Meghalay Ki Lokkathayen
(0)
Author:
Madhavendra, Smt. ShrutiPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
This book has no description
Read moreAbout the Book
This book has no description
Book Details
-
ISBN9789355210517
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Narakkund Mein Baas
- Author Name:
Jagdish Chandra
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Buddh Nirvan Ki Raah Par
- Author Name:
Shiv K. Kumar
- Book Type:

-
Description:
बुद्ध के जीवन पर आधारित इस उपन्यास में बुद्ध के सभी सिद्धान्तों को कथा-सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया गया है, जिन्हें बुद्ध के बुद्धत्व की थाती माना गया। सहज, जीवन से जुड़ी भाषा में लिखा गया उपन्यास बुद्ध या उनके दर्शन को लेकर कोई विमर्श खड़ा करने का प्रयास न करके उनकी जीवन की घटनाओं के साथ भौतिक संसार से शनै:-शनै: उनके मोहभंग को दिखाता हुआ उनकी निर्वाण-यात्रा के पथ को पुन: आलोकित करता है। वह भी इतनी सहज गति के साथ कि कहीं-कहीं वह आपको अपनी ही यात्रा लगने लगती है।
यह उपन्यास के सहजता के ही कारण है कि इसे पढ़ते हुए हमारे मन में अपने आसपास व्याप्त हिंसा, असहिष्णुता और पौरुष के निकृष्टतम संस्करणों का सर्व-स्वीकृत प्रचलन चकित करने लगता है। किसी भी विभूति के जीवन को आधार बनाकर लिखे गए उपन्यास की सबसे बड़ी सफलता यही मानी जानी चाहिए कि वह तर्कों के नहीं, संवेदना के स्तर पर हमें कितना उस व्यक्ति के जीवन और प्रतिश्रुतियों से जोड़ता है। इस अर्थ में यह सर्वथा सफल उपन्यास है।
Gahri Nadiya Naav Purani
- Author Name:
Ushakiran Khan
- Book Type:

-
Description:
पुनकला को नहीं मालूम कि उसने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर, और लीला को अपने यहाँ शरण देकर कितना बड़ा काम किया। उसका सारा जीवन एक मैनेजर की तरह बीत गया। उसने कर्त्तव्य को टाला नहीं, और प्रेम को भी मन भरकर जिया, लेकिन बस मन में ही भरकर, जो उसे मिला वह ऐसा नहीं था जो सिर्फ उसका हो।
वह दरअसल समय था, अपनी गति से खिलता-बढ़ता समय जिसमें सब शामिल थे : समाज बदलने के अपने बड़े सपने को पूरा करने के लिए उसे छोड़कर गया उसका पति सुधीर हजारी; छीतन हजारी जिसने उसके बाद उसे अपने घर की मालकिन बनाया और अपने बच्चों की माँ; उसके बच्चे जिन्होंने उसे अपनी माँ ही माना; लीला, जिसने उसके आँचल तले ठौर पाया; और वह काल जिस की विराट गोद में बच्चे पल रहे थे, बड़े हो रहे थे, फिर उनके बच्चे; धरती जो धीरे-धीरे थिर हो रही थी, बंजर से उपजाऊ; शिक्षा जो सदियों से पीड़ित-प्रताड़ित जनगण को आगे बढ़ने का रास्ता दे रही थी। यह सब दादी पुनकला का था।
बिहार के देश-काल में अवस्थित इस उपन्यास का जेपी आन्दोलन और आपातकाल का दौर है; लेकिन कथा यह बिहार के पिछड़े दलित समाज की और उसके तेजी से बदलते सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक ढांचे की है। वहाँ बाढ़ है, गरीबी है, गुंडई है, लेकिन सपने भी हैं, बदलाव की आकांक्षा भी है, वे युवा भी हैं जिनमें शिक्षा की, आगे बढ़ने की, और बदलाव की गहरी तलब है, जो अपने सपनों को अपनी ही धरती में बोना चाहते हैं।
दादी पुनकला ने बहुत धीमे समय को भी देखा है, और अब इस वक्त को भी देख रही है। उनके पास सब कुछ है, लेकिन सुधीर हजारी नहीं। और सुधीर हजारी जो पहले नक्सल होते हैं, फिर जेपी के साथ जुड़ते हैं, और आपातकाल के बाद अपने गाँव आकर अपने लोगों को दिशा देते हैं; उनके पास भी सभी कुछ है, लेकिन पुनकला नहीं, जो आठ-नौ साल की उम्र में उनकी पत्नी बनी थी, और जवानी में कदम रखते ही जिसे उन्होंने मुक्त कर दिया था। दोनों के बीच बदलाव का एक बड़ा हलचल-भरा फलक है लेकिन वे दोनों आज भी वहीं खड़े हैं जहाँ अलग हुए थे।
Dhamam Sharanam
- Author Name:
Suresh Kant
- Book Type:

