Romeo, Juliet Aur Andhera
(0)
Author:
Jan Otčenášek, Nirmal VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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पॉल, एक चेकोस्लोवाक युवा छात्र और एस्थर, एक यहूदी लड़की—अर्थात रोमियो-जूलियट जैसे पवित्र प्रेम में आकंठ निमग्न दो युवा हृदय...अलग-अलग डालों पर खिलने के बावजूद एक साथ महमहाते और झूमते...कि तभी उनके ऊपर नाज़ियों की शक्ल में अँधेरा उतर आया...यह उपन्यास वस्तुतः नैसर्गिक प्यार के प्रस्फुटन और उसके असामयिक अन्त का मर्मस्पर्शी आख्यान है। साथ ही यह निरपराध मनुष्यता को कहीं भी रौंदते फ़ौजी दमन, अन्धराष्ट्रीयता, और बर्बरता के ख़िलाफ़ ऐसी आवाज़ है, जिसे पूरी गम्भीरता से सुना जाना चाहिए।
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About the Book
पॉल, एक चेकोस्लोवाक युवा छात्र और एस्थर, एक यहूदी लड़की—अर्थात रोमियो-जूलियट जैसे पवित्र प्रेम में आकंठ निमग्न दो युवा हृदय...अलग-अलग डालों पर खिलने के बावजूद एक साथ महमहाते और झूमते...कि तभी उनके ऊपर नाज़ियों की शक्ल में अँधेरा उतर आया...यह उपन्यास वस्तुतः नैसर्गिक प्यार के प्रस्फुटन और उसके असामयिक अन्त का मर्मस्पर्शी आख्यान है। साथ ही यह निरपराध मनुष्यता को कहीं भी रौंदते फ़ौजी दमन, अन्धराष्ट्रीयता, और बर्बरता के ख़िलाफ़ ऐसी आवाज़ है, जिसे पूरी गम्भीरता से सुना जाना चाहिए।
Book Details
-
ISBN9789360863227
-
Pages208
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अन्तिम अरण्य निर्मल वर्मा का आख़िरी उपन्यास है जिसका प्रकाशन दो सदियों के सन्धि-बिन्दु पर वर्ष 2000 में हुआ था। हिन्दी समाज में एक घटना की तरह प्रकट हुआ यह उपन्यास लम्बे समय तक चर्चाओं का विषय रहा।
कुछ समीक्षकों ने इसे मृत्यु का आख्यान कहा, लेकिन यह ठीक-ठीक वही नहीं है, नश्वरता का एक गहरा अहसास इस उपन्यास के केन्द्र में ज़रूर है। जीवन के एक विशिष्ट मोड़ पर आकर ठहरे हुए इसके चरित्र एक तरह से अपने भीतर की यात्रा पर निकले हैं और इस तरह जिजीविषा और मृत्यु की अपरिहार्यता का अन्वेषण करते हुए उस जीवन से साक्षात्कार करते हैं जो जिया जा चुका है, लेकिन अभी भी स्मृतियों के रूप में सजीव है।
पूरा उपन्यास नैरेटर की डायरी की शक्ल में सामने आता है जिसमें वह मेहरा साहब से बात करते हुए नोट्स लेता है। वह स्वयं भी अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर तलाश रहा है। अतीत, वर्तमान और भविष्य में आवाजाही करते हुए इस तरह एक संश्लिष्ट कथा बनती है जो अन्त तक आते-आते एक आध्यात्मिक और निर्मल ऊँचाई तक पहुँच जाती है।
