Vaidhanik Galp
(0)
Author:
Chandan PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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गहरी राजनैतिक, सामाजिक पक्षधरता का गद्य होते हुए भी चन्दन का ‘वैधानिक गल्प’ तीव्र आन्तरिक भावनाओं और संवेदनाओं का साथ नहीं छोड़ता। इस मुश्किल जगह से रचे जाने के बावजूद कमाल यह भी है कि यह गल्प के पारम्परिक तत्त्वों जैसे–रहस्य, रोचकता और अन्तत: पठनीयता को बचाए रखता है। प्यार, क्रूरता और प्रतिरोध चन्दन के यहाँ अपने सूक्ष्म और समकालीन रूपों में प्रकट होते हैं जो न सिर्फ़ चकित करता है बल्कि पाठक की चेतना में कुछ सकारात्मक जोड़ जाता है। </p> <p>—महेश वर्मा</p> <p> </p> <p>चन्दन पाण्डेय की लेखकी को समकाल के पूर्ण साहित्यिक विनियोग के रूप में देखा-रखा जा सकता है। चन्दन का कथाकार क़िस्से में ग़ाफ़िल नहीं, बल्कि सतर्क व अचूक है, जिससे समकाल के अद्यतन संस्करण का भी प्रवेश उनके कथादेश में सहज ही सम्भव है। कहन की साहिबी उन्हें ईर्ष्या का पात्र बनाती है। </p> <p>—कुणाल सिंह
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गहरी राजनैतिक, सामाजिक पक्षधरता का गद्य होते हुए भी चन्दन का ‘वैधानिक गल्प’ तीव्र आन्तरिक भावनाओं और संवेदनाओं का साथ नहीं छोड़ता। इस मुश्किल जगह से रचे जाने के बावजूद कमाल यह भी है कि यह गल्प के पारम्परिक तत्त्वों जैसे–रहस्य, रोचकता और अन्तत: पठनीयता को बचाए रखता है। प्यार, क्रूरता और प्रतिरोध चन्दन के यहाँ अपने सूक्ष्म और समकालीन रूपों में प्रकट होते हैं जो न सिर्फ़ चकित करता है बल्कि पाठक की चेतना में कुछ सकारात्मक जोड़ जाता है। </p>
<p>—महेश वर्मा</p>
<p> </p>
<p>चन्दन पाण्डेय की लेखकी को समकाल के पूर्ण साहित्यिक विनियोग के रूप में देखा-रखा जा सकता है। चन्दन का कथाकार क़िस्से में ग़ाफ़िल नहीं, बल्कि सतर्क व अचूक है, जिससे समकाल के अद्यतन संस्करण का भी प्रवेश उनके कथादेश में सहज ही सम्भव है। कहन की साहिबी उन्हें ईर्ष्या का पात्र बनाती है। </p>
<p>—कुणाल सिंह
Book Details
-
ISBN9789389577549
-
Pages142
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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गुजराती उपन्यास के क्षेत्र में सन् 1992 में ‘मीरा याज्ञिक नी डायरी’ (मीरा याज्ञिक की डायरी) एक बे-आवाज़ बग़ावत बनकर आई। बिन्दु भट्ट द्वारा पहली बार यहाँ रूढ़ियों और कामवर्जनाओं की बन्दिशों को तोड़कर बिना किसी मुखरता के सेल्फ़ सेन्सरशिप को उखाड़ फेंकने की दिशा में स्त्री-लेखन ने एक क़दम आगे बढ़ाया है। संवेदनशील-शिक्षित युवती के समलिंगी तथा विषमलिंगी काम सम्बन्धों की अन्तरंग और बेबाक अभिव्यक्ति, डायरी शैली की कलात्मक सार्थकता एवं पारदर्शी गद्य की ताज़गी ने सुज्ञ पाठक वर्ग का बरबस ध्यान खींचा। आज सर्वाधिक आलोचनात्मक लेखों का रिकॉर्ड ‘मीरां याज्ञिक की डायरी’ ने क़ायम किया है।
