Twisted Tales
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Authors ink brings to you an unputdownable heady cocktail of 13 short stories that will compel you think about life in a way you have never thought before. Ranging from tales of horror to the tales of the unexpected, from stories of love to stories of irony and self realisation, twisted tales promises to keep you enthralled as each story brings out the vagaries of life and the fickleness as well as the strengths of human emotions and character in a way that each story touches you in a special way and compels you to relate it to your own life and personal experiences. Pick up the book, put your feet up, and make yourself comfortable to embark on a journey full of excitement, thrills and experience the…unexpected.
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Authors ink brings to you an unputdownable heady cocktail of 13 short stories that will compel you think about life in a way you have never thought before. Ranging from tales of horror to the tales of the unexpected, from stories of love to stories of irony and self realisation, twisted tales promises to keep you enthralled as each story brings out the vagaries of life and the fickleness as well as the strengths of human emotions and character in a way that each story touches you in a special way and compels you to relate it to your own life and personal experiences. Pick up the book, put your feet up, and make yourself comfortable to embark on a journey full of excitement, thrills and experience the…unexpected.
Book Details
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ISBN9788193343081
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Pages180
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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गुरुकुल’ का यह दूसरा भाग उसी चिन्ता का गम्भीर और गहन विस्तार है जो उपन्यास के पहले भाग में अंकुरित होती दिखाई दी थी।
पहले उपन्यास का भोला-भाला पार्थ यहाँ पर्याप्त वयस्क हो चुका है। वह न सिर्फ़ समाज की थोथी नैतिकता की अँधेरी गलियों में दुबके गे समुदाय की दुनिया को खुली आँखों से देख रहा है, बल्कि उनके हित में एक निर्णायक संघर्ष की तैयारी भी कर रहा है।
कहने की ज़रूरत नहीं कि हिन्दी में वैकल्पिक यौन-व्यवहार के माध्यम से सामाजिक और मानवीय सहिष्णुता की तलाश का यह पहला प्रयास है। सवाल बहुत सीधा है कि स्वतंत्रता और समता के अलम्बरदार हमारे तथाकथित लोकतांत्रिक समाज में कुछ लोगों को सिर्फ़ उनके ‘सेक्सुअल प्रिफ़ेरेंस’ के कारण ही क्यों समाज की घृणा और क़ानून की क्रूरता का पात्र बना दिया जाता है? लेकिन जवाब इतना सीधा नहीं है, क्योंकि न हममें इतना नैतिक साहस है और न इतनी इंसानियत।
यह उपन्यास भी इसका जवाब नहीं देता, यह उसकी ज़िम्मेदारी भी नहीं है, वह बस इस सवाल के पीछे छिपे हमारे ख़ूँख़्वार और दानवी चेहरों को उघाड़ता है। वह बताता है कि हम क्या हैं, हमारी नैतिक पवित्रता क्या है, हमारी न्याय व्यवस्था क्या है और हमारी पुलिस क्या है, और इस तरह इस सवाल के जवाब की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।
Bidhar
- Author Name:
Bhalchandra Nemade
- Book Type:

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Description:
‘बिढार’ का मतलब है—अपने कन्धे पर अपनी गृहस्थी का बोझ लादे हुए भटकना। इस दिक्-काल से परे की भटकन का मक़सद है, शायद, गौतमबुद्ध की तरह संबोधि प्राप्त करना। अपने आपको, अपनों को, अपनापे को पाना। बिढार के चांगदेव की यह भटकन, भाषा-प्रदेश और काल को लाँघकर सार्वजनीन और बीसवीं शताब्दी के डॉक्यूमेन्ट्स को लेकर सार्वकालिक बन जाती है। यह कहीं भी ख़त्म न होनेवाली भटकन, जिसका प्रारम्भ 1962 में हुआ था, वह ‘बिढार’ (1975), ‘जरीला’ (1977) और ‘झूल’ (1979) को पार कर अब अपने आगे के मुकाम ‘हिन्दू’ की ओर अग्रसर है। यह परकाया प्रवेश करनेवाले एक की आपबीती है जो अपने विस्तार में अनेक को समाहित करने का सामर्थ्य रखती है।
यह मानव-सभ्यता की कैसी विडम्बना है कि सृजन-क्षमता के विनाश को स्वीकार किए बिना मनुष्य
को समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होती। विपात्र बनो और प्रतिष्ठा प्राप्त करो। सत् (बीइंग) और कर्तृत्व (बिकमिंग) का घोर कुरुक्षेत्र नेमाड़े जी के उपन्यास—‘चतुष्ट्य’ का दहला देनेवाला अन्तःसूत्र है। जीवन के नैतिक और सांस्कृतिक दायित्व की व्यग्रता का भाव नेमाड़े जी के ‘बिढार’ में जिस अभिनिवेश शून्य परन्तु रचनात्मक स्वरूप में पाया जाता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
—रंगनाथ तिवारी
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