पहाड़ और पहाड़ का जीवन इस उपन्यास में एक सम्पूर्ण पात्र की तरह मौजूद जो इसके विमर्श को और गहराता है, कथा को एक विलक्षणता प्रदान करता है और बिम्बों, प्रतीकों, छवियों का एक भूगोल रचता है जिससे अस्तित्व से जुड़े गहन प्रश्नों को एक विराट पृष्ठभूमि मिलती है। अन्तिम अरण्य निर्मल वर्मा का आख़िरी उपन्यास है जिसका प्रकाशन दो सदियों के सन्धि-बिन्दु पर वर्ष 2000 में हुआ था। हिन्दी समाज में एक घटना की तरह प्रकट हुआ यह उपन्यास लम्बे समय तक चर्चाओं का विषय रहा।
कुछ समीक्षकों ने इसे मृत्यु का आख्यान कहा, लेकिन यह ठीक-ठीक वही नहीं है, नश्वरता का एक गहरा अहसास इस उपन्यास के केन्द्र में ज़रूर है। जीवन के एक विशिष्ट मोड़ पर आकर ठहरे हुए इसके चरित्र एक तरह से अपने भीतर की यात्रा पर निकले हैं और इस तरह जिजीविषा और मृत्यु की अपरिहार्यता का अन्वेषण करते हुए उस जीवन से साक्षात्कार करते हैं जो जिया जा चुका है, लेकिन अभी भी स्मृतियों के रूप में सजीव है।
पूरा उपन्यास नैरेटर की डायरी की शक्ल में सामने आता है जिसमें वह मेहरा साहब से बात करते हुए नोट्स लेता है। वह स्वयं भी अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर तलाश रहा है। अतीत, वर्तमान और भविष्य में आवाजाही करते हुए इस तरह एक संश्लिष्ट कथा बनती है जो अन्त तक आते-आते एक आध्यात्मिक और निर्मल ऊँचाई तक पहुँच जाती है।
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भारत और यूरोप दो ध्रुवान्तों का नाम है, एक-दूसरे से जुड़कर भी दो अलग-अलग वास्तविकताएँ। खींचकर या सिकोड़कर उन्हें मिलाया नहीं जा सकता। लेखन के प्रति ईमानदार रचनाकार के लिए इस वास्तविकता को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके बिना न सिर्फ़ युग-यथार्थ की पहचान असम्भव हो जाएगी बल्कि उसे उसकी विविधता के साथ रचना में अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकेगा, क्योंकि कोई भी लेखक सत्य की एकांगिता के सहारे यथार्थ का मुक्त द्रष्टा नहीं हो सकता।
‘भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र’ निर्मल जी के अपरम्परित सोच और निष्कर्षों को अपेक्षाकृत विकसित रूप में निरूपित करती है। भारत और यूरोप की अपनी-अपनी चिन्तन-परम्परा के मूल आधारों को व्याख्यायित करते हुए वे यहाँ उस रचनात्मकता की आलोचना करते हैं, जो अपने स्वाभाविक आधारों की उपेक्षा करती है। उनके अनुसार कला और साहित्य की प्रासंगिकता का सवाल अपनी सांस्कृतिक परम्परा से कटकर हल नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में उनके ही शब्दों को उद्धृत किया जाए तो “भारतीय परम्परा में कला और दुनिया के यथार्थ के बीच का सम्बन्ध हमेशा से ही कुछ पवित्र माना जाता रहा है। उसमें एक तरह की आवेगपूर्ण मांसलता रही है और मांसलता ऐन्द्रिक होने के बावजूद एक प्रकार की ईश्वरीय दिव्यता में आलोकित होती है...”
