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Author:
S.K. Pottekkat, S. K. Pottekat, ArsuPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
175
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‘नादान प्रेमम्’ एक प्रतिष्ठित कथाकार का प्रथम उपन्यास है। रासायनिक स्वादों से साहित्य को दूर रखने का ख़याल एस.के. पोट्टेक्काट्ट ने हमेशा रखा। आम आदमी के जीवन की परिस्थितियों को विषय-वस्तु बनाकर विशिष्ट कृतियाँ लिखने में वे सव्यसाची-सरीखे थे। ‘नादान प्रेमम्’ गाँव-देहात की मुहब्बत की दास्तान है। लेखक के लिए चिर-परिचित गाँव मुक्कम तथा उधर की इरुवषमि नदी का परिवेश उपन्यास की सहजता को बढ़ाता है। इक्कोरन और मालू इसके मुख्य पात्र हैं। छल-कपट से मुक्त प्रेमिका के दिल की धड़कन का वर्णन मार्मिक है। क्या नादान होना ख़तरनाक है? यह सन्देश भी उपन्यास पढ़ते समय पाठकों के मन में सहज ही उभर आएगा। रोचक कथानक, सहज परिवेश, ग्रामीण पात्र, पात्रानुकूल भाषा, लोकजीवन के बिम्ब आदि इस उपन्यास की ख़ूबियाँ हैं। आलोचक प्रवर प्रो. के.एम. तरकन ने इस उपन्यास का मूल्यांकन ग्रामांचल में घटित होनेवाले ‘शाकुन्तल’ के रूप में किया है। उपन्यासकार ने ‘नादान प्रेमम्’ को अपनी पहली सन्तान का दर्जा दिया है। गौण प्रसंगों में भी गम्भीरता के बीजों को तलाशने की प्रवृत्ति यहाँ द्रष्टव्य है। यह उपन्यास प्रेम की निष्ठा को उजागर करता है, लेकिन कभी निष्ठा का परिणाम धोखा भी होता है। मानवता के उत्कर्ष की वकालत करनेवाले लेखक की एक अनुपम कृति है ‘नादान प्रेमम्’।
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‘नादान प्रेमम्’ एक प्रतिष्ठित कथाकार का प्रथम उपन्यास है। रासायनिक स्वादों से साहित्य को दूर रखने का ख़याल एस.के. पोट्टेक्काट्ट ने हमेशा रखा। आम आदमी के जीवन की परिस्थितियों को विषय-वस्तु बनाकर विशिष्ट कृतियाँ लिखने में वे सव्यसाची-सरीखे थे।
‘नादान प्रेमम्’ गाँव-देहात की मुहब्बत की दास्तान है। लेखक के लिए चिर-परिचित गाँव मुक्कम तथा उधर की इरुवषमि नदी का परिवेश उपन्यास की सहजता को बढ़ाता है। इक्कोरन और मालू इसके मुख्य पात्र हैं। छल-कपट से मुक्त प्रेमिका के दिल की धड़कन का वर्णन मार्मिक है। क्या नादान होना ख़तरनाक है? यह सन्देश भी उपन्यास पढ़ते समय पाठकों के मन में सहज ही उभर आएगा। रोचक कथानक, सहज परिवेश, ग्रामीण पात्र, पात्रानुकूल भाषा, लोकजीवन के बिम्ब आदि इस उपन्यास की ख़ूबियाँ हैं।
आलोचक प्रवर प्रो. के.एम. तरकन ने इस उपन्यास का मूल्यांकन ग्रामांचल में घटित होनेवाले ‘शाकुन्तल’ के रूप में किया है।
उपन्यासकार ने ‘नादान प्रेमम्’ को अपनी पहली सन्तान का दर्जा दिया है। गौण प्रसंगों में भी गम्भीरता के बीजों को तलाशने की प्रवृत्ति यहाँ द्रष्टव्य है। यह उपन्यास प्रेम की निष्ठा को उजागर करता है, लेकिन कभी निष्ठा का परिणाम धोखा भी होता है। मानवता के उत्कर्ष की वकालत करनेवाले लेखक की एक अनुपम कृति है ‘नादान प्रेमम्’।
Book Details
-
ISBN9789389742886
-
Pages73
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल रचना है। प्रस्तुत उपन्यास उक्त महाकाव्य की कथावस्तु पर आधारित पहली हिन्दी कृति है, जिसमें दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण हुआ है। तत्कालीन पृष्ठभूमि को सँजोने में लेखक ने इतिहास-ग्रन्थों का अवगाहन करके अपने चित्रणों को यथासम्भव प्रामाणिक बनाने की चेष्टा की है और इस प्रकार उक्त महाकाव्य पर आधारित होते हुए भी यह प्रायः एक स्वतंत्र रचना बन गई है। स्वयं लेखक के शब्दों में : ‘‘घिसी-पिटी थीम होने पर भी पापुलर उपन्यास के लिए मुझे वह अच्छी लगी; मैं अपने दृष्टिकोण से उसमें नवीनता देख रहा था।’’ मिली-जुली सरल भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का यह छठा संस्करण पाठकों के सामने है, जो इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।
Ateet Ke Chalchitra
- Author Name:
Mahadevi Verma
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‘अतीत के चलचित्र’ हिन्दी गद्य की एक अप्रतिम रचना है। इतने दिनों बाद आज भी संवेदना के वे धरातल अछूते और अपूर्व हैं जिनकी सृष्टि इन रेखाचित्रों द्वारा हुई थी। मानवीय सहानुभूति और संवेगों की गहनता के लिए इन्हें चिरकाल तक हिन्दी साहित्य का शीर्षस्थ पद प्राप्त रहेगा।
Bhartrihari : Kaya Ke Van Mein
- Author Name:
Mahesh Katare
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राजा भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि और योगी भर्तृहरि। उनके आयाम, समय और देश का अपार विस्तार। भर्तृहरि के जीवन में एक ओर प्रेम और कामिनियों के आकर्षण हैं तो दूसरी ओर वैराग्य का शान्ति-संघर्ष। वह संसार से बार-बार भागते हैं, बार-बार लौटते हैं। इसी के साथ उनके समय की सामाजिक, धार्मिक उथल-पुथल भी जुड़ी है। भर्तृहरि का द्वन्द्व सीधे गृहस्थ व वैराग्य का न होकर तिर्यक है। विशेष है। वह इसलिए कि वे कवि हैं, वैयाकरण भी। सुकवि अनेक होते हैं तथा विद्वान भी लेकिन भर्तृहरि जैसे सुकवि और विद्वान एक साथ बिरले ही होते हैं। सुपरिचित कथाकार महेश कटारे का यह उपन्यास इन्हीं भर्तृहरि के जीवन पर केन्द्रित है। इस व्यक्तित्व को, जिसके साथ असंख्य किंवदन्तियाँ भी जुड़ी हैं, उपन्यास में समेटना आसान काम नहीं था, लेकिन लेखक ने अपनी सामर्थ्य-भर इस कथा को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया है। भर्तृहरि के निज के अलावा उन्होंने इसमें तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का भी अन्वेषण किया है। उपन्यास के पाठ से गुज़रते हुए हम एक बार उसी समय में पहुँच जाते हैं। भर्तृहरि के साथ दो बातें और जुड़ी हुई हैं—जादू और तंत्र-साधना। लेखक के शब्दों में, ‘मेरा चित्त अस्थिर था, कथा के प्रति आकर्षण बढ़ता और भय भी, कि ये तंत्र-मंत्र, जादू-टोने कैसे समेटे जाएँगे? भाषा भी बहुत बड़ी समस्या थी कि वह ऐसी हो जिसमें उस समय की ध्वनि हो।’ इतनी सजगता के साथ रचा गया यह उपन्यास पाठकों को कथा के आनन्द के साथ इतिहास का सन्तोष भी देगा।
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