Radio Kosi
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रेडियो कोसी की शुरुआत तो दो प्रेमियों ने आपस में बतियाने के लिए की, लेकिन आवाज़ वह बन गई साढ़े तीन सौ गांवों और लाखों लोगों की। प्रह्लाद इस रेडियो का आविष्कारक और अभियंता था, और प्रेमिका दीपा, रेडियो जॉकी। कानों पर हेडफोन लगाकर सुबह-सुबह आंगन बुहारती हुई वह अपने-अपने अंधेरों में डूबे उन गाँवों के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम शुरू कर देती।</p> <p>वे लोग जो कोसी तटबंधों के बीच आज भी फँसे हैं, जिन के पास स्वतंत्र भारत के नागरिकों को प्राप्त कोई सुविधा नहीं है, न अस्पताल हैं, न सड़क, न स्कूल, न बिजली; जो अभी भी सदियों पहले के वक्त में जी रहे हैं—बाढ़ की मार को सीधे झेलते हुए, जीने की जद्दोजहद करते हुए। कहानी का एक मोड़ यह संकेत भी देता है कि इनके दुख-दर्द को समझने-जानने के लिए भले ही देश का तंत्र वहां न पहुंचे लेकिन वोट मांगने और कानून के नाम पर दमन करने जरूर पहुंच जाता है।</p> <p>अपने साथ भारी मात्रा में गाद लाने वाली कोसी इस गाद के चलते ही अगले साल अपना रास्ता बदल देती है और अनेक गाँव फिर उसकी चपेट में आ जाते हैं। इसी को देखते हुए नदी को दो तटबंधों के बीच सीमित रखने की योजना आजादी के कुछ साल बाद बनी, लेकिन उन तटबंधों के बीच जो गाँव पड़ते थे उन्हें वहीं रहने दिया गया। पुनर्वास के नाम पर जो हुआ वह भी धोखा साबित हुआ।</p> <p>यह उपन्यास इसी कहानी की तरफ हमारा ध्यान खींचता है जिसके बारे में अभी भी बहुत से लोग नहीं जानते हैं।
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रेडियो कोसी की शुरुआत तो दो प्रेमियों ने आपस में बतियाने के लिए की, लेकिन आवाज़ वह बन गई साढ़े तीन सौ गांवों और लाखों लोगों की। प्रह्लाद इस रेडियो का आविष्कारक और अभियंता था, और प्रेमिका दीपा, रेडियो जॉकी। कानों पर हेडफोन लगाकर सुबह-सुबह आंगन बुहारती हुई वह अपने-अपने अंधेरों में डूबे उन गाँवों के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम शुरू कर देती।</p>
<p>वे लोग जो कोसी तटबंधों के बीच आज भी फँसे हैं, जिन के पास स्वतंत्र भारत के नागरिकों को प्राप्त कोई सुविधा नहीं है, न अस्पताल हैं, न सड़क, न स्कूल, न बिजली; जो अभी भी सदियों पहले के वक्त में जी रहे हैं—बाढ़ की मार को सीधे झेलते हुए, जीने की जद्दोजहद करते हुए। कहानी का एक मोड़ यह संकेत भी देता है कि इनके दुख-दर्द को समझने-जानने के लिए भले ही देश का तंत्र वहां न पहुंचे लेकिन वोट मांगने और कानून के नाम पर दमन करने जरूर पहुंच जाता है।</p>
<p>अपने साथ भारी मात्रा में गाद लाने वाली कोसी इस गाद के चलते ही अगले साल अपना रास्ता बदल देती है और अनेक गाँव फिर उसकी चपेट में आ जाते हैं। इसी को देखते हुए नदी को दो तटबंधों के बीच सीमित रखने की योजना आजादी के कुछ साल बाद बनी, लेकिन उन तटबंधों के बीच जो गाँव पड़ते थे उन्हें वहीं रहने दिया गया। पुनर्वास के नाम पर जो हुआ वह भी धोखा साबित हुआ।</p>
<p>यह उपन्यास इसी कहानी की तरफ हमारा ध्यान खींचता है जिसके बारे में अभी भी बहुत से लोग नहीं जानते हैं।
Book Details
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ISBN9789395737425
-
Pages152
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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नारायण एक सितारवादक है। जीविका के लिए वह परिवार को दूसरी जगह छोड़कर अपने पुराने शहर में आता है और यहीं से मकान की तलाश शुरू होती है। इस दौरान उसका सितार से साथ छूटने लगता है; और अब वह जिनके साथ जुड़ता है, उनमें मकान बाँटनेवाला अफ़सर है, कर्मचारी-यूनियन का नेता बारीन हालदार है, पुरानी शिष्या श्यामा है, वेश्या-पुत्री सिम्मी है और वे तमाम तत्त्व हैं जो ज़िन्दगी के बिखराव को तीखा बनाते हैं। इस संघर्ष, शोषण और अव्यवस्था के दौर से गुज़रते हुए तीक्ष्ण प्रतिक्रियाएँ व्यक्त होती हैं : ‘मज़ाक़ देखा तुमने? हम आसमान में उपग्रह उड़ा सकते हैं पर इस निगम के सीवेज़ के लिए मशीनों का जुगाड़ नहीं कर सकते। यहाँ सीवेज़ की सफ़ाई के लिए तो बलि के बकरे चाहिए, पर बिस्कुट बनाने के लिए यहाँ नई से नई मशीनें मौजूद हैं...’
‘जैसे कुछ तांत्रिक लोग शराब पीने से पहले माँ काली के नाम पर दो-चार बूँदें ज़मीन पर छिड़क देते हैं; वैसे ही हाउसिंग की पूरी-की-पूरी स्कीम गटकने से पहले चतुर लोग हरिजनों के नाम पर दस-बीस प्लॉट निकाल देते हैं...’ उपन्यास का अन्त सर्वथा अप्रत्याशित मोड़ पर होता है।
‘मकान’ यशस्वी कथाकार श्रीलाल शुक्ल की बहुप्रशंसित कृति है। वस्तुत: संगीत की पृष्ठभूमि में कलाकार के जीवन की आकांक्षाओं, ज़िम्मेदारियों, विसंगतियों और तनावों को केन्द्र बनाकर लिखा गया हिन्दी में अपनी तरह का यह पहला उपन्यास है।
Abhibhavak Kaise Hon
- Author Name:
Acharya Mayaram 'Patang'
- Book Type:

- Description:
"शिक्षकों और बालकों पर पुस्तकें चाहे कम ही सही, परंतु लिखी गई हैं। माता-पिता या अभिभावक कैसे हों? इस विषय पर पहली बार ही कोई पुस्तक हिंदी साहित्य में प्रकाशित हुई है। मुझे पहल करने का गौरव प्राप्त हो रहा है। इस पुस्तक की शैली भी अनोखी है। अभिभावकों का प्रशिक्षण कार्यक्रम हो रहा है। हर विषय के विशेषज्ञ उसमें अपने व्याख्यान दे रहे हैं। फिर शंका-समाधान के लिए प्रश्न एवं उत्तर की व्यवस्था से पुस्तक और अधिक सरल तथा सरस बन गई है। माता-पिता अपने बच्चों की तथा परिवार की भलाई के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढें़। इसमें ऐसा बहुत कुछ मिलेगा, जो माता-पिता बन जाने के बाद भी हमें पता नहीं है। हमें अपने दायित्व का बोध नहीं है। हम या तो बच्चों को मारते-डाँटते हैं या शिक्षकों को दोष देते रहते हैं। मेरा दावा है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद हम सच्चाई को समझेंगे, अपने कर्तव्य को जानेंगे, समझेंगे तथा निभाएँगे।
Utarti Hui Dhoop
- Author Name:
Govind Mishra
- Book Type:

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आधुनिक भारतीय समाज में कॉलेज-जीवन का यथार्थ क्या है ? अध्ययन, प्रेम और रोमांस या कि हमारी परम्परागत सामाजिकता के विभिन्न दबाव ? निश्चय ही गोविन्द मिश्र का यह उपन्यास हमें इन सवालों के जवाब देता है, लेकिन किसी गणितीय गुणा-भाग से नहीं, बल्कि एक भावप्रवण काव्यात्मक रचाव के साथ।
समर्थ रचनाकार के नाते गोविन्द मिश्र की एक अलग पहचान है और हमारे मध्यवर्गीय जीवन में उन्होंने नारी-स्वातन्त्र्य तथा प्रेम एवं काम-सम्बन्धों की बहुस्तरीय पड़ताल की है। कहने की आवश्यकता नहीं कि उनका यह बहुचर्चित उपन्यास भी एक ऐसी ही पड़ताल का नतीजा है। इसमें उन्होंने एक कॉलेजियेट युगल के धूप-छाँही रोमांस और परवर्ती परिस्थितियों के परिणामस्वरूप उनके मोहभंग का प्रभावी अंकन किया है। प्रेमिल स्मृतियों और अधूरे सपनों के प्रति उद्दाम आकर्षण के बावजूद अन्ततः उन्हें इस सच्चाई को स्वीकार करना पड़ता है कि सामाजिक यथार्थ उनके व्यक्तिगत भावावेश से कहीं ज्यादा अहम है। संक्षेप में, अपने तमाम रागात्मक खुलेपन के बावजूद यह कथाकृति हमें सामाजिक दायित्वबोध के स्वीकार की प्रेरणा देती है।
Vijaynagar Ki Rajnartki
- Author Name:
Balwant Singh
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प्राचीन दन्तकथाएँ अनेक देशों में प्रचलित हैं। अलिफ़-लैला की कथाओं में सिन्दबाद जहाज़ी अपनी एक यात्रा का विवरण देते हुए एक ऐसी बासी का वर्णन भी करता है, जो रत्नों से परिपूर्ण थी और जहाँ किसी भी मनुष्य का पहुँच पाना असम्भव था। विजयनगर में भी यह बात प्रसिद्ध थी कि राज्य के उत्तर में इसी प्रकार की एक घाटी है।
इस उपन्यास के पात्र ऐसे हैं, जिनमें सोचने-समझने का सामर्थ्य है और उन्हें इसका अवकाश भी है, परन्तु वे यह सब किसी विशेष दर्शन से प्रेरित होकर नहीं करते, वरन् एक आन्तरिक उत्कंठा के कारण करते हैं।
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