इस पुस्तक में शामिल ‘भारतीय संस्कृति और राष्ट्र’, ‘भारतीय जीवन की निराशाएँ’, ‘क्या साहित्य समाज से कट चुका है?’ और ‘आलोचना के भटकाव’ जैसे प्रश्नाकुल निबन्ध हमारी आज की चिन्ताओं तक आते हैं।
Thigaliyan
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

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निर्मल जी की कहानियाँ हमें जीवन के किसी अदेखे से पल को उसके पूरे विस्तार में फैलाकर थमा देती हैं। एक साधारण से मनुष्य के इर्द-गिर्द लिपटी चलती पीड़ा की झीनी-सी परत सहसा एक बड़े फलक पर अर्थवान हो उठती है; हर जगह अदेखे से जिये जाते सामान्य-साधारण लोगों को उनकी उसी साधारणता में आलोकित कर देने की इसी कला को निर्मल वर्मा की भाषा और दृष्टि का जादू कहा जाता है।
‘थिगलियाँ’ में निर्मल जी की अभी तक असंकलित कहानियाँ पहली बार एक साथ प्रकाशित हो रही हैं। इनमें से ज़्यादातर कहानियाँ साठ के दशक में लिखी गईं और विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। इन कहानियों में जो विशेष है, वह है पात्रों की मन:स्थितियों और उनके सामाजिक भूगोल का अत्यन्त स्पर्श्य चित्रांकन।
ये कहानियाँ न अपने मन्तव्य को ऊँचे स्वर में घोषित करती हैं, न दुख के उस तार को कहीं ढीला पड़ने देती हैं, जिसको चिह्नित करना ही लेखक का उद्देश्य है—उसके पूरे तनाव के साथ। इतिहास और समाज के विराट विस्तार में अवस्थित सामान्य लोगों की सामान्य दैनंदिनी के ये महीन चित्र नाटकीय घटनाओं के निर्जीव विवरणों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा वास्तविक लगते हैं।
‘रिश्ते’ के महीप, एला और सुरमा, ‘बैगाटेल’ के हेमंती और सुमेर, ‘थिगलियाँ’ की चंदा बीबी और मास्टर जी, ‘रात और दिन’ की प्रेमा, ‘इशारे’ के अमर बाबू—ये सभी पात्र उतने ही आम हैं, जितना हर कोई होता है, और उतने ही ख़ास भी।
इस पुस्तक में निर्मल जी के दो अपूर्ण उपन्यास भी शामिल हैं।
Itihas Smriti Akanksha
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

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क्या मनुष्य इतिहास के बाहर किसी और समय में रह सकता है? क्या हम वही हैं जो हम दिखाई देते हैं या बीते हुए समय की प्रकृति, लाखों जीव-जन्तुओं और ख़ुद मनुष्य की सैकड़ों सृष्टियाँ हमारी चेतना में कहीं मौजूद हैं? क्या आज का मनुष्य अतीत की अनेकानेक विस्मृत सृष्टियों का स्मारक है? आधुनिक मनुष्य जिसका अस्तित्व इतिहास और स्मृति के दो छोरों पर अटका हुआ है, और जिसकी आत्मखंडित चेतना अवधारणा तथा वास्तविकता के बीच झूलती रहती है, अपने सत्य तक कैसे पहुँचता है? कलाकृति का सत्य क्या है? धार्मिक और सेक्युलर के विभाजन ने हमारे सांसारिक अनुभवों को कैसे प्रभावित किया? ये और ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिन पर निर्मल वर्मा इस पुस्तक में शामिल व्याख्यानों में अपनी विशिष्ट चिन्तन-शैली में विचार करते हैं। स्मृति, इतिहास, विचारधारा, कला-अनुभव और साहित्य के अनेक आधारभूत प्रश्नों पर उन्होंने निबन्धों में भी बार-बार विचार किया है, इन व्याख्यानों में वह प्रक्रिया और घनीभूत दिखाई देती है। ‘वत्सल निधि’ द्वारा आयोजित डॉ. हीरानन्द शास्त्री स्मारक व्याख्यान माला की दसवीं कड़ी (1990) के रूप में दिए गए ये व्याख्यान निर्मल वर्मा के चिन्तक पक्ष को गहराई से रेखांकित करते हैं और हमें पुन: उन प्रश्नों पर लौटने को आमंत्रित करते हैं जिन्हें हमने बीते दो-तीन दशकों में साहित्य-चिन्तन की परिधि से जैसे बाहर ही कर दिया है।