अपने लघु-कलेवर में ‘मीरा याज्ञिक की डायरी’ हमारी चेतना को अनेक स्तर पर छूते हुए विस्तार देती है। विश्वविद्यालय में शोधकार्य करती मीरा संवेदनशील और बौद्धिक है। ख़ालिस ख़ूबसूरती और भरपूर प्रेम की उसे तलाश है। इस तलाश में अपने समूचे अस्तित्व के साथ वह समस्त परिवेश, विविध पात्र और परिस्थितियों को सहज स्वीकार करती है। संवेदना के स्तर पर वह जो कुछ भी अनुभव करती है, उसे बिना किसी दम्भ-दावे और पूर्वाग्रह के, अपनी डायरी में सर्जनात्मक ढंग से दर्ज करती है। इसीलिए मीरा की डायरी में उसके भीतर-बाहर की प्रत्येक तरंग का विश्लेषणात्मक लेखा-जोखा है और उसकी भाषा में बिना किसी लाग-लपेट की अपूर्व ऐसी स्वाभाविकता। निर्मम होकर अपने आपको भी दाँव पर लगाती यह अन्तरंगता जीवन के साथ बड़े गहरे सरोकार से ही सम्भव है। इसके चलते यह डायरी केवल मीरा की नहीं रहती, बल्कि किसी भी संवेदनशील बौद्धिक चेतना का अंश बन जाती है। वृन्दा और उजास में भीतर तक पैठकर स्वयं अपने को पाने की मीरा की ख़तरनाक जद्दोजहद ‘मनुष्य’ मात्र की जद्दोजहद में बदल जाती है और हमें झकझोरती है।
Kaun Des Ko Vasi : Venu Ki Diary
- Author Name:
Suryabala
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प्रवासी भारतीय होना भारतीय समाज की महत्त्वाकांक्षा भी है, सपना भी है, कैरियर भी है और सब कुछ मिल जाने के बाद नॉस्टेल्जिया का ड्रामा भी। लेकिन कभी-कभी वह अपने आप को, अपने परिवेश को, अपने देश और समाज को देखने की एक नई दृष्टि का मिल जाना भी होता है। अपनी जन्मभूमि से दूर किसी परायी धरती पर खड़े होकर वे जब अपने आपको और अपने देश को देखते हैं तो वह देखना बिलकुल अलग होता है। भारतभूमि पर पैदा हुए किसी व्यक्ति के लिए यह घटना और भी ज़्यादा मानीख़ेज़ इसलिए हो जाती है कि हम अपनी सामाजिक परम्पराओं, रूढ़ियों और इतिहास की लम्बी गुंजलकों में घिरे और किसी मुल्क के वासी के मुक़ाबले क़तई अलग ढंग से ख़ुद को देखने के आदी होते हैं। उस देखने में आत्मालोचन बहुत कम होता है। वह धुँधलके में घूरते रहने जैसा कुछ होता है। विदेशी क्षितिज से वह धुँधलका बहुत झीना दीखता है और उसके पर बसा अपना देश ज़्यादा साफ़।
इस उपन्यास में अमेरिका-प्रवास में रह रहे वेणु और मेधा ख़ुद को और अपने पीछे छूट गई जन्मभूमि को ऐसे ही देखते हैं। उन्हें अपनी मिट्टी की अबोली कसक प्राय: चुभती रहती है—वे अपने परिवार जनों और उनकी स्मृतियों को सहेजे जब स्वदेश प्रत्यावृत्त होते हैं तो उनकी परिकर-परिधि में आए जन उनके रहन-सहन, आत्मविश्वास से प्रभावित होते हैं, किन्तु वेणु और मेधा के दु:ख, उदासी और अकेलापन नेपथ्य में ही रहते हैं। नई पीढ़ी की आकांक्षाओं में सिर्फ़ और सिर्फ़ बहुत सारा धनोपार्जन ही है ताकि एक बेहतर ज़िन्दगी जी सके, जबकि अमेरिका गए अनेक प्रवासी डॉलर के लिए भीतर ही भीतर कई संग्राम लड़ते हैं। कैरम की गोटियों को छिटका देनेवाली स्थितियाँ हैं, पर निर्मम चाहतें।
वरिष्ठ कथाकार सूर्यबाला का यह बृहत् उपन्यास एक विशाल फलक पर देश और देश के बाहर को उजागर करता है। इसका वितान जितना विस्तृत है उतना ही गझिन भी, मनुष्य-संवेदना और खोने-पाने की विकलताएँ जैसे यहाँ एक बड़े फ़्रेम में साकार हो उठी हैं।
