Hindi Patrakarita : Ek Yatra
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अरसे तक ‘राष्ट्रीय मीडिया’ मानी जानेवाली अंग्रेजी मीडिया के वर्चस्व को, अपने व्यापक जमीनी जुड़ाव की बदौलत किनारे कर, देश के कोने-कोने तक पहुँच बना चुकी हिन्दी मीडिया का यह ऐतिहासिक सफर अत्यन्त चुनौतीपूर्ण रहा है, जिसका ब्योरा मृणाल पाण्डे ने इस किताब में दर्ज किया है। इसमें औपनिवेशिक काल में बढ़ती राष्ट्रीय भावना से उपजे अखबार और अंग्रेजी की अधीनता से लेकर, आजादी के बाद के दौर में विज्ञापन और निजी कॉरपोरेटों की बढ़ती मौजूदगी से आए उन बदलावों का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है जिन्होंने पत्रकारिता का परिदृश्य आमूल बदल दिया। आगे डिजीटलीकरण, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के बढ़ते प्रभावों और विज्ञापनों पर भारी निर्भरता ने बदलावों को और तेज किया। और अब, राजनीति, कारपोरेट और मीडिया के बीच स्पष्ट किन्तु जटिल रिश्तों की छाया में यह सवाल सामने है कि एक समय भारतीय लोकतंत्र को आगे बढ़ाने का जरिया बनी हिन्दी मीडिया आज हमारे संविधान प्रदत्त सूचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक को आगे बढ़ा पाने में किस हद तक सक्षम है? जरूरी जानकारियों से भरी यह किताब पत्रकारिता के छात्रों, प्रोफेसरों और मीडियाकर्मियों के साथ-साथ उन सबके लिए एक विचारोत्तेजक पाठ है जो मीडिया और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास, वर्तमान और भविष्य में दिलचस्पी रखते हैं।
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अरसे तक ‘राष्ट्रीय मीडिया’ मानी जानेवाली अंग्रेजी मीडिया के वर्चस्व को, अपने व्यापक जमीनी जुड़ाव की बदौलत किनारे कर, देश के कोने-कोने तक पहुँच बना चुकी हिन्दी मीडिया का यह ऐतिहासिक सफर अत्यन्त चुनौतीपूर्ण रहा है, जिसका ब्योरा मृणाल पाण्डे ने इस किताब में दर्ज किया है। इसमें औपनिवेशिक काल में बढ़ती राष्ट्रीय भावना से उपजे अखबार और अंग्रेजी की अधीनता से लेकर, आजादी के बाद के दौर में विज्ञापन और निजी कॉरपोरेटों की बढ़ती मौजूदगी से आए उन बदलावों का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है जिन्होंने पत्रकारिता का परिदृश्य आमूल बदल दिया। आगे डिजीटलीकरण, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के बढ़ते प्रभावों और विज्ञापनों पर भारी निर्भरता ने बदलावों को और तेज किया। और अब, राजनीति, कारपोरेट और मीडिया के बीच स्पष्ट किन्तु जटिल रिश्तों की छाया में यह सवाल सामने है कि एक समय भारतीय लोकतंत्र को आगे बढ़ाने का जरिया बनी हिन्दी मीडिया आज हमारे संविधान प्रदत्त सूचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक को आगे बढ़ा पाने में किस हद तक सक्षम है? जरूरी जानकारियों से भरी यह किताब पत्रकारिता के छात्रों, प्रोफेसरों और मीडियाकर्मियों के साथ-साथ उन सबके लिए एक विचारोत्तेजक पाठ है जो मीडिया और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास, वर्तमान और भविष्य में दिलचस्पी रखते हैं।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2024
- Weight
- 205 grams
- ISBN-13
- 9788119989270
- Pages
- 224
- Reading time
- ~7 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 22 cm
- Language
- Hindi
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विख्यात कथाकार, पत्रकार और समाज-चिन्तक मृणाल पाण्डे के नाटकों का यह संग्रह उनके एक और महत्त्वपूर्ण रचना-पक्ष को सामने लाता है। नाटककार के रूप में उनकी यात्रा अस्सी के दशक से शुरू हुई और अपनी तमाम कार्यकारी तथा रचनात्मक व्यस्तताओं के बीच समय-समय पर उन्होंने इसे बरक़रार रखा। उनका पहला नाटक ‘मौजूदा हालात को देखते हुए’ था जिसका प्रकाशन ‘नटरंग’ में और भोपाल में मंचन भी हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से उसकी कोई प्रतिलिपि अब प्राप्य नहीं है। यही स्थिति उनके रेडियो नाटकों की भी है, जिनमें से अधिकांश आकाशवाणी के आर्काइव्ज़ में गुम हैं। सो इस संग्रह में दो ही रेडियो नाटक शामिल हो सके हैं, ‘सुपर मैन की वापसी’ और ‘धीरे-धीरे रे मना’। पुस्तक के मुख्य भाग में मृणाल जी के पाँच पूर्णकालिक नाटक हैं जो न केवल नाटककार के रूप में उनकी प्रतिभा के परिचायक हैं बल्कि उनकी वैचारिक आत्मनिर्भरता को भी रेखांकित करते हैं। संग्रह का पहला नाटक ‘जो राम रचि राखा’ उस दौर में लिखा गया था जब हिन्दी में जनवादी तर्ज की ‘प्रतिबद्धता’ धार्मिक आस्था की तरह स्थापित थी। उस दौर में उन्होंने इस नाटक के पात्र मन्ना सेठ के हास्यास्पद क्रान्ति-स्वप्नों के माध्यम से अपने समाज से अपरिचित और निरर्थक प्रतीकों से भरी तत्कालीन वैचारिक दुनिया की तरफ़ इशारा किया। इस पर उनको आलोचना भी सहनी पड़ी। आलोचना उन्हें अपने नवीनतम नाटक ‘शर्मा जी की मुक्तिकथा’ (2002) पर भी मिली जिसको आलोचकों ने जटिल और ‘बहुत प्रयोगधर्मी’ कहा। लेकिन इस सबके बावजूद मृणाल पाण्डे का नाटककार अपने समय की जटिलताओं का सामना करता रहा। उनका मानना है कि “अपनी सच्ची स्थिति को, वह चाहे जितनी भी जटिल क्यों न हो, परिभाषित करना हर लेखक की लेखकीय अनिवार्यता है।” उनके एक पहले नाटक ‘आदमी जो मछुआरा नहीं था’ का फोकस ही यह है कि मनुष्य के लिए उसकी स्वतंत्रता और नियति अन्तत: एक निजी सवाल है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि मृणाल पाण्डे के ये सभी नाटक मंच की कसौटी पर भी खरे उतर चुके हैं। इसलिए सिर्फ़ पाठक ही नहीं, रंगकर्मी भी इस संकलन को उपयोगी पाएँगे और हमें उम्मीद है कि इससे उनकी यह शिकायत काफ़ी हद तक दूर हो जाएगी कि हिन्दी में मंचन करने लायक मौलिक नाटक नहीं लिखे जा रहे।
Pratinidhi Kahaniyan : Mrinal Pande
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Mrinal Pande +1
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मृणाल पाण्डे सत्तर के दशक से कहानी-लेखन में सक्रिय हैं, और उन्होंने बिना किसी आन्दोलन का हिस्सा हुए कथाकार के रूप में एक विशिष्ट पहचान अर्जित की है। उनकी कहानियों की दुनिया स्त्रियों, पहाड़ी जीवन के सुख-दुख और आधुनिक समाज में बढ़ते सम्बन्धगत तनावों से बनती है; और उस भाषा से जो अपनी स्वाभाविकता, सम्प्रेषणीयता और पारदर्शिता से पाठक के मन पर अमिट प्रभाव छोड़ जाती है। इस संकलन में शामिल कहानियाँ उनके कथाकार की लगभग सभी विशेषताओं को रेखांकित करते हुए उनके वैचारिक और सामाजिक सरोकारों को भी स्पष्ट करती हैं। इस चयन से गुज़रते हुए पाठकगण न सिर्फ़ इन कहानियों की पठनीयता के क़ायल होंगे, बल्कि पात्रों की ऐसी श्रेणी से साक्षात्कार भी करेंगे जो अपनी ज़मीन और अपने ताने-बाने में बेहद प्रामाणिक और वास्तविक है।
Paridhi Par Stri
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Mrinal Pande
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आज स्त्रियों के काम तथा राष्ट्रीय उत्पाद में उनके कुल योगदान का बड़ा महत्त्व राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर स्वीकार कर लिया गया है। यह भी मान लिया गया है कि एक पुरुष को साक्षर बनाने से एक व्यक्ति ही साक्षर होता है, जबकि एक स्त्री के शिक्षित होने से एक पूरा कुनबा! अकाट्य तौर से यह भी प्रमाणित हो चुका है, कि ग़रीबतम तबके की औरतों तक स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारियों तथा सुविधाएँ पहुँचाए बिना संक्रामक रोगों अथवा आबादी पर अंकुश लगाना क़तई नामुमकिन है। इसलिए ज़रूरत है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की वर्तमान रपट का महत्त्व तथा शरणार्थी समस्या का यह अनदेखा पहलू हमारी सरकार भी समझे और इन उपेक्षित स्त्रियों में कौन हिन्दू है, कौन ग़ैर-हिन्दू, इसकी स्वार्थी विवेचना की बजाय उन तक ज़रूरी नागरिक सुविधाएँ और आजीविका के संसाधन पहुँचाने की यथाशीघ्र चेष्टा की जाए, वरना लाख प्रयत्नों के बावजूद राष्ट्रीय प्रगति सही रफ़्तार नहीं पकड़ पाएगी। कवि रहीम ने कहा भी था, कि जिस व्यक्ति को याचक बनकर जाना पड़ता है, वह तो जीते जी मरता है, पर उससे भी गया-गुज़रा वह है, जिसके मुँह से निकलता है ‘नहीं’। क्या इन अधमरी स्त्रियों की ज़रूरतों को जाति-धर्म की तुला पर तौलते हुए हम हर बार राष्ट्र के ज़मीर की हत्या नहीं करते हैं?
Saathi
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Harsh Ranjan
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आते हैं और आते रहेंगे- हर साल ये फाल्गुन की हवाऐं जेठ की दुपहरी आषाढ के बादल भाद्र की फुहार और काँपती-कँपकँपाती पूस की पछिया बयार... हर बार एक परदेसी कोई आएगा, लौटकर अपने देस; झांकेगा, ताकेगा, हर गली-हर मुहल्ला लिए, दबाए, छाती में हूक एक... हर साल, हर बार जो आएगा, झांकता जाएगा, थोड़ा घबराकर, थोड़ा ठहरकर, सरसरी निगाहों से या कि संग लंबी आहों के ये राहें ...ये चौराहे, आ बैठेगा फिर कोई हर साल, हर बार मन के आंगन में ... चुप...चुप...चुप... एक अनकहा आश्वासन देंगे वो, पाएंगे हम ,थामे रखना! आऐंगे ही हम बाँटने ये सब-कुछ हर साल-हर बार.....
Ek Aag Ka Dariya
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Harsh Ranjan
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मैं हर्ष रंजन हूँ, आपके लिए सर्वथा अपरिचित। ये किताब मेरा पहला परिचय है। एक सीरीज आपके सामने लाया हूँ, पाँच कहानी-संग्रह, जो एक के बाद एक आपके सामने आएंगी। लिखना कब, क्यों और कैसे शुरू होता है कहना मुश्किल है बस इतना बता सकता हूँ कि पत्रों से शुरुआत की थी। सालों गुजर गए, न आज वो चिट्ठियाँ हैं और ना... बहरहाल मैं अपने जीवन-क्रम से चुनकर दस कहानियाँ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसमे गंगा के घाट से लेकर आग के दरिया, जमीन से लेकर आकाश तक का वर्णन है। मैंने इतनी मेहनत की है कि भले ही ये कभी जीने के लिए बहुत कठिन हों लेकिन आज पढ़ने के लिए बहुत सरल हैं। आशा है कि सरलता और सादगी आपको पसंद आएगी। बस इस सीढ़ी पर पहला कदम रखिए और देखिये इस दुनिया को नए नजरिए से। रचना आपको कैसी लगी जरूर बताएं।
Aashad Ki Duphari
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Harsh Ranjan
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मेरे छठे काव्य संग्रह को मैं आपके हाथों में दे रहा हूँ। ये पुस्तक काफी इंतज़ार के बाद निकली है पर जब निकली है तो क्या निकली है। ये संग्रह एक प्रयोग के लिए जाना जाएगा जो इसमें शामिल वक्तव्य के रूप में हैं। ये वक्तव्य एक कौंध जैसे हैं और आपको इसमें मेरे विचार एक क्षण के लिए पर बिल्कुल स्पष्ट दिखेंगे। सूई से लेकर रॉकेट तक पर कविता लिखने की शिक्षा हमें मिली है और हर बार की तरह संसद से सड़क तक को मैंने लपेटने का प्रयास किया है। आप कविताओं का आनंद लें और मैं अगली पुस्तक की तैयारी में लगता हूँ।.
Parchaiyoon Ke Pichee Prarambh
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Harsh Ranjan
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सामने का मंदिर बिल्कुल निष्पंद है। इधर सौ मीटर का मैदान है और दूसरी तरफ मंदिर की सीढि़यां। इधर हनुमान जी, दूसरे किनारे पर काली माँ, बीच में दुर्गा, बगल में राम और उनके बगल में सपरिवार भोलेनाथ। पुजारी पूजा करा कर जा चुके हैं। रवि और गुंजन समय टिकाकर आये हैं और इस मंदिर में इसलिए उनका आना हुआ है कि ये मंदिर ज्यादातर लोगों से खाली और श्रद्धा से भरा रहता है । श्रद्धा रवि की । बचपन से उसका इस मंदिर में आना-जाना रहा है। उसने गुंजन से पहले ही कह रखा था कि शादी करेंगे तो इसी मंदिर में सुबह के साढ़े सात बज रहे हैं। गुंजन और रवि सादे कपड़ों में यहाँ पहुँचे थे। शादी के नाम पर उन्हें बस दो औपचारिकताएं पूरी करनी थी। जिसमें एक थी सिन्दुर से और दूसरी मंगलसूत्र से क्योंकि शादी का मतलब है इस से ज्यादा कुछ जानते भी नहीं थे। लेकिन क्या शादी का मतलब बस इतना है। हाँ बस इतना है। इससे ज्यादा जो है वह केवल प्रदर्शन है। कभी लोगों को दिखाने के लिए कभी खुद को। जीवन बहुत लंबी यात्रा है और इस लंबे जीवन में दोनों का साथ बना रहे इसी प्रार्थना के साथ दोनों ने पैर रखे। रवि बिल्कुल शांत है और उसी तरह शांत गुंजन। दोनों के मन मे लेकिन दो अलग-अलग बातें चल रही है। रवि का मानना है कि यहा पहुँचकर वो सफर खत्म हुआ जो बरसों पहले शुरू हुआ था, और दूसरी तरफ गुंजन सोच रही थी कि यहाँ एक ऐसा सफर शुरू होने को है जो वर्षों चलेगा। कहें तो जीवन भर .....
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