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भ्रष्टाचार, जिसका विरोध करना भारतीय समाज का सबसे पसन्दीदा शगल है, दरअसल हमारी जीवन-शैली का हिस्सा बन चुका है। हर कोई दूसरे के भ्रष्टाचार से त्रस्त है और सबके पास अपने भ्रष्टाचार के पक्ष में देने के लिए अनेक व्यावहारिक तर्क हैं। जो भ्रष्ट नहीं है और जीवन के हर मोड़, हर क़दम पर सिर्फ़ सिद्धान्त रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उसका विरेाध करता है, उसे अस्वीकार करता है, वह ख़ुद-ब-ख़ुद समाज से निर्वासित महसूस करने लगता है। इस उपन्यास का नायक मनोहर ऐसा ही व्यक्ति है जो किसी भी रूप में रिश्वत का समर्थन नहीं करता। इसके कारण, उसे न सिर्फ़ अपने दफ़्तर में अपने सवर्ण सहकर्मियों की उपेक्षा, उपहास और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है, बल्कि घर में उसकी पत्नी भी इसी कारण पहले उससे नाराज़ रहने लगती है, और फिर तनाव के चलते बीमार पड़ जाती है। जयप्रकाश कर्दम ने इस उपन्यास में विस्तार से एक आदर्शवादी युवक के मानसिक और सामाजिक संघर्ष को दर्शाया है। साथ ही आरक्षण और उच्च स्तरों पर व्याप्त भ्रष्टाचार, जाति-व्यवस्था, जाति के आधार पर दफ़्तरी माहौल में फैले भेदभाव आदि को भी बारीकी से उभारा है। सरल, सहज भाषा में बिलकुल आसपास घटित होती दिखनेवाली यह कहानी पाठकों को निश्चय ही पठनीय लगेगी।

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भ्रष्टाचार, जिसका विरोध करना भारतीय समाज का सबसे पसन्दीदा शगल है, दरअसल हमारी जीवन-शैली का हिस्सा बन चुका है। हर कोई दूसरे के भ्रष्टाचार से त्रस्त है और सबके पास अपने भ्रष्टाचार के पक्ष में देने के लिए अनेक व्यावहारिक तर्क हैं। जो भ्रष्ट नहीं है और जीवन के हर मोड़, हर क़दम पर सिर्फ़ सिद्धान्त रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उसका विरेाध करता है, उसे अस्वीकार करता है, वह ख़ुद-ब-ख़ुद समाज से निर्वासित महसूस करने लगता है।

इस उपन्यास का नायक मनोहर ऐसा ही व्यक्ति है जो किसी भी रूप में रिश्वत का समर्थन नहीं करता। इसके कारण, उसे न सिर्फ़ अपने दफ़्तर में अपने सवर्ण सहकर्मियों की उपेक्षा, उपहास और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है, बल्कि घर में उसकी पत्नी भी इसी कारण पहले उससे नाराज़ रहने लगती है, और फिर तनाव के चलते बीमार पड़ जाती है।

जयप्रकाश कर्दम ने इस उपन्यास में विस्तार से एक आदर्शवादी युवक के मानसिक और सामाजिक संघर्ष को दर्शाया है। साथ ही आरक्षण और उच्च स्तरों पर व्याप्त भ्रष्टाचार, जाति-व्यवस्था, जाति के आधार पर दफ़्तरी माहौल में फैले भेदभाव आदि को भी बारीकी से उभारा है। सरल, सहज भाषा में बिलकुल आसपास घटित होती दिखनेवाली यह कहानी पाठकों को निश्चय ही पठनीय लगेगी।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2019
Weight
156 grams
ISBN-13
9788183619165
Pages
136
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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