Mangla Se Shayan Tak
- Author Name:
Achala Nagar
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'मैं इंसानियत में बसता हूँ/लोग मुझे मज़हबों में ढूँढ़ते हैं।’
ज़िन्दगी को आसान कर देनेवाला ये फ़लसफ़ा ही 'मंगला से शयन तक’ का मुख्य आधार है जिसे डॉ. अचला नागर ने इतने रोचक अन्दाज़ में कह दिया कि उपन्यास कहीं भी बोझिल नहीं हो पाता।
इस उपन्यास में वर्तमान और देश के विभाजन उपरान्त के तो ट्रैक एक साथ कहानियाँ सुना रहे हैं। वर्तमान में शहर के जाने-माने और लोकप्रिय गायक-संगीतकार उस्ताद रमजान अली ख़ान जिन्हें सभी प्यार से नन्हें भाई कहते हैं, जो ख़ुद को मज़हबे-इन्सानियत का नुमाइन्दा बतलाते हैं, क्योंकि उन्हें जन्म दिया एक मुसलमान माँ ने, अपना दूध पिला के ज़िन्दा रखा एक सिख महिला प्रकाश कौर ने, और पाल-पोस कर संगीत के इस मुकाम तक पहुँचाया हिन्दू महिला पद्ममश्री तारा शर्मा ने, जो हालात की भंवर में डूबते उतराते एक ख्यातिप्राप्त गायिका बन गई थी । अपने कथ्य और प्रभाव में बेहद महत्त्वपूर्ण उपन्यास।
Baton Mein Beete Din
- Author Name:
Namvar Singh
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‘बातों में बीते दिन’ पुस्तक नामवर सिंह के साक्षात्कारों का संकलन है। इस किताब में शामिल साक्षात्कारों का विषय क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। पेरेस्त्रोइका-ग्लासनोस्त और आधुनिकतावाद से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास और निजी जीवन तक। साहित्य और देश-दुनिया की नामवर जी की समझ का एक स्पष्ट प्रतिबिम्ब यहाँ मिलता है। उनकी विश्व-दृष्टि का रूपायन इन साक्षात्कारों में हुआ है। पुस्तक तीन खंडों में बँटी हुई है। मध्यम आकार के और विषय केन्द्रित साक्षात्कार पहले खंड में हैं। दूसरे खंड में रचनाकारों और रचनाओं पर केन्द्रित बातचीत है। प्रेमचन्द, सुमित्रानन्दन पंत, त्रिलोचन और अमृतराय तथा सुमित्रानन्दन पंत की कृति ‘गुंजन’ और कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’—इन साक्षात्कारों के केन्द्र में है। तीसरे खंड में महावीर अग्रवाल द्वारा लिये गए नौ साक्षात्कार हैं जो उनके निजी जीवन से लेकर आलोचना और विविध विषयों से सम्बन्धित हैं। आलोचना लिखित हो या वाचिक—उसके पीछे बुनियादी प्रक्रिया है—पढ़ना, विवेचना, विचारना। तर्क और संवाद। नामवर जी के इन साक्षात्कारों में इसका व्यापक समावेश है। इनसे गुजरते हुए हम महसूस करते हैं कि वह किसी रचना को हमेशा नई और अपनी तरह से पढ़ने की कोशिश करते हैं और इस तरह ‘पढ़ते’ हुए वे लगातार नई तरह से ‘सोचते’ और ‘विचारते’ हुए सामने आते हैं। उनकी वाचिक आलोचना मूल्यांकन की ऊपरी सीढ़ी तक पहुँचती है। निकष बनाती है। प्रतिमानों पर बहस करती है। उसमें ‘लिखित’ की तरह की ‘कौंध’ मौजूद होती है। नहीं होता तो बस पूरापन।
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