Kunwari Dharati
(0)
Author:
Ivan Sergeyevich TurgenevPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
299
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‘कुँआरी धरती’ तुर्गेनेव का छठा और अन्तिम उपन्यास है। इसकी पृष्ठभूमि में ज़ारकालीन रूस का क्रान्तिकारी आन्दोलन और उसमें शामिल युवा हैं। देश के अशान्त सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य से असन्तुष्ट ये युवा उसकी कुँआरी धरती में क्रान्ति के बीज बोना चाहते हैं। वे आत्मकेन्द्रित अभिजातों के विरोधी हैं और कष्ट में पड़े जन-सामान्य के हमदर्द। ऐसे ही एक युवा के ज़रिये तुर्गेनेव इस उपन्यास में तत्कालीन रूस की सामाजिक जड़ता के बीच परिवर्तनकामी आदर्शवाद की जटिलताओं की पड़ताल करते हैं। इस उपन्यास में पुराने और उभरते नए रूस के मध्य वैचारिक संघर्ष का बारीक चित्रण किया गया है, जिसके निहितार्थों का सार्वकालिक महत्त्व है।
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‘कुँआरी धरती’ तुर्गेनेव का छठा और अन्तिम उपन्यास है। इसकी पृष्ठभूमि में ज़ारकालीन रूस का क्रान्तिकारी आन्दोलन और उसमें शामिल युवा हैं। देश के अशान्त सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य से असन्तुष्ट ये युवा उसकी कुँआरी धरती में क्रान्ति के बीज बोना चाहते हैं। वे आत्मकेन्द्रित अभिजातों के विरोधी हैं और कष्ट में पड़े जन-सामान्य के हमदर्द। ऐसे ही एक युवा के ज़रिये तुर्गेनेव इस उपन्यास में तत्कालीन रूस की सामाजिक जड़ता के बीच परिवर्तनकामी आदर्शवाद की जटिलताओं की पड़ताल करते हैं। इस उपन्यास में पुराने और उभरते नए रूस के मध्य वैचारिक संघर्ष का बारीक चित्रण किया गया है, जिसके निहितार्थों का सार्वकालिक महत्त्व है।
Book Details
-
ISBN9789360862800
-
Pages336
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारतीय समाज सदियों से जातियों-उपजातियों की चक्की में लोगों को पीसता रहा है। जाति हमारे यहाँ ऊपरी आभासी समरसता के अन्तस्तल में अनिवार्य तत्त्व के रूप में सदैव सक्रिय रहती है और लोगों के निर्णयों और प्राथमिकताओं के निर्धारण में एक बड़ी भूमिका निभाती है। यही कारण है कि लोग मजबूरी में भी अपनी जाति-पहचान से चिपके रहते हैं।
इस उपन्यास का नायक मानवीयता की उदात्त डोर पकड़कर आगे बढ़ने की कोशिश करता है, किन्तु कदम-कदम पर उसे अपमान और प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। व्यक्ति के शुभत्व में गहरी आस्था के सहारे नायक अपने संघर्ष की निरन्तरता बनाए रखता है, किन्तु प्राय: हर तरफ से बार-बार मिलती निराशा इसे आत्मघात की ओर धकेल देती है। उपन्यास के अन्य चरित्र मानव-जीवन की विभिन्न विचित्रताओं को चित्रित करते हैं जिससे इसका कथानक बहुआयामी और रोचक बन गया है।
उपन्यास के लेखक ने वर्षों तक निरन्तर शोध और फील्ड वर्क किया है। महाब्राह्मण समाज की गहराई में जाकर लेखक ने अनगिनत इंटरव्यू लिए और अनेक ऐसी विसंगतियों को देखा-समझा जिनके बारे में आमतौर पर हम बिलकुल नहीं जानते। यह पहली कृति है, जो जाति-संरचना के इस पक्ष को इतने अच्छे ढंग से न सिर्फ, चित्रित करती है बल्कि विश्लेषित भी करती है।
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