसे-जैसे मीडिया का वैविध्य बढ़ रहा है, वैसे-वैसे मीडिया शोध की आवश्यकता और उसकी प्रवृत्तियों में भी बदलाव और विकास देखने को मिल रहा है। बीसवीं सदी के अन्तिम दशक में जब मीडिया के विभिन्न उपक्रमों को नये-नये आयाम मिल रहे थे, तभी मीडिया शोध की नयी-नयी प्रवृत्तियाँ भी जन्म ले रही थीं। यही वह समय था जब भारत में टेलीविजन प्रसारण मजबूत हो रहा था और वेब संचार की दुनिया आकार ले रही थी। मीडिया और बाजार के रिश्ते नये रूप-रंग ले रहे थे और मीडिया के साथ उसके पाठकों, श्रोताओं
और दर्शकों के रिश्तों को नये-नये रंग-ढंग मिल रहे थे। टेक्नोलॉजी के सहारे अगर मीडिया बदल रहा था तो सामाजिक तानेबाने में भी खूब परिवर्तन देखने को मिल रहे थे। वास्तव में यही वह समय था, जब मीडिया शोध को नयी पहचान मिली। नयी सदी यानी इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में ही अकादमिक और औद्योगिक आवश्यकताओं और इनके मिले-जुले प्रयासों ने मीडिया शोध के क्षेत्र को समृद्ध तो किया ही, साथ ही इसे जीवन्त निरन्तरता भी प्रदान की। यही वजह है कि मीडिया शोध की नयी-नयी प्रवृत्तियाँ विकसित हो चुकी हैं और अब नये-नये आयाम सामने आ रहे हैं।
Media Ka Loktantra
- Author Name:
Vineet Kumar
- Book Type:

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Description:
इसमें अब कोई सन्देह नहीं रह गया कि भारत का पॉपुलर मीडिया, खासतौर से टीवी, अब वह बिलकुल नहीं कर रहा है जिसकी अपेक्षा हम एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते उससे करते हैं। वह कुछ और कर रहा है, और इतने साफ़ ढंग से कर रहा है कि यह भी बिना कोशिश के दिख जाता है कि क्या कर रहा है!
लेकिन देश का हर दर्शक इसे नहीं देख पाता; हमारी जनसंख्या का वह बड़ा हिस्सा, जिसे साक्षर होने के बावजूद शिक्षित नहीं कहा जा सकता, जिसे अपनी समझ का परिष्कार करने के लिए अभी और समय चाहिए था, अधबीच ही उस गोरखधंधे के हत्थे चढ़ गया है जिसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विज्ञापन और पीआर एजेंसियों, भाषा के जादूगर विज्ञापन लेखकों, फ़ेक न्यूज़ की फैक्ट्रियों, सच्ची- झूठी समाचार संस्थाओं और सोशल मीडिया के सहारे चला रहा है। दर्शक देशवासियों का यह विशाल हिस्सा आज भी मुद्रित और प्रसारित छवियों/शब्दों को लगभग देववाणी मान लेता है, इसलिए वह मीडिया के उस प्रचार का बहुत आसान शिकार हो जा रहा है, जो प्रचार, जो नैरेटिव न तो उसका है और न उसके हित में है, जिसका उद्देश्य नागरिक को महत अपने काम की चीज बनाना है।
प्रखर मीडिया विश्लेषक और माध्यमों की लोकतांत्रिकता के प्रति गहरे चिन्तित विनीत कुमार की लम्बे समय से प्रतीक्षित यह किताब मीडिया के मौजूदा इस संजाल को अपेक्षित तथ्यों, आँकड़ों, सन्दर्भों, विवरणों और विश्लेषणों से रेशा- रेशा खोल देती है।
इस किताब को पढ़ना आज हर उस व्यक्ति के लिए जरूरी है, जिसे देश, देश के लोगों और लोकतंत्र की सचमुच में चिन्ता है।
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