Har Barish Mein
- Author Name:
Nirmal Verma
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निर्मल वर्मा अपनी इस पुस्तक और इसके निबन्धों को भी, दो पूर्ण बिन्दुओं के बीच की कड़ी मानते थे। विधा के रूप में भी ये आलेख यात्रावृत्त और निबन्ध के बीच कहीं ठहरते हैं, ‘जहाँ न भोग का सुख है, न समाधान का निश्चय’। अपने दूसरे यूरोप प्रवास के दौरान उन्होंने यूरोप की धड़कन, उसके गौरव और शर्म के क्षणों को बहुत नज़दीक से देखा-सुना था। इस लिहाज से यह पुस्तक एक ऐसी नियतिपूर्ण घड़ी का दस्तावेज़ है, जब बीसवीं शती के अनेक काले-उजले पन्ने पहली बार खुले थे। दुब्चेक काल का प्राग-वसन्त, सोवियत-स्वप्न का मोह-भंग, पेरिस के बेरिकेडों पर उगती आकांक्षाएँ—ऐसी अभूतपूर्व घटनाएँ थीं, जिन्हें हमारी ढलती शताब्दी की छाया में निर्मल वर्मा ने पकड़ने की कोशिश की, किसी बने-बनाए आइने के माध्यम से नहीं बल्कि सम्पूर्णतया अपनी नंगी आँखों के सहारे।
शायद यही कारण है कि इस पुस्तक के निबन्ध कभी-कभी एक ऐसे ‘निर्वासित’ लेखक के रिपोर्ताज जान पड़ते हैं, जिनमें उन्होंने ‘युद्ध’ के मोर्चे पर घायल संस्कृतियों के घावों को जैसा देखा, वैसा ही आँकने की कोशिश की और भारतीय आत्मसन्तोष से हटकर, ख़ुद अपने देश की व्यवस्था को इन घावों में रिसते देखा।
वैज्ञानिक प्रगति के अकल्पनीय चरणों को पार करने के बाद आज भी जब हम देखते हैं कि इतिहास से न राजनीति ने कुछ सीखा है, न संस्कृतियों और धर्मों ने, तो इन निबन्धों को पढ़ना, इनकी अन्तर्दृष्टि तक पहुँचना और ज़रूरी जान पड़ता है।
Aadi, Ant Aur Aarambh
- Author Name:
Nirmal Verma
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‘भारत सिर्फ़ एक ‘नेशन स्टेट’ नहीं है। शताब्दियों से हमारे देश की सीमाएँ वे स्वागत-द्वार रही हैं जिनके भीतर आते ही उत्पीड़ित और त्रस्त जातियाँ अपने को सुरक्षित पाती रही हैं।’
यह लिखते हुए निर्मल वर्मा यह भी कहते हैं कि एक प्राचीन वट-वृक्ष की तरह भारतीय संस्कृति ने अपनी छाया तले अनेक समुदायों को ऐसा पवित्र स्पेस दिया जहाँ वे मुक्त हवा में साँस ले सकें।
क्या आजादी के बाद हमने एक राष्ट्र के रूप में अपनी इस विराटता को छीज जाने दिया?
ऐसे ही प्रश्नों पर मनन करते हुए इस पुस्तक के निबन्ध उस आत्म-उन्मूलन को भी रेखांकित करते हैं जिसके चलते आधुनिक मनुष्य अपने ही स्पेस में शरणार्थी जैसा हो चला है। अलग-अलग अवसरों पर लिखे गए इस पुस्तक के अधिकांश निबन्ध, भले ही उनके विषय कुछ भी हों, आत्म-उन्मूलन के इस ‘अन्धकार’ को कहीं-न-कहीं चिह्नित करते हैं।
भारतीय बुद्धिजीवी की भूमिका, धर्म और साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और भारतीयता आदि विषयों के अलावा यहाँ संकलित निबन्ध हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े कुछ प्रश्नों को भी अपने दायरे में लेते हैं।
चेकोस्लोवाकिया पर सोवियत सेना के आक्रमण और भारत के आपातकाल से जुड़े दो आलेख भी इस पुस्तक में शामिल हैं।
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