Shadi Se Peshtar
About the book
शादी, ख़ासकर लड़कियों की एक कठिन, जटिल और अत्याधुनिक समस्या बनती जा रही है। वह जीवन का एक मुक़ाम है, परम और चरम लक्ष्य नहीं, ऐसी प्रतीति पढ़ी-लिखी और तथाकथित आधुनिक लड़की को भी नहीं हो पाती, क्योंकि बहुत कुछ बदलने के बावजूद समाज जस का तस रह गया है। जींस पहननेवाली बाल-कटी लड़की राहगीरों को भले ही आज़ाद, खिलंदड़ और कभी-कभी लड़का तक होने का आभास दे या भ्रम पैदा करे, लेकिन उसकी और उसके संकटग्रस्त माता-पिता की तलाश अच्छा-सा लड़का और ठीक-ठाक घर ढूँढ़ने से आगे नहीं जा पाती। यह तलाश एक अथक और जानलेवा प्रयत्न बन जाती है और बार-बार असफल होने पर एक ऐसी प्रतीक्षा का रूप ले लेती है, जो तरह-तरह के भय, नए-नए नुस्ख़े आज़माने, ज्योतिषियों के चक्कर लगाने और समय को भरने के दबाव पैदा करती रहती है। जब तक शादी न हो तब तक लड़की क्या करे? ‘शादी से पेशतर’ की कई लड़कियों में एक डेज़ी कहती है, ‘‘कुछ सोचो मत बस करती चली जाओ।’’ क्या करती चली जाओ? नए-नए कोर्स—ब्यूटीशियन बनने के, कम्प्यूटर विशेषज्ञ बनने के, इंटीरियर डेकोरेटर बनने के और न जाने क्या-क्या। इस करते जाने के पीछे एक धुँधला-सा संकेत अपने पैरों पर खड़े होने का भी ज़रूर रहता है, लेकिन वह शादी को ही ‘मोक्ष’ मानने के कारण ठोस रूप ग्रहण नहीं कर पाता। ‘शादी से पेशतर’ हमें एक ऐसे अन्तःपुर के एकदम भीतर ले जाता है, जिसकी विदीर्णता का हम अनुमान भी नहीं लगा पाते क्योंकि हमें जो दिखाई पड़ता है, उसी को देख रहे होते हैं। यह एक ऐसा कोलाज़नुमा लघु उपन्यास है जो सरसरी दृष्टि से पढ़ने पर सतह पर ही तैरता मालूम पड़ता है, पर ध्यान देने पर यह बताता है कि सतह सिर्फ़ सतही नहीं होती, उसमें नीचे गहराई और डूब भी रहती है। लेखिका बिना किसी लेखकीय टिप्पणी और गुरुगम्भीरता के शादी का इन्तज़ार करती हुई लड़कियों से हमारी इस तरह मुलाक़ात करवाती है कि हम परेशानी महसूस करने लगते हैं। वह हमें लड़की देखने आए लोगों में बैठा देती है।
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About the Book
शादी, ख़ासकर लड़कियों की एक कठिन, जटिल और अत्याधुनिक समस्या बनती जा रही है। वह जीवन का एक मुक़ाम है, परम और चरम लक्ष्य नहीं, ऐसी प्रतीति पढ़ी-लिखी और तथाकथित आधुनिक लड़की को भी नहीं हो पाती, क्योंकि बहुत कुछ बदलने के बावजूद समाज जस का तस रह गया है। जींस पहननेवाली बाल-कटी लड़की राहगीरों को भले ही आज़ाद, खिलंदड़ और कभी-कभी लड़का तक होने का आभास दे या भ्रम पैदा करे, लेकिन उसकी और उसके संकटग्रस्त माता-पिता की तलाश अच्छा-सा लड़का और ठीक-ठाक घर ढूँढ़ने से आगे नहीं जा पाती। यह तलाश एक अथक और जानलेवा प्रयत्न बन जाती है और बार-बार असफल होने पर एक ऐसी प्रतीक्षा का रूप ले लेती है, जो तरह-तरह के भय, नए-नए नुस्ख़े आज़माने, ज्योतिषियों के चक्कर लगाने और समय को भरने के दबाव पैदा करती रहती है। जब तक शादी न हो तब तक लड़की क्या करे?
‘शादी से पेशतर’ की कई लड़कियों में एक डेज़ी कहती है, ‘‘कुछ सोचो मत बस करती चली जाओ।’’ क्या करती चली जाओ? नए-नए कोर्स—ब्यूटीशियन बनने के, कम्प्यूटर विशेषज्ञ बनने के, इंटीरियर डेकोरेटर बनने के और न जाने क्या-क्या। इस करते जाने के पीछे एक धुँधला-सा संकेत अपने पैरों पर खड़े होने का भी ज़रूर रहता है, लेकिन वह शादी को ही ‘मोक्ष’ मानने के कारण ठोस रूप ग्रहण नहीं कर पाता। ‘शादी से पेशतर’ हमें एक ऐसे अन्तःपुर के एकदम भीतर ले जाता है, जिसकी विदीर्णता का हम अनुमान भी नहीं लगा पाते क्योंकि हमें जो दिखाई पड़ता है, उसी को देख रहे होते हैं। यह एक ऐसा कोलाज़नुमा लघु उपन्यास है जो सरसरी दृष्टि से पढ़ने पर सतह पर ही तैरता मालूम पड़ता है, पर ध्यान देने पर यह बताता है कि सतह सिर्फ़ सतही नहीं होती, उसमें नीचे गहराई और डूब भी रहती है।
लेखिका बिना किसी लेखकीय टिप्पणी और गुरुगम्भीरता के शादी का इन्तज़ार करती हुई लड़कियों से हमारी इस तरह मुलाक़ात करवाती है कि हम परेशानी महसूस करने लगते हैं। वह हमें लड़की देखने आए लोगों में बैठा देती है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2001
- Weight
- 272 grams
- ISBN-13
- 9789360869977
- Pages
- 144
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 22 cm
- Language
- Hindi
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