-
Description:
धर्म यदि राजनीति को नियंत्रित-निर्देशित करने लगे अथवा राजनीति ही धर्म की आड़ में अपना खेल खेलने लगे तो हिंसा निश्चय ही उसका अनिवार्य परिणाम होगी। सुपरिचित कथाकार सुरेश कांत ने इस उपन्यास के माध्यम से इसी सत्य को रेखांकित किया है।
इसके लिए लेखक ने प्रियदर्शी अशोक की मृत्यु (ई.पू. 236) के क़रीब सौ वर्ष बाद का समय चुना है, जबकि सम्पूर्ण उत्तर-पश्चिमी भारत यूनानी आक्रमणों का शिकार था और मगध साम्राज्य का महान सेनानी पुष्यमित्र मौर्यवंश के अस्तप्राय गौरव की पुनर्स्थापना में लगा हुआ था, जैन धर्म का अभी प्रादुर्भाव ही हुआ था और पतनशीलता के गर्त में पड़ा हुआ बौद्ध धर्म अहिंसा के नाम पर अपनी सर्वाधिक हिंसक एवं राष्ट्रविरोधी भूमिका में था। इस पृष्ठभूमि में लेखक ने धर्म और राजनीति के अन्तर्सम्बन्धों का गम्भीर विवेचन किया है और राष्ट्रीय स्वाभिमान के सन्दर्भ में हिंसा तथा अहिंसा की सार्थकता का सवाल उठाया है। उसके पास इतिहास को देखने की एक लोकोन्मुख दृष्टि है और उसे एक रोचक कथा-फलक प्रदान करने की रचनात्मक क्षमता भी।
वस्तुतः लेखक की यह ऐतिहासिक कथाकृति तथाकथित ‘धर्म’ के उस भयावह चेहरे को उघाड़ती है, जो प्रायः अनदेखा रह जाता है और यह कार्य उसने कुछ इस कुशलता से किया है कि वर्तमान भारत में राजनीति करनेवाली धर्मोन्मादी शक्तियाँ—मठ और मन्दिर—अनायास हमारे सामने नग्न हो उठती हैं। हम उन धर्म-स्थानों और धर्म-गुरुओं को पहचान जाते हैं, जो जेतवन-विहार के विशाल चैत्य और संघ-स्थविर मोग्गलान-जैसे लोगों की शक्ल में यहाँ आज भी सक्रिय हैं। कहना न होगा कि इस कृति में रूपायित अतीत हमारे वर्तमान का ही एक चिन्तनीय अध्याय है।
Sadabahar Kahaniyan : Lu Xun
- Author Name:
Lu Xun
- Book Type:

- Description: लू शुन 1881-1936 लू शुन विश्वप्रसिद्द आधुनिक चीनी लेखक हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में आम लोगों की जिंदगी का यथार्थपरक चित्रण किया। उनकी इस शैली ने दुनिया भर के लेखकों को प्रभावित किया। दुनिया भर की भाषाओं में उनकी कहानियों का अनुवाद भी हुआ। वह आलोचक, व्याख्याता, अनुवादक, कवि, निबंधकार और प्रतिष्ठित राज्य सेवक भी थे। वह सच्चे अर्थों में जनता के लेखक थे। उन्होंने जनता की चेतना को और साफ़ करने के साथ जनता के लिए अनगिनत लेखक तैयार कर दिए।
Hamara Shahar Us Baras
- Author Name:
Geetanjali Shree
- Book Type:

-
Description:
आसान दीखनेवाली मुश्किल कृति ‘हमारा शहर उस बरस’ में साक्षात्कार होता है एक कठिन समय की बहुआयामी और उलझाव पैदा करनेवाली डरावनी सच्चाइयों से। बात ‘उस बरस’ की है, जब ‘हमारा शहर’ आए दिन साम्प्रदायिक दंगों से ग्रस्त हो जाता था। आगजनी, मारकाट और तद्जनित दहशत रोज़मर्रा का जीवन बनकर एक भयावह सहजता पाते जा रहे थे। कृत्रिम जीवन-शैली का यों सहज होना शहरवासियों की मानसिकता, व्यक्तित्व, बल्कि पूरे वजूद पर चोट कर रहा था।
बात दरअसल उस बरस भर की नहीं है। उस बरस को हम आज में भी घसीट लाए हैं। न ही बात है सिर्फ़ हमारे शहर की। ‘और शहरों जैसा ही है हमारा शहर’—सुलगता, खदकता—‘स्रोत और प्रतिबिम्ब दोनों ही’ मौजूदा स्थिति का। एक आततायी आपातस्थिति, जिसका हल फ़ौरन ढूँढ़ना है; पर स्थिति समझ में आए, तब न निकले हल। पुरानी धारणाएँ फिट बैठती नहीं, नई सूझती नहीं, वक़्त है नहीं कि जब सूझें, तब उन्हें लागू करके जूझें स्थिति से। न जाने क्या से क्या हो जाए तब तक। वे संगीनें जो दूर हैं उधर, उन पर मुड़ीं, वे हम पर भी न मुड़ जाएँ, वह धूल-धुआँ जो उधर भरा है, इधर भी न मुड़ आए।
अभी भी जो समझ रहे हैं कि दंगे उधर हैं—दूर, उस पार, उन लोगों में—पाते हैं कि ‘उधर’ ‘इधर’ बढ़ आया है, ‘वे’ लोग ‘हम’ लोग भी हैं, और इधर-उधर वे-हम करके ख़ुद को झूठी तसल्ली नहीं दी जा सकती। दंगे जहाँ हो रहे हैं, वहाँ ख़ून बह रहा है। सो, यहाँ भी बह रहा है, हमारी खाल के नीचे।
अपनी ही खाल के नीचे छिड़े दंगे से दरपेश होने की कोशिश ही इस गाथा का मूल। ख़ुद को चीरफाड़ के लिए वैज्ञानिक की मेज़ पर धर देने जैसा। अपने को नंगा करने का प्रयास ही अपने शहर को समझने, उसके प्रवाहों को मोड़ देने की एकमात्र शुरुआत हो सकती है। यही शुरुआत एक ज़बरदस्त प्रयोग द्वारा गीतांजलि श्री ने ‘हमारा शहर उस बरस’ में की है। जान न पाने की बढ़ती बेबसी के बीच जानने की तरफ़ ले जाते हुए।
Trimurti
- Author Name:
R. S. Kelkar
- Book Type:

-
Description:
यह आज़ादी के कुछ बरसों बाद की दिल्ली है और दिल्ली का सत्ता-तंत्र। स्वतंत्रता के लिए चले लम्बे संघर्ष, अनेक लोगों की क़ुर्बानी के बाद हासिल हुई गद्दियों का निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करते नेताओं, उनके छुटभैयों, टुटपुँजिया व्यवसायियों की कलुष-क्रीड़ा।
र.श. केलकर ने इस छोटे से उपन्यास में जिस दुनिया का चित्र खींचा है, भारतीय लोकतंत्र को उसके बहुत बाद तक भुगतने थे। कौड़ीमल एम.पी. हों, उनके लिए प्राइवेट सेक्रेटरी के तौर पर काम करनेवाली प्रतिभा हो, लाला रामभरोसे हों, या अन्य पात्र, धीर-धीरे इन सबको
व्यक्तियों के बजाय पतन के प्रतीक बन जाना था।
लाइसेंसों, ठेकों, ज्योतिषियों, बिना रीढ़ के बुद्धिजीवियों और धन के परजीवियों की एक पूरी दुनिया इस उपन्यास में हमें दिखाई देती है।
उपन्यास में ख़ास तौर पर देखने लायक़ है—दिल्ली की सड़कों-गलियों-बाज़ारों आदि का विवरण देनेवाली लेखक की भाषा जो एक कैमरे की तरह एक-एक चीज़ का विवरण देती चलती है। शब्द चित्र हो उठते हैं, और लेखक नि:संगतापूर्वक कहानी को उनके बीच से आगे लिए जाता है।
Shaalgirah Ki Pukar Per
- Author Name:
Mahashweta Devi
- Book Type:

-
Description:
हिन्दुस्तान में गोराशाही लूट पर टिकी थी। व्यापार करने आई ईस्ट इंडिया कम्पनी ने लूट-व्यापार को स्थायी बनाने के लिए षड्यंत्र और सैनिक हस्तक्षेप के ज़रिए 1757 में प्लासी-युद्ध में जीत के बाद सत्ता हाथ में ले ली। मगर रियाया पर प्रभुत्व स्थापित करना आसान न था। गोरों के ख़िलाफ़ असन्तोष फैलने लगा था। मुनाफ़े के लिए गोरे अकाल और भूख की तिजारत कर रहे थे। अपने शासन-क्षेत्र का विस्तार कर रहे थे। बिहार-बंगाल के जंगल के दावेदार संथालों से अपना लोहा मनवाने और उनकी स्वतंत्र-प्रवृत्ति पर क़ाबू पाने के लिए गोरों ने जंगल-उत्पादों, धान-चावल की ख़रीद शुरू की। गोरों ने बाज़ार को हथियार बनाया। संथाल भड़क उठे और विद्रोह की कमान सँभाली संथाल परगना के आदि विद्रोही तिक्का माँझी ने।
संथाल जीवन और गोरों के विरुद्ध उनके ऐतिहासिक संग्राम की गाथा दर्ज है। ‘शाल-गिरह की पुकार’ में प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की प्रखर लेखनी से। यह न केवल इतिहास है बल्कि हर भारतीय के लिए गौरव-स्मृति भी है।
Nati
- Author Name:
Mahashweta Devi
- Book Type:

-
Description:
बंगाल की प्रसिद्ध उपन्यासकार महाश्वेता देवी की चमत्कारी लेखनी से हिन्दी पाठक पूर्णरूपेण परिचित हो चुके हैं। ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ और ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित महाश्वेता देवी की कृति ‘नटी’ पढ़कर पाठक एक बार फिर चौकेंगे।
करीब सवा सौ साल पहले की संगीत-सभा, मुजरा-गोष्ठी, भारतीय स्वातंत्र्य-संग्राम की प्रथम चिनगारी और संघर्ष के वातावरण के बीच मोती नाम की एक नर्तकी की प्रेरणादायक भूमिका का यह इतिहास-खंड एक नई दुनिया की ही सृष्टि करता है। मोती अद्वितीय सुन्दरी थी, अपूर्व नर्तकी, ख़ूब मोहक। लेकिन राजाओं-महाराजाओं के बीच मुजरा करके उनका मनोरंजन करते-करते स्वयं ही एक सिपाही ख़ुदाबख़्श की प्रेयसी बन उसे सारा जीवन संन्यासिनी होकर क्यों बेचैन रहना पड़ा, इसी की कथा है यह—नटी।
रंग, रेशम, जरी, जेवर और वेणी में तूफ़ान भरकर अनेक मजलिसों से घिरी, घुँघरुओं की झंकार पर थिरकती मोती जब घाघरे का एक वृत्त बनाकर बैठ गई तो उसका सीमाहीन जीवन ख़ुदाबख़्श की एकान्त प्रेम-परिधि में कैसे बँध गया, क्यों? ख़ुदाबख़्श के वक्ष के अतिरिक्त मोती के लिए छिपने का कहीं स्थान नहीं बचा क्यों...क्यों? रंगीन जीवन की अनेकानेक रहस्यमय परतों को एक-एक कर खोलनेवाली और पग-पग पर पाठकों को चौंकानेवाली ‘नटी’ की यह अनुपम कथा एक अनुपम साहित्यिक उपलब्धि है।
Disguise
- Author Name:
Samuel Dharmendar
- Book Type:

- Description: A smart young woman is brutally attacked by two hitmen on a gloomy winter night. A compassionate surgeon rescues the victim, identifying her as tarsha. After recuperating, she tries to get to the root of the assault. However, in her quest to avenge herself, she stumbles upon a string of human right trespasses committed in various orphanages. Hurled into a world of deceit, life takes tarsha through a mind-boggling train of events that unveils the truth.
Jan Nayak Krishna
- Author Name:
Virendra Sarang
- Book Type:

-
Description:
वीरेन्द्र सारंग का यह नया उपन्यास इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि यह महाभारत काल और कृष्ण से जुड़े मिथकों को एक नई दृष्टि से देखता है। इसका असली सार कृष्ण के उस जननायक रूप का है जिसे बाक़ायदा राजनीति के तहत नन्द और वासुदेव समर्थकों ने उनके बचपन से ही मिथकीय रूप दिया ताकि कंस के ख़िलाफ़ जनता को एकजुट किया जा सके। कंस असुर है जो देवताओं और आर्यों के चंगुल में फँसकर क्रूर और तानाशाह हो गया है। उग्रसेन नाक़ाबिल और कमज़ोर राजा हैं जिन्हें हटाकर कंस राजा बनता है ताकि अपनी अनार्य संस्कृति की रक्षा की जा सके, जो मूलत: गोपालक और कृषक जाति है। देवता आर्य संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं जो मूलत: उपभोग की संस्कृति है।
इस उपन्यास की ख़ासियत यह है कि मिथकों में जिनको राक्षसों का रूप दिया जाता है, लेखक ने बहुत यथार्थवादी दृष्टि से उनका मानवीकरण कर दिया है, उनके सुख-दु:ख का भी। उपन्यास का सबसे दिलचस्प हिस्सा कृष्ण के बुढ़ापे का है जब सब कुछ उनके हाथ से निकल जाता है। द्वारका में अराजकता फैल चुकी है और कृष्ण बहुत अकेले पड़ गए हैं। वे अपनी झोली लेकर द्वारका छोड़ देते हैं। उनकी मृत्यु का प्रसंग और भी दारुण है। क्या हर क्रान्ति का यही हश्र होता है? शायद यह सत्ता का चरित्र है जो किसी को भी निरंकुश बना देती है। जिस शान्ति के लिए कृष्ण द्वारका आए, वह अराजक हो गई। उनकी अपनी ही सन्तानें उनके ख़िलाफ़। कुल मिलाकर यह उपन्यास कृष्ण-कथा का नया और दिलचस्प भाष्य प्रस्तुत करता है जो बेहद पठनीय है।
Miss You Bruzo
- Author Name:
Tanishi Sharma
- Book Type:

- Description: जी, हाँ...। ब्रूज़ो एक पालतू डॉगी है। किताब इसके इर्द-गिर्द ही घूमती है। दिल्ली की रहने वाली एक छोटी लड़की की ब्रूज़ो से मुलाक़ात हिमाचल प्रदेश के ख़ूबसूरत शहर धर्मशाला में होती है। ब्रूज़ो का साथ उसकी चाहत को पूरा करता है। जब वह दिल्ली में रहती थी, तो अक्सर अपनी माँ से एक डॉगी को घर पर रखने की माँग करती थी। लेकिन उसकी माँ उसकी इस इच्छा को हमेशा नज़रअंदाज़ करती रहीं। कोरोना के पहले दौर में, जब महामारी का भय चरम पर था, तब वह सपरिवार धर्मशाला शिफ्ट हो जाती है। वह जिस घर में रहती है, उसके मकान मालिक के पालतू कुत्ते का नाम ब्रूज़ो है। दस साल की छोटी लड़की ब्रूज़ो के साथ ख़ूब खेलती और उसके साथ काफी समय बिताती। लेकिन यह ख़ुशी थोड़े दिनों के लिए ही रहती है..। यह उपन्यास हिंदी बाल साहित्य की दुनिया में एक नई शुरुआत है।
Apni Zamin
- Author Name:
Shantinath Desai
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Questions - A Poetry Collection
- Author Name:
Ajay Gupta
- Book Type:

- Description: The Author has generally examined the set of experiences too, it's a finished bundle in itself, it keeps occupied with its assortment. It never allows you to hold the hand under the jawline, you are consistently on the edge of the seat and you figure how could he do that. They start from Contemporary tennis to Ram Jethmalani it's anything but a decent visual of various pieces of the world. It has split between loads of areas as opposed to naming them as pages. The general move towards the lovely adventure and the author has ostentatiously portrayed the wonderful quintessence of him in his first book This book should be read by all.
Chhal
- Author Name:
Achala Nagar
- Book Type:

-
Description:
रेडियो नाटक, फ़िल्मों और धारावाहिक आदि माध्यमों की विख्यात सृजनकर्मी अचला नागर का यह पहला उपन्यास है। इस उपन्यास में उन्होंने परिवार और व्यवसाय की एक सहयोगी संरचना को आधार बनाते हुए एक ओर पीढ़ियों के संघर्ष को रेखांकित किया है, तो दूसरी तरफ़ विश्वास और भरोसे पर जीवित शाश्वत मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है।
कथा के केन्द्र में एक व्यवसायी परिवार है जिसने व्यवसाय का एक सहयोग-आधारित ढाँचा खड़ा किया है, जहाँ व्यवसाय के सब फ़ैसले सहयोगियों की राय से लिए जाते हैं, लेकिन नई पीढ़ी के कुछ लोगों को यह तरीक़ा बहुत रास नहीं आता जिसका परिणाम परस्पर छल, अविश्वास और पारिवारिक मूल्यों के विघटन में होता है। लेकिन जल्दी ही उन्हें अपनी भूल का अहसास होता है, और परिवार तथा परस्पर सौहार्द के जिस ढाँचे पर ग्रहण लगने लगा था, वह वापस अपनी आभा पा लेता है।
उपन्यास की विशेषता इसका कथा-रस है जो इधर के उपन्यासों में अक्सर देखने को नहीं मिलता। बिना किसी चमत्कारी प्रयोग के कथाकार ने सरल ढंग से अपनी कहानी कहते हुए अपने यथार्थ पात्रों को साकार और जीवित कर दिया है।
Kuchh Alpa Viraam
- Author Name:
Sachchidanand Joshi
- Book Type:

- Description: ‘कुछ अल्प विराम’ को साहित्य की किसी एक विधा के खाँचे में डालकर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह विधाओं की परिधि को तोड़कर जिंदगी की सच्चाई से सीधा संबंध जोड़ती है। इसमें जीवन के उन सभी छोटे-बड़े प्रसंगों को इकट्ठा करने की कोशिश की है, जो गुदगुदाते हैं, हँसाते हैं, रुलाते हैं, कभी हल्की सी चपत लगाते हैं और कभी चिकोटी काट लेते हैं। सबकुछ उतना ही जितना जरूरी है, हमें हमारी असमय नींद या तंद्रा से जगाने के लिए काफी है। कभी लघुकथा के माध्यम से, तो कभी किस्से के माध्यम से और कभी-कभी संस्मरण के माध्यम से। जरूरी नहीं कि जिंदगी का हर सबक, हर समय किसी भारी भरकम शास्त्रीय किताब से ही सीखा जाए। जिंदगी के छोटे से प्रसंग भी कई बार बड़ा सबक सिखा जाते हैं। ऐसे ही प्रसंगों को जो हमारे जीवन में अल्प विराम की तरह हैं, बेहद सरल भाषा और सहज शैली में सँजोकर प्रस्तुत करने की कोशिश है, ‘कुछ अल्प विराम’।
Mukhara Kya Dekhe
- Author Name:
Abdul Bismillah
- Book Type:

-
Description:
‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ (1986) के प्रकाशन के ठीक दस वर्षों बाद आनेवाला अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह उपन्यास अपनी महाकाव्यात्मक गरिमा के साथ एक ऐसे मुखड़े का रहस्योद्घाटन कर रहा है जो बाहर से बहुत भव्य है, पर भीतर से अत्यन्त कुरूप। ‘मुखड़ा क्या देखे’ की कथा भारतीय स्वाधीनता के कुछ बाद से लेकर इमरजेंसी तक फैली हुई है। इस पूरे दौर में देश के भीतर घटित सारी घटनाओं की छाप ग्रामीण जीवन पर किस रूप में पड़ी, उपन्यास की नींव इसी प्रश्न पर डाली गई है। लेखक यह स्पष्ट करता है कि देश-दुनिया में घटनेवाली बड़ी-बड़ी घटनाओं को बुद्धिजीवी और इतिहासकार जिस रूप में देखते हैं, गाँव के सामान्य लोग उसी रूप में नहीं देखते। उनके विचार और निष्कर्ष भले ही ग़लत होते हों, पर होते हैं ठोस। निस्सन्देह ‘मुखड़ा क्या देखे’ ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, लेकिन इसमें भारतीय इतिहास के अनेक बिन्दुओं की ऐसी व्याख्या है, जो इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलेगी।
‘मुखड़ा क्या देखे’ उपन्यास किसी विशेष गाँव या विशेष पात्रों की कथा न होकर सामान्य भारतीय जनमानस की कथा है। इस उपन्यास को बहुसंख्यक अथवा अल्पसंख्यक समाज की दृष्टि से भी नहीं देखा जा सकता। भारतवर्ष बहुजातीय, बहुधार्मिक और बहुभाषायी देश है। हिन्दी में ऐसे अनेक उपन्यास आए हैं, जो या तो बहुसंख्यक समाज की कहानी कहते हैं या फिर अल्पसंख्यक समाज की, लेकिन ‘मुखड़ा क्या देखे’ समग्र भारतीय समाज की कहानी कहता है, जिसमें सम्पन्न वर्ग के हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर हिन्दू ‘परजा’ और मुसलमान ‘परजा’ का शोषण करते हैं।
अब्दुल बिस्मिल्लाह के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जिस विषय पर लिखते हैं, उसमें आकंठ डूब जाते हैं। यही कारण है कि इस उपन्यास में जिस प्रामाणिकता के साथ उन्होंने मुसलमान रीति-रिवाज़ों का चित्रण किया है, उसी प्रामाणिकता के साथ हिन्दू और ईसाई समुदाय के रीति-रिवाज़ों का भी। अर्थात् पिछले बीस वर्षों में आए हिन्दी उपन्यासों में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि हिन्दी में लिखा गया यह उपन्यास समूचे भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी अन्तर्वस्तु और शिल्प पर ठेठ देसी रंगों एवं संस्कारों की गहरी छाप है।
Dashkriya
- Author Name:
Baba Bhand
- Book Type:

-
Description:
दशक्रिया’ मराठी के प्रख्यात कथाकार बाबा भांड के इसी नाम से मराठी में प्रकाशित उपन्यास का अनुवाद है। इस उपन्यास में लेखक ने भानुदास नामक एक किशोर चरित्र को केन्द्र में रखकर समाज की जड़ रूढ़िवादिता, जाति व्यवस्था, निर्धनता आदि के आवरण में छुपे मनुष्यता के करुण चेहरों और विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय जिजीविषा और साहस की प्रज्ज्वलित ज्योति को रेखांकित किया है।
मृत्यु और शव के अन्तिम संस्कारों से अपनी जीविका अर्जित करनेवाले एक समुदाय के माध्यम से उपन्यासकार इस पुस्तक में वर्गों और वर्णों में बँटे भारतीय समाज का एक प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करता है।
तटस्थ और यथार्थवादी शैली में प्रामाणिक वर्णनों से भरपूर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कृति।
—भूमिका से
Hindi Ki Manak Vartani
- Author Name:
Dr. K.C. Bhatia +1
- Book Type:

- Description: "हिंदी की मानक वर्तनी—कैलाशचंद्र भाटिया प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी के तीन अत्यधिक व्यावहारिक पक्षों को रखा गया है—वर्तनी, विरामचिह्न तथा प्रूफ-संशोधन। उक्त तीनों पक्ष एक-दूसरे से इतने अधिक संबद्ध हैं कि पृथक् करने में कठिनाई है। प्रूफ-संशोधन में जहाँ वर्तनी का शुद्ध रूप रखना पड़ता है, वहीं विरामचिह्नों के ठीक प्रयोग का। ‘मानक हिंदी वर्तनी’ का कार्यक्षेत्र केंद्रीय हिंदी निदेशालय का है, जिनकी सिफारिशों को इसमें समुचित स्थान दिया गया है। वर्तनी का क्षेत्र मात्र शब्दों तक नहीं है, उसमें संक्षिप्त रूप, प्रतीक, व्यक्ति-स्थान नामों का अपार भंडार है। वर्तनी से ही विरामचिह्न जुड़े हुए हैं। यह सर्वविदित है कि पूर्ण विराम ‘।’ के अतिरिक्त सभी चिह्न अंग्रेजी के संसर्ग से प्राप्त हुए हैं। व्याकरण की विभिन्न पुस्तकों में यत्किंचित् सामग्री विरामचिह्नों पर भी है। इस पुस्तक में पहली बार इन्हें विस्तार से समझाया गया है; जिससे विद्यार्थी व सुधी पाठक लाभान्वित होंगे। प्रूफ-संशोधन कार्य उक्त दोनों से जुड़ा हुआ है। हिंदी पत्रकारिता में भी अब इसकी आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा है। साधारणत: हिंदी लेखक इस पुस्तक से लाभान्वित होंगे ही, साथ ही विद्वानों को इस दिशा में अंतिम रूप से निर्णय लेने में चिंतन का अवसर मिलेगा। "
Pagalkhana
- Author Name:
Gyan Chaturvedi
- Book Type:

-
Description:
ज्ञान चतुर्वेदी का यह पाँचवाँ उपन्यास है। इसलिए उनके कथा-शिल्प या व्यंग्यकार के रूप में वह अपनी औपन्यासिक कृतियों को जो वाग्वैदग्ध्य, भाषिक, शाब्दिक तुर्शी, समाज और समय को देखने का एक आलोचनात्मक नज़रिया देते हैं, उसके बारे में अलग से कुछ कहने का कोई औचित्य नहीं है। हिन्दी के पाठक उनके 'नरक-यात्रा', 'बारामासी' और 'हम न मरब' जैसे उपन्यासों के आधार पर जानते हैं कि उन्होंने अपनी औपन्यासिक कृतियों में सिर्फ़ व्यंग्य का ठाठ खड़ा नहीं किया, न ही किसी भी क़ीमत पर पाठक को हँसाकर अपना बनाने का प्रयास किया, उन्होंने व्यंग्य की नोक से अपने समाज और परिवेश के असल नाक-नक़्श उकेरे।
इस उपन्यास में भी वे यही कर रहे हैं। जैसा कि उन्होंने भूमिका में विस्तार से स्पष्ट किया है, यहाँ उन्होंने बाज़ार को लेकर एक विराट फैंटेसी रची है। यह वे भी मानते हैं कि बाज़ार के बिना जीवन सम्भव नहीं है। लेकिन बाज़ार कुछ भी हो, है तो सिर्फ़ एक व्यवस्था ही जिसे हम अपनी सुविधा के लिए खड़ा करते हैं। लेकिन वही बाज़ार अगर हमें अपनी सुविधा और सम्पन्नता के लिए इस्तेमाल करने लगे तो?
आज यही हो रहा है। बाज़ार अब समाज के किनारे बसा ग्राहक की राह देखता एक सुविधा-तंत्र-भर नहीं है। वह समाज के समानान्तर से भी आगे जाकर अब उसकी सम्प्रभुता को चुनौती देने लगा है। वह चाहने लगा है कि हमें क्या चाहिए, यह वही तय करे। इसके लिए उसने हमारी भाषा को हमसे बेहतर ढंग से समझ लिया है, हमारे इंस्टिंक्ट्स को पढ़ा है, समाज के रूप में हमारी मानवीय कमज़ोरियों, हमारे प्यार, घृणा, ग़ुस्से, घमंड की संरचना को जान लिया है, हमारी यौन-कुंठाओं को, परपीड़न के हमारे उछाह को, हत्या को अकुलाते हमारे मन को बारीकी से जान-समझ लिया है, और इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं कि अब वह चाहता है कि हमारे ऊपर शासन करे।
इस उपन्यास में ज्ञान चतुर्वेदी बाज़ार के फूलते-फलते साहस की, उसके आगे बिछे जाते समाज की और अपनी ताक़त बटोरकर उसे चुनौती देनेवाले कुछ बिरले लोगों की कहानी कहते हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book