Radio Natak Ki Kala
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‘रेडियो नाटक’ की कला सन् 1988 के ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार’ से सम्मानित है।</p> <p>डॉ. सिद्धनाथ कुमार रेडियो नाटकों के जाने-पहचाने लेखक और अध्येता थे। सन् 1948 में ही वे रेडियो नाट्य-लेखन से जुड़े। सन् 1955 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘रेडियो नाट्य शिल्प’ काफ़ी चर्चित हुई। अनेक लेखक और अध्येता इस नई विधा की प्रथम पुस्तक से लाभान्वित हुए।</p> <p>‘रेडियो नाटक की कला’ में लेखक ने अपने दीर्घकालीन नाट्य-लेखन के अनुभव एवं विषयगत व्यापक अध्ययन के आधार पर रेडियो नाट्य विधा का सूक्ष्म एवं व्यापक विवेचन किया है। रेडियो नाटक के व्यावहारिक लेखन और सैद्धान्तिक अध्ययन, दोनों ही दृष्टियों से पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसा हमारा विश्वास है।</p> <p>डॉ. सिद्धनाथ कुमार नाट्यालोचक भी थे और उन्होंने रेडियो नाटकों के प्रसंग में वस्तु-विन्यास, चरित्र, संवाद आदि का जो विवेचन किया है, वह सामान्य नाटक के शिल्प में रुचि रखनेवाले लेखकों और अध्येताओं के लिए भी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा।
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‘रेडियो नाटक’ की कला सन् 1988 के ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार’ से सम्मानित है।</p>
<p>डॉ. सिद्धनाथ कुमार रेडियो नाटकों के जाने-पहचाने लेखक और अध्येता थे। सन् 1948 में ही वे रेडियो नाट्य-लेखन से जुड़े। सन् 1955 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘रेडियो नाट्य शिल्प’ काफ़ी चर्चित हुई। अनेक लेखक और अध्येता इस नई विधा की प्रथम पुस्तक से लाभान्वित हुए।</p>
<p>‘रेडियो नाटक की कला’ में लेखक ने अपने दीर्घकालीन नाट्य-लेखन के अनुभव एवं विषयगत व्यापक अध्ययन के आधार पर रेडियो नाट्य विधा का सूक्ष्म एवं व्यापक विवेचन किया है। रेडियो नाटक के व्यावहारिक लेखन और सैद्धान्तिक अध्ययन, दोनों ही दृष्टियों से पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसा हमारा विश्वास है।</p>
<p>डॉ. सिद्धनाथ कुमार नाट्यालोचक भी थे और उन्होंने रेडियो नाटकों के प्रसंग में वस्तु-विन्यास, चरित्र, संवाद आदि का जो विवेचन किया है, वह सामान्य नाटक के शिल्प में रुचि रखनेवाले लेखकों और अध्येताओं के लिए भी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा।
Book Details
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ISBN9789349159037
-
Pages174
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘21वीं सदी : पहला दशक’ पुस्तक में विख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी के वे लेख संकलित हैं जो उन्होंने ‘जनसत्ता’ दैनिक में सन् 2000 के बाद लिखे। 2001 से 2009 के बीच प्रकाशित इन लेखों में देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन की धड़कनें सुनी जा सकती हैं।
21वीं सदी के आगमन को सत्ताधारी वर्ग ने सम्पन्नता के स्वप्न के रूप में प्रचारित किया था। लेकिन सचाई यह थी कि 21वीं सदी देश के बहुजन जीवन के लिए अभिशाप की तरह प्रकट हुई। आर्थिक उदारीकरण की नीति के दुष्परिणाम सामने आने लगे। आम लोगों का जीवन पहले की तुलना में ज़्यादा मुश्किलों के घेरे में आ गया। इस पुस्तक में प्रभाष जोशी ने आर्थिक और सामाजिक स्तर पर पैदा होनेवाली इन मुश्किलों की व्याख्या विस्तार से की है। उसकी आत्महन्ता राजनीतिक परिणति को प्रभावी तरीक़े से समझाया गया है।
प्रभाष जोशी की पत्रकारिता महज़ चिन्तन और विश्लेषण की पत्रकारिता नहीं है, वह सामाजिक सक्रियता और विसंगतियों के विरुद्ध हस्तक्षेप की पत्रकारिता है। इन लेखों में एक शोषणमुक्त भारतीय समाज का स्वप्न भी देखा गया है, जिसमें एक नए विकल्प का संकेत भी दिखाई देता है। यह पुस्तक नई सदी की वास्तविक पहचान का रेखाचित्र है।
Television KI Bhasha
- Author Name:
Harish Chandra Barnwal
- Book Type:

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अनुमान के मुताबिक़ हिन्दी में लगभग एक लाख पैंतालीस हज़ार शब्द हैं, लेकिन हिन्दी टेलीविज़न पत्रकारिता के लिए महज़ पन्द्रह सौ शब्दों की जानकारी ही काफ़ी है
यानी अगर आपने इतने शब्दों की जानकारी हासिल कर ली तो यक़ीन मानिए, आप भाषा के लिहाज़ से हिन्दी के अच्छे टेलीविज़न पत्रकार तो ज़रूर बन जाएँगे। अफ़सोस की बात है कि ये जानकारी भी टेलीविज़न पत्रकारों को भारी लगती है। शब्दों की सही समझ की कमी, भाषा के आधे–अधूरे ज्ञान की वजह से टेलीविज़न पत्रकार ऐसी ग़लतियाँ कर बैठते हैं कि कई बारगी मज़ाक़ का पात्र तक बन जाते हैं। यही नहीं, शब्दों के ग़लत इस्तेमाल से अर्थ का अनर्थ तक हो जाता है। इसलिए पत्रकारिता के लिहाज़ से भाषा की सही जानकारी बेहद ज़रूरी है।
हिन्दी न्यूज़ चैनलों की दुनिया भले ही समय के साथ काफ़ी व्यापक होती चली गई हो, लेकिन हक़ीक़त यही है कि आज भी टीवी पत्रकारिता में भाषा को लेकर एक भी ऐसी किताब नहीं है, जो भाषा और पत्रकारिता को जोड़ते हुए एक मुकम्मल जानकारी दे सके। यही परेशानी टीवी पत्रकारिता की पढ़ाई करनेवाले छात्र–छात्राओं के साथ है। हिन्दी के प्रोफ़ेसर ही पत्रकारिता के बच्चों को भी पढ़ाते हैं, ऐसे में पत्रकारिता की भाषा का व्यावहारिक ज्ञान कभी भी विद्यार्थियों को सही से नहीं हो पाता और इसका ख़मियाज़ा टेलीविज़न पत्रकारिता को होता है।
टेलीविज़न की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है। इसकी भाषा आम बोलचाल की भाषा होते हुए भी अलग है। इसकी भाषा मानकता के क़रीब रहते हुए भी इसके नियमों का पालन कभी नहीं करती। नए–नए शब्द समय और ज़रूरत के हिसाब से गढ़े जाते हैं तो कई शब्दों को हमेशा के लिए त्याग दिया जाता है। इस भाषा को अंग्रेज़ी, उर्दू और दूसरी भाषाओं से कोई परहेज़ नहीं। इसकी भाषा मीडिया के अन्य माध्यमों मसलन अख़बार या फिर रेडियो की भाषा से बेहद अलग है।
Television Ki Kahani : Part-1
- Author Name:
Shyam Kashyap +1
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टेलीविज़न की कहानी वर्तमान समय सूचना-समाचारों के विस्फोट का है। हर घर-आँगन में चौबीस घंटे की टेलीविज़न-उपस्थिति है। चकमक करती रौशनियाँ हैं, दमक-हुमक-भरे चेहरे हैं। हर्ष, विषाद, रुदन की आक्रामकता है। कहीं समाचार, कहीं फ़िल्म और घर-घर की कहानी बयान करते रंग-बिरंगे धारावाहिक। लेकिन क्या आप जानते हैं, इस चमक-दमक के आविष्कारक कौन थे? टेलीविज़न का कब और कैसे आविष्कार हुआ? टेलीविज़न के अतीत-वर्तमान को ही जानने-समझने का सार्थक प्रयत्न करती है यह पुस्तक। वरिष्ठ लेखक-पत्रकार डॉ. श्याम कश्यप और चर्चित युवा टीवी पत्रकार मुकेश कुमार की क़लम-जुगलबन्दी ने टेलीविज़न की कहानी को आप तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया है।
टेलीविज़न के विभिन्न आयामों का समावेश करती इस पुस्तक में कुल बारह अध्याय हैं, जिनमें टेलीविज़न की ईजाद और उसके क्रमिक विकास की कहानी के साथ उनके विशिष्ट आन्तरिक संरचना, चरित्र और सामाजिक प्रभावों की भी प्रभावी पड़ताल की गई है। इसमें प्रसंगवश उन तमाम समकालीन प्रश्नों से भी मुठभेड़ करने का प्रयास किया गया है, जिनका सामना टीवी पत्रकार को अक्सर करना पड़ता है।
पुस्तक में टीवी पत्रकारिता से जुड़ी उन तमाम बातों का ज़िक्र है, जिसकी ज़रूरत इस क्षेत्र के छात्रों और पत्रकारों को पड़ती है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए मददगार साबित होगी। न सिर्फ़ छात्रों और पत्रकारों के लिए बल्कि आम पाठक, जो टेलीविज़न के इतिहास और उसके संसार को जानना और समझना चाहते हैं, उनके लिए भी उपयोगी और रुचिकर पुस्